ज़न्नत नसीबी

नूर ज़हीर
चर्चित उर्दू कथाकार. रेत पर खून, सुर्ख कारवां के हमसफ़र, My God is a woman, Denied by Allah आदि किताबें प्रकाशित. संपर्क:noorzaheer4@gmail.com
रकीबन बी का दिल बल्लियों उछल रहा था. उनकी ख़ुशी का ठिकाना न था. बस आजकल पांव ज़मी पर नहीं पड़ते  मेरे-वाली हालत थी.  वैसे रकीबन बी की उम्र दिल के बल्लियाँ उछलने की न थी. भला बहत्तर की उम्र में दिल ख़ुशी से उछलता है ? उछलता भी है तो बस एक बार 'टै ' हो जाने के लिए.  लेकिन वही मसल है की उम्र ढल जाती है दिल कहाँ बुढ़ाता है ? सो इनके बूढ़े वजूद में जवान दिल कुलाटियां भर रहा था और भाई बात भी तो ख़ुशी की थी; जिंदिगी भर दूसरों के घर में चाकरी करके, जूठन उतरन पर गुज़र करके, पहाड़ जैसी जिंदिगी परायों की गालियों, कोसनो के सहारे काट देने वालों को भी कहीं हज नसीब होता है ? अल्लाह भला करे अक्कन मियां का जो विलायत में रह कर ग्यारह सालों में तो अपनी माँ को झाँकने भी न आये लेकिन उनके लिए हज करने के पैसे भेज  कर अपने लिए जन्नत की बुकिंग पक्की कर रहे थे . इतना ही नहीं , अक़ील अहमद, उर्फ़ अक्कन मियां ने विलायत से यह हुकुम भी जारी किया था कि उनके साथ साथ कंचे और गुल्ली डंडा खेले हुए लंग़ोटिया  यार , जो अब इस कसबे की शिया मस्जिद के छोटे इमाम थे उनकी अम्मी के साथ मक्का जायेंगे वरना  भला अरबी में होने वाले उमरा को सीधी - साधी हिंदुस्तानी ज़बान में अम्मी को कौन समझायेगा? और पैसठ साल की अम्मी की हज़ारों ख्वाहिशों , ज़रूरतों को पूरा करने के लिए भी तो कोई चाहिए लिहाज़ा उनके साथ रकीबन बी का जाना भी उन्होंने तय  कर दिया था.

वैसे रक़ीबन  बी का जवानी के दिनों से यही रोल रहा है. वो 24 साल की जवान-जहान  बेवा थी,  जिन्हें  नवेली दुल्हन (हशमत आरा बेगम) के साथ ससुराल भेजा गया था की वहां परदेस में उनकी ज़रूरतों, ख्वाहिशों का कौन ख्याल रखेगा? ये भी उन्ही की, यानी हशमत आरा बेगम की ज़रूरत ही थी की दुबई तक पानी के जहाज़ से सफर करना तय  हुआ. अक्कन मियां तो हवाई जहाज़ का किराया देने को तैयार थे.  दस दिन का सफर घंटो में पूरा हो जाता. लेकिन हशमत आरा बेगम को हवाई जहाज़ में बैठने के ख्याल से ही दिल में हौल उठने लगता. सो सफर लम्बा तो खिंचा ही,  साथ ही पुरानी बाबा आदम के ज़माने की खड़बड़िया एम्बेसडर में लखनऊ जाने और फिर हवाई अड्डे पर हवाई जहाज़ में फुदकने के बजाये  रेल से मुंबई और वहां से जहाज़ में दुबई और दुबई से बस  से मक्का जाना ठीक किया गाया . तीनो तरह के सफर एक साथ करने को मिलेंगे यह तो रकीबन बी ने ख्वाबो ख्याल में भी न सोचा था. बिटिया के, यानी 65 साला हशमत आरा बेगम के सारे गरारे  कुर्ते रकीबन बी ने खुद धोये , सारे दुपट्टे कलफ देकर बड़े  जतन  से चुने, लोबान, धूप से सारे कपड़े  बासे, ताकि एक बार पहनने के बाद ही बदलने की ज़रूरत न पड़े.  सरसों दूध में भिगोकर, उबाली, सुखाई  और 13 जड़ी बूटियों के साथ पीस कर कपडे  की थैलों में बाँधी.  भला बिटिया हज पर साबुन से नहाएँगी ? मौलवी साहब के लिए भी चार नए जोड़े बनवाने दर्ज़ी के पास वही गईं  और अपने लिए भी  दो नए सफ़ेद छालटीन  के गरारे खुद ही सी डाले. इतनी तैयारी तो उनकी जिंदिगी में बस एक ही बार हुई थी--बिटिया के ब्याह में!

इतना लम्बा सफर तो दूर,  वो तो ज़िले के बाहर भी न झांकी थे और हज से तो उनके ख्वाबो ख्याल तक ने किनारा कर लिया था.  वैसे पूरे मोहल्ले पर ही एक मसर्रत का आलम तारी था.  हज की रवानगी  की खबर मिलने के दिन से ही हर जुमेरात को हलवा बंटने  लगा.  रकीबन बी,  जो घर की माली हालत से वाक़िफ़ थी,  इस खर्च के बिलकुल खिलाफ थी. अक्कन मियाँ,   जिनको उन्होंने गोद में  खिलाया था की कमाई की ऐसी बर्बादी उनका दिल कचोट रही थी.  मौलवी साहब भी हर वक़्त हाथ में क़ुरान शरीफ और बग़ल में जनमाज़ दबाये नज़र आते. आखिर उन्हें हर आयत हर हुक्म के मतलब समझाने थे.  उन्होंने खुद ही कहा था की बेगम साहब फ़िक्र न करे , वे चल रहे हैं न साथ, सब समझाते, बताते चलेंगे.  हज के सफर से पहले कई अदद छोटे सफर करने पड़े. पासपोर्ट फॉर्म भरने, दाखिल करने, पुलिस जांच और फिर हज कमिटी के दफ्तर में जमा कराने में तीन चक्कर तो लखनऊ के लगे.  एक बार दिल्ली जाना पड़ा, पांच मुल्कों के पांच दूतावास में वीज़ा की मोहर लगाने.  हज के साथ साथ कर्बला की ज़ियारत भी कर लेंगे, ईरान की फ़िरोज़ा मस्जिद  और तुर्की में रूमी की क़ब्र भी देख लेंगे. हर दफ्तर में हर मेज़ पर जो भी सुनता की ये लोग हज को जाने वाले हैं तो फ़ौरन अपने लिए दुआ करने की फरयाद करते . हिन्दू तक अपना दुखड़ा सुनाने लगते और इल्तिजा करते की उनके दुःख निवारण के लिए हशमत आरा बेगम ज़रूर काबे शरीफ में दुआ करे.


मौलवी साहब का तो काम ही है सबको संतुष्ट करना  लेकिन बिटिया भी फ़ौरन वादा कर लेती. आखरी दफ्तर में रकीबन बी से रहा नहीं गया ---बिगड़ कर बोली--लो भला बताओ, हम हर किसी की मुराद पूरी करने की दुआ मांगते रहे तो हमारे अपनों का तो नंबर ही न आने का ! न भैया , दुआ तो हम अपने और अपनों के लिए ही मांगेंगे, उसी  के लिए तो जा रहे हैं, साफ़ बात. आखिर सफर शुरू करने का दिन आया , ट्रेन  से तीनो मुंबई पहुंचे और वहां से उस जहाज़ पर सवार हुआ जो हज पर जाने वाले मुसाफिरों से भरा था.  जहाज़ क्या था, इस्लाम का यह द्विप जैसा था ; हर तरफ से तलावत की गूंजती आवाजें, आबो हवा को पाक रखती, हर वक़्त लोग बधना लिए वज़ू के लिए दौड़ते नज़र आते. अक़ीदत का यह आलम था की जहाज़ ज़रा डगमगाया की लोग जहाँ होते वहीँ सजदे में गिर जाते; नेकी, मेल मिलाप और ईमान से लबालब भरे तालाब में किसी ने छपाक से एक ढेला मारा . किसी बेचारे का कश्मीरी दोशाला गया, नमाज़ पढ़ने को, वज़ू से पहले दुखिया ने उतारकर तह करके एक तरफ रखा था.  और फ़ारिग़ होकर जब वहां पहुंचा तो दोशाला नदारद! रकीबन बी पहले तो सकते में आगई . ऐसा कैसे हुआ ? यानी हज को जाने वाले सब नेक बन्दे नहीं हैं, उनमे से कुछ चोर बेईमान भी हैं , जो हज के सफर पर भी अपनी आदतो से बाज़ नहीं आते. भला ऐसी हज का क्या फ़ायदा? वैसे उनके दिल को जहाज़ पर चढ़ते ही एक धक्का लग चुका था जिसके बारे में उन्होंने मौलवी साहब से पूछा भी था की हज पर जाने वाले तो सब मुसलमान होंगे, तो भला नमाज़ की अलग जमाते क्यों लगती होंगी ?

मौलवी साहब ने डपटते हुए कहा -लो भला बताओ, शिया है , सुन्नी है, वहाबी है, बोरी हैं, खोजे हैं, मैमन है, इस्माइली है -सबकी जमात भला एक कैसे हो सकती है? "पर हैंगे  तो सब मुसलमान और हज करने को जा रहे हैं जो कि एक ही तरह से की जाती है, तो सब उस अल्लाह के हुज़ूर में एक साथ नमाज़ क्यों नहीं पढ़ सकते?" रक़ीबन  बी ने तर्क किया. 'बेकार बहस न करो. ' मौलवी साहब ने बिगड़ कर कहे'. "जो बात तुम्हारी समझ से बाहर है,  उसमे क्यों दखल देती हो ?" हशमत आरा बेगम ने समझाया. रकीबन बी चुप हो गई. इस चोरी वाले हादसे से दिल में उमड़ते सवालों को भी उन्होंने दबाए  रखा,  मगर सतर्क हो गई. गरारे पहनने छोड़ दिए, बिटिया का बैग ठीक अपने पीछे रखती और सजदे में झुकते हुए, चुस्त चूड़ीदार पजामो में जकड़ी टांगो के बीच में से झाँक कर इत्मीनान कर लेती की सामान अपनी जगह सुरक्षित है.  भला ऐसा सजदा कितने दिन छुपता और मौलवी साहब तो आये ही इसीलिए थे की सब पर नज़र रखे की वह दीन  की पाबंदियां निभा रहे हैं या नहीं.  जब सवाल जवाब हुआ तो रकीबन ने साफ़ कह दिया "तो क्या हुआ, अल्लाह मियां को सजदा भी करते हैंगे , अपने माल की हिफाज़त भी करते हैंगे इसमें ग़लत क्या हैगा ?" दुबई से लम्बा बसों, मोटर गाड़ियों का लम्बा काफिला मक्का की तरफ रवाना हुआ . हज शुरू होने में अभी 3 दिन बाक़ी थे.  3 दिन उनके ड्राइवर और गाइड ने उन्हें हर वो निशान  दिखाया जो अल्लाह ने बतौर अपने होने के सुबूत में इस ज़मीन पर छोड़ा है.

 कहीं ऐसा पेड़ था , जिसकी जड़े ऊपर आसमान में और तन ज़मीन में घुसा था, कहीं सुलगती रेत के बीचोबीच ऐसा ठंडा पानी का चश्मा फूट रहा था की क्या कहे.  लोग थे कि सजदा करने में एक दूसरे के ऊपर  गिर पड़ते थे. रकीबन बी हैरान, आँखें फाड़-फाड़ कर सब कुछ देख रही थी.  बात ही कुछ ऐसी थी.  हर नया निशान देख कर मौलवी साहब सजदे में लोटपोट हो जाते, बिटिया शुक्राने की दुआएं पढ़ते हुए आंसू बहाती की अल्लाह ने उन्हें इस काबिल समझा की वो हज अदा करे और सब अपनी आँखों से देखे. आखिर रक़ीबन  बी से रहा न गया.  उन्होंने तो जिंदिगी में इतने पेड़  देखे हैं , जो पत्तियां झड़ जाने पर यूँ मालूम होते हैं जैसे जड़े  ऊपर हवा में किये खड़े हों और अगर धूप में रख देने से सुराही का पानी बर्फ जैसा ठंडा हो जाता है, तो तपती रेत से ठन्डे पानी का चश्मा फूट पड़ने पर ख़ुदा का शुक्र मानना तो समझ में आता है, लेकिन उसे भला चमत्कार क्यों क़रार दिया जाए?  उम्र शुरू होने से पहले, हज के लिए हुक्म और काबा शरीफ का इतिहास मौलवी साहब ने बड़े तफ्सील से सुनाए. उनका अंदाज़े बयां इतना अच्छा था और इतनी सीधी- साधी भाषा में होता था की आसपास के लोग भी जमा हो जाते.

ये ज़्यादातर ग़रीब हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी या बांग्लादेशी थे,  जो जहाज़ों के सबसे निचली श्रेणी में, ज़मीन पर दरिया चादरें बिछाए, मामूली बसों में धक्के खाते, कई बार पैदल चलते, दिल में हज की ललक लिए यहाँ तक पहुंचे थे.  मौलवी साहब इन ग़लीज़, गंदे, खब्बीसों की मौजूदगी पर बिगड़ जाते. इनके पास से उन्हें बदबू आती थी.  असल में रकीबन बी,  जो दिन भर बस में बैठे बैठे उकता  जाती थी, अपनी टाँगे खोलने, रात को रुके पड़ाव भर में डोलती फिरती और अपने मौलवी साहब की तारीफें कर करके मजमा जमा कर लेती.  इतने बड़े मजमे के आगे धर्म का बखान करना मौलवी साहब को अच्छा ही लगता मगर यह क्या बात हुई की रकीबन बी, वहीं सबके सामने अल्लाह और रसूलल्लाह की शान में मौलवी साहब की हर दलील पर ऐतराज़ जताये ? और उस दिन तो उन्होंने हद ही कर दी. मौलवी साहब काबे के पत्थर का ज़िक्र कर रहे थे . कैसे यह पत्थर हज़रत इब्राहिम के वक़्त से भी पहले, एक दिन अचानक आसमान से आकर ज़मीन पर गिरा; कैसे सब कबीलों के लोग इस आसमानी नेमत को देखने जमा हो गए और इसकी रंगत, रूप और इसमें से निकलने वाली रौशनी से चकाचौंध   हो गये. तभी एक आकाशवाणी हुई "ऐ बन्दों, यह हमारे ही जलाल का हिस्सा है. और तुम इसे हमारा ही नुमाइंदा मानकर इसकी परिक्रमा करना और इसी की तरफ सजदा करना."  रकीबन बी ने बड़ी ललक से पूछा "तो हम लोग इस अजूबे पत्थर को कब देख पाएंगे, कब हमारी आँखें अल्लाह के नूर का जलवा देख पाएंगी?" मौजूदा भीड़ में एक उत्साह की लहर दौड़ गई "हाँ कब, आखिर कब?" मौलवी साहब ने नाराज़ होकर कहा, उसे देखा नहीं जा सकता .

हिफाज़त के लिए उसके चारों तरफ बारह फुट ऊँची दिवार है और ऊपर सपाट छत.  जो घनाकार काबाशरीफ की तस्वीरों में नज़र आता है उसके अंदर यह पत्थर महफूज़ है. उमरा rइसी के चारों तरफ करना पड़ता है और हर चक्कर के पूरा होने पर उसकी तरफ ऊँगली करनी पड़ती है. रकीबन बी का सारा धार्मिक जोश ठंडा हो गया. बिगड़  कर बोलीं "लो भला, जिसे अल्लाह ने इसी जगह पर फेंका है उसे यहाँ से हिला पाने की कौन जुर्रत  कर सकता है और अल्लाह के जलाल के हिस्से को अगर किसी ने चुरा लेने की कोशिश की तो उसका हाथ न जल जावेगा ?" मौजूद लोगों ने भी रकीबन से हाँ में हाँ मिलाई,   और एक दो ने तो इस पूरे इंतज़ाम को सऊदी साज़िश बताया जो चाहते ही नहीं की उनके अलावा कोई और मुसलमान पूरी हज कर सके और उसका पुण्य कमायें .इन सब लोगो को डांट कर चुप कराया गया और मौलवी साहब को आगे की दास्तान सुनाने की फरयाद की गई. उनका मूड उखड़ गया था,  लेकिन फिर भी काबे के सबसे बड़े तीर्थ बनने की दास्तान ऐसे  मोड़ पर थी की,  उसे रोक देना किसी तरह मुनासिब था. खैर इतिहास की कथा आगे बढ़ी और वहां पहुँच गई जहाँ हर अरब क़बीले  और यहूदी क़बीले ने पैग़म्बर इब्राहीम  को हुई भविष्यवाणी को सही मान लिया और इस जगह को एक पवित्र स्थान का दर्ज देते हुए यहाँ आकर पुण्य कमाना अपना मज़हबी फ़र्ज़ स्वीकार कर लिया

 ज़्यादातर अरब  कबीलों के अपने अपने इष्ट देवता थे. इस पत्थर के चारों तरफ  इमारत में  सबने मदद की और अपने देवताओं की प्रतिमाये यहाँ रख दी. हज़रत मोहम्मद पर अल्लाह का राज़ खुलने के बाद सारे अरब कबीलों ने इस्लाम धर्म क़ुबूल कर लिया. उसके बाद सिर्फ मुसलमान और यहूदी ही यहाँ आते और पुण्य कमाते. लेकिन उनकी रस्मे और तौर-तरीका मुसलमानों से अलग था,  इसलिए पैग़म्बर ने बैठकर यह संधी  कर ली कि जब वे  आएंगे तब मुसलमान नहीं आएंगे , ताकि एक दूसरों  के धार्मिक रीति कोई खलल न पड़े.  रकीबन बी की आँखों में पैग़म्बर की इंसाफ़पंसदी पर  फक्र के आंसू छलक आये. इसीलिए तो उनके बाद अल्लाह को कोई दूसरे पैग़म्बर को भेजने की ज़रूरत नहीं रही. इन्साफ करना, सबको बराबर मानना, ऊँच- नीच का भेद मिटा देना तो कोई इस्लाम से सीखे. बड़ी उत्सुकता से बोली "अच्छा ! तो हम मुसलमान तो यहाँ बकरीद के महीने में हज करने आते हैं. यहूदी यहाँ कब आते हैं? " मौलवी साहब की पहाड़ी नदी सी कल- कल करती ज़बान लड़खड़ा गई.  कुछ पल तो वो सन्नाटे में आ गए फिर ज़रा सँभालते हुए बोले 'यहूदी यहाँ नहीं आते. पैग़म्बर अले सलाम ने उनके यहाँ आना बंद कर दिया था !" "ऐ ग़ज़ब खुद का क्यों?" रकीबन बी तक़रीबन चीख पड़ी.

"यहूदियों ने उन्हें पैग़म्बर मानने से इंकार कर दिया” ऐसा  है तो क्या हुआ . यह तो उन्ही की जगह है न, और अल्लाह ने काबे का पाक पत्थर भी हज़रत इब्राहीम के लिए भेजा था और उन्ही के बेटे इस्माइल की प्यास से बिलखने और पाक पैरों के रगड़ने से रेगिस्तान का सीना चीरकर आबे जम-ज़म का चश्मा बह  निकला था, जो आज तक बह  रहा है।  फिर उन्हें कैसे बेदखल कर दिया पैग़म्बर ने, ये तो बड़ी  नाइन्साइफ़ी बात की उन्होंने ."इतना कहना था कि कोहराम मच गया.  भला इतने अकीदतमंद मुसलमानो की मौजूदगी में कोई पैग़म्बर को अन्यायी कहने की जुर्रत करे ! मौलवी साहब तो बस फट ही पड़े और अपना बोरिया बिस्तर लपेटकर वापस हो जाने पर आमादा हो गये. इस तरह के दहरिये [नास्तिक] काफिर के साथ वह हज करके क्यों खुद को गुनहगार करते ?
हशमत आरा बेगम के समझाने पर की वो इतना बड़ा गुनाह कैसे कर हैं कि मक्के के दरवाज़े से लौट जाये.  वो रुआंसे बोले की गुनहगार तो रकीबन बी हुई और वो तो क़यामत के दिन उन्ही का दामन पकड़ेंगे,  जिन्होंने ऐसे हालात पैदा कर दिए की एक नेक पाबन्द मुस्लमान हज करने से महरूम रह जाय . उसके बाद रकीबन बी ने तौबा कर ली , हशमत आरा बेगम की ज़रूरतों के अलावा वो मुह नहीं खोलेंगी.  किसी तरह मौलवी साहब वहीँ बने रहने पर राज़ी हुए.

रकीबन बी  अपने वादे की ऐसी पक्की  निकली की अपने  होठ  सी लिए.  जो कुछ मौलवी साहब कहते उसे ख़ामोशी से निभाती और एक कोने में सिमट रहती.  हाँ रात के वक़्त हशमत आरा बेगम उन्हें अक्सर, करवटें बदलते,  इधर उधर टहलते, बड़बड़ाते और ठंडी आहें भरते सुनती.  हज के सारे अनुष्ठान पूरे हो गए थे,  बस आखरी शैतान को संगसार करना रह गया था. मक्का के बाहर, तीन बड़े बड़े खम्बे हैं, जिन्हे हाजी शैतान मानकर पत्थर मारते हैं. हर दूसरे तीसरे साल पथराव  करने के जोश में यहाँ भगदड़ मच जाती और कई लोग ज़ख़्मी होते, कुछ कुचल कर मारे भी जाते। ऐसा इस वजह से होता,  क्योंकि लोग खम्बों के दोनों तरफ खड़े  होकर पत्थर फेंकते।  "कम्बख्तों के सर पर पत्थर पड़े  थे क्या?" रकीबन बी ने दिल में सोचा.  "भला दोनों तरफ से पथराव होगा,  तो किसी न किसी का तो निशाना चुकेगा ही और सर फुटव्वल होगा ही.“ खैर अब तो तीनो खम्बों  के बीच में दीवार खींच दो गई है. पुलिस का सख्त पहरा रहता है और गिनकर लोग पथराव  करने के लिए भेजे जाते हैं और उनके आ जाने के बाद ही दूसरे भेजे जाते हैं. हर किसी के हाथ में पत्थर भी सात से ज़्यादा नहीं  होने चाहिए. ये पत्थर मीणा के दक्षिण पूरब में मुज़्दालिफा मैदान से जमा करने होते हैं।  रकीबन बी के दिल में मौलवी साहब की सुनाई कहानी गश्त कर रही थी. कैसे हज़रात इब्राहिम को रास्ता दिखाते हुए फ़रिश्ते जिब्रील ने  तीन बार पत्थरों के ढेर की तरफ इशारा करके कहा "इसे मारो, ये शैतान है !" उसी की याद में यह खम्बे हैं, जिन्हे मारना हज का हिस्सा है।

रकीबन बी ने तड़के सवेरे जाकर अपने और बिटिया के लिए पत्त्थर जमा कर लिए थे.  पथराव  करने वाली कतार में वो लग गई थीं। उनके चारों तरफ लोग जोश में आकर शैतान को संगसार कर रहे थे  लेकिन रकीबन बी चेहरे से परेशान दिल में सोच रही थी " ऐ बेचारा दुखिया, पहले तो अल्लाह के सबसे अज़ीज़ पद से गिराया गया, फिर जन्नत से निकाला गया . उसके बाद आदम और हव्वा से दुश्मनी न करता तो क्या उन्हें गोद  खिलाता? खुद लालच में आकर आदम और हव्वा ने सेब खाया और इल्जाम  उसके सर धार दिया. अब लावारिस के पास ज़मीन में इधर -उधर डोलने के अलावा चारा ही क्या है ? हर जगह से बेचारा ठुकराया जाये, न कोई ठौर न ठिकाना.  ऐसे दर- दर भटकने और क्या पत्थर मारकर फटकारना ? मैं खुद गुनहगार, क्या इस दुखिया पर पथराव करूं ? रकीबन बी ने एक -एक करके सातो पत्थर ज़मीन पर गिरा दिए और आगे बढ़ गई.
कहते हैं क़यामत के रोज़ जब सबकी नेकियों का हिसाब होगा और जन्नत और जहन्नुम भेजे जाने का फैसला किया जायेगा, तब अगर किसी की बस एक नेकी काम पड़  रही होगी और वह सबसे मांगता फिरेगा की अपनी एक नेकी मुझे दे दो ताकि मैं जन्नत में जा सकूँ, और कोई ऐसा होगा, जिसके पास सारी  जिंदिगी की बस एक नेकी ही होगी, और यह शख्स अपनी एक नेकी कुर्बान कर देगा तो अल्लाह उसकी फराक दिली से खुश होकर उसे जन्नत में जगह देगा.क्या अल्ला शैतान पर किये इस एहसान को नेकी मानेगा और गुनहगार रकीबन बी के लिए जन्नत के दरवाज़े खोलेगा?
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