व्यावसायिक जोखिम का लैंगिक विमर्श

2010 में मैंने सुप्रीम कोर्ट में सूचना अधिकार के एक आवेदन किया था और टाल मटोल के बाद पता चला कि वहां यौन उत्पीडन के खिलाफ जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप ही कोई समिति नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थलों पर , जहां 10 से अधिक स्त्री –पुरुष काम करते हैं, ऐसी समिति बनाने का निर्देश दिया था, जिसे ‘विशाखा समिति’ कहा जाता है . सुजाता  कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड्न झेलती महिलाओं के संघर्ष के बारे में बता रही हैं.  यह आलेख 'सबलोग' के अप्रैल  अंक में स्त्रीकाल कॉलम में छपा है . 
                                                                                                                       संपादक
सुजाता तेवतिया
सुजाता तेवतिया चोखेरवाली ब्लॉग का संचालन करती हैं और दिल्ली वि वि के श्यामलाल कॉलेज में पढ़ाती हैं . संपर्क : ई-मेल : sujatatewatia@gmail.com                                      
एक पुरुष सहकर्मी द्वारा एक दिन मिली टिप्पणी -"मैडम आज तो आप गज़ब ढा रही हैं ,पर आपका कुर्ता कुछ ज़्यादा ही छोटा है,थोड़ा लम्बा होता तो ...अच्छा रहता " एक बारगी समझ नही आया कि क्या कहूँ ....मुस्कुरा कर निकल गयी हर बार की तरह. एक  मिनट बाद पलटी यह सोच कर कि थप्पड़ क्यो न जड़ दूँ मुँह पर आज. लेकिन देर हो गयी थी ,वह जा चुका था । ऐसी अप्रिय (अनवेलकम) टिप्पणियों को नज़रअंदाज़ करने केमानसिक अनुकूलन की वजह से तुरंत कुछ सूझता भी नहीं ऐसे में। फिर भी लिखित कम्प्लेंट की तो ऑफिस में हल्ला हो गया । सरकारी नौकरी थी वह चांस नहीं ले सकता था और माफी मांगना तौहीन होती। इसलिए अन्य पुरुष साथियों से मिलकर दबाव बनाने लगा.घर पर फोन आने लगे। पीछे न हटने पर अखबार में मित्रता कॉलम में नम्बर प्रकाशित करवा दिया गया और फिर क्या था ....फोन पर फोन !ऑफिस में महिला कर्मचारी मिल गयीं इसके खिलाफ।लेकिन उन्हें भी धमकाया गया लेकिन ऑफिस के मर्दों द्वारा नही ,घर के मर्दों द्वारा"खबरदार!जो इस पचड़े मे तुम पड़ीं !समाज-सुधार नहीं करना !अपना घर देखो। कल को तुम्हारे साथ कुछ हो गया तो कौन निबटेगा? वो भी पागल है चुपचाप चली जाती !छोटी सी बात पर कम्प्लेंट करने की क्या ज़रूरत थी नौकरी करो चुपचाप ।घर थोड़े ही बसाना है वहाँ ।" और वे सब चुपचाप अपना घर देखने लगीं ।

महिला मित्र समझाती रहीं कि केस वापिस ले लो । अब चरित्र पर वार करेंगे वे लोग कि ये ऐसी ही है। खुद ही उलझती है मर्दों से। जीना मुश्किल हो जायेगा । मर्द तो खाली हैं ,इनके घर तो बीवियाँ सम्भाल रही हैं । अपनी बीवियों को घर की बच्चों की ज़िम्मेदारियाँ थमा कर यहाँ पॉलिटिक्स करते हैं ,कैरियर बनाते हैं,बदनाम करते हैं, नाम कमाते हैं ,परेशान करते हैं !तुम ये सब कर सकोगी ? बच्चों पर क्या असर होगा ? सब अस्त व्यस्त हो जायेगा । लेकिन एफ आई आर दर्ज करवा दी गयी ।काल्पनिक कहानी नहीं है, यह एक करीबी मित्र की है. किसी भी स्त्री की हो सकती है जो घर से बाहर निकली है और दफ्तर पहुँची है। अनाहिता मोसानी की भी यही कहानी है और न जाने कितनों की जो चुप रह जाती हैं या नौकरी छोड़  जाती हैं क्योंकि इन मोर्चों पर लड़ाई अक्सर अकेली और दर्दभरी होती है।अक्सर अपनों के भी खिलाफ खड़ा होना पड़ता है और अंजाम तक आते आते भारी कीमत वसूल लेती है ।

टेरी संस्थान के प्रमुख आर के पचौरी पर हाल ही में ऐसे ही केस के संदर्भ में चार्जशीट फाइल की गई जबकि पचौरी लगातार सभी आरोपों से इंकार कर रहे हैं। साल भर पहले उनकी सहकर्मी ने तंग आकर उनके खिलाफ शिकायत की थी, बदले में वे छुट्टी पर भेज दिए गए। जब कोई कार्यवाही न हुई तो शिकायतकर्ता स्त्री ने नौकरी छोड दी। अभी हाल में इस घटना के सालभर बाद एक और महिला जो पचौरी के साथ काम कर चुकी हैं यही शिकायत दर्ज की है। रूपन बजाज का के.पी.एस.गिल के खिलाफ और तहलका सुप्रीम तरुण तेजपाल के खिलाफ सहकर्मी के यौन शोषण के कुछ ऐसे केस हैं जिन्हें मीडिया का खूब ध्यान मिला। महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय के अनुसार साल 2014 में 526 केस दर्ज किए गए।कितने ही बिना दर्ज हुए रह गए भी होंगे ही।

कार्यस्थल पर यौन शोषण को पहली चुनौती 1997 में मिली जब भँवरी देवी केस के संदर्भ में महिलाओं की एक संस्था ने विशाखा और दूसरी महिला संस्थाओं ने जनहित याचिका दायर की। बाल-विवाह रोकने के अपने प्रयासों के चलते राजस्थान सरकार प्रायोजित महिला संस्था की कर्मचारी भँवरी देवी के साथ बलात्कार हुआ था। बलात्कारी प्रभावशाली लोग थे। सेशन कोर्ट ने इंकार कर दिया कि ऐसा नही हुआ। आगे सुप्रीम कोर्ट ने कार्यस्थल पर यौन शोषण की परिभाषा देते हुए स्त्री के लिए काम करने के स्वस्थ माहौल को स्त्री का मूलभूत अधिकार कहते हुए जो निर्णय दिया और निर्देश दिए उन्ही को हम ‘विशाखा गाइडलाइन’ के नाम से जानते हैं। इसके अनुसार सभी दफ्तरों, संस्थानों, विश्वविद्यालयों में एक शिकायत कमिटी होनी ज़रूरी है जिसमें पचास प्रतिशत से कम महिला सदस्य न हों। दुखद: है कि इतने वर्षों बाद भी ऐसे केस के सामने आने पर पता चलता है कि संबंद्ध संस्थान में ऐसी कमिटी ही विद्यमान नही है।

 कार्यस्थल पर यौन शोषण दो तरीके से होता है। जहाँ स्त्री पुरुष के मातहत है वहाँ अक्सर ‘Quid Pro Quo’  यानि यौनाचार की सहमति के बदले स्त्री को तरक्की या कोई अन्य किस्म का लाभ पहुँचाए जाने का प्रस्ताव। नुकसान पहुँचाने की धमकी भी दी जा सकती है। दूसरे तरीके में विक्टिम के सहकर्मियों द्वारा अपमानजनक माहौल बना दिया जाता है। गन्दे चुटकुले सुनाना ,लगातार घूरना या सर से पाँव तक घूरना ,शारीरिक आकृति –पहनावे –अपियरेंस पर टिप्पणी करना ऐसे अनेक उदाहरण हैं। भारत में कामकाजी स्त्रियों की संख्या बहुत अधिक नही है। उनमें भी ऊँचे ओहदों पर गिनी चुनी स्त्रियाँ हैं। इसके अलावा असंगठित क्षेत्रों में स्थिति और भी भयानक है। वहाँ के शोषण के आँकड़े भी जुटाना लगभग असम्भव सा है। जो स्त्रियाँ घरों में काम करती हैं, सड़कों पर सामान बेचती हैं, किसी भवन निर्माण की साइट पर हैं, दिल्ली हाट के बाहर मेहंदी लगाने बैठी हैं या चूड़ियाँ बेचने, उनके साथ होनेवाले यौन शोषण से निबटने का तो राज्य द्वारा  कोई भी तरीका नहीं ईजाद किया जा सका है। फील्ड में काम करने वाली औरतों, जिनमें पत्रकार और पुलिस में शामिल महिलाएँ भी हैं , के लिए सम्मानजनक स्थितियाँ नहीं बन पाई हैं।

स्त्रियों के यौन शोषण ले लिए ज़िम्मेदार लैंगिक असमानता है और जो कानून बनाए जाते हैं वे अक्सर बहुत कारगर सिद्ध नहीं होते। एक बड़ा कारण है महिलाओं की चुप्पी। यह सब ज़ाहिर होने को वे और आस-पास सभी सामाजिक कलंक के रूप में देख रहे होते हैं। कोई आर्थिक मजबूरी भी अक्सर उन्हें चुप रह जाने , सब  कुछ को नज़र अंदाज़ कर देने को विवश करती है। यह आज भी बड़ा मिथ है कि स्त्री यदि चुप है तो इसका मतलब उसे इस व्यवहार से कोई ऐतराज़ नही है और यह भी कि उसकी ’ना’ में ही उसकी ‘हाँ ’ है। फिर, हम अपने कार्यस्थलों में यौन शोषण को रोकने का कोई कारगर मैकेनिज़्म आज भी ईजाद नहीं कर पाए हैं। सदियों से पुरुष ‘पब्लिक मैन’ रहा है और स्त्री ‘प्राईवेट वुमन’। सार्वजनिक स्थान पर दोनो को एक साथ काम करते कोई बहुत वक़्त नही गुज़रा है। इसे ध्यान में रखते हुए ऐसा कोई प्रशिक्षण शिक्षा के साथ -साथ या नौकरियों में भर्ती के साथ अनिवार्यत:  नहीं दिया जा रहा कि पब्लिक स्फियर में स्त्री-पुरुष एक दूसरे से कैसा व्यवहार करें।

अक्सर पुरुष सहकर्मी साथ काम करने वाली महिला के लिए और अपने ही परिवार की स्त्री की गरिमा में अंतर करते हैं और आपत्ति करने वाली स्त्री को खड़ूस या हँसी-मज़ाक न समझने वाली रूखी महिला कहते पाए जा सकते हैं। आखिर सामाजिक जीवन सदियों से ‘उनका इलाका’ था जिसमें स्त्रियों ने अतिक्रमण किया है, तो इसके परिणाम भुगतने के लिए उन्हें तैयार रहना चाहिए। मुझे याद है बस में बेहूदा तरीके से सटे हुए एक पुरुष सहयात्री को टोकने पर मुझे सुनने को मिला था कि इतनी तकलीफ होती है तो घर से बाहर ही क्यों निकलती हो, टैक्सी क्यों नहीं लेतीं, बस में क्यों चढीं। मानो बाहर निकलने पर यह अपमान सहने को मुझे चुपचाप प्रस्तुत रहना ही होगा। कार्यस्थल पर स्त्री- पुरुष का साथ साथ होना और काम करना बराबरी और सम्मान के वातावरण में एक बहुत सुन्दर स्थिति हो सकती है। आखिर यह असत्य नहीं कि स्त्रियाँ और पुरुष दोनों जहाँ काम  करते हैं वहाँ अलग अलग बौद्धिक क्षमता , रीतियों और रुचियों  के कारण एक मधुर वातावरण होता है। केवल स्त्री वाले विद्यालय और कॉलेज, केवल स्त्रियों वाले डाकखाने या पुलिस थाने, मेट्रो ट्रेन में स्त्रियों का अलग डब्बा आखिरकार  स्त्रियों की छवि एक विक्टिम की बनाता है जिन्हें हमेशा संरक्षण की आवश्यकता होती है। एक कमज़ोर शिकार !

यह स्त्री के काम करने में एक अलग तरह की बाधा उत्पन्न करता है। इसके अलावा मातृत्व अवकाश, बच्चों को पालने की दिक्कतें सब मिलकर स्त्रियों को नियुक्त करने की नियोक्ताओं की अनिच्छा में बदल जाता है। स्त्री और पुरुष समान नहीं हैं लेकिन वे बराबर हैं, यह कानून के स्तर पर समझना और सामाजिक अवचेतन में पैठी मान्यताओं के कारण सामाजिक व्यवहार- पैटर्न के स्तर पर समझना अलग अलग बात है। नौकरी से पहले स्त्रियों से उनकी आखिरी मासिक चक्र की तिथि पूछ सुनिश्चित किया जाना या स्त्रियोचित व्यवहार न होने पर सहकर्मी स्त्रियों द्वारा ही अलग-थलग किया जाना हमारी सोच का वह अनुकूलन है जिसमें पितृसत्ता प्रकारांतर से काम कर रही होती है।
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