देह बनाम मन की स्वतंत्रता की कहानियाँ

भावना मासीवाल
भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :bhawnasakura@gmail.com;
कहानी का संसार कल्पना और यथार्थ के बीच चित्रित महीन तंतुओं से सृजित होता है. यह महीन तंतु ही कहानीकार की अपनी लेखन या कहें की रचना कला है जो उसकी लेखकीय दृष्टि को जीवंत करती है. लेखिका की लेखकीय दृष्टि भी कल्पना और यथार्थ के बीच के इन तंतुओं से सृजित है जहाँ वह लिखती है. ‘समाज का वो अंतिम आदमी ही मेरी कहानियों का स्रोत और लेखन की प्रेरणा है . उसकी भाषा, मेरी भाषा . उसके भीतर की घुटन को स्वर व आकार देना ही मेरा ध्येय.’ 21वी सदी की समकालीन समस्याओं को जिन कहानीकारों ने अपनी रचना का विषय बनाया उनमें हुस्न-तबस्सुम निहां का नाम भी प्रमुख रूप से लिया जाता है. इनकी कहानियाँ जीवन से होकर गुजरती हैं और उन अनछुए पहलुओं को सामने लाती हैं जिन्हें हमारी नजरें न देख पाती हैं और न ही समझ पाती है. ‘नर्गिस ...फिर नहीं आएगी’ हुस्न तबस्सुम निहां का दूसरा कहानी संग्रह है इसके पूर्व इनका चर्चित कहानी संग्रह ‘नीले पंखों वाली लड़कियाँ’ रहा है. ‘नर्गिस ...फिर नहीं आएगी’ संग्रह में सत्रह कहानियाँ संग्रहित है. सभी कहानियों का कैनवास भले ही अलग-अलग रंगों से रंगा गया हो परंतु उन अलग रंगों में चित्रित सभी दृश्य ‘स्त्री’ पर केन्द्रित देखें जाते है. साथ ही इनकी कहानियाँ आज के बदलते मानवीय सरोकारों को भी अभिव्यक्त करती है. स्त्री स्वतंत्रता, समानता व अधिकार के मुद्दों को इनकी कहानियाँ उठाती हैं और स्त्री की दैहिक स्वतंत्रता पर चल रही लंबी बहसों से हमें बाहर निकाल ‘निर्णय’ की स्वतंत्रता के प्रश्न से रूबरू करवाती है.  आज़ादी के इतने लंबे संघर्ष और स्त्री अधिकारों के लिए ज़ारी संघर्षों के उपरांत आज भी हमारी बहस का केंद्र स्त्री की ‘सेक्सुअलिटी’ ही होती है.  जबकि उससे गंभीर बहस का मुद्दा उसके ‘निर्णय’ व ‘सोचने’ की आज़ादी का है ।

हुस्न तबस्सुम निहां ने स्त्री स्वतंत्रता का आशय स्त्री के खुद के प्रति लिए गए निर्णयो की आज़ादी को माना है. इसी कारण इनकी कहानियों के महिला पात्र अपने जीवन के निर्णय खुद लेते देखे जाते हैं फिर वह ‘तालों के तलातुम’ कहानी में कैद ‘मिसेज डिसूजा’ का व्यक्तित्व हो , जो अपनी जॉब से इस्तीफा देकर अपने और परिवार के लिए जीने का निर्णय लेती है या ‘थैंक्यू नेपोलियन’ कहानी की शमिता का व्यक्तित्व जो जिंदगी जीने के लिए बिना शादी के माँ बनने का निर्णय लेती है या फिर उन महिलाओं के अपने प्रति लिए गए निर्णयो की आज़ादी का संघर्ष हो जिसमें ‘तय्यब अली प्यार का दुश्मन’ कहानी की ‘नूरा’, ‘दैहिक ऋतुओं के पार’ की ‘रजनी’ या ‘वंचित मन’ कहानी की ‘नायिका’ का व्यक्तित्व, अपनी पूरी गरिमा के साथ उभर कर सामने आता है. यह तीनो कहानियाँ समाज के जाति आधारित असमान विभाजन पर भी प्रश्न उठाती है और एक ऐसी युवा पीढ़ी की ओर हमारा ध्यान केन्द्रित करती हैं जो समाज के रूढ़ मूल्यों को चुनौती देता है और अपने निर्णयों के प्रति सही साबित होकर दिखाता है. ‘तय्यब अली प्यार का दुश्मन’ कहानी की नूरा और अबरार सामाजिक बंधनों को तोड़कर प्रेम करते हैं उनका यह प्रेम भले ही समाज के तय शुदा मानदंडों में फिट नहीं बैठता परंतु दोनों का प्रेम उनके परिवारो को अनचाहे ही आत्मिक रूप से जोड़ देता है.  ‘वंचित मन’ कहानी का कैनवास भी समाज में जाति पवित्रता के प्रश्न पर केन्द्रित है. आज भी समाज में जाति के स्तर पर अपने से निम्न जाति को अस्पृश्य या कहे की अपवित्र समझा जाता है और शुद्ध होने के लिए ‘गंगा जल’ का प्रयोग किया जाता है. वंचित मन कहानी की नायिका कहती है ‘क्या माँ, आपकी ये गंगा-मैया कितनी पवित्र होगी, ये तो आप ही जाने.

 शहर के सारे नाले, परनाले, सीवरेज उसी में जाके गिरते हैं, सारा कूड़ा-कचरा उसी में फेंका जाए, फिर भी वो पवित्र है. कहानी की नायिका अपनी जाति से बाहर शिखर से प्रेम करती है. उसका यह प्रेम प्रतिष्ठा, कर्तव्य और दायित्वों के भारी भरकम शब्दों के जंजाल में फस कर दम तोड़ देता है. परंतु भविष्य में जब उसके अपने पिता तथाकथित निम्न जाति की महिला से विवाह कर घर छोड़ देते हैं तो एक आत्मिक संतोष का भाव कहानी की नायिका में देखने को मिलता है ‘आखिर पिता भी इस बंधी-बंधाई तथा प्रतिष्ठा और उमस भरी पवित्रता से पलायन कर ही गए.’  ‘दैहिक ऋतुओं के पार’ कहानी जातीय और वर्गीय असमानता के घेरो से बाहर निकल रजनी और फेरु के सात्विक प्रेम की कहानी है.  रजनी जो विवाह के 5 साल तक पति के प्रेम में सुखी थी अचानक चर्म रोग से ग्रसित हो जाती है और पति द्वारा तिरस्कृत कर घर से निकाल दी जाती है क्योंकि उसकी सुंदरता अब दागदार हो गई थी. वहीं फेरू रजनी को उसके वास्तविक रूप में अपनाता है और कहता है ‘बदन की छोड़ो. प्रेम दागी नहीं होता रज्जों, प्रेम-प्रेम होता है. स्त्री मन से अधिक तन की सुंदरता का आज का कांसेप्ट स्त्री को उसकी यौनिकता में ही देखने की बात करता है. ‘तुम्हारी यात्रा तो देह से शुरू होके देह पर ही समाप्त हो जाती है. तुम्हें क्या पता दैहिक यात्राओं के पार भी एक यात्रा है.' ‘दैहिक ऋतुओं के पार’ कहानी के माध्यम से लेखिका ने स्त्री मन के भीतर उठते उन प्रश्नों को उठाया है जो हर स्त्री के भीतर है.  क्या स्त्री महज शरीर से अधिक कुछ नहीं है ? उसका अपना शरीर ही क्यों उसका व्यक्तित्व निर्धारित करता है ?


‘आँधियों के छोर’ कहानी इस संग्रह की पहली कहानी है जो एन.आर.आई पुरुषों या कहें की दुल्हों पर केन्द्रित है जिनका सोचना है कि ‘इंडियन लडकियाँ चीप एण्ड बेस्ट होती है..और मैरेज करके लड़कियाँ यूज करो तो खर्च कम आता है.'  आज भी हमारे समाज में लड़कियों की शादी एन.आर.आई. लड़को से करना गर्व की बात मानी जाती है और लडकियाँ भी उज्जवल भविष्य के प्रति चिंतामुक्त हो यह विवाह स्वीकार कर लेती है. परंतु जिस भविष्य की उज्ज्वलता उन्हें इस ओर आकर्षित करती है वही जब यथार्थ होकर सामने आता है तो उनकी स्थिति भी सिम्मी की तरह हो जाती है. हाल के कुछ वर्षों में भारत में इस तरह के बहुत से ‘केस’ सामने आए हैं. यह हमारे समाज के बीच एक ज्वलन्त मुद्दा है जिसे लेखिका अपनी कहानियों में उठाती हैं इसके अतिरिक्त कई ओर मुद्दे भी इनकी कहानियों में उठाए गए हैं जिनमें बाजार और बाजार से उपजी संवेदनहीनता का मुद्दा प्रमुख है .भूमंडलीकरण के इस दौर में पारंपरिक संबंधों में तेज़ी से हो रहे संक्रमण के बदलाव को भी लेखिका ने अपनी कहानियों में दिखाया है. आज के बदलते परिवेश में पूंजी के वर्चस्व ने कैसे मनुष्य के संबंधों व उसकी प्राथमिकताओं को बदला है ‘तन्हाइयाँ’, ‘वापसी’, ‘भीतर की बात’ और ‘...कि शो खत्म हुआ’ संग्रह की कहानियाँ इन मानवीय संवेदनाओं पर केन्द्रित है. तन्हाइयाँ कहानी का नायक जहाँ अपने ही परिवार के भीतर अकेलेपन का शिकार है जो ताउम्र परिवार के लिए ओवरटाइम करता है अपनी जिम्मेदारियों के प्रति प्रतिबद्ध है बावजूद इन सब के अपने ही परिवार में संवादहीनता का शिकार होता है. यह कहानी आज के परिवारों की यथा-स्थिति पर केन्द्रित है जो ‘सेल्फ सेण्टरड’ होते जा रहे है.

‘पर्सनल स्पेस’ और प्राइवेसी ने जहाँ न केवल परिवार में माता-पिता और बच्चों के बीच दूरी कायम कर दी है बल्कि एक पिता का अपने बच्चों के कमरे में जाना भी बच्चों की निजता का अतिक्रमण लगता है. ‘थके क़दमों से आगे बढ़े और सहसा ऋतु के कमरे के सामने ठिठक गये. कमरे की सारी खिड़कियाँ भटो-भट खुली हैं और ऋतु कैनवास पर झुकी है . भीतर एक विचित्र भयावह बैचेनी चुभ गई.  वह तेज़ी से पीछे हट गए.  कहीं ऋतु देख ना ले, कहीं पकड़े ना जाएं; उनकी निजता का अतिक्रमण करते हुए.'  कहानी का पूरा कैनवास अकेलापन, अजनबीयत, प्राइवेसी और जीवन से विरक्ति के भाव को दिखाता हैं जो आज कि परिस्थितियों की उपज है. ‘भीतर की बात’ कहानी का कैनवास पूंजी और मनुष्य के बीच के बदलते और नए स्थापित रिश्तों की ओर ले जाता है. चन्दर और रमा के बीच आए दिन होती मार-पीट से सारा मोहल्ला परेशान है और इस मार-पीट का कारण उससे भी दिलचस्प. ‘रमा तू सोच, हमारे घर और हमारे बाल-बच्चों का खर्च कहाँ से पूरा होता है ? हमारी परचून की दूकान में कितनी आमदनी होती है ? इसी पर रहूं, तो एक रोटी भी ढंग से ना खाई जाए । सब चलता है अम्मा को मिलने वाली बापू की पेंशन से । पेंशन है कब तक ? जब तक अम्मा की सांस चले है .इसीलिए इसे खूब खिला-पिलाकर टाठी रखना है. इसे मरने नहीं देना है. ना ही बीमार होने पाए. नहीं तो सारा पैसा दवा-दारू पे उड़ जाएगा. सो, समझ-बूझकर काम ले. बच्चे को एक पहर दूध ना मिले तो ना सही मगर अम्मा की रातिब में कमी ना होने पाए .बूढी हड्डियाँ हैं, एक बार लड़खड़ाई तो ढ़हने में देर नहीं लगेगी.

वह दस बार दूध पिए, फल खाए, सोने का अंडा पाने के लिए मुर्गी को तंदुरुस्त रखना ही पड़ेगा रमा, इसमें ढिलाई का मतलब है, अपने हाथ-पांव काट लेना.' परिवार के भीतर गहराती यह मानसिकता प्रेम से नहीं बल्कि पूंजी से उपजी है. यह आज की भौतिकतावादी संस्कृति की देन है जिसने मानवीय संबंधों को पूंजी से कमतर बना दिया है. वापसी कहानी भी इसी भौतिकतावादी संस्कृति से उपजी कहानी है जो एक ओर सरकारी नीतियों व कार्यशैलियों से त्रस्त ग्रामीण समाज की मनः स्थिति और गरीबी को दिखाती है तो दूसरी ओर मानवीय संबंधों से अधिक पूंजी की महत्ता के वर्चस्व को. दुर्घटना में केशव का मरना और मुआवजे के समय ठीक होकर लौट आना, न उसकी अपनी माँ स्वीकार पाती है न पत्नी. माँ की आँखों में तमाम प्रयास के बाद भी वह चमक नहीं आ पा रही थी जो माँ को अपने खोए हुए बेटे को पाकर आती है ...बरसाती से कुछ कदम की दूरी पर. बैठक से आती पुकार पत्नी को छेद रही थी. उसका नम्बर अब कभी नहीं आएगा.’अम्मा हैरान थी. नियति भी क्या चीज है....’ ग्रामीण समाज की यह सामाजिक और आर्थिक स्थितियां ही हैं जिनके आगे आज का मनुष्य खुद को लाचार पाता है,  केशव की पत्नी और माँ का चरित्र इन्ही स्थितियों की तरफ हमारा ध्यान खींचता है.
भूमंडलीकरण ने जहाँ विश्व को ग्लोबल विलेज में तब्दील किया वहीं मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों को भी आभासी बनाया.‘...कि शो खत्म हुआ’ कहानी इसी आभासी दुनिया के भीतर से उपजी शिखर और तरंग के प्रेम संबंधों की कहानी है जो यथार्थ में सामने आते ही टूट जाते है. आभासी दुनिया ने आज हमें इस कदर जकड़ा है कि हमारे अपने पास के रिश्ते दूर होते चले जाते है.


इनकी कहानियाँ जहाँ एक ओर प्रेम के आभासी स्वरूप की ओर हमे ले जाती है, तो दूसरी ओर आध्यात्मिक व आत्मिक स्वरूप की ओर भी. ‘मेरा ख़त तुम्हारे नाम’, ‘कनक चंपा’ और ‘तेरी धूप, तेरी छाव’ तीनों कहानियाँ इसी पृष्ठभूमि पर लिखी कहानियाँ है. ‘तेरी धूप, तेरी छाव’ कहानी जरीना के प्रेम व समर्पण की कहानी है तो वहीं ‘मेरा ख़त तुम्हारे नाम’ कहानी प्रेम के आत्मिक क्षणों में नायक का अपनी मृत प्रियसी को याद करते हुए लिखी गई खतनुमा कहानी है. वहीं ‘कनक चंपा’ यथार्थ के धरातल पर उपजे आकस्मिक प्रेम की कहानी है  जिसे पढ़ते समय एक बार हमें फ्लैश बेक में ‘उसने कहा था’ कहानी याद हो आती है. आज के दौर में साहित्यिक दुनियां की चकाचौंध में नए लेखकों की क्या स्थिति है व उन्हें अपने लेखन को पाठक तक पहुँचाने के लिए किन-किन मुश्किलो से गुजरना पड़ता है और यदि वह प्रकाशक तक पहुँच बनाने व छपने में सफल भी हो जाते है तो प्रकाशक द्वारा उनके लेखन का किस रूप में शोषण होता है.‘स्वप्निल कैनवास के धुन्घले-घुन्घले रंग’ कहानी लेखक, रचना और प्रकाशक के बीच के इन्हीं संबंधों पर विस्तार से प्रकाश डालती है. साथ ही लेखक होने और भविष्य में नई पीढ़ी के लेखक नहीं बनने की भयावह पीड़ा को अभिव्यक्त करती है. हुस्न तब्सुम निहां की कहानियाँ उतर आधुनिकता के दौर में पूंजी और तकनीक के वर्चस्व से हास होती मानवीय संवेदनाओं से रूबरू कराती है. साथ ही आम आदमी की आर्थिक स्थितियों और उससे जद्दोजहद करती उसकी जिंदगी तक भी पाठक को ले जाती है. स्त्री होना आज हमारे समाज की सबसे बड़ी त्रासदी है

ऊपर से आर्थिक रूप से गरीब परिवार में होना. ‘और शाम ढल गयी’ कहानी ऐसे ही परिवेश से उपजी है जहाँ लड़की होकर पैदा होने और उसके प्रति जिम्मेदारियों से उसे बचपन से ही अहसास कराया जाता है. यही ज़िम्मेदारी बारह साल की ‘छुटकी’ को कब बड़ा बना देती है वह खुद भी नहीं जान पाती. छुटकी का आत्महत्या का निर्णय उसके परिवार के प्रति ज़िम्मेदारी का अहसास कराता है ‘अम्मा, हम लोग बड़ी निर्धनता में जी रहे हैं, सभी लोग दुःखी है.  तुम, बापू, दद्दा और इरा.  इसलिए मैं आत्महत्या कर रही हूँ. जब मेरे प्राण निकल जाए तो मेरी आँखे दद्दा को, मेरी किडनी बापू को लगवा देना, जब दोनों अच्छे हो जाएंगे तो इरा दी का ब्याह भी खूब अच्छा हो जाएगा ...मेरे बलिदान को व्यर्थ ना जाने देना अम्मा’, तो दूसरी तरफ लड़की होकर पैदा होना जिंदगी की सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी व बोझ होने का. हमारे समाज में आर्थिक हालात स्त्रियों को स्वतः ही सबसे पहले ज़िम्मेदार बना देते हैं क्योंकि अधिकांशतः उन आर्थिक स्थितियों के लिए उन्हें ही दोषी ठहराया जाता है.
हमारे समाज में आज भी महिलाएं स्वतंत्र होकर या कहें कि अपने निर्णय स्वयं लेने के लिए आजाद नहीं है वह क्या सोचती हैं या चाहती हैं उनकी प्राथमिकताएं आज भी गौण है. समाज में आज भी विधवा, तलाक शुदा और अकेली महिलाओं को जो ‘सिंगल वुमेन’ और ‘सिंगल मदर’ की अपनी भूमिका में खुश हैं साथ ही आर्थिक रूप से स्वतंत्र है. समाज व परिवार द्वारा अकेले होने और पुरुष के साथ की आवश्यकता का अहसास कराया जाता है  महिला का समाज में अकेला या सिंगल चाइल्ड मदर होना समाज में गुनाह है.


बिना शोहर की औरते आज भी समाज में अपमान की नजरों से देखी जाती है. माँ की शादी की बात, राहुल को जहाँ ख़ुशी देती है वही माँ भविष्य के प्रति आशंकित है क्योंकि वह जानती उसका यह सहारा किन शर्तो पर उससे बाधा जा रहा है समाज महिलाओं से पुरुष रूपी लादे गए सहारा देने की दकियानूसी सोच के तहत उनका आर्थिक व सामाजिक सहारा छीन लेता है व पुनः उन्हें अस्तित्वहीन बना देता है. ‘मेरी माँ की शादी’ ऐसी ही एक ‘सिंगल चाइल्ड मदर’ की कहानी है. समाज ने स्त्री को सदैव ही कमज़ोर माना और बनाया । उसके शरीर और उसकी यौनिकता को उसके चरित्र का मापदंड, जिसकी चाबूक हमेशा पुरुषों के हाथों में ही रही. ‘नर्गिस ....फिर नहीं आएगी’ कहानी इस संग्रह की अंतिम व ऐसी ही स्त्री पात्र की कहानी है जो अपने ही शौहर द्वारा चरित्रहीन बताकर घर से निकाल दी जाती है और पूरी उम्र उस चरित्रहीनता के दाग को साबुन से धोने का प्रयास करती हुई निमोनिया से मर जाती है. दूसरी और यह ऐसे मानसिक रूप से अस्वस्थ पुरुष पात्र की कहानी है जो यौनिकता को घर की चारदीवारी के भीतर भी ‘पति की चारदीवारी’ में कैद करने की इच्छा रखता है. यह कहानी प्रश्न करती है हमारे समाज में स्त्री-पुरुष सम्बंधों को हमेशा ही यौनिक संबंधों के पलड़ो में रख कर ही क्यों देखा जाता है. क्यों एक महिला को कमज़ोर करने के लिए उसके चरित्र को हथियार बनाया जाता ? शुद्ध-अशुद्ध, पवित्र-अपवित्र, सद्चरित्र-चरित्रहीन क्या तमाम तमगे महिलाओं के लिए ही निर्मित हैं ? ‘नर्गिस ...फिर नहीं आएगी’ एक मार्मिक कहानी है परंतु साथ ही कमज़ोर भी.

 कहानी अपने शिल्प में नहीं बल्कि अपनी पात्र नर्गिस के रूप में कमज़ोर प्रतीत होती है. नर्गिस का घर से निकलते समय कहना ‘ठीक है, अगर आपको यही मंजूर है तो यकीन मानो नर्गिस फिर नहीं आएगी.’ नर्गिस के व्यक्तितत्व की दृढ़ता को दर्शाता है वहीं नर्गिस का अपने चरित्र पर लगाए गए हर दाग़ को साबुन से धोने का प्रयास ‘नर्गिस बाजी, हर दाग साबुन से नहीं धुलता. वैसे अब तुम पर कोई दाग नहीं रहा, बिल्कुल साफ-सुथरी हो गयी. अब ये नहाना-धोना खत्म कर दो.’ नर्गिस का कहना ‘वाह भाभी अगर ऐसा होता तो क्या जहीर हमें लेने ना आ जाता’ कहानी में नर्गिस के चरित्र को कमज़ोर दिखाता है. जो इनके संग्रह की अन्य कहानियों के महिला पात्र शमिता, मिसेज डिसूजा, रजनी, नूरा आदि में नहीं देखने को मिलता है. कुल मिलाकर देखे तो ‘नर्गिस...फिर नहीं आएगी ’ कहानी संग्रह की सभी कहानियाँ परिवेशगत निर्मित है.  उनके पात्र, घटनाएँ भले ही हमे काल्पनिक प्रतीत हो परतुं वह सभी ही यथार्थ की भूमि से उपजे और कहानी में आए है. जहाँ एक ओर मुस्लिम परिवेश और उससे जुड़े मसले इनकी कहानियों का हिस्सा बनते हैं तो दूसरी तरफ हिंदू परिवेश भी उससे अछुता नहीं है. मसलन देखा जाए तो समस्याएं दोनों जगह समान हैं केवल अंतर है तो उनके स्वरूप का. स्त्री स्वतंत्रता का जो मुद्दा पश्चिम में उठा वह कुछ परिवर्तित रूप में भारत में आया. भारत में भी धर्म और सांस्कृतिक स्वरूप की भिन्नता ने उसे अलग-अलग रूपों में अपनाया. बावजूद इन सबके समस्यां का केंद्रीय बिंदु आज भी ‘स्त्री की यौनिकता’ है. स्त्री की यौनिकता के मसले को भले ही आज के लेखकों की तरह हुस्न तबस्सुम निहां अधिक तरजीह नहीं देती लेकिन वह उससे बड़े मसले पर बात करती है जिसे आज की महिलाएं सोचती और महसूस करती है. आज महिलाएं देह की आज़ादी से अधिक मन की आजादी या कहें की निर्णय की आजादी चाहती है. जिस दिन वह निर्णय लेने की स्वतंत्रता को पा सकेगी उस दिन उनकी देह खुद ब खुद स्वतंत्र हो जाएगी. ‘थैंक्यू नेपोलियन’ कहानी की शमिता का व्यक्तित्व कुछ इसी तरह का है.      
                                                                         

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