रील और रीयल ज़िदगी: एक इनसाइड अकाउंट

असीमा भट्ट
रंगमंच की कलाकार,सिनेमा और धारवाहिकों में अभिनय, लेखिका संपर्क : asimabhatt@gmail.com
प्रत्युषा मर गयी. वह क्यों मरी? क्या हुआ उसके साथ यह अटकलें लगायी जा रही है. ज़्यादातर लोग बार -बार प्रेम में असफलता पर ज़ोर दे रहे हैं. जबकि वह कोई पहली अभिनेत्री/मॉडल नहीं है,  जिसने आत्महत्या की. परवीन बॉबी, दिव्या भारती,नफीसा जोसेफ, सिल्क स्मिता, कुलजीत रन्धावा, जिया खान,., और भी कई नाम हैं,  जिन्होंने  आत्महत्या की या मारी गईं . कुछ रहस्य है,  कुछ से पर्दा उठना बाक़ी है, कुछ भुला दी गयीं या फिर यह  भी भुला दी जायेगीं.  स्मृतियाँ बहुत जल्द विस्मृत हो जाती हैं. विस्मृत की  जाती हैं.. सबकुछ वापस वैसे ही अपनी- अपनी पटरी पर.

प्रत्युषा भी भुला दी जाएगी. एक ऐसी अभिनेत्री जिसने बालिका वधु में ‘आनंदी’ की भूमिका  निभायी. यह सीरियल अब तक सबसे अधिक लम्बा चलने का  रिकॉर्ड बनाने वाला और सबसे हाई टीआर पी (टेलीविजन रेटिंग पॉपुलारिटी पॉइंट) वाला सीरियल माना जाता है. ऐसी लोकप्रियता के लिए कोई भी कलाकार सपना देखता है. उसे यह सब कुछ इतनी जल्दी और आसानी से मिला फिर क्या वजह रही , सिर्फ़ प्रेम प्रंसग .....?

आज इंडस्ट्री में एक्टिंग स्कूल से ज़्यादा मनोचिकित्सक की जरूरत है |

शायद कुछ लोग जानते हों या याद हो कि ‘बैंडिट क्वीन’ फ़िल्म में  सीमा बिस्वास ने फूलन देवी की भूमिका निभायी थी. यह बात पता नहीं कितने लोग जानते हैं कि सीमा बिस्वास को उस क़िरदार से बाहर निकलने में काफ़ी वक़्त लग गया था. फूलन देवी के साथ जो उसकी रीयल ज़िन्दगी में हुआ, उसे सीमा बिस्वास को फूलन बन कर रील (सिनेमा) जिंदगी में जीना पड़ा. उन सबसे वह वैसे ही गुज़री जैसे फूलन देवी - अपने जीवन में हर तरह की यातना झेलती हुई. और सच्चाई को सिनेमा में जीते- जीते कई बार अभिनेता उस तरह सोचने और जीवन को देखने लगता है,  जिससे कई बार किरदार से बाहर आने में वक़्त लग जाता है या बहुत मुश्किल होती है.


बल्लभ व्यास ने रामगोपाल बजाज के निर्देशन में सुरेन्द्र वर्मा का ‘क़ैद ए हयात’ में ग़ालिब की भूमिका निभायी थी. बल्लभ व्यास भी उसी तरह ग़ालिब के किरदार में लम्बे अर्से तक गिरफ़्त रहे. उनकी आँखें लगातार ग़ालिब जैसी  ही चढ़ी रहती. हमेशा उदास बेक़रार  ... जैसे किसी चीज़ की तलाश... हर वक़्त कुछ ढूंढती आँखें...
यह हाल होता है एक प्रशिक्षित अभिनेता का,  जबकि उन्हें इस बात की ट्रेनिंग विधिवत दी जाती है कैसे वे किरदार में जाएँ और कैसे बाहर आयें. ‘How to switch on and switch off. How to attach and detach with character.’  किसी अभिनेता के लिए यह बुनियादी प्रशिक्षण है कि अभिनय में यह अभ्यास सीखें कि कैसे अपनी भूमिका में किसी खास वक़्त तक ही रहना और फ़िर उसके बाद उससे बिल्कुल बाहर निकल आना सीखना होता है.  मंच पर और कैमरे के सामने भी याद रखना बहुत ज़रुरी है कि वह एक दी गयी भूमिका निभा रहा/रही है न कि वह स्वयं वह है. एक बारीक रेखा हमेशा अभिनय और अभिनेता में रखनी पड़ती है और यह कला एक कलाकार को सीखनी बहुत ही ज़रूरी है, नहीं तो उसी में उलझा रहेगा/रहेगी. अगर ‘रोमियो जूलियट’ कर रहे हैं तब यही समझें कि सचमुच ‘रोमियो जूलियट’ हैं,  वैसे दूसरे के लिए मरेंगे. जबकि मरना तो है ही नहीं किरदार को जीना है.  ‘ऑथेलो’  करेंगे तो  डेस्डेमोना  की हत्या करेंगे. फिर क्या होगा? तुग़लक़ नाटक करेंगे तो क्या होगा ? कितनी लाशे बिछेंगी मंच पर? ‘लव मेकिंग’ सीन में यह लगते हुए भी कि आप डूब कर शिद्दत से  प्यार कर रहे हैं,  वहां भी बहुत सूक्ष्मता से ध्यान रखना होता है कि कैसे आप सिर्फ़ ‘Act’ कर रहे हैं. यह सबसे मुश्किल होता है एक अभिनेता अभिनेत्री के लिए. कैसे आप ऐसे सीन में अपने सह-कलाकार को कॉमफ़र्ट देते हैं जिससे वह सीन बेहतरीन भी हो, दर्शक कन्विंस हो ,  खूबसूरत भी हो और अभिनेत्री को भी लगे कि आप ऐसे सीन का कोई लाभ नहीं उठा रहे होते हैं. यह सब बहुत जरूरी है अभिनेताओं को सीखने और यही नहीं आता तो बहुत मुश्किल हो जाता है. इसका मनोवैज्ञानिक असर भी होता है अभिनेता और अभिनेत्रियों पर. कई बार अभिनेत्रियाँ मना कर देती हैं ऐसे सह कलाकारों के साथ काम करने से.

हत्या, बलात्कार यहाँ तक कि माँ, पिता, पति आदि की मृत्यु के दृश्य में यह मुश्किल होता है,  अगर मान लिया कि वो सचमुच उनके अपने हैं तो गहरा मानसिक सदमा पंहुच सकता है.  इस तरह की  बातों  पर ध्यान  नहीं दिया गया तो खतरें होते हैं और होने की हमेशा सम्भावना बनी रहती है. यह दर्शक नहीं समझ सकते लेकिन अभिनेता और उनके साथ काम करने वाले अन्य कलाकारों के साथ साथ निर्देशकों को भी समझ आनी चाहिए.
एक बार जब ‘बैरी पिया’ के सीरियल में मैं विधवा की भूमिका कर रही थी. जिसमें न चाहते हुए मेरा मंगलसूत्र कैमरे में झांक रहा था. रणदीप महाडिक निर्देशक थे,  मेरे पास आये और धीरे से कान में कहा – अगर आप बुरा न मानें तो क्या सिर्फ़ सीन करने तक मंगलसूत्र निकाल सकती हैं? टेक के बाद आप पहन लीजियेगा. और वह व्यहार इतना आग्रहपूर्ण था,  और एक अभिनेता की संवेदना को ख्याल में रखकर किया गया कि तुरंत मैंने मंगलसूत्र गले से निकाल कर उन्हीं के हाथों में पकड़ा दिया. अगर इसी बात को  कहने का उनका तरीका कुछ और होता तो शायद बहस होती या मन ख़राब होता,  प्रोफस्लिज़म के साथ इमोशन का ख्याल रखना बहुत ज़रूरी होता है. और अक्सर यह बात अभिनेता भी भूलते हैं और निर्देशक भी. एक दृश्य था ‘प्रथा’ सीरियल में,  जिसमें मेरे बेटे की भूमिका कर रहे अभिनेता का एक्सीडेंट हुआ है और शव मेरे सामने पड़ा होना था है. अभिनेता को मेकअप रूम से बुलाया गया. और कहा गया - ‘चल तू मर गया लेट जा अर्थी पर...’  यह इतना अमानवीय तरीके से कहा गया कि मुझे बहुत बुरा लगा. लेकिन यह बात सिखायी नहीं जाती जबकि सिखायी जानी चाहिए और सीखनी चाहिए.


     
भावनात्मक दृश्य का यानी रोने धोने वाले दृश्य का नाम ‘ग्लिसंरींन के आंसू’ रखा गया है. और सेटपर कहा जाता है – ‘लाओ TRP लाओ.’  रिसर्च के तहत ऐसे सीन लिखे जाते हैं कि अभिनेत्री को जितना सताया जायेगा और अभिनेत्री जितना रोयेगी , उतना ही दर्शक भावुक होंगे और ‘TRP’ उतनी ही बढ़ेगी. दर्शकों की भावनाओं के किस तरह खिलवाड़ किया जाता है यह दूर दराज़ की भोली–भाली दर्शक क्या समझे. वह तो इस बात पर भूखे प्यासे रह जाते  हैं कि आज उनकी अमुक पसंदीदा अभिनेत्री को उसके पति ने मारा या सास ने ताने दिये  और अभिनेत्री दुःखी होकर भूखी-प्यासी सो गयी. जबकि पैकअप के बाद अभिनेत्री देर रात किसी नाईट क्लब में नाचती उछलती पायी जायेगी.

रामानन्द सागर का रामायण कितने लोगों को याद है दीपिका ने उसमें सीता की भूमिका निभायी थी. अब कितने लोगों वो याद है? जबकि उस दौर में सीता की भूमिका में उसकी तस्वीर घर घर लगी पायी जाती थी और लोग उसकी पूजा आरती करते थे. अभिनेता भी अपने क़िरदार को निभाते निभाते कई बार खुद वही समझने लगता है जो भूमिका निभा रहा होता. जबकि होना यह चाहिए कि जैसे ही आपने अपना क़िरदार का ड्रेस बदला वैसे ही आप उससे बाहर आयें. यानी चोला बदलना आना चाहिए. ऐसा जो अभिनेता अभिनेत्री नहीं कर पाए इनमें उनलोगों की संख्या बहुतायत है,  जिन्होंने आत्महत्या तो नहीं की लेकिन भारी मात्रा में शराब या ड्रग्स की गिरफ्त में हैं , आज उनकी कोई पहचान नहीं. धीरे -धीरे लोग तब्बू और सीमा बिस्वास जैसी अभिनेत्रियों को भूलते जा रहे हैं. ग्रेसी सिंह जैसी अभिनेत्री , जो लगान’ और मुन्ना भाई एम्.बी.बी.एस. जैसी हिट फिल्मों की अभिनेत्री थी उसके बारे में लोग पूछने लगे थे कौन ग्रेसी सिंह ? दुबारा वे  संतोषी माता के रूप में छोटे पर्दे पर अवतरित हुई हैं.

महेश भट्ट की बहुत ही हिट फ़िल्म आयी थी आशिक़ी/ कितने लोगों को याद है उसकी अभिनेत्री अनु अग्रवाल ने जो  एक कार एक्सीडेंट में अपना चेहरा पूरी  तरह खो बैठी, किसी तरह मेडिकल और मेडिटेशन से अपना दुबारा जीवन पाया.  यह नियति है कलाकारों की और वो इस चमक दमक वाली खोखली दुनिया को जितनी समझ लें उतना ही उनके लिए अच्छा होगा. राजेश खन्ना , जिनके ज़माने में सडक पर निकलने पर लडकियाँ अपना दुपट्टा लहराती थी,  आख़री दिनों में बेहद अकेले पड़ गए थे.  सब चढाते सूरज को सलाम करते हैं
जब तक सितारा बुलदं है. फिल्म/टीवी शो चल रहा है. अभी आपके पीछे घूमते हैं. निर्देशक, प्रोडूसर और फैन. सबकी अभिनेताओं को आदत लग चुकी होती. पेज थ्री पर आने के लिए क्या क्या नहीं जुगत लगाते हैं,  लेकिन यह नहीं पता होता कि पेज थ्री की कितनी उम्र होती है. उन्हीं पेज थ्री से बच्चों की पॉटी साफ़ की जाती है.
मैंने यह किया. मैंने इतनी हिट फ़िल्में की. मेरा शो इतना पॉपुलर था,  यह सोच सोच कर एक झूठी शान में जीने की आदत बना लेने वाले कलाकार बहुत जल्दी टूटते हैं,  जब उनके घर सिर्फ़ फ़ोन आना कम हो जाता है. चाहने वालों से घिरे रहने वालों से अचानक जब लोग मुंह मोड़ लेते हैं,  तो यह सदमा उन्हें बर्दाश्त नहीं होता.  वे अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं. जबकि पिछले दो साल पहले की हिट फ़िल्में लोगों को बमुश्किल याद रहती है. एक साल पुराना सबसे हाई टीआरपी सीरियल बंद होने के बाद दर्शक उसे भूल जाते हैं. जिनके कलाकारों को रेड कारपेट पर चलने की आदत हो जाती है, फोटोग्राफ और ऑटोग्राफ देने की आदत हो जाती है,  अचानक जब कोई उन्हें पूछने नहीं लगता,  तो यह हीरो/हीरोइन वाले इमेज को झटका सा लगता है. सहन नहीं कर पाते. जिन्होंने समय पर शादी कर ली ,  बाल बच्चे हो गए. और अपनी सुरक्षा का इंतेज़ाम कर लिए. गाड़ी,मकान में इन्वेस्टमेंट कर लिया,  ठीक ठाक हैं,  वरना उनकी हालत है कि उनको भी मलाल रहता है अब वो दिन नहीं रहे जब वे स्टार हुआ करते थे.



सफ़लता की मुक़ाम पर क़ायम रहना भी कला है 

अपने सोचे से क्या होता है शाद 
खुदा की देन है मशहूर हो जाना 
सफलता एक तो सबको नहीं मिलती और अगर मिल भी जाए तो सफ़लता की मुक़ाम पर कायम रहना उससे भी बड़ी कला है. क्या लगता है अमिताभ बच्चन को आसानी से सफ़लता मिली? और मिल गयी तो आसान है उन्हें आपनी जगह पर क़ायम रहना. सफ़लता की बहुत बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है हर कलाकार को वरना हर वक़्त एक असुरक्षा की भावना से जीते हैं कि कब वो जिस पायदान पर हैं उससे नीचे आ गिरें या हटा दिए जाएँ. आज बॉलीवुड में शाहरुख खान भी असुरक्षित हैं कि कब कोई नया अभिनेता आकर उनकी जगह ले ले. अभिनेत्रियों का करियर तो और भी कम होता है फ़िल्मी दुनिया में. जूही चावला और काजोल जैसी अभिनेत्री की लोकप्रियता भी मिट गयी. तो जो एकाध फ़िल्मों में आयी और काम किया , वह कब आयी और कब गयी किसी को याद नहीं. याद रखने की ज़रूरत भी किसे हैं. सिनेमा है/टीवी है कोई जिंदगी थोड़े है. और जब जिंदगी की बड़ी से बड़ी घटना विस्मृत कर दी जाती है तो टीवी/सिनेमा कोई क्यों और कितनी देर याद रखेगा? सफलता और उसकी चमक दमक आज है कल नहीं होगी. यह बात अगर अभिनेता स्वीकार ले और सहजता से आम इन्सान की तरह जीये तो कोई  तकलीफ़ नहीं होगी. जिंदगी ने अवसर दिया आपने सफ़लता को जिया/भोगा.   सहज बने रहकर सहजता से जीना आना भी सीखना एक अभिनेता को आना चाहिए. और जीवन के हर अवस्था को गरिमापूर्ण जीना सीखना आना चाहिए. यह जब एक कलाकार नहीं सीख पाता तो अकेलापन और अवसाद से ग्रस्त हो जाता है.  

सामाजिक/मनोवैगानिक कंडीशनिग़
ग्लैमर की चकाचौध दुनिया लोगों को बहुत मनभावन लगती है. रातों रात की लोकप्रियता एक ऐसे चाँद की तरह है जिसे देख हर कोई ललचाता है. इसकी झमता. प्रतिभा, गुणवत्ता आपमें है भी या नहीं. या सिर्फ बच्चे की तरह  चाँद देख कर मचल गए कि मुझे भी चाँद चाहिए. चाँद चाहिए तो चाँद को छूने के लिए अपनी कद को भी उतना ऊँचा बनायें. वरना तो मुंह की गिरेगे. समाज में भी टीवी/फ़िल्म के कलाकारों को अगल दुनिया से आये एलियन की तरह देखा जाता है. और वो क्या करता होगा? क्या खाता होगा?  वह भी आम इन्सान हैं. उन्हीं पांच तत्वों से बना है,  जिनसे आप. आप जो खाते हैं वो भी खाता है,  वो भी सोता है,  वो हंसते हैं,  रोते हैं. कालिदास के संस्कृत के नौ रस की तरह उनमें भी नौ रस हैं. और मनुष्य के भाव यूनिवर्सल होते हैं. चाहे वो राजा हो या रंक फिर अभिनेता हो या दर्शक . उनसे अलग इंसानों जैसा उम्मीद करना आम जनता की भूल है या जो सोचते हैं कि हीरो हमेशा दस पर भारी पड़ेगा और हिरोइन मक्खन जैसी होती है. उसके बाल और आंचल अस्वाभाविक तरीके से हवा में लहराते हैं. ऐसा कुछ नहीं होता. सारे कलाकार इंसान पहले हैं,  उनकी भावनाएं और दुःख- सुख भी सामान्य लोगों की तरह हैं. नहीं तो प्यार होने और प्यार में दिल टूटने पर रोते नहीं और जान नहीं देते. ' फेयरी  टेल'  वाले कांसेप्ट से बाहर निकलें. कालिदास ने नाटक कैसे देखें इस पर अलग से लिखा है. एफ़टीआईआई भी एक खास प्रशिक्षण देते हैं ‘HOW to watch cinema’

नाटक और सिनेमा देखना भी एक कला है और उसको वहीं  तक रहने दें. उसके बाद अभिनेता ने जो अभिनय सिनेमा/स्टेज/टीवी पर निभाया उससे उसके निज़ी जिंदगी में वैसा उम्मीद करना नासमझी है. फ़िल्म/टीवी/स्टेज़ पर बुरा चरित्र निभाने वाला बुरा नहीं होता और सब अच्छा चरित्र निभाने वाले महान इंसान नहीं होता.  अक्सर लड़के -लड़कियां हीरो- हीरोइन जैसे पति -पत्नी और जीवन साथी की कल्पना कर लेते हैं,  जबकि खुद अभिनेता और अभिनेत्रियों की ज़िन्दगी कितनी खोखली होती है. एक ऐसी रौशनी है,  जिसके पार मुश्किल से दिखायी देता है या उसके पार की सच्चाई को देखना चाहेंगे तो आँखें धुंधली हो जायेगी. इसलिए जो जैसा है रहने दें. कैमरे के पीछे देखने की कोशिश न करें. नहीं तो इतनी मायूसी होगी कि आपने सुना होगा कि शूटिंग देखने के बाद फ़िल्म देखने का मन नहीं करता. इतनी बार रिटेक देते हैं वो. हम तो एक बार में कर लें. ऐसा लगता है. ज़लेबी खाने जैसा आसान नहीं है.

अवतार सिंह ‘पाश’ की एक कविता की पंक्ति है . ‘मैं इन्सान हूँ. बहुत कुछ जोड़ -जोड़ कर बना हुआ’ 
कलाकार भी इन्सान होते हैं. आम इन्सान की तरह बहुत कुछ जोड़ कर बने होते हैं. उनके भी दुःख/सुख और सफलता और असफलता होती है. रील और रीयल जिंदगी के बीच भारी अंतर है और इस अंतर को बैलेंस करना सीखना पड़ेगा.  सपनों की दुनिया नहीं है. सच की सतह है और जिंदगी में सच की सतह  पर सब कुछ होता है , सुख भी,  दुःख भी.  धूप भी, छाँव भी.
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