ये किताबें शर्तिया नुस्खा हैं लड़कों/ मर्दों के बदलने के

मनीषा कुमारी

सबलोग के ताजे अंक में  स्त्रीकाल कॉलम के तहत प्रकाशित 
                       
आधी आबादी के साथ पुरुषों जैसा बराबरी का सुलूक नहीं होता है . रीति- रिवाज, धर्म –संस्कृति, कानून  में व्याप्त गैर बराबरी हमारे सोचने-समझने के तंत्र को भी प्रभावित करती है , खुद स्त्रियों के आगे भी बहुत कुछ करने और सोचने में असमंजस ,द्वंद्व की स्थिति पैदा करती हैं, वे हाँ और न के बीच झूलती रहती हैं . यह एक लोकतांत्रिक देश है, जहाँ धर्म ,भाषा ,लिंग जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता हैं. लेकिन हकीकत कुछ और है .महिलायें अपने लिए अपना निर्णय भी नहीं ले सकती हैं. समाज में कोई महिला अकेले रहना चाहे तो यह निर्णय उसे कडवे अनुभव के लिए विवश करेगा. समाज ऐसी स्त्री को टेढ़ी नजर से देखता है . यहाँ तक कि इसके बावजूद कि संतान स्त्री के गर्भ में पलती है , किन्तु एक स्त्री को अपने गर्भ का ही फैसला लेने का अधिकार नही होता है. स्त्रियों को परम्परा और रीति रिवाजों से ऐसे जकड़ दिया जाता है कि अगर वे नए मूल्यों को आत्मसात करना भी चाहती हैं तो यह आसान नहीं होता . उन्हें ऐसा करने में कई पीढियां लग जाती हैं.

कई विडंबनाएं ऐसी हैं, जिनसे मुक्ति इतना आसान नहीं है . मसलन , महिलायें पुरुषों के लिए लम्बी उम्र के लिए व्रत रखती हैं,  वहीँ महिलाओं की लम्बी उम्र की जरुरत ही नहीं समझी जाती-भ्रूण से लेकर जीवन के हर मोड़ पर स्त्री की उम्र पर खतरे हैं. स्त्री को इज्जत का प्रतीक माना जाता हैं और समुदाय का इज्जत तार -तार करने का मैदान इनका शरीर बनता है, यही कारण है कि उन्हें साम्प्रदायिक और जातीय हिंसा में यौन हिंसा भी झेलना पड़ता है. स्त्री ऐसी स्थिति में अकारण , सिर्फ अपने स्त्री होने का दंश झेलती हैं . आज का वक्त पहचान और अस्मिताओं का है, जबकि स्त्रियों के आगे अपनी पहचान के साथ जीने का द्वंद्व  सबसे ज्यादा हैं यदि स्त्री के जन्म के साथ विवाह की चिंता के बजाय उनके विकास की चिंता की जाये, उनके रुचि  के अनुसार आगे बढ़ने की दिशा में बढ़ावा दिया जाए और स्वालंबी बनने की राह आसान की जाये तो न सिर्फ स्त्री का जीवन बेहतर होगा , बल्कि यह दुनिया भी बेहतर होगी .

जैसी चल रही हैं वैसी ही चलने दो दुनिया
बेशक न पैदा करो बेटियां ,न पैदा होने दो बेटियां 
फिर न कहना- कैसी थी कैसी है,  कैसी हो गई होगी दुनिया. 

स्त्रियों की मुक्ति के लिए जरूरी है कि पुरुषों की सोच बदले इसकी पहल ली जानी  चाहिए. इसी पहल के फलस्वरूप पुरुषों के लिए ‘लड़कों की खुशहाली के लिए शर्तिया नुस्खा’ सीरीज में चार किताबें प्रकाशित हुई हैं , लेखक हैं , नासिरुद्दीन और प्रकाशक ‘ सेंटर फॉर हेल्थ एंड सोशल जस्टिस’. शर्तिया नुस्खा सीरीज की इन चार किताबों को क्रमशः ‘कौन कहता है लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा?’, ‘लड़कियों के बारे में कितना जानते है’, क्या हमें पता हैं लडकियां क्या चाहती हैं  और ‘प्यार पाना है तो लड़कियों का दिल भी न दुखाना’ शीर्षक से लिखा गया है . किताब के प्रारम्भ में ही निर्मित मानस पर हमला करने के लिए एक चेतावनी लिखी गई है , ‘ यह किताब लड़कों और मर्दों के लिए है.’ ‘शर्तिया नुस्खा’ और ‘चेतावनी’ की शैली  में मर्दों को आक्रामक यौनिकता ,में ढालने की पुरुष-मानसकिता पर भी प्रहार करती है.


‘कौन कहता है लड़कियों के साथ भेदभाव हो रहा?’ शीर्षक किताब में बौद्धकालीन थेरी गीतों और आधुनिक समय के गीतों , कहावतों से यह बड़े आसानी से समझाया जा सका है कि समाज कैसे ‘ एक पुरुष’ और ‘ एक स्त्री’ को गढ़ता है . यह गढन इतना गहरा होता है कि लडकियां आजीवन द्वंद्व की शिकार हो जाती हैं . उन द्वंद्वों की पड़ताल भी की गई है , इस किताब में.  इस किताब के द्वारा लड़कों को सीख दी जा सकती है कि वे इस तरह का  भेदभाव ना करे जो वे बचपन से अपनी माँ या अन्य स्त्रियों के साथ होते देखते आ रहे हैं तभी हम ऐसे समाज की कल्पना कर पायेंगे जहाँ स्त्रियों को गरिमापूर्ण हिंसा रहित जीवन,  जीने का हक़ होगा जो समानता और बराबरी पर आधारित होगा

नासिरुद्दीन अपनी दूसरी किताब ‘लड़कियों के बारे में कितना जानते है’ में 250 प्रश्नों के माध्यम से , उनके उत्तर के विकल्पों के साथ इन प्रश्नों के पाठक और उत्तर देने वाले लड़कों / मर्दों को यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि वे स्त्रियों के प्रति क्या सोच रखते हैं, क्या वे स्त्री को जानते हैं?  किताब के कुछ सवाल हैं , मसलन , क्या हमें उनके पसंद का ख्याल रखना चाहिए,क्या उन्हें पढ़ाना चाहिए क्या वे अपना निर्णय ले सकती हैं क्या उन्हें अपनी पसंद की शादी करनी चाहिए या क्या अपनी इच्छा से पुरुष साथी चुनाव करने का अधिकार है कि किस के साथ यौन सम्बन्ध बनाने का अधिकार है क्या उन्हें अपनी कोख पर अधिकार है? इन सवालों के माध्यम से बहुत हद तक पुरुष अपने आप को, अपनी सोच के बारे में जान सकते हैं,  जिससे वे अपने आप को, समाज को बहुत हद तक प्रभावित कर सकते है और ऐसे में ऐसे  समाज का निर्माण करने की कल्पना की जा सकती हैं , जहाँ हर स्त्री अपना फैसला स्वतंत्र रूप से ले सके.

क्या हमें पता हैं लडकियां क्या चाहती हैं  के माध्यम से कहा गया है कि लड़कों को लगता हैं कि हम सब जानते है, कि हमारी माँ, बहन,भाभी, पत्नी या बेटी क्या चाहती हैं. जबकि अहम बात यह है कि जब लड़के  उनकी उम्मीद को समझेंगे तभी उन्हें अच्छी तरह से जान पाएँगे.  इसके लिए लड़कों को अपनी माँ बहन भाभी पत्नी या बेटी उन्हें वह सब आजादी देनी होगी, जिसका इस्तेमाल वे खुद करते हैं उन्हें रोजमर्रा के काम में सहयोग देना होगा. उन्हें खुद अपने काम करना होगा . जब शादी  के बाद लडकी ससुराल आती हैं तो क्या उसे आजादी और बेफिक्री मिलती है,  जो शादी से पहले थी?  क्या उसे वह सम्मान मिलता हैं जो अन्य रिश्तेदार को मिलता है.  ऐसे में हमें इस बात का ध्यान रखना होगा कि उन्हें भी वह सम्मान मिलना चाहिए, जिसकी उम्मीद मर्द करते है. लड़कों को उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना होगा. , मर्दों को उनका स्वामी नही पार्टनर बनना होगा तभी वे उन्हें अच्छी तरह से समझ सकेंगे . इस किताब के माध्यम से बहुत हद तक इस भ्रम को दूर किया जा सकता है कि महिलायें सिर्फ घरेलू काम काज के लिए हैं,  उनकी कोई शारीरिक और मानसिक आवश्यकता नही हैं

इस सीरी  की चौथी किताब ‘प्यार पाना हैं तो लड़कियों का दिल भी न दुखाना’ स्त्री –पुरुष के जैविक अंतर को, जो प्रकृति ने किया है,  पितृसत्तात्मक समाज के द्वारा स्त्री को कमतर आंकने के लिए किये गए इस्तेमाल को चिन्हित  किया है . लड़कियों दोयम दर्जे का माना जाता हैं,  उनके साथ इंसान जैसा सुलूक नही किया जाता है.  लड़कियों को बार-बार बात-बात पर टोका जाता हैं, यह गैरबराबरी एक को उँचा और दूसरे को नीचे बैठाता है आये दिन स्त्री शारीरिक हिंसा, यौन हिंसा, मौखिक और भावनात्मक हिंसा, ,आर्थिक हिंसा या दहेज़ संबंधी उत्पीडन उन्हें झेलना पड़ता है, जिसका प्रभाव उनके जीवन पर पड़ता हैं उनका पूरा व्यक्तित्व  बिखर जाता है.


इस किताब के माध्यम से बहुत हद तक लड़कों को जेंडर सवेदनशीलता का पाठ पढाया जा सकता है, जिससे  स्त्री-पुरुष की  खाई को पाटा जा सकता है. यह किताब क़ानून और संविधान के प्रति सम्मान भी सिखाती है -जो स्त्रियों के पक्ष के विधान हैं, उनके प्रति संवेदनशील बनाती है.  पेशे से पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता  नसीरुद्दीन  ने ‘जेंडर जिहाद’ की बात की है, अर्थात जेंडर सवेदनशीलता कायम करने के लिए संघर्ष की,  यानी एक ऐसा समाज बनाने की , जहाँ कोई किसी से लिंग के आधार पर भेदभाव न करे. इसका मकसद दुनिया में सामाजिक आतंक को दूर करना है. इन किताबों को पाठ्यक्रमों में अनिवार्यतः शामिल करना चाहिए. 
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