अपनी -अपनी वेश्यायें : सन्दर्भ : जे एन यू सेक्स रैकेट

संजीव चंदन
प्रोफ़ेसर अमिता सिंह , सोचता हूँ कि आपकी 'जे एन यू सेक्स रैकेट वाली रिपोर्ट'  पर क्या कहूं. आजकल चिट्ठियाँ लिखने का चलन है, चाहे वह चिट्ठी पढ़े या न पढ़े जिसे वह चिट्ठी लिखी गई है . मैंने भी कुछ चिट्ठियाँ लिखी हैं इन दिनों . चाहा आपको भी लिखूं. आपके नाम दर्जनो शोध पत्र हैं, 4 दशकों से आप प्रोफ़ेसर हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर जे एन यू तक आपने पढ़ाया है. आपको कहाँ होगी फुर्सत कोई चिट्ठी पढने की !

फिर भी दिल है कि मानता नहीं. जानना चाह रहा था कि जे एन यू में जिस सेक्स रैकेट की बात आप कर रही हैं वह कब से चल रहा है, 2001 के बाद, जब आप यहाँ प्रोफ़ेसर होकर आईं या उसके पहले से. सोचा फोन कर पूछूं वह कौन सा मेस है , कौन सी जगह है, जहां से रैकेट चलता है ! जानना चाह रहा था कि आपको कैसे पता चला कि जे एन यू में सेक्स रैकेट चल रहा है, कब पता चला. पता चला तो आप तो देशभक्त नागरिक हैं, पुलिस को भी सूचित किया होगा आपने. जब आप आईं यहाँ प्रोफ़ेसर होकर तब मान्यवर अटल बिहारी वाजपयी प्रधानमंत्री थे और मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी थे. इन सच्चरित्र 'पुरष सिंहों' के हाथ में देश का और देश की शिक्षा का भविष्य था, तब जरूर आपने उन्हें जे एन यू की गंदगी से  अवगत कराया होगा. नहीं कराया तो बड़ी चूक हुई आपसे, क्योंकि तबतक तो 10 साल के लिए सत्ता से ‘रामभक्त’ विदा हो गये, तबतक तो सेक्स रैकेट और जम गया होगा जे एन यू में...!

जे एन यू में अमिता सिंह के खिलाफ एक पोस्टर 
सच बताऊँ तो मैं डर गया आपके रूतबे से और आपको फोन नहीं कर सका. सोचा चलो खुद ही जे एन यू चलते हैं. कल पहुंचा भी, कोई स्रोत तो पता चले, कब कैसे कहाँ से चलता है यह रैकेट ! वाह, आपने क्या प्लाट बनाया है, इस संस्पेंस कथा का, सेक्यूरिटी गार्ड, विश्वविद्यालय का मेस, मुनिरका का ब्यूटी पार्लर- कितना सच सी लगती है न कहानी आपकी !  मुझे आपका बैकग्राउंड नहीं पता है, कहाँ से आती हैं, किस समाज से आती हैं, जहां से, जिस समाज से आती हैं, उस समाज से कितनी लडकियां उच्च शिक्षा में दाखिला ले पाती हैं. फिर भी बैकग्राउंड का फर्क तो पड़ता है, जिसे आप जैसे ‘ चरित्रवान’ प्रोफ़ेसर संस्कार कहते हैं . आप जैसे ‘ संस्कारी प्रोफेसरों ‘ की पीड़ा समझ सकता हूँ , जिन्हें जे एन यू जैसे नर्क में पढ़ाना पड़ रहा है और  ‘ टैक्स पेयर जनता’ के पैसों से डेढ़ –दो लाख का वेतन लेने को मजबूर होना पड़ रहा है, और वहीं कैम्पस में सुविधा संपन्न सरकारी निवासों में रहते हुए अपने बच्चों का लालन –पालन करना पड रहा है- बच्चों पर बिगड़ने के खतरे अलग से.

एक कहानी याद आ रही है, किसी संस्कारी कथाकार की, जिसकी कहानी के नायक को दिल्ली की लड़कियों की पीठ पर 500 रुपये का टैग लटका दिखता था, यानी 500 रुपये में उसे वे लडकियां ‘चलने’ को तैयार दिखती थीं. कहानीकार जिसे ‘ चलना’ कह रहा है ‘ उसे आप ‘ सेक्स रैकेट’ कह रही हैं – ‘ काल गर्ल टाइप’ की शब्दावली ,में – हिन्दी का कथाकार है,  हिन्दी में सोचता है और आप अंग्रेजी में सोचती हैं- लेकिन दोनो की चेतना एक सी काम करती है ‘ संस्कारी टाइप.’ शुक्र है कि 2002 में जब वह कहानी लिखी गई थी तो कहानीकार ने या उसके नायक ने आपको नहीं देख लिया होगा, क्योंकि सडक पर चलने वाली हर ‘मादा’ (!) की पीठ पर उसके संस्कार ने 500 का टैग दे रखा था ! कुफ्र ! तौबा , तौबा ! यह क्या,  संस्कारों के प्रभाव में मैं इतना कुछ सोचता चला गया ! लेकिन मैडम पता नहीं अदृश्य टैग देखने वाले और शराब की बोतलें, हड्डियां और कंडोम गिनने वाले डोजियर लिखने वाले ‘ संस्कारी मस्तिष्क’ को मैं एक साथ देख रहा हूँ, एक ही बैकग्राउंड से- एक ही संस्कार से लदे –फदे.
जे एन यू में प्रतिरोध 

डोजियर तैयार करने वाले आपके ‘संस्कारी मन’ को लेकर इतना तो आश्वस्त हूँ ही कि यह कोई नासमझ या संस्कार प्रेरित प्रसंग भर नहीं है , यह दुष्ट दिमाग से निकला षड़यंत्र है, जो उच्च शिक्षा में दाखिल लड़कियों को झेल नहीं पा रहा है – मनुस्मृति प्रेरित मन - उन्हें फिर से घर की ‘ सुरक्षा’ में कैद करना चाहता है. आप तो प्रतीक मात्र हैं. आप तब भी प्रतीक बन गई होंगी जब हिन्दी के कथाकार के नायक की निगाह आपकी पीठ पर गई होगी, क्योंकि आप भी तब दिल्ली में थीं, पब्लिक स्फीअर में थीं, जब उसे दिल्ली में लड़कियों की पीठ पर 500 रुपये के टैग दिख रहे थे- यानी पब्लिक स्फीअर में दिखती लडकियां 500 रूपये की 'माल' !   और अब आपको आइसा, डी एस यू आदि में सक्रिय लडकियां ‘ सेक्स रैकेट’ के चैनल को संचालित करती दिखती हैं- 'संस्कारी मन' का क्या साम्य है !!

अमिता सिंह जी , यह संस्कार बड़ा विचित्र है. इसकी प्रेरणा से चलिए आपको कुछ दृश्य याद करवाता हूँ. जब आपके किशोर दिनों में आप या आपकी सहेलियों ने पहला ठहाका लगाया होगा, खुलकर,  तब किसी ‘संस्कारी मन’ ने कहा होगा – ‘लड़कियों का जोर –जोर से हंसना छिनाल होने की पहचान है, इसलिए जोड़ से मत हंस.’ जब किसी स्कूल –कॉलेज में पढने गई होंगी और किसी युवा पुरुष सहपाठी के साथ स्कूल से आते या जाते वक्त दिखी होंगी ऐसे ही किसी ‘संस्कारी मन’ को,  तो उसने कहा होगा, ‘ रुक बदचलन, लड़कों के साथ लड़कियों का घूमना ठीक नहीं है.’ आपके संस्कार को देखते हुए,  न जानते हुए भी मैं समझ सकता हूँ कि आपने प्रेम नहीं किया होगा युवा दिनों में, विवाह से पूर्व. पहली बार पति के साथ ही गई होंगी सिनेमा भी देखने. सिनेमा हॉल में पति के साथ ही सही , लेकिन एक पुरुष के साथ फिल्म देखते हुए ‘ संस्कारी मन’ ने कहा होगा ‘ बदचलन, सिनेमा में चुम्मा चाटी’ देखती है !  जब पढ़ाने आई होंगी कॉलेज में पहली बार और 8वें दशक में और साड़ी के साथ दिल किया होगा आधी बांह का ब्लाउज पहनने का, पहन कर गई भी होंगी कॉलेज में पढ़ाने तो ऐसे ही  ‘संस्कारी मन’ ने पता नहीं क्या –क्या संकेत किया होगा, क्या –क्या  कहा होगा आपस में. और किसी दिन साधना कट बाल बना कर गई होंगी कॉलेज या साड़ी से पेट का कोई हिस्सा दिख गया होगा कभी कॉलेज आते –जाते,  तो ऐसे ही ‘डोजियर’ के कितने पन्ने लिख दिये होंगे तब के किसी ‘संस्कारी मन’ में.

इस तरह फोटो मिक्सिंग से बनाया जा रही  जे एन यू की इमेज 
मैं भी न मैडम. क्या से क्या लिखे जा रहा हूँ. आपके इतने मेहनत से तैयार फिक्शन के ऊपर. आप कहाँ समझने वाली हैं यह सब, क्योंकर याद करने लगीं भला अपने ‘ उन दिनों’ को. अभी तो फिक्शन लिखते हुए आपके         ‘ संस्कारी मन’ की दुष्टता बल्लियों उछल रही होंगी. कितना खुश होती होंगी आप जब आपके जैसे ही कुछ और दुष्ट ‘ संस्कारी मन’ चैनलों से लेकर यू ट्यूब तक जे एन यू के बोर्ड के साथ शॉर्ट्स पहनी लड़कियों की तस्वीरों के घाल –मेल से आपके फिक्शन में यथार्थ का घोल डाल रहे होंगे .

मैडम आप तो खूब समझती हैं, आप जैसे आपके आका भी समझते हैं,  ऐसे डोजियर का मतलब, वे इसके असर को लेकर निश्चिन्त होंगे कि यह ‘ राम (देव) बाण औषध’ की तरह काम करेगा, जब लड़कियों का मन उच्च शिक्षा में दाखिले को ललचेगा. यह मनुस्मृति से ज्यादा मारक है, तत्काल प्रभावकारी ! 
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