देह का स्त्रीवादी पाठ और मित्रो मरजानी

शशिकला त्रिपाठी
 विभागाध्यक्ष , हिन्दी,वसंता कॉलेज, बनारस. उत्तरशती के उपन्यासों में स्त्री में स्त्री सहित कई आलोचना पुस्तक प्रकाशित shashivcr9936@gmail.com

किसी वरिष्ठतम रचनाकर की उस कृति का पुनर्मूल्यांकन करना जिससे उसकी पहचान पुख्ता हुई हो, आसान नहीं होता; उस स्थिति में और भी जब उसकी रचनाओं की संख्या दर्जन पार हो चुकी हो. ’बादलों के घेरे’ ’तिन पहाड़’ ’डार से बिछुड़ी’ ’मित्रो मरजानी’ ’यारों के यार’ ’ऐ लड़की’ ’समय सरगम’ ’हम हशमत’ (तीन खण्डों में समकालीनों पर संस्मरण), ’बुद्ध का कमंडल' लद्वाख’ आदि की लेखिका कृष्णा सोबती छठें दशक के कथा लेखन में विशिष्ट हस्ताक्षर बनकर उभरती हैं. उर्दू में इस्मत चुगताई और हिन्दी में कृष्णा सोबती ने ’स्त्री-यौनिकता’ को प्रमुखता से रेखांकित कर उन अनछुए पहलुओं को उजागर किया जो निराकार, निर्गुण या वायवीय नहीं होते. स्त्रियों की अबूझ मनोभूमि और तन के यथार्थबोध से कथा-साहित्य सचमुच उनसे समृद्ध हुआ. यशस्विनी कथाकर मन्नू भण्डारी और उषा प्रियम्वदा के बरक्स कृष्णा सोबती कथा के हिसाब से क्रान्तिकारी कहलायीं. ’मित्रो मरजानी’ में ’देह’ की सच्चाई की अभिव्यक्ति सारे ख़तरे उठाकर भी उन्होंने किया. बहुचर्चित यह रचना इन्हीं विशेषताओं के कारण विवादास्पद रही. किरदार मित्रो उपन्यास में ही हलचल पैदा नहीं करती वह हिन्दी-साहित्य की भी सतह को आन्दोलित करती है. उपन्यास में तन-मन का झंकार और बुद्धि, वाणी की पारस्परिकता इस तरह गुँथा गया है कि कभी पाठक रचनात्मक यथार्थ से अभिभूत होता है, कभी उसकी पेशानी पर बल पड़ता है तो कभी ठगा सा रह जाता है.

 मित्रो जैसी अलमस्त, अल्हड़, वाचाल निडर और ईमानदार चरित्र साहित्य में अनन्य है. उसके सारे बात-व्यवहार और क्रियाकलाप में देह-उत्सव का उत्साह उमड़ता है. उसकी तरुणाई का एक ही मकसद है आनन्द जिसके आयोजन के लिए हमेशा वह फिक्रमंद रहती है. ’समय सरगम’ की सत्तरवर्षीय आरण्या भी अपने अनूठेपन से चमत्कृत करती हैं. स्त्री-चिन्तन की पितामही मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट ने बड़े ज़ोरदार ढंग से कहा था कि स्त्री प्रज्ञा, बुद्धि में पुरुषों से कमतर नहीं. स्त्री को ’देह’ के रूप में देखने की ज़िद तो पुरुषों की रही है ताकि, वह उस पर शासन कर सके. इस तथ्य को स्त्री-आन्दोलनों में बार-बार रखा भी गया. फिर भी, विडम्बना यह कि उसे सामन्ती समाज ने ’भोग्या’ कहा और पूँजीवादी सभ्यता भी उसे ’देह’ की ही ज़द में समेटती रही है. ’मित्रो मरजानी’ जिसका प्रकाशन पहले लम्बी कहानी के रूप में 1966 में (अब पचास वर्ष हो गए) हुआ, बाद में विधा का अतिक्रमण कर वह उपन्यास होती है; उसमें स्त्री-देह का वर्णन-मूल्यांकन पुरुष-दृष्टि से नहीं, पहली बार स्त्री-दृष्टि से किया गया. पुरुष-वर्चस्व समाज ने यौनिकता के प्रसंग में पुरुषों की सराहना की, कहा ’साठा तब पाठा’ और स्त्री की यौनिकता की निन्दा ’संतान’ नहीं हुई तो स्त्री ’बाँझ’ कहलाई. ’सन्तानोत्पत्ति के लिए पुरुष ने दूसरा विवाह भी किया. किन्तु, स्त्री हर हाल में कुल की मर्यादा बनाकर विवाह-संस्था में बँधी अपने मन को ही नहीं, ’तन’ को भी मारती रही है. हिन्दी साहित्य में पहली बार कृष्णा सोबती ने स्त्रीपक्ष में ’सेक्सुअलिटी, को एक समस्या के रूप में उभार दिया. ’सेक्स’ अगर पुरुष के लिए आनन्दप्रद है तो स्त्री के लिए भी है.

स्त्री, सिर्फ ’करण’ कारक नहीं; ’कर्ता’ भी होना चाहती है परन्तु, पुरुष ऐसा नहीं होने देता. उसकी ’इच्छा’ या ’अक्षमता’ से स्त्री को समझौता करना पड़ता है. ’मर्द’ और ’पाठा’ जैसे जुमलों का प्रयोग इस सच्चाई ’स्त्रियों की कामशक्ति पुरुषों की तुलना में कई गुना ज़्यादा होती है’ को झुठलाने का मात्र कुटनीतिक प्रयास है कि साहसी लेखिका ने ऐसे अनछुए विषय को एक समस्या के रूप में ’मित्रो मरजानी’ में प्रस्तुत किया सातवें दशक में. लेकिन, इक्कीसवीं सदी में भी यह समस्या स्त्रियों  की हो सकती है, होती है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता.
उपन्यास की संरचना में पंजाबियों का मध्यवर्गीय कस्बाई परिवार है जिसमें सास-ससूर के रूप में धनवन्ती-गुरुदास हैं. उनके तीन विवाहित बेटे-बनवारीलाल, सरदारीलाल और गुलजारी हैं तथा उनकी पत्नियाँ हैं- सुहागवन्ती, समित्रावन्ती (मित्रो) व फूलावन्ती; मगर बच्चों की किलकारी या धमाचैकड़ी बिल्कुल नहीं है, यह सन्नाटा अचम्भित करता है. सम्भवतः रचनाकार के कथ्यार्थ का सीधा संबंध न होने से. कथानक की बुनावट में संवाद-संयोजन स्त्रियों के माध्यम से अधिक हुआ है ताकि, स्त्रियों की ज़िन्दगी अधिक मुखर हो. ’घर’ की अवधारणा ’घरवालियों’ से ही बनती है अतएव, उनकी बातचीत में ही समस्या को कथा शृंखलाओं में पिरोया गया है. इस संयुक्त परिवार में कोई भी प्रसंग ’व्यक्तिगत’ नहीं रहा पाता, सब कुछ पारिवारिक होता है, यह संयुक्त परिवार की विशेषता भी है.


 सास धनवन्ती अस्वस्थ पति के साथ ज्यादा समय बिताती है. जब कभी रसोईं में जाती है तो वहाँ बहुओं ख़ासतौर से परिवार से असन्तुष्ट फूलावन्ती द्वारा उनकी निगहबनी होती है. उसे घर के मालिक के लिए ही दूध लेना असहज लगता है तो भी वह, पति-बेटों के साथ समस्याओं का समाधान ढूढ़ती रहती है..उपन्यास में तीनों पुत्रवधुओं के रंग-ढंग अलग-थलग हैं. सुहागवन्ती बिल्कुल पारम्परिक, सीधी-साधी पुत्रवधू और पत्नी है और आचार-विचार और व्यवहार में पूर्णरूपेण कुलीन. सबसे छोटी फूलावन्ती इर्ष्या -द्वेष से ग्रसित झगड़ालू है. वह, न तो परिवार के प्रति  ज़िम्मेदारी का भाव रखती है और न ही सम्मान का. व्यवसाय एक होने से सभी भाई एक साथ हैं लेकिन, फूलावन्ती उनके बीच असहिष्णुता दर्शाकर पति गुलजारी के साथ मायके रहने का निश्चय करती है. गुलजारी, कठपुतली बना ससुराल में रहता तो है मगर खुश नहीं है, क्योंकि उसे अर्थसंकट भी बना रहता है. इस प्रकार, उपन्यास में संयुक्त परिवार की अनेकानेक समस्याएं, उठा-पटक, इर्ष्या -द्वेष और विघटनकारी तत्व मौजूद हैं. सास-ससूर और जेठ बनवारी, जिठानी सुहागवन्ती के सौहार्द्र और धैर्य से येन-केन प्रकारेण परिवार संयुक्त है. लेकिन, मझली बहू समित्रावन्ती की समस्या सबसे जुदा है इसलिए, वही प्रमुख चरित्र है. उसकी जैविक ज़रुरत, अर्थ-संकट से अधिक बड़ी समस्या प्रतीत होती है. फ्रायडीय सिद्धान्त उपन्यास को समझने में अधिक मददगार होता है. मित्रो, वाक्पटु, मुखर, हाज़िरज़वाब, मज़ाकिया और व्यंग्य-विधा में निपुण है. जबकि वह, शिक्षित हो, ऐसा कोई उल्लेख उपन्यासिका में नहीं है. वह, सबको हँसती खिझाती परेशान करती है और घर के लोग उसकी चिरौरी करते रहते हैं. वह, अपनी ज़िद और हठ में ऐंठी हुई रहती है.

उसकी स्वच्छन्दता खिलदड़ापन पूरे उपन्यास में अभिव्यंजित है. वह, पति सरदारी से प्रेम न करती हो, ऐसा नहीं; किन्तु उसकी शिकायत है कि पति में उसके लिए चाहत तड़प नहीं हैं. ’जिठानी तुम्हारे देवर सा बकलोल कोई और दूजा न होगा. न दुख-सुख, न प्रीति-प्यार न जलन-प्यास-- बस आए दिन धौल धप्पा-- लानत मलानत.’’2 पति का मतलब उसके लिए सही मायने में ’संगी’ है जो मन-तन की साझीदारी करे. लेकिन, सरदारी का व्यवहार संयुक्त परिवार के पुरुषों की भाँति पूर्णतया औपचारिक है. उससे सन्तुष्ट न होते हुए भी मित्रो उसे अर्थ-संकट से उबारने के लिए तीन-चार लाख रूपए भी देती है. परन्तु, उसका यह औदात्य या खिलंदड़ापन उपन्यास का केन्द्रीय कथ्य नहीं है, केन्द्रीय विषय है ’यौनिकता’ जिसके साझीदार स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं और सहमति में दोनों को आनंदानुभूति होती है. लेकिन, उपन्यास में मित्रो की समस्या उसकी देह-प्यास का न मिटना है. स्त्री की जैविक आवश्यकता को कभी तवज्जो नहीं दी गई. जब, स्त्री द्वितीय कोटि की है तो उसकी आवश्यकता महत्वपूर्ण कैसे हो सकती है ? कृष्णा जी ने मित्रो के माध्यम से पुरुषों की घोषित मर्दानगी पर सवालिया निशान लगाया है. स्त्री की आवश्यकता से कन्नी काटना और दमनात्मक रवैया अपनाना क्या पुरुषों का अन्याय  नहीं है ? प्रश्न यह कि अनंग का असर तो स्त्री पर भी होता है. पुरुष, अपनी कामनापूर्ति के लिए घर और घर से बाहर भी कई रास्ते निकाल लेता है लेकिन औरत.........

औरत अपनी देह-पिपासा का संकेत भी करे तो ’निर्लज्ज’ कहलाए. ’कामिनी’ की निन्दा गौतम बुद्ध, संत, भक्त कवियों सभी ने किया. पितृकुल और श्वसुरगृह दोनों संस्थानों में उसकी ’सेक्सुअलिटी’ पर नियन्त्रण रखने के लिए उस पर मर्यादा की चादर डाली जाती है. उसकी शुचिता ही इज्ज़त का पर्याय हुई. परन्तु, मित्रो काम की धधकती ज्वाला से शान्त नहीं रह पाती. वह कहती है, ’’मेरा यह बेकल मर्द जना यही नहीं जानता है कि मुझ जैसी दरियाई नार किस गुर से काबू आती है. मैं निगोड़ी बन-ठन के बैठती हूँ तो गबरू सौदा सुल्फ लेने उठ जाता है. जिसने नार-मुटियार को सधाने की पढ़ाई नहीं पढ़ी, वह इसे बालों की बलूगड़ी को क्या सधाएगा ? 3 मित्रो ऐसी उफनती नही है कि जेठ बनवरी को भी अपनी कामना धार में बहा लेना चाहती है. वह कहती है, ’’मर्द जन होते तो या चटखारे ले ले मुझे चाटते या फिर शेर की तरह कच्चा चबा डालते.’’4 वह, अपने अंग-प्रत्यंग के माधुर्य और देह सौन्दर्य पर खुद रीझती है. स्त्री परिवार की मर्यादा होती है.अगर वह ’विपथगा’ है तो परिवार पर आँच आयेगी. इसीलिए उपन्यास के सभी बड़े स्त्री-पुरुष पात्र मित्रो को समझाते रहते है. गुरुदास कहता है, ’’आँख का पानी उतर गया तो फिर क्या घर-घराने की इज्ज़त और क्या लोक मरजाद? सरदारी उस पर तोहमत लगाता उसे ’छिनालों की भी छिनाल’ कहता है. उसके रोग का इलाज उसके लिए संभव नहीं होता. बेबसी में उसके उद्दाम वेग पर नियंत्रण ’पिटाई’ द्वारा करना चाहता है. यानी, अपनी कमी को डण्डे के बल से झुठलाना चाहता है. नज़रे न मिला पाने की स्थिति में मित्रो को ही नज़र नीची करने के लिए पीटता है.

 तब धनवन्ती मित्रो  को समझाती है- ’तू ही आँख नीची कर ले. बेटी, मर्द मालिक का सामना हम बेचारियों को क्या सोहे ?5 जब तक ससुराल का प्रसंग कथानक में चलता है तब तक घरेलू स्त्री की छवि मित्रो में अन्य पात्र तलाशते हैं. जिठानी सुहाग कहती है, ’’सरदारी देवर देवता पुरुष हैं देवरानी. ऐसे मालिक से तू झूठ-मूठ का व्यवहार कब तक करोगी ? यह राह कुराह छोड़ दे बहना.’’6 हालांकि, उपन्यास में प्रत्यक्ष कोई कथा-संयोजन चरित्रहीनता का नहीं रचा गया है मगर, उसके लिए घर के बाहर बाज़ार तक में लोगों के व्यंग्य बाण चलते हैं. उसके चरित्र को लेकर सभी सशंकित हैं. ’इस कुलबोरन की तरह जनानी को हया न हो तो नित-नित जूठी होती  औरत की देह निरे पाप का घट है. ’7 सुहागवन्ती प्रार्थना करता है- ’’हे जोतेवाली देवी। इस घर की इज्जत-पत रखना.’’8 लज्जा का आवरण डालकर भारतीय स्त्रियाँ मन-तन की आवश्यकता को मारती रही हैं और उसी लज्जा को स्त्री का आभूषण माना गया. जयशंकर प्रसाद ने ’कामायनी’ का एक पूरा सर्ग ’लज्जा’ मनोभाव पर लिख डाला है. परन्तु, कृष्णा सोबती की मित्रो का संबंध लज्जा से तनिक भी नहीं है. वह यौवन के उमंग, तरंग में आकंठ निमज्जित रहती है. उसे, मर्यादा, नैतिकता जैसे मूल्यों का तनिक भी बोध नहीं है. देह की भूख उसके लिए उतनी ही प्राकृतिक है जितना साँस लेना.

लेखिका ने मित्रो जैसा उन्मुक्त व्यवहार, बिन्दास अन्दाज, पारदर्शिता व उसकी लज्जारहित वाणी के माध्यम से जिस स्त्री का निर्माण किया है, वह किसी कुलीन परिवार की बेटी नहीं हो सकती, ऐसी सोच, स्वयं कृष्णा जी की भी है इसीलिए, उन्होंने उसे ऐसी औरत की आत्मजा बताया है जिसका पारिवारिक जीवन नहीं है, अपितु, वह देह के कारोबार में संलग्न है. फिर भी मित्रो लेखिका के लिए सहानुभूति की पात्र है. शायद, इसलिए कि कृष्णाजी उन लोगों में शुमार हैं जो मनुष्य को जाति, वर्ग और जेंडर के कटघरे में बाँटने से पहले उसके आत्यंतिक सत्य को महत्व देती हैं- शबारी ऊपरे मानुष सत्य.....9 निम्नमध्यवर्गीय गुरुदास के परिवार में वेश्या पुत्री मित्रो का आगमन चकित करता है. लगता है, लोग दहेज और सौन्दर्य से आसक्त हुए होंगें अन्यथा परिवारों में प्रायः ऐसा नहीं होता. मित्रो स्वयं कहती है,’’ सात नदियों की तारू, तवे सी काली मेरी माँ और मैं गोरी चिट्टी उसकी कोख पड़ी. कहती है इलाके के बड़भागी तहसीलदास की मुँहादरा है मित्रो...... अब तुम्हीं बताओं जिठानी, तुम जैसा- सत्तबल कहाँ से पाऊँ-लाऊँ देवर तुम्हारा मेरा रोग नहीं समझता......... और मेरी इस देह में इतनी प्यास है, इतनी प्यास कि मछली सी तड़पती हूँ.’’ 10 तात्पर्य यह कि संस्कार, नैतिक मूल्य पारिवारिक संरचना में निर्मित होते हैं। इसीलिए, विवाह के वक्त लड़के लड़की के कुल की छानबीन की जाती है. जब तक मित्रो गुरुदास के परिवार में रहती है, वह पाठकीय करुणा अर्जित करती है किन्तु, मायके पहुँचने पर, उसकी जो लीला रची जाती है; उसका ध्वन्यार्थ यही निकलता है कि परिवेश का असर चारित्रिक संरचना में सौ फीसदी होता है. वहाँ, उसकी अर्जित नैतिकता का गुब्बारा बहुत जल्दी फूटता है.



उपन्यास के उत्तरार्ध के पृष्ठों पर जिस तरह लेखिका ने ’स्त्री की स्वतन्त्रता को प्रश्नांकित किया है; यशपाल के उपन्यास  ’दिव्या’ की स्मृति ताज़ा हो जाती है कि ’वेश्या’ ही स्वतन्त्र होती है. अन्य के लिए अभिभावक पिता, पति या बेटे की अनुमति आवश्यक है.’’11 विवाह ’संस्था’ की जितनी भी आलोचना की जाय, उसकी जड़ें मजबूत है; कृष्णा जी भी उसके अस्वीकार के पक्ष में नहीं हैं. उन्होंने कुलवधू मित्रो और वेश्या बीबो के माध्यम से स्त्री के दोनो  पक्षों पर प्रकाश डाला है. बीबो को ’खसम’ न पाने की कचोट है तो ’बड़े-बडे बाघ छका डाले’ का अहंकार भी. मित्रो, मायके पहुँचकर ’घरवाले का मान-गुमान’ भुलाकर विपथपा होना चाहती है. माँ-बेटी की गरिमा भी वहाँ हवा हो जाती है, वे सिर्फ दो स्त्रियाँ रह जाती हैं. बीबो मित्रो से कहती है, ’’अरी लहर हो तो बुलाऊँ तेरी बगीची के लिए कोई माली ?’’ वह अपने पुराने साथी के पास उसे भेजने का उपक्रम भी करती है, तभी उसे आत्मग्लानि होती है, ’’एक दिन जो डिप्टी सौ-सौ चावकर तेरी शरजी आता था, आज वही इस लौंडिया से रंगरलियाँ मनाएगा. थू; री बालो तेरी ज़िन्दगी पर.12 निस्संदेह, उपन्यास में, आदर्श/नैतिकता का मुलम्मा हटाकर स्त्री पात्रों का रचाव प्राकृतिक ढंग से करने की कोशिश है. इसी कारण मित्रो कह पाती है- ’अपने लड़के बीज डालें तो पुण्य, दूजे डालें तो कुकर्म.’’ उसका यह तर्क सामाजिक मूल्यों के समक्ष चुनौनी है. अलबत्ता, व्यक्ति और समाज के द्वन्द्व का विकास क्रमिक होता हुआ दिखता है.

मित्रों के सारे कार्य-व्यापार में ’सेक्सुअलिटी’ की कुंठा है. इस तरह उपन्यास के चारित्रिक विश्लेषण के लिए मनोवैज्ञानिक अध्ययन अपेक्षित है. कृष्णा सोबती विवाह संस्था के विपक्ष में खड़ी नहीं है.उपन्यास का विषय बोल्ड होने के बावजूद भी उन्होंने मित्रो को जिस तरह सरदारी से प्रेम करते हुए दिखाया है, उसे, माँ बीबो के ’काले चेहरे पर दो चील की-सी आँखे’ दिखती हैं तो वह तड़प कर चीखती है-’तू सिद्ध भरों की चेली, अब अपनी खाली कड़ाही में मेरी और मेरे खसम की मछली तलेगी ? सो न होगा, बीबो कहे देती हूँ.’13 या बीबो का यह कहना......... ’’न-न री, अब इस ठठरी ठण्डी भट्टी का कोई वाली-वारस नहीं. कोई मरे मनुक्ख का नाम भी नहीं......14 वेश्या स्त्री के जीवन का निर्जन एकान्त, हाहाकार करता सन्नाटा इतना भयावह होता है कि मित्रो भय से काँप उठती है. उसे सरदारी लाल दिल के और करीब लगने लगता है. समस्या का निदान भिन्न परिवेशों की संरचना और मानसिक चेतना के बदलाव में ही होता है. उपन्यास का कथानक, पंजाबी भाषा की देशज साज, रवानगी, कविता जैसी अर्थव्यंजकता, झरने जैसा शब्द-प्रवाह और नदी जल जैसी ध्वन्यांत्मकता प्रभावित करती है.रचना की पठनीयता इतनी कि एक पाठ में ही उपन्यास समाप्त हो जाय. मित्रो मरजानी अमर कृति बन जाती है प्राकृतिक समस्याओं के उठान और समाधान के विमर्श हेतु, यही कारण है इसकी पठनीयत और लोकप्रियता का. सौ पन्नों की यह उपन्यासिका कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवादित होकर पढ़ी-पढ़ाई जा रही है, यह किसी भी रचना के महत्व का द्योतक है.

सन्दर्भ

1.  मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट-स्त्री अधिकारों का औचित्यसाधन, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
2. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 17, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
3. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 34, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
4. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 17, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
5.  कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 11, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
6.  कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 92, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
7 . कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 18, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
8. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी, पृ.सं. 19, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
9 .  गरिमा श्रीवास्तव-कृष्णा सोबती, के साथ साक्षात्कार, पृ.सं. 50, ’लहक’ मार्च-अप्रैल 2016 कोलकाता
10. कृष्णा सोबती-दिव्या, पृ.सं. 20, राजकमल
11. यशपाल-दिव्या, पृ.सं. 118-119, लोकभारती प्रकाशन
12. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी-पृ.सं. 108 राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
13. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी-पृ.सं. 111, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली
14. कृष्णा सोबती-मित्रो मरजानी-पृ.सं. 110, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली                    
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