आधा चाँद : खंडित व्यक्तित्व की पीड़ा

रेणु अरोड़ा
रेणु अरोड़ा मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिसटेंट प्रोफेसर हैं. नाटक और रंगमंच में अभिरूची . संपर्क : renur71@gmail.com
आधा चाँद— यह शीर्षक  राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय रंगमंडल की ताज़ातरीन प्रस्तुति का है , जिसे त्रिपुरारी शर्मा ने लिखा भी है और निर्देशित भी किया है। उदारीकरण के साथ हमारे देश में कॉल सेंटर खुले,  युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिले। इन सेंटरों ने युवाओं को धन-वैभव और विदेश गमन के सपने दिखाए. उनकी रातें इन कॉल-सेंटरों के ए.सी कमरों में विदेशी ग्राहकों से बात करते बीतती हैं  और दिन सोने में। इनमें काम करने वाले युवक-युवतियाँ आर्थिक दबावों के चलते,कुछ अपने सपने पूरे करने के लिए,कुछ ज्यादा न पढ़ने-लिखने के कारण तो कुछ घर के दमघोंटू वातावरण से बचने के लिए इन कॉल सेंटर की दुनिया में पहुँच जाते हैं। यहाँ उनकी पहचान-उनका नाम,उनका देश सब बदल जाता है। मालती मारग्रेट हो जाती है,रमा रीटा,विष्णु रेंमड,अंजू एंजिला। उनके वास्तविक नाम का यहाँ कोई वजूद नहीं। नाम ही नहीं जिस आवाज़ के माध्यम से वे ख़ुद को फोन के दूसरे सिरे पर जोड़ रहे हैं वो आवाज़ भी उनकी अपनी नहीं--बनावटी है,आयातित है।

उनकी भाषा भी यांत्रिक और बनावटी है। यहाँ काम करने के अपने सख्त नियम हैं, यहाँ काम करने वालों को व्यक्ति नहीं मशीन की तरह व्यवहार करना है। लगातार बोलते रहना है,ब्रेक के अलावा कोई विराम नहीं। ग्राहक से शिष्टतापूर्वक बात करनी है , चाहे वह आपको गालियाँ ही क्यों न दें! अपनी इज्ज़त,ज़मीर और मन की यहाँ कोई जगह नहीं। आपको यदि पैसा कमाना है तो गाली सुनकर भी अनसुना करना होगा। यहाँ काम करने वाले हरेक युवा का अपना सपना है,इस नौकरी के माध्यम से वो इसे पूरा करना चाहता है , लेकिन उसे पता ही नहीं चलता कि किसी उत्पाद बेचने वाली कंपनी का उत्पाद बेचते-बेचते वह ख़ुद एक उत्पाद में तब्दील हो गया। उसके सपने, उसकी उम्मीदें,उसकी कल्पनाओं का दम घोंटकर ये व्यवस्थाएँ अपना उल्लू सीधा करती हैं और काम करने वाले अपने को ठगा-सा महसूस करते हैं।

लेकिन यह नाटक सिर्फ कॉल-सेंटर के बारे में नहीं है. त्रिपुरारी के अन्य नाटकों की तरह ये नाटक भी इसके माध्यम से जीवन और व्यक्ति से जुड़े बड़े प्रश्नों को उठाता है। इन कॉल सेंटर्स के तार पूरी दुनिया से जुड़े हैं और इन्हें जोड़ने वाला धागा है आवाज़ लेकिन इस आयातित आवाज़ को अपना कहा जा सकता है? यह प्रस्तुति रीएल और वर्चुअल स्पेस की बात करती है। आज जब हम वास्तविक दुनिया से कटकर वर्चुअल स्पेस में अपने संबंध और सामाजिकता को जी रहे हैं तब यह प्रस्तुति उस वर्चुअल स्पेस की सच्चाई तथा खोखलेपन का हमें गहरा एहसास कराती है। बाज़ार ने हमें उपभोक्ता में बदल दिया है। हमें ज़्यादा और ज़्यादा चाहिए। ये बाज़ार हमें लुभाता है,ललचाता है। इसके लालच में फंसकर हम इसके हाथों की कठपुतली बन जाते हैं। व्यवसायिकता का दबाव हमारी मानवीयता को,हमारी संभावनाओं को सोख लेता है। स्थान ही नहीं बल्कि व्यक्ति भी अपने रिएल और वर्चुअल रूप के साथ निरंतर जूझता रहता है।

 उसका वास्तविक जीवन कुछ और है और वर्चअल कुछ और। उसका नाम ही केवल अलग नहीं होता बल्कि उसे अपने व्यक्तित्व को भी अलग-अलग फ़ाइल,डिक्स में बाँटना पड़ता है ताकि माता-पिता और सी.इ.ओ के दिखाए मार्ग पर चल सकें ,  भले ही ये मार्ग उसे विपरीत दिशाओं में खीचतें हों । अपने वर्चुअल स्पेस में वह दूसरी ओर जिन लोगों से बात कर रहा है , उनके प्रति जिम्मेदारी का एहसास उसे कैसे मथता है? उसका संवेदनशील मन कैसे चीत्कार करता है , उसका भी साक्षात्कार कराता है यह नाटक। इस आभासी दुनिया में दुनिया हमारी अंगुलियों के क्लिक पर है,   ऐसा लगता है.   पर यह भ्रम तब चकनाचूर हो जाता है जब कोई  मदद की उम्मीद  से फोन करता है लेकिन आप तो उसके पास वास्तव में हैं ही नहीं,आप चाहकर भी उसकी कोई मदद नहीं कर सकते। क्षणभर में बोलता हुआ आदमी मौत की आगोश में सो जाता है और मुट्ठी में समाई दुनिया रेत की तरह हमारे हाथों से फिसल जाती है। इन कॉल सेंटर्स में काम करने वालों का चूंकि कोई वास्तविक वजूद नहीं है , इसलिए यदि उनके साथ कोई अनहोनी घट भी जाए तो उसकी जिम्मेवारी किसी की नहीं बनती। जो गया वो एक नाम भर था और उसका रिप्लेसमेंट तैयार है। एक एंजिला गई दूसरी आ गई।

इस कॉल सेंटर में काम करने वाले हरेक व्यक्ति की अपनी कहानी है,उसकी अपनी यात्रा है,जो इस नाटक को एक व्यापक कैनवास देता है। यहाँ की कार्य-शैली और  काम करने वालों के साथ जो कुछ हो रहा है वह केवल यहाँ का ही सत्य नहीं बल्कि किसी भी मल्टीनेशनल का सत्य हो सकता है। इस अर्थ में यह नाटक हमारे आज को,आज की स्थितियों और परिस्थितियों को बाखूबी उभारता है। महानगरीय परिवेश की अंधी भाग-दौड़,स्त्रियों का उत्पीड़न,युवाओं का भटकाव,उनकी कुंठा,उनका आवेश,संवेदनहीनता,यांत्रिकता,बदलतीजीवनशैली,बदलती खान-पान की आदतें कितना कुछ इस प्रस्तुति में झलक-झलक उठता है। इस सबके बरक्स ठेले वाले की ठहरी हुई वास्तविक जिंदगी जैसे यह एहसास देती है कि जीवन की इस वृतुलाकार  गति में जिंदगी पुनः इस ठहराव को पाकर प्रकृति के निकट आएगा,  साथ ही जिस तेज रफ़्तार में हम जिस ठेले को दरकिनार कर रहे हैं,जब इस रफ़्तार पर ब्रेक लगेगा और काँच की ये भव्य इमारतें चरमराकर टूटेंगी तब यही ठेला उसका बोझ उठाएगा।
त्रिपुरारी के लेखन और निर्देशन की यह विशेषता है कि वे बड़ी संवेदनशीलता से अपने अनुभव को दर्शक का अनुभव बना देती हैं। देखते हुए ऐसा लगता है कि हम जी रहें हैं। महागरीय परिवेश को,भागती हुई जिंदगी को, ट्रैफिक जाम में फंसी हुई जिंदगी को मंच पर दृश्य में ढालने के लिए वे सफेद बड़े पर्दे का इस्तेमाल मंच के अग्र भाग में करती हैं। इस पर उभरती छवियाँ ध्वनियों और संवादों के साथ मिलकर थियेटर में सड़क का आभास देता है। एक दृश्य में पात्र चलती-फिरती कुर्सियों पर बैठकर ही सारा कार्य-व्यापार करते हैं।

पात्रों की गतिविधियाँ,संवाद और बॉडी-लेग्विज़ एक ओर उनकी चाहतों को पूरी करने की डेसपिरेशन को मूर्त करता है दूसरी ओर कुर्सी को सत्ता के प्रतीक रूप में यह एहसास कराता है कि जब जहाँ जिसके पास ये कुर्सी आ जाती  है वह उसे छोड़ना नही चाहता बल्कि एक-दूसरे को पीछे धकेलकर अपने सपने पूरे करना चाहता है। लेकिन ये अंधी दौ़ड़,ये लालसा हमें कहीं नहीं पहुँचायेगी—यह भी संकेत कर देता है। भट्ठी में कोयला,जीवन खोयला’, ‘तंबाकू के छल्ले’ जैसे गीत कथ्य की संवेदना से जुड़कर उसे विस्तार और गहराई देते हैं।नाटक का शीर्षक भी प्रतीकात्मक है। ‘चाँद भी एक बुलबुला है,जो कभी बढ़ता है तो कभी घटता है। कभी पूरा होता है तो कभी गायब हो जाता है। इसी तरह हैं हमारी चाहतें,हमारी कल्पनाएँ जिन्हें हम सोचते हैं कि पूरी हे जाएगी मगर सच्चाई उससे जुदा है। चाँद आधा है—अतः वह पूरा भी हो सकता है और गायब भी हो सकता है। इस नाटक में दृश्यों की ऐसी अनवरत कड़ियाँ चलती हैं जिनका जितना अनुभव किया जा सकता है उतना कहा नहीं जा सकता।
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