स्त्रियों की अस्मिता और अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न

डॉ. परवीन कुमारी 'रमा'
रचनाकार .समीक्षक . संपर्क: parvilordshiva7@gmail.com,
‘What a piece of work is a man? How noble in reason? How infinite in faculty? in from, in Moving, How express and admirable? in action how like an angel? In apprehension how like a god? the beauty of the world, the paragon of animals?’
(Shakespeare)

स्त्री-पुरुष के बगैर समाज की कल्पना भी संभव नहीं हो सकती है क्योंकि, स्त्री-पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं. ये एक-दूसरे से भिन्न तथा स्वायत्त  भी है.  सामाजिक विकास की प्रक्रिया में पूरक तत्व पर इस भाँति जोर दिया गया है कि पुरुष ने स्त्री की अस्मिता और अस्तित्व का निर्माण, क्षमताओं-अक्षमताओं की पहचान एवं सांस्कृतिक रूपों की पहचान का आधार स्त्री के अस्तित्व को नहीं रहने दिया ,  बल्कि स्त्री की अस्मिता तथा अस्तित्व को तय करने वाला प्रमुख कारण है उसका पुरुष संदर्भ. पुरुष संदर्भ के कारण ही स्त्री को पत्नी, माँ, बेटी, बहन या रखैल का दर्जा प्राप्त हुआ. इसके अतिरिक्त स्त्री की अस्मिता व अस्तित्व को पहचानने का कोई रूप समाज के सम्मुख आता है,  तो समाज आज भी इस भूमण्डलीकरण के युग में भी  स्त्री को पहचानने से इंकार कर देता है तथा उस पर अनेक प्रश्नचिन्हों की बरसात कर देता है.  मानव-जीवन को संचलित करने वाले संस्थान, कलारूप, नियम, मूल्य एवं पैमाने प्रत्येक पुरुष पर ही केन्द्रित रहे हैं.  स्त्री-जीवन हाशिए पर था अथवा निष्क्रिय,  क्योंकि स्त्री-जीवन का पर्याय तो केवल पुरुष मात्र रहा है.  स्त्री के सदैव से ही प्रकृति का पर्याय माना जाता रहा है. लिंगभेदीय असमानता एवं स्त्री की प्रत्येक अनुपस्थिति के माहौल को स्त्री ने स्वयं के संघर्ष, जिजीविषा एवं परिवर्तन के प्रति गहरी आस्था के माध्यम से तोड़ा  है.

 अन्त में यही कहा जा सकता है कि स्त्री के शोषण तथा असमानता को बनाए रख कर सदैव से दोयम दर्दे का प्राणी समझा जाता रहा है। टी.ए. ग्रीन ने कहा भी सत्य है कि “will and not force is the basis of state”  गाँधी जी ने भी मानवीय (स्त्री-पुरुष) अन्तकरण को स्वतन्त्रता की अमूल्य निधि को स्वीकृति दी है. उनका कथन इस सत्यता को प्रकट करता है कि, “If he gives to the state a certain measure of obedience, It is never with regard to fundamentals.” (Prof. N.K.Basu, Studies in Gandhism) ) वहीं दूसरी ओर महान क्रान्तिकारी दार्शनिक के विचारों से इस सत्यता को प्रभावित किया है कि मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य मानव समाज को कष्टों से मुक्ति दिलाना माना जाता है:: “Man’s dearest possession is life, and since it is given to him to live but once, he must so live as not to be seared with the shame of a cowarally and trivial past, so live as no to be tortured for years without purpose, so live that dying he can say, “All my life and my strength were given to the first cause in the world-the liberation of mankind”.  
इंग्लैण्ड़ के राजा जॉन द्वारा सन् 1215 ई. का घोषणापत्र (Magna carta) ) स्वीकृति ही ऐसी अमूल्य निधि
है“No freeman shall be taken or imprisoned or out lawed or banished, or in anyway destroyed, nor will we go upon him, nor send upon him, except by legal judgement of his peers or by the law of the land.” (Article-39)

आज भूमण्ड़लीकरण के दौर में स्त्री ने लम्बे संघर्ष के पश्चात कुछ बेहतर स्थिति को प्राप्त करने का प्रयास किया है क्योंकि स्त्री अस्मिता, स्त्री मुक्ति, स्त्री अस्तित्व से जुड़े प्रत्येक सवाल-जवाब पर बहस-मुबाहिसा आयोजित करना अत्यन्त चुनौतिपूर्ण  हो गया है.  स्त्री कोई निष्क्रिय शरीर नही है और न ही वह किसी की गुलाम है बल्कि वह तो एक मानवी है. स्त्री की स्वतन्त्र इच्छाएँ, स्वतन्त्र विचारधारा, स्वतन्त्र-दृष्टिकोण तथा उसकी स्वयं की एक स्वतन्त्र परम्परा है. यही कारण है कि उसने प्राचीनकाल से लेकर अब तक समाज एवं परिवार में दर्शाने तथा उत्तीर्ण होने केलिए प्रयत्नशील रही है. 'कवि मैथलीशरण गुप्त' ने  स्त्री के बारे कहा है ‘आँचल में है दूध और आँखो में पानी’ कहकर यशोधरा की स्थिति को दर्शाया है. अब सवाल यही उठता है कि विश्व की प्रत्येक स्त्री के साथ ऐसा क्यों होता है कि वह केवल स्वयं से यों जूझती व लड़ती रहे? स्त्री-शोषण के प्रति सत्यता को जयन्ती आलम ने यों दर्शाया है“Women are engaged in both reproduction and production and both are governed by gender relations that interpenetrate.  They are responsible for the continuation of the family and the human civilisation yet women’s share in resources, even in household resources, is never equal to her effort and contribution in augmenting them.  Accroding to the report of the world food summit in Rome, held on November 13-17, 1996, women are responsible for 80 percent of local food production in Africa, upto 60 percent in Asia and 90 percent in America”.
(Jayanti Alam: Gender and Ideal of a pluralist society, Main stream, Dec.25, 1999)


आज स्त्री की अनेक स्थानों एवं अनेक राज्यों में स्वतंत्र अस्मिता तथा पहचान है.  स्त्री ने अपने अनेक अधिकारों को भी प्राप्त किया है किन्तु इसके अतिरिक्त अनेक ऐसे भी क्षेत्र है जहाँ स्त्री की अस्मिता, अस्तित्व, मुक्ति आज भी गायब है. स्त्री जीवन का संघर्ष बहुस्तरीय होता है. स्त्री-संघर्ष पुरुष जीवन की भाँति एकायामी नहीं होता है क्योंकि गृह के भीतर, बाहर, मन के अंदर और मन के बाहर वह इस संघर्ष की अभिव्यक्ति रही है. छोटे-छोटे मसलों में स्त्री- अस्मिता की जद्दोजहद व्यक्त होती है.  छोटी-छोटी बातों, वस्तुओं, साधनों एवं संकुचित सुख की कामना उसकी अस्मिता के संघर्ष का अंग भाग रहा है.  इसीलिए स्त्री की प्राथमिकताएँ तय करना अत्यन्त कठिन तथा मुश्किल प्रतीत होती है.  स्त्री की स्वतन्त्र पहचान, स्वतन्त्र जीवन-शैली, स्त्री संस्कृति के स्वतन्त्र रूपों के सृजन एवं गैर पुरुष संदर्भों की सृष्टि केलिए प्रथम शर्त है कि स्त्री स्वयं को भिन्न रूप में देखें तथा स्वयं की पहचान को परखें. मानव-अधिकार किसी देश या राज्य की आन्तरिक अथवा घरेलू अधिकारिता के अन्तर्गत नहीं आते अपितु, ये विश्व मानवता के पक्ष में उसके संरक्षण एवं संवर्धन पर बल देते हैं. ऐसे में स्त्री-जाति के कर्त्तव्य उसके सुशिक्षित तथा सुसंस्कृत होने के उपाय, स्त्री-जाति के प्रति पुरुषों के सद्व्यवहार अहम् बिन्दुओं पर विशेष विचार विमर्श करने की आवश्यकता है.

स्त्रियों के उपेक्षित जीवन मूल्यों के परिणामस्वरूप ही विश्व मानव समाज में अनेक प्रकार की बुराईयाँ पनप रही हैं जैसे कि – स्त्रियों के प्रति अत्याचार, उत्पीड़न, दहेज के नाम पर हत्यायें, आत्महत्यायें, यौन-शोषण, घरेलू हिंसा का शिकार आदि.  स्त्रियों के प्रति हो रहे इन अपराधों एवं अत्याचारों के लिए सामाजिक, संस्कृतिक, वैयक्तिक सभी कारण जिम्मेदार हैं.  गरीबी, अशिक्षा, दहेज-प्रथा, पुरूष प्रधान सामाजिक व्यवस्था, तीव्रगति से बदलते सामाजिक मूल्य, आधुनिकीकरण की चाहत, उपभोक्तावादी संस्कृति और नैतिक आध्यात्मिक मूल्यों का ह्रास विधि-व्यवस्था में कमियाँ एवं जटिलतायें प्राय: उत्तरदायी हैं.  हम जब भी स्त्रियों की प्रताड़ना की बात करते हैं तभी प्रत्येक स्थान पर हमारी सभ्यता एवं संस्कृति उसे अदृश्य करना चाहती है और सीता, सावित्री के देश की कथा का स्तर मुखरित होने लगता है अर्थात सीता ने स्वयंवर में राम को चुना था, राधा ने कृष्ण के साथ रास-लीला रचाई थी पार्वती ने शिव को प्राप्त करने केलिए कठोर तपस्या की थी.  इसी कारण स्त्री दबी-दबी रहेगी तो बोलेगी नहीं और पितृसत्तात्मक समाज का वर्चस्व हो जाऐगा और संपत्ति, सत्ता तथा प्रमुख पुरुष के पास बरकरार रहेगा क्योंकि जब भी संस्कृति की चर्चा होती है तो उसका विश्लेषण होना चाहिए कि हमारे इतिहास से जो भी प्रतीत हो रहा है उसके वास्तविक निष्कर्ष क्या निकलते हैं?  केरी ब्राउन ने अपनी पुस्तक‘The Essential Teaching of Hinduism में सत्यता को प्रमाणित किया है कि,“In Hinduism, a woman is looked after not because she is inferior or incapable but, on the contrary, because she is treasured.  She is the pride and power of society. Just as the crown jewels should not be let unprotected (quoted in human rights and values, Jois M. Rama, page 51).

आधुनिकता, पश्चिमीकरण और उत्तर आधुनिकता, उदारीकरण के युग में स्त्री स्वतंत्रता का पताका लिए उसके पक्ष में बढ़-चढ़कर बोलने वाला कथित आधुनिक और प्रबद्ध पुरुष भी अपने घर में एवं अपने आसपास स्त्रियों का शोषण करने से क्यों नहीं चूकता ?  पुरुष की जन्मदात्री होने के नाते उसे उसकी खोई मातृपद की प्रतिष्ठा क्यों नहीं लौटाता ?  दूसरी ओर स्वयं स्त्रियों की प्रगति में क्यों बाधक है ?  ऑल इण्डिया मुस्लिम पर्सन लॉ बोर्ड के अध्यक्ष काज़ी मुजाहइदुल इस्लाम कासिम का कथन इस प्रकार है,“Divine laws can’t be changed, the solution is changing mindsets. The Board will work at Muslims becoming God fearing Muslims who are responsible husbands and fathers.” (outlook, May 21, 2001, Page-57)
विवाद का स्वरूप कुछ भी हो, मुख्य बात है कि गुजारा- भत्ता आपातकालीन आर्थिक स्थिति से उबरने केलिए एक सहारा मात्र समझा जाना चाहिए . अर्थात आज भूमण्डलीकरण युग में स्त्री-पुरुष संबंधों पर अथवा स्त्रियों की बहुमुखी प्रगति पर लिखते हुए, इस अन्तर्विरोधों और विसंगतियों का विश्लेषण भी अत्यन्त महत्वपूर्ण और आवश्यक माना जाता है.

सन् 1994 में दिल्ली उच्चतम न्यायालय में न्यायमूर्ति सुनंदा भंडारे की स्मृति को चिरस्थाई रखने हेतु प्रतिष्ठा की स्थापना की गई थी. सुनंदा भंड़ारे जी ने संक्षिप्त कार्यकाल के दौरान एक ऐसे समलिंग समाज की स्थापना हेतु निरन्तर कार्य किया था जिसमें स्त्रियों एवं समाज के शोषित वर्गों को गौरव एवं सम्मान के साथ जीने का अधिकार प्राप्त हो सके. सुनंदा जी मानव समाज के गौरव के प्रति दृढ़ता से समर्पित थी जिसको स्वतन्त्रता एवं समता द्वारा ही सुरक्षित एवं अलंकृत किया जा सकता था. सुनंदा जी का मुख्य उद्देश्य विभिन्न गतिविधियों द्वारा लिंग समता को सुनिश्चित करना था. किन्तु अनेक प्रश्नों में सर्वोपरि सारगर्भित प्रश्न यह है कि अधिकार घोषित कर देने तथा राज्यों द्वारा स्वीकृति प्राप्त हो जाने से क्या मानव समाज वास्तव में सुख और शान्ति पा सका है ? आखिर स्त्री जाति तथा पुरुष वर्ग अपने अधिकार किससे माँग रहा है ?  क्या एक स्त्री-जाति दूसरे से अधिकार की माँग कर रही है अथवा वह सामूहिक रूप से पूरे समाज से अधिकार चाह रही है ?  क्या वह राज्य से अपने अधिकार देने वाला है कौन ? मानव  स्वयं ? समाज ? राज्य ? यदि यह कहा जाए कि अधिकार लेने और देने वाला स्वयं मानव ही है, तो फिर विसंगति कहाँ है ?  निश्चित ही इस लेन-देन के मामले में कहीं कोई कड़ी  टूट गयी है, कहीं कोई चूक, कहीं कोई शिथिलता, कहीं कोई त्रुटिपूर्ण सम्बन्ध हमारे कार्यों को प्रदूषित कर रहा है.

 इस समस्या पर यदि गंम्भीरता से विचार किया जाये तो हमें यह आभासित हो जायेगा कि अधिकारों के घटाटोप में कर्तव्य रेखा विलुप्त भले ही न हुई हो किन्तु, अदृश्य होती अवश्य प्रतीत रही है. क्योंकि अन्याय एवं बेईमानी सदैव लोगों की स्मृति पर एक अमिट छाप छोड़ जाती है. फिर चाहे यह एकलव्य हो जिसे गुरु दक्षिणा में हाथ का अंगूँठा काट कर देना पड़ा या फिर ढ़ाका से बुनकर जिन्हें बुनाई से रोकने के लिए जबरन उनके अँगूठे काट दिये गये थे.  कौरवों के दरबार में द्रौपदी का चीरहरण भी ऐसी ही एक घटना है. स्त्रियों के प्रति ऐतिहासिक अन्याय के बारे में विश्व की जागरूकता बढ़ी है. स्त्रियों के खिलाफ सभी प्रकार के भेदभाव को दूर करने की पुष्टि एमरीटस प्रोफेसर डॉक्टर आर. अंजनएयूलू ने अपनी Mathrudevobhava (मातृदोवो भव) नामक पुस्तक में किया है कि “The three gunas – Rajasic and Tamasic qualities after birth may also depend upon what it is subject to hear in the anti-natal period.  If the mother reads religious books, hears songs of bhakti and devotion during pregnancy, the child after birth and later in life will also be inclined to hear the same and his behaviour and character will be in the same way.  In a family where there are fights and quarrels and baby in the womb listens to these the child may imbibe the same” (Chapter entitled ‘The foetus can listen and react from Mother’s womb’, Page-42).  

यदपि सार्वजनीन घोषण के अनुच्छेद 29 में कहा गया है कि समुदायों के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के कुछ कर्तव्य हैं और उन कर्तव्यों के पालन से ही उसके व्यक्तित्व का निर्बाधपूर्ण विकास संभव है, किन्तु न तो कर्तव्यों का विस्तार किया गया है और न उनकी विवेचना की गई है। इसीलिए मानवाधिकारों के लिए आधारभूत होते हुए भी कर्तव्य हाशिये पर आ गये हैं.  गाँधी जी के शब्दों में “सभी ने अधिकार प्राप्त करने का प्रयत्न किया लेकिन अपने फर्ज़ भूल गये. ” (हिन्दस्वराज, पृष्ठ संख्या -64) यही कारण है आर्थिक तथा सांस्कृतिक जीवन में स्त्रियों की पुरुषों के साथ समानता के आधार पर भागीदारी में बाधा आती है. समाज एवं परिवार की समृधी  अवरूद्ध होती है तथा स्त्रियों की क्षमता का पूर्ण विकास अत्यधिक कठिन हो जाता है. अब सवाल यही उठता है कि स्त्रियों को सशक्त बनाने में कानून की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है ? आजकल स्त्रियों के सशक्तिकरण में कानून की भूमिका नकारना एक फैशन-सा बन गया है क्योंकि, कानूनों के बावजूद दहेज और दहेज हत्यायें अभी भी जारी हैं। इतना ही नहीं इन मामलों में  वृधी भी हुई है तथा हिन्दू कानून में संशोधनों के बावजूद अभी भी परिवारों में स्त्रियों के प्रति भेदभाव बरता जा रहा है.  ऐसा क्यों है ? यह इसलिए है कि लोग और विशेषकर स्त्रियाँ स्वयं के कानूनी अधिकारों से अनभिज्ञ है और उनके अधिकारों को लागू करने का उनके पास कोई साधन नहीं है.


सबसे महत्वपूर्ण सवाल तो यह है कि सामाजिक खींचतान तथा दवाबों के चलते वह अपने हक़ तथा अधिकारों को प्राप्त करने हेतु संघर्षशील तथा प्रयत्नशील है. आज सामाजिक सोच में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है. हालाँकि कानून की मदद से अत्यधिक अनुकूल वातावरण बन सका है .देखा जाए तो यह अत्यन्त आवश्यक  है कि जब तक कानून से समानता और ईमानदारी का वातावरण नहीं पनपता तब  तक इम भेदभाव से मुक्ति प्राप्त नहीं हो सकती. यहाँ हम देख सकते हैं कि किस भाँति आज का वातावरण बना हुआ है जिसके कारण मानव में सामानिक दुष्टिकोण नहीं बदल पा रहा है और अगर दृष्टिकोण में परिवर्तन करते भी हैं तो अनेक नई आकांक्षाओं को मूर्त रूप देने केलिए कानून नहीं है. भारत के उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश  वी.आर. कृष्णा अय्यर ने गलत व्याख्या के विषय में एक उदाहरण इस प्रकार दिया है कि “The best law can prove dreadful in the interpretative hands of a bad Judge as happened in America in the notorious. Dred Scott case which held Negroes to be slaves, not human. There, inspite of the constitutional declaration that all men are equal and possess inalienable rights, the Supreme Court of the United States held that black slaves were not persons but property and thus constitutionalised slavery.”
(Law, Society and collective consciousness, Page - 77)

  यह एक कठोर सत्य है की शाब्दिक लफ्फाजी के उपरान्त भी स्त्रियाँ ऐसे घोर भेदभाव और अपमान की शिकार हैं, जिसे देखकर लगता है कि हम इंसानियत  से गिर गये हैं और यही भारत में स्त्री-पुरूष संबंंधों की वास्तविकता है. यदि स्त्री-सशक्तिकरण की प्रथम कसौटी को हम देखते हैं तो वह है ‘निर्भयता,’ इसके लिए हमारी पुलिस एवं न्याय प्रणाली कार्यक्रम बने, स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता बनाए, यौन-अपराधों के लिए कड़ी सजा हो और आज की ढी़ली दण्ड प्रक्रिया में परिवर्तन हो. एक नई व्यवस्था का निर्माण करना होगा ताकि न्याय प्रक्रिया की तमाम अकार्यक्षमता तथा विलम्ब जनता के सम्मुख लाया जाये. अपराध की छानबीन पर से पुलिस का तथा न्यायिक प्रक्रिया पर से अदालतों का एकाधिकार समाप्त करके उसे गतिमान बनाया जाये. ऐेसी कौन-सी योजनायें हमारे पास है और उन्हें किस प्रकार से जनता के परिवर्तन हेतु रखा जाये. पारिवारिक तथा बाहरी सुरक्षा के पश्चात अब प्रश्न उठता है रोजी-रोटी का, आज की स्त्री किस भाँति नौकरी कर रही है ?  कैसा काम, कौन सा काम, स्त्रियाँ उसे किस प्रकार करती है और उस कार्य का लेखा - जोखा कैसे रखा जाता है ? महिला सशक्तिकरण में शिक्षा का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है. कहा जाता है कि ‘सा विधा या विमुक्तये.

इसी कसौटी पर आज की शिक्षा प्रणाली पुनर्गठित करने की आवश्यकता है. जिसमें, ईमानदारी, कार्यकुशलता, न्यायपरायणता और देशप्रेम जैसे मूल्यों को तेजस्वी तथा प्रखर बनाया जाये. हमारे लोकतन्त्र में महिला सशक्तिकरण की प्रथम नींव उसी दिन आ गई थी जिस दिन प्रत्येक व्यस्क स्त्री को पुरुषों की बराबरी में मतदान करने और चुनाव लडने का अधिकार प्राप्त हुआ था. अर्थात  संविधान में भी पोजि़टिव  डिस्क्रिमिनेशन इन फेवर ऑफ विमेन’ कहा गया है, “These fundamental rights represent the basic valves cherished by the people of this country since the vedic times and they are calculated to protect the dignity of the individual and create conditions in which ever human being can develop his personality to the fullest extent.”
( Maneka Gandhi Vs union of India (1978) ISCC 248)


जैसे-जैसे स्त्री सशक्तीकरण के माध्यम से अपने अस्तित्व एवं अस्मिता की चेतना के प्रति जागृत होगी उन पर उतने ही पुरुषात्मक वर्ग से प्रहार भी होते रहेंगे.  स्त्रियों पर बढ़ते अत्याचारों का मुख्य कारण यह है कि जिस गति से स्त्री चेेतना प्रकट और मुखर हो रही है और स्त्रियों उतनी गति से पुरुषों में संवेदना जाग्रत नहीं हो पा रही है. जिससे संघर्ष उत्पन्न हो रहा है. निष्कर्ष के रूप मे हम कह सकते हैं कि ‘परिवार’ ही बढ़कर ‘समाज’ के रूप में विकसित होता है.  इसलिए इसका प्रभावी होना आवश्यक है, लेकिन यह तभी संभव होगा जब उसके संपूर्ण घटकों में समानता और साझेदारी हो. इसके लिए परिवार के सारे सुख-दुःख, भूमिकाएँ, जिम्मेदारियाँ, आवश्यक किन्तु उबाऊ कार्य, निर्णय अधिकार इत्यादि आपस में बाँटने होंगे .  इसके लिए आवश्यक है कि परिवार के घटक सदस्य एक-दूसरे का ख्याल रखें, उनका हाथ बँटाएँ, उनके अच्छे गुणों का सम्मान करें और कमियों को पूरा करें और यह सब समानता के आधार पर हो. हम उम्मीद करें कि अपने लोकतन्त्र तथा समानता के हक का सहारा लेते हुए नयी दिशा की ओर अग्रसर रहेंगे.

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