सखी तुम्हारा जाना मलय पवन का दह जाना है

सोनी पांडेय
कवयित्री सोनी पांडेय साहित्यिक पत्रिका गाथांतर की संपादक हैं. संपर्क :dr.antimasoni@gmail.com
आज तरंग सर के यहाँ से अभिनव कदम ले आई और खोलते ही एक युग भहरा कर यों गिरा की यादों की बस्ती में सैलाब आ गया. मैं चीख कर मन भर रोना चाहती हूँ. मन में हाहाकार मचा है .... जयप्रकाश सर को फोन किया ..... सर अंशु कैसे मरी ?....एक लम्बी साँस छोड़ कर उन्होने बुझे मन से कहा .... तुम सोचना कैसे मरी .....तुम उसे जानती हो ? सर ने पूछा ....जी .. मेरी क्लास मेट थी.  जयप्रकाश धूमकेतु सर ने उसकी कविताओं से बड़ी ही मर्मभेदी पंक्ति शीर्षक के लिये चुना था ... "मौन बेबस बाँसुरी कोने लगी " ,पहली ही पंक्ति ....अंशुरानी नहीं रही .....  वो नहीं रही ... शायद हार गयी या तोड़ दी गयी ,अपनी अनन्त कहानियों के साथ एक मृत्यु पुन: कील की तरह आ चुभी. अभी जैसे कल की ही बात हो ...एक बेहद गम्भीर लड़की हमारे स्कूल सोनी धापा खण्डेलवाल बालिका विद्यालय में दाखिल होती है. मैं चंचला , बातुनी और वह ....एक दम उसके विपरित. आकर अगली सीट पर बैठ जाती है ,किसी से कोई संवाद नहीं.कंधे तक  कटे खुले बाल ,गेहुँए रंग की दुबली -पतली लड़की में कुछ तो था जो मुझे तमाम नये चेहरों के बीच खींच रहा था. आँखों पर चश्मा चढ़ाऐ उसकी गर्दन नब्बे अंश का कोण बनाए किताबों  में मुँह ड़ाले झूकी रहती. संगीता सारस्वत ने गर्दन नचाकर कहा था ....ये तो गजब पढ़ाकू आईं. नर्गिस मुझे देख कर मुस्कुरा उठती ...शायद मुझे उकसाती ,कुछ पूछो ,......महीना बीत गया ,वह रहस्य ही रही.साधारण शक्लोसूरत की लड़की मुझे अपनी पहचान बनाने के लिए खूब संघर्ष करना पड़ा था स्कूल में. नौवीं - दसवीं में निरन्तर श्रम का परिणाम था कि मैं तीन हजार लड़कियों में विशेष पहचान बना चुकी थी.दो सालों से डिवेट चैंपियन. प्रार्थना कराने से लेकर क्लास मानीटरी तक में मेरी धाक बन चुकी थी. अंशु मुझे कभी कभार कनखियों से देखती और नज़र मिलते ही चेहरा घुमा लेती.

एक विचित्र आकर्षण हमारे बीच पैदा हो रहा था .. अनजाना सा. पहला संवाद हमारे बीच तब हुआ जब अगस्त में कक्षाऐं सुचारु रुप से चलने लगीं. हिन्दी टीचर आशा मैम ने दहेज पर निबन्ध लिखने को दिया ,सख्त हिदायत के साथ कि गाईड या भाषा भाष्कर से छपाई हुई तो कॉपी फाड़ दूगीं. अगले दिन पहली घंटी में सबकी कॉपीं जमा हो गयी. चेक कॉपियाँ हम मानीटर सबके नाम पढ़ कर बाँटती थीं. उत्तम ,अति उत्तम तो कई कॉपियों में दर्ज था पर सर्वोत्तम इस बार मेरी जगह अंशु की कॉपी में देख सारी लड़कियाँ उछल गयीं. मैं सोच में पड़ गयी , उसकी कॉपी खोल पढ़ने लगी ..... उसने बहुत प्रभावशाली लिखा था , पुष्ट भाषा , सशक्त उदाहरण. मैं मुस्कुरा उठी , उसे कॉपी पकड़ा मैंने मुस्कराकर कहा.. गजब ,क्या लिखा है तुमने .उसने मुस्कुराकर धीरे से थैक्स कह कॉपीं अपने बैग में रख लिया. मेरी मण्डली को बात हजम होने का नाम ही नहीं ले रही थी. रिकार्ड टूटा था ....शालिनी ने कहा ......यार लैंग्वेज तो देखो , किसी मोटी किताब से टीपा होगा देवी जी ने. शैल ने हामी भरी. विरोधी टीम अंशु की पीठ ठोंक रही थी ,कोई तो आया मुझे पटकनी देने वाला ....  हिन्दी में मेरे और अंशु के बीच खुली जंग छीड़ चुकी थी. वो नम्र - मैं उदण्ड , वो शीतल पवन मैं गर्मी की थपेड़े खाती - खिलाती लू , मैं भयंकर बातुनी वो हद से ज्यादा शान्त. हमारा कोई मेल नहीं था. पन्द्रह अगस्त के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मेरा भाषण अनीवार्य होता. संगीत टीचर सुशीला मैम कहतीं .... बाप की तरह नेता बनेगी. उस वक्त राजनीति में जाना पहला विकल्प था. प्रिंसपल शैलजा मैम मेरे मंच पर आते माईक बन्द करवा देतीं और हँस कर कहतीं ....इसकी आवाज तो यूँ ही डी.सी.एस. के.तक जाती है. मेरा उत्साह उस क्षण हिमालय हो जाता. मैं पूरे जोश में बोलती और तालियों की गड़गड़ाहट से प्रांगण गूंज उठता. कहना न होगा वो मेरे जीवन का स्वर्णीम दौर था.

मैं स्पीच देकर मंच से उतरी तो अंशु ने चमकती आँखों से मेरा स्वागत किया ....हाथ बढ़ाकर बधाई देते हुए कहा ....तुम बहुत अच्छा बोलती हो ,मैं मुग्ध हो गयी उसके इस पहल पर. दूसरे के विशिष्ट गुण को सम्मानीत करने का ये नायाब ढ़ंग मैंने अपने जलते हुए परिवेश में पहली बार देखा था.  हम उस दिन दोस्त हुए ....और शुरु हुई एक नयी कहानी. अंशु पढ़ने में तेज थी. मैं ठीक -ठाक. अगले दिन से हमारी सीट एक हो गयी. मैं कभी डांस में भाग लेती कभी कला प्रतियोगिता में ,कभी ऐंकरिंग तो कभी अभिनय. वाद -विवाद पर एकछत्र अधिकार था ही सो पढ़ाई का औसत होना लाज़मी था. कथकडांस क्लासेज भी जारी था. मोहित कृष्ण हफ्ते में एक दिन बनारस से हमें सुशीला मैम के घर डांस सिखाने आते थे. मैं अच्छी नृत्यांगना थी सो एक विकल्प क्लासिकल डांसर बनने का भी सामने आ रहा था. मैं खाली घण्टी में क्लास में जम कर धमाल मचाती ......मैं नाचती ....मधुबन में राधिका नाचे रे ....अंशु तालियाँ बजाती. कुछ था हम दोनों के बीच जो दिलों में जुड़ाव के पौधे रोप रहा था. आशा मैम ने निबन्थ लिखने को दिया .....हमारा जीवन -हमारा समाज , मेरे जीवन में अजब उथल -पुथल थी. बड़ी बहन की शादी दहेज के कारण टूट चुकी थी. ससुराल वालों की प्रत्याणना से उसके दिमाग में  खून का थक्का जमा जो काफी दिनों बाद सामने आया और परिणाम बहुत त्रासद रहा ....दी का मानसिक संतुलन बिगड़ने लगा. परिवार अग्रमुख से पतन की ओर मुड़ा ,पिता के थोक कपड़ों का व्यवसाय दी के इलाज में दर -दर भटकने के कारण डूबने लगा. दुकान बन्द रहने लगी. बाबूजी के पास सरकारी प्राध्यापकी होने के कारण अर्थ संकट तो नहीं आया किन्तु व्यवसाय डूबने से भारी क्षति उठानी पड़ी. शादी में अगुवाई मझले मामा के करने के कारण ननिहाल से सम्बन्ध विच्छेद हो गया. घर में माता -पिता के बीच दी की दूसरी शादी को लेकर कोहराम मचा रहता .


 दी दूसरी शादी को तैयार नहीं थी. उसके ससुर ने छोटी दी से जीजा की शादी का प्रस्ताव भेजा ,ये कहकर कि बड़ी का दिमाग खराब हो गया. घर में भूचाल उठ खडा हुआ.  बाबूजी की चहेती दिव्य सुन्दरी ,स्कालर बेटी के लिए ये प्रस्ताव .... बाबूजी धधक उठे. हम चार बहनों में या ये कहें कि पिता की पाँच संतानों में प्रभा के गौर वर्ण और तीव्र बुद्धिमत्ता के आगे सभी उपेक्षित थे.  मैं श्यामवर्णा तो घर में होकर भी उनकी दृष्टि में शून्य थी. प्रभा के सौन्दर्य की आभा में मैं निरा अन्धेरी चिन्ताओं में धकेली पिता की तीसरी कन्या सन्तान अपने अस्तित्व की लड़ाई अपने ढंग से लड़ती कब इतनी तूफानी नदी बनती चली गयी , पता ही नहीं चला. चारों तरफ प्रभा की जयकार ..... बाबूजी ने सख्ती से मना कर दिया और बड़ी दी के कोमल ह्रदय पर इस खबर से बज्र आ गिरा. वह और गुमसुम रहने लगी. अम्मा की दौड़ मुल्ला के मस्जिद की दौड़ की तरह गाँव से मऊ ,मऊ से गाँव की लगी रहती । लम्बी खेती का पूरा बोझ बाबूजी अम्मा पर डाल शिक्षक संघ की राजनीति में रम गये. इसी बीच मऊ स्वतंत्र रुप से जिला बना. घर में मुझे घुटन होती .....बड़ी बहन जिन्दा लाश बन चुकी थी. दूसरी अपने आगे हम दोनों छोटी बहनों को कुछ समझती ही नहीं थी. जब तक अम्मा रहतीं , घर में काम का कुहराम नहीं मचता ,उनके जाते ही पूरा घर मुझे सम्हालना पडता. मेरी देवी सी साध्वी बड़ी बहन तील -तील गीली लकड़ी की तरह सुलगती मृत्यु की तरफ बढ रही थी. घर मुझे काटता ,एक भी दिन स्कूल बंक नहीं करती. मेरे पास संवेदनशील दोस्तों का समृद्ध संसार था. सुधा ,सुनीता , मीरा ,शालिनी ,शैल और रंजना ये वो लड़कियाँ थीं जो मेरी दुखद घड़ी की शीतल छांव बन दुख हर लेती थी. अम्मा ने मेरी शादी के बाद पहली बार मायके जाने पर हँस कर नाउन से कहा था  ......

.ये आ गयी , अब मेरे घर चीनी-चाय की पत्ती का खर्च बढ़ जाएगा. सहेलियों का जमघट लगता तो अम्मा की खैर नहीं ..... शालिनी सीधे अम्मा का फर्श टटोल कर पचास की नोट निकाल लाती और भाग कर गली में से चौहान की दुकान से गरम -गरम समोसे ले आती.  अम्मा हँस कर दे देती. मेरी सहेलियों के घर से अम्मा का आना जाना तक होता. स्नेहिल रिश्तों की कड़ी मेरे पिता का घर छोड़ने के बाद भी जस का तस चल रहा है.
ऐसे ही रिश्ते की कड़ी अंशु से जुड़ी ....अंशु हमारी मित्र मण्डली में आ जुड़ी.  निबन्ध लिखा गया.  आशा मैम मौलिकता पर विशेष ध्यान देती ,हम युध्दस्तर पर किताबों पढ़ - पढ़ कर उदाहरण ढ़ूढ़ते और निबन्ध लिखते. पढ़ाई में मैं औसत छात्रा हमेशा रही जिसका कारण बाबूजी मेरी उल -जुलूल किताबों में रुचि को ठहराते रहे. आज भी कहते हैं जितनी शिद्दत से प्रेमचन्द और हंस पढ़ती रही कोर्स पढ़ती तो आई.ए.एस.बनती. साहित्यिक किताबों के पढ़ने का नशा अंशु की सोहबत में परवान चढ़ने लगा. उसके दादा  साहित्यिक व्यक्ति थे. हंस की पुरानी प्रतियाँ अँशु बैग में छिपा कर लाती और धीरे से मेरे बैग में डाल देती. एक दिन छोटी दी  ने किसी बात पर चिढ़ कर  बाबूजी से लहरा दिया ....."आज कल नावेल पढ़ रही है." मेरा बस्ता चेक हुआ ..... माधुरी खन्ना मैम की राग - दरबारी और हंस निकल कर बाहर आई ....मुझे तीनों त्रिलोक दीखने लगा .....छोटे भाई -बहन सहमें खड़े मेरी कितनी कुटाई होगी की कल्पना कर रो रहे थे . दोनों किताबें जब्त हो गयी. मुझे काटो तो खून नही.अँशु खुद मुझे अपनी दादी से चोरी किताबें देती थी ,कारण ये किताबें उसकी दादी के पास पति की स्मृतियों की अन्तिम कड़ी थी ..जिसे वह गहनों से ज्यादा सहेज कर रखती थीं.

 बाबूजी ने शाम को मुझे बुलाया और पूछा किताबें किसकी हैं ?.....मैने बता दिया .....अँशु के परिवार के बारे में मेरी जानकारी अब तक ना के बराबर थी. इतना जानती थी महरनिया पर रहती है .....पिता व्यापारी हैं और दादी राजकीय स्कूल में टीचर है. एक बात मैं नोटिस कर रही थी ,मैं उसे बार - बार घर बुलाती थी लेकिन वह भूले से घर आने का न्यौता नहीं देती. बाबूजी के कोप से मैं बच गयी. छोटी दी कविताऐं लिखती थी ....उसकी लिखी कविताऐं स्थानीय देवल दैनिक और वनदेवी समाचार पत्रों में छपते ....आत्ममुग्द्धता और सौन्दर्य बोध की पराकाष्ठा ने उसे अंहवादी बना दिया था ....उस पर से पिता की सिर चढ़ी .....बाबूजी के सामने मेरी सारी अच्छाइयाँ शून्य बटा सन्नाटा सिद्ध होती. अँशु का मेरे घर आना -जाना शुरु हुआ. वह अक्सर रविवार के दिन अपनी छोटी बहन अपराजिता के साथ आने लगी ....कभी -कभी उसका छोटा भाई हिमालय भी आता ...घुंघराले बालों वाला हिमालय हमारे साथ खूब उछल -कूद करता. दोनों बहनें उसे कुँवर जी कह कर बुलाती थी .धीरे -धीरे संकोच कम होने लगा.अंशु बड़ी दी को खूब ध्यान से देखती .....एक शून्य उसकी गहरी आँखों का शांकल खोल चारों तरफ फैल जाता. हमारे घर में कोई परदेदारी दी को लेकर नहीं थी. एक दिन उसने मुझसे कहा - सोनी ! तुम्हें दुख होगा .... कुछ लड़कियाँ कहती हैं कि तुम्हारी बहन पागल है ...... मैं नम आँखों से उस वृहद शून्य के वृत्त से जा टकराई ......पागल तो वो लोग हैं जो ससुराल वालों को छोड़ इसका मूल्यांकन करने में लगे हैं कि मेरी बहन क्या है ? अंशु ...जानती हो डॉक्टर बेहरे कहते हैं कि इसे ठीक करने के लिए पति और ससुराल की सहानुभूति चाहिए ....और वह मिलने से रहा. ससुराल और समाज से उपेक्षित स्त्री आखिर जीए तो कैसे जीए ? मैं बिफर पड़ी
 
             
 उस दिन अंशु भी शालिनी और शैल की तरह खूब दी से बतियायी .दी खुश थी ....उस दिन उसने कई दिनों बाद खाना बनाया .....एक उम्मीद ने दस्तक दी .....अम्मा खुश थी ....शायद दी लौट आए पुराने जीवन में की आहट ने उस दिन सबको उम्मीदों का सूत्र पकड़ा दिया.अंशु मेरे घर में देखते -देखते सबकी चहेती हो गयी. अंशु हँसती नहीं थी .....मुस्कुरा भर देती हँसने वाली बात पर. उसकी मोती जैसी दंतपंक्तियाँ सावलें चेहरे की रौनक बढ़ा देतीं . एक दिन अचानक अंशु ने घर बुलाया ,मैं अम्मा से पूछ झट छोटी बहन लाडली के साथ उसके घर जाने को तैयार हो गयी. मुंशीपुरा  से हम दोनों बहने रिक्शे से महरनिया मुहल्ले उसके घर पहुँचे और क्या देखते हैं कि उसका घर हमारे पुरोहित बल्लभ महाराज के घर से बिल्कुल सटा हुआ था. हम चुपचाप छिपते हुए गली में पहुँचे, क्यों कि यदि कमलेश बुआ देख लेतीं तो पकड़ कर पहले अपने घर ले जातीं. अंशु के दो मंजिले मकान के निचले हिस्से में हिमालयन ट्रेडर्स नाम से पिता ने दैनिक उपभोग के ब्रांड़ेड़ सामानों की एजेंसी खोल रखी थी. अच्छे व्यापारी थे. हम दुकान में चाचाजी को नमस्ते कर नौकर के साथ अन्दर गये. अंशु को खबर लग चुकी थी .....वो सीढ़ियों से धड़धड़ाती हुई नीचे उतर रही थी. मेरे गले लग जोर से चीख उठी .....हैप्पी बर्थ ड़े सोनी ......मैं थोड़ी देर उसे नम आँखों से  निहारती रही .....शायद पहली बार मेरे वजूद पर किसी ने खुशी ज़ाहीर की थी. पकड़ कर अपने कमरे में ले गयी. बहुआ ने हँस कर मेरा स्वागत किया ,कुँवर जी और अपराजिता हमारे आस - पास उछल -कूद कर रहे थे ...अचानक ,कितना शोर हो रहा है कि एक रौबदार चेतावनी आयी और सभी सहम गए. बहुआ उठ कर चली गयी. सफेद साड़ी में एक लम्बी कद -काठी वाली बेहद गम्भीर महिला अंशु की दादी सीढ़ियाँ चढ़ती उसकी माँ पर भनभना रही थी. सभी शान्त थे. वह सीधे कमरे में आई......अंशु ने बताया ....ये सोनी है .....दादी  मेरे घर परिवार की गहन पड़ताल में लग गयी.

 बाबूजी को पूरे शिक्षक जानते थे.माध्यमिक शिक्षक संघ के महामंत्री बाबूजी जिले के शिक्षकों में गहरी पकड़ रखते थे. महरनिया दक्खिन टोले से अम्मा -बाबूजी का पुराना जुड़ाव था. यही से बाबूजी ने अपने जीवन संघर्ष का आरम्भ किया था.  बाबूजी जब मऊ आए तो यहीं अपने कुल गुरु देवकीनन्दन महाराज के मकान में कमरा लेकर रहते थे. अम्मा -बाबूजी के संघर्ष का चरम काल था. बाबा ने घर से किसी भी प्रकार की मदद देने से इन्कार कर दिया था. उन्हे जानकर खुशी हुई कि मैं शेषमणि त्रिपाठी की लड़की हूँ. उनके जाने के बाद हमारे लिए चाय नाश्ता लेकर उसकी माँ आई. अँशु और उसके भाई बहन माँ को बहुआ कहते थे. बहुआ बीए 0 बीएड 0थी. नौकरी न करने का उनको गहरा मलाल था. सास से खूब डरती थी. हमारी दोस्ती की गाड़ी सरपट भाग रही थी. हम खूब लिखते ....कविताऐं अधिक.  मैं स्कूल में सभी गतिविधियों में आगे रहती लेकिन अंग्रेजी बहुत कमजोर थी ...बाबूजी ने ट्यूशन नहीं लगवाया .....अन्त में फेल होने के डर से मैंने अंग्रेजी छोड़ कला ले लिया. कला अच्छा था मेरा ...संगीत ,साहित्य और कला मैं माँ से और वक्तव्य कौशल पिता से ले पूरे जोश में जीवन के स्याह पक्ष से लड़ रही थी. दी की स्थिति बद से बद्तर होती जा रही थी. लोग पकड़ पकड़ कर पूछते पुष्पा का क्या हुआ ?
मैं एक ऐसी मानसिक यातना के दौर से गुजर रही थी जिससे निजात केवल किताबें दिला सकतीं थी.  अब समस्या यह थी किताबें कैसे मिले ? हल निकल गया ....माधुरी खन्ना मैंम के पास अक्सर साहित्यिक किताबें रहती.... मैं उनसे किताबें तेल -पालिश लगा, लेती और झट- पट पढ़ कर लौटा देती. राग दरबारी से लेकर मैला आँचल ,पचपन खम्भे लाल दीवारे जैसी पुस्तकें चाटने की हद तक पढ़ चुकी थी.
            
 हम स्कूल में हर जगह हाथ में हाथ डाले घूमते और लड़कियाँ तोता -मैना कह कर चिढ़ाती. आशा मैम की अंशु चहेती छात्रा थी ...कुछ -कुछ शायद मैं भी ,वह उन्हें अपना लिखा अक्सर दिखाती , मैम खूब ध्यान से पढ़ती. कई बार मुझसे भी कहती. " दिखाओ भाई ..... मैं भी तो देखूं क्या लिखती हो ..और ये सुनते ही मुझे पतली टट्टी महसूस होने लगती. भय था ....बड़ा जबर .... शायद उनसे ज्यादा बाबूजी का ....कहीं कह न दें और मेरी कुटायी न हो जाए. हम ग्यारहवीं पास कर गये. एक दिन बल्लभ महराज के घर अम्मा मुझे लेकर गयी तो मैं सीधे बिना बताए उसके घर भागी. उस दिन एक नया सच मेरे सामने आया उसके जीवन का. जो हाल मेरी बहन का था ठीक वही उसकी  छोटी बुआ का था , जिसे वह हमसे छुपा कर रखती चली आ रही थी. शायद उसकी दादी नहीं चाहती थी.सभी आवाक मुझे देखते रहे ....दादी की आॉखों से बिना नाक किए आने की नाराजगी साफ पता चल रही थी. माहौल उस दिन उसके घर का भारी हो गया.अंशु असहज थी और मैं बेचैन ...एक और स्त्री की छटपटाहट मेरे सामने  .....ज्यादा देर नहीं ठहर पाई. उसके रहस्यमयी संसार से पर्दा उठ चुका था. मैं बुझे मन से घर लौट आई. स्त्री जीवन का हाहाकार मुझे मरघट सी निशब्द अगियाए अगन मे डूबे रहा था. बड़ी बहन की मृत्यु का उत्सव ,हाँ उत्सव ही तो था .....वह मरी और बहुतो ने चैन की साँस ली. पति त्याज्या का मर जाना उचित था ...क्या करती जी कर ? किसके लिए जीती ? पति ने क्या त्यागा संसार ने त्याग दिया. संसार का सबसे स्याह पक्ष उसके हिस्से था  ...उसकी सिसकती कराहो में गूँजता वह गीत याद आता है जिसे वह अक्सर बचपन में अन्ताक्षरी में अपनी बारी आने पर सर झूका कर गाती थी ...लो आ गयी उनकी याद वो नहीं आए .....


मृत्यु की अन्तिम बेला तक वह हा रमेश कहते मर गयी. बस एक बार उस निष्ठुर को देखना चाहती थी जो लेने तो आया पर शरीर चेतना शून्य होने पर. अपनी जिद की विजयी मेरी राजरानी बहन जीत गयी ...उमड़ा पूरा ससुराल पक्ष...जिस घर डोली चढ़ गयी ,जिद थी अरथी भी वहीं से उठे. चार कांधों पर चढ़ कर गयी ..उसका शव पिता की देहरी से विदा हुआ. शहर के सारे ब्राह्मण सुबह से शाम तक बाबूजी को समझाते रहे .....पिता के हाथों मुक्ति नहीं मिलेगी ....लाश उठ गयी ....कमलेश बुआ ने कहा -"जियते पियवा बात न पूछे मुअले पिपरे पानी.  " शायद उसके ससुराल मुन्ना भईया या उनके पिताजी खबर लेकर गये थे .. हम सब बेसुध थे....उसकी स्वर्ग की सिdhiयाँ उन्हीं लोगों ने बनवायी थी .....अब सुना है बड़े पत्रकार हो गये हैं .. उस दिन हमारे घर की आपदा के सबसे बड़े साथी .....मृत्यु की टीस में अक्सर याद आते है. वो दिन मृत्यु का कोलाहल और आज का दिन मृत्यु का सन्नाटा ....जोर का तमाचा ....अबला जीवन हाय तुम्हारी यही कहानी का आर्त नाद ....मैं फिर से रोती हूँ .इतना की धरती फट जाए और आकाश सुने भी न . तकिये को गार दूँ तो डूब जाए समुची सृष्टि .....
हम इण्टर पास कर गये. मैं कला वर्ग में सर्वोच्च अंक ले प्रथम श्रेणी में  वह सेकेण्ड क्लास. मेरे घर कोई खुशी नहीं ....वह जा रही थी उत्सवी मुस्कान संग गोरखपुर विश्वविद्यालय सतानन्द चाचा संग जाना तो मुझे भी था ,मेरिट सूची मे उससे ऊपर थी ,....सवाल पैसे का था .....बाबूजी कालिका सिंह से कह रहे थे .....तीन साल में तीस हजार बी.ए.करने में खपाऊँगा बाऊसाहब तो तिलक क्या चढ़ाऊँगा. उन दिनों पचास हजार में ठीक ठाक लड़के मिल जाते थे . मैं रह गयी अपनी विवशताओं संग उसे पंख मिला.  उन्ही दिनों एक साझा काव्य संग्रह में उसकी कुछ कविताऐं छपी. सतानन्द चाचा जी संग वह कभी आकाशवाणी तो कभी काव्य गोष्ठियों में शिरकत कर रही थी .

मैं एक बार फिर अपने खोह में.  शुरु में एकाध बार वह चाचा जी संग मेरे घर जरुर आई पर अब मिजाज बदला रहता. उसके चाचा जी मेरे आगे के दो उठे दाँत को देख बडदन्तुल कह परिहास उडाते. अम्मा को अब उसका आना खटकने लगा और हमारे मीठे सम्बन्धों का बन्धन सफलता -असफलता के प्रदर्शन में दरकने लगा.
याद आती हैं मुझे कई लड़कियाँ....एक वन्दना सिंह ....गजब की प्रतिभा नृत्यांगना तो ऐसी की मैं उन्हें नाचते देख मुग्ध हो जाती ....मोतियों सी लिखावट .... कविता वह भी लिखती थी और फिर एक दिन सुना जल कर मर गयी .....दूसरी दीपा शाही जिनकी कविता की पंक्ति " अन्दर बाहर बड़ी घुटन है , ये पल जीना बड़ा कठिन है ....... एक हाहाकार था इन लड़कियों की अन्तस चेतना में मुक्ति का ....और एक ठस से मन भर का प्रहार .....अम्मा ने बताया ...बच्चा नहीं हो रहा था .... मर गयी.  ये सारी लड़कियाँ सपने देख रही थीं ..शैलजा मैम कहतीं -"फिल्ड में जाओ तो सिल्ड लेकर आओ. "आशा मैम का गुरु मन्त्र -हक मिलता नहीं ,छीनना पड़ता है. याद आता है कल्पनाथ राय का व्यंग्य " सोनी धापा की कितनी लड़कियाँ चिट्ठी -पतरी से आगे बढ़ी ? तडप उठीं थीं सपने देखने वाली सारी लड़कियाँ.  मन करता है भर दूँ ढेर सारे सिल्ड - मेडल शैलजा मैम के आँचल में ....ये रास्ते उन्हीं की कमाई है. मै भारी मन से डी .सी .एस .के .से ग्रेजुएशन करने लगी. अब जीवन में साहित्य और साहित्यिक पत्रिकाओं का मोहभंग था. अम्मा ने उम्मीद से कहा था - अब इस डूबते घर की तुम्ही पतवार .....ऊपर की दो मंजिले ढह चुकी  थीं...बड़ी नियति की मार से दूसरी अपने जिद से .....

प्रेम की तलाश में प्रेम विवाह और सजनी अमीर सजना गरीब के समीकरण ने जम कर उथल पुथल मचाया ..... परिणाम ,मायके ठिकाना.  माँ ने कहा -तुम्हें सेतु बनना है. समझ में आ चुका था ....मुझे अच्छी लड़की बनने की अग्नि परीक्षा देनी है. अच्छी लड़कियों की तरह मैं  सिलाई कढ़ाई बुनाई और कुकरी कोर्स करने लगी. एक अच्छी बहू और पत्नी बनना मेरे लिए चिड़िया की आँख बेधना था.  साधारण शक्लोसूरत वाली सांवली लड़की मेरे समाज में घर भर की चिन्ता का विषय. जैसे तैसे एम. ए .किया और अम्मा का राग भैरवी चालू -"जाहिं घरे कन्या कुँवारी निंन्द क ईसे आई ........." बाबूजी दर दर वर तलाशते हताशा और निराशा के बीच गिरते -उठते घर लौटते तो अपने वजूद पर गहरा क्षोभ होता ....हम बेटियों की अन्तर वेदना का मापन यदि किसी मापक यन्त्र से हो सकता तो निश्चित उस क्षण वह  तड़ाक से फट पड़ता जैसे हाई वोल्टेज से बिजली के यन्त्र भड़ाम से फटते है. शादी की कथा फिर कभी .....कोई सन् 2001-2की बात होगी ....अंशु को बाबूजी चौक पर मिल गये ....मैं उन दिनों मऊ में थी ,पता चलते अंशु अपराजिता संग मेरे घर आ धमकी ..वही पुरानी चहक ....भोलू मेरी गोद में था ....तेल ,बुकवा ,दूध की गन्ध में नहाई मैं लरकोर औरत वो चहकती प्यारी मैना. छोटी बहन चाय -नाश्ता लेने चली गयी. मैंने पूछा क्या कर रही हो ?सम्पूर्णानन्द से पी एच डी ...मैं मुस्कुरा उठी ....ये हमारा कभी साझा सपना हुआ करता था. मेरे बेटे को दुलारते हुए उसने कहा ....ये तो भक्क गोरा है सोनी ...शायद अपने पापा जैसा ....मैंने सहमति में गर्दन हिलाया. वह नाराज थी ....शादी में नहीं बुलाया .....तुम भी तो भूल गयी ...मैं उसकी गहरी आँखों में देखते हुए कहा. अपराजिता ने आश्चर्य से कहा - दीदी आपका घर कितना बड़ा बन गया है.

अम्मा ने झट से टोका -तुम्हारा भी तो बड़ा है .....नज़र लगने के भय से. दोनों बहनों का चेहरा बुझ गया .....सोनी अब पहले जैसे हालात नहीं रहे ....पापा का बिजनेस डूब गया ......दादी नहीं रहीं .....घर गिरवी है ,मैं पढाती हूँ बनारस में ,छोटी को कहा ...ये भी ट्यूशन पढ़ाती है ....हिमालय भी सेल्समैनी कर रहा है ....। बहुआ का चेहरा घूम गया .....एक पढ़ी लिखी औरत को नौकरी न करने देने का विभत्स परिणाम बच्चों के संघर्ष के रुप में सामने था. अंशु उस दिन कुछ कहना चाहती थी .....उसकी आँखों में तीव्र बेचैनी के भाव थे ....अम्मा थी की ठसक के चौकी पर हमारे पास बैठी उठने का नाम ही नहीं लेती ....मैं भी पूछना चाहती थी बहुत कुछ पर अम्मा तो अम्मा ....अब कोई खतरा वह मोल नहीं लेना चाहती ....ड़टी रही जैसे सीमा पर प्रहरी ...उसकी नज़रों में वह बुरी लड़की थी ...अपने मन की ....ना जाने क्या -क्या महरनिया पर सुनती थी ....मैं पूछती तो उठ कर चल देती . रह गयी बहुत सारी बातें ,.....मुलाकातें ...आज होती तो मेरी दुनिया रंग खूब गाढ़ा होता ....बसन्त जैसा .
वह चली गयी लिख कर ....
 गन्ध बारुदी हवाओं में भरा
 मौन बेबस बाँसुरी कोने लगी ......
कोने लग गयी एक मेधावी लड़की ना जाने किस परिस्थिति में नहीं जानती. उसके घर जाने का साहस नहीं होता वह चाहती थी ये दुनिया प्रेमिका के चेहरे सा सुन्दर हो जाए ....जो होने से रहा. आज मन में बार -बार एक ही हूक उठती है .......सखी तुम्हारा जाना ,मलय पवन का दह जाना है.

सोनी मणि
संपादक
गाथांतर हिन्दी त्रैमासिक
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