पापा बदल रहे हैं : एक हकीकत एक फ़साना

मुकुल सरल
कवि/पत्रकार/संस्कृतिकर्मी. संपर्क : mukulsaral@gmail.com
( वैयक्तिक ही राजनीतिक है , कैरोल हैनीच का का लेख और स्त्री विमर्श के लिए नारा सा बन गया है उपबंध,  सच में स्त्रीमुक्ति का सूत्र वाक्य है . स्त्रीमुक्ति के लिए पुरुषों का बदलना जरूरी है , क्योंकि स्त्रीवाद कोई ऐसा आन्दोलन नहीं है, जो किसी शत्रु के खात्मे से ख़त्म होने वाला है . एक स्त्री का अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष जिससे है , वह उसका पिता, पति  दोस्त , भाई और प्रेमी है , जिससे वह प्रेम भी करती है. इस लिहाज से यह पुरुष  को बदलने का संघर्ष है, ख्वाहिश है , न कि उससे भागने का या शत्रुता का . इस लिहाज से फेसबुक पर 'पापा बदल रहे हैं' नामक कम्युनिटी ने मुझे आकर्षित किया . इसके मोडरेटर हैं कवि, पत्रकार , संस्कृतिकर्मी मुकुल सरल.  इस नाम से वे एक ब्लॉग भी चलाते हैं . स्त्रीकाल के पाठकों के लिए उनकी योजना और उद्देश्य के सन्दर्भ में उनका स्वकथ्य .  फेसबुक कम्युनिटी और ब्लॉग देखने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें :
पापा बदल रहे हैं : फेसबुक कम्युनिटी 
पापा बदल रहे हैं : ब्लॉग 
पापा बदल रहे हैं?’ यह शीर्षक या वाक्य कोई बयान या वक्तव्य नहीं है, बल्कि एक सवाल है, जिसके जरिये मैं अपने बदलते समाज का जायज़ा लेना चाहता हूं और पड़ताल करना चाहता हूं कि क्या वाकई पुरुष अपनी वर्चस्ववादी भूमिका बदल रहा है? या ऐसे कौन से कारक हो सकते हैं जिससे वह इस बदलाव के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित या मजबूर हो सकता है।

दरअसल  मेरे नज़दीक स्त्री विमर्श इसी सवाल के जवाब की तलाश है कि कैसे बनेगा नया पुरुष ? बेशक मैं मानता हूं कि नयी स्त्री ही नये पुरुष को जन्म देगी। लेकिन दूसरे अर्थों में यह समाज बदलने की पूरी ज़िम्मेदारी स्त्री के कंधों पर ही डाल देना जैसा भी है। साथ ही मैं यह भी जानता हूं कि फिलहाल की स्थिति में नयी स्त्री के निर्माण में कितनी बाधाएं-रुकावटें हैं। हमारा पुरुष प्रधान समाज उसे वह स्पेस देने को तैयार नहीं है, जो उसका अपना है।

यह सच है कि नयी स्त्री बन रही है और उसके साथ नये पुरुष का भी निर्माण हो रहा है, लेकिन नये पुरुष के निर्माण की गति अभी बेहद धीमी है। और उसमें भी छद्म और दिखावे की काफी गुंजाईश है।पिता के बहाने दरअसल  मैं इन्हीं सब सवालों से टकराने की कोशिश कर रहा हूं और सबके विचार और अनुभव से यह जानने की कोशिश कर रहा हूं कि कैसा बन रहा है या बनेगा नया पुरुष?

यह विचार मुझे लंबे समय से मथ रहा है। बतौर पत्रकार महिलाओं के उत्पीड़न, शोषण और बलात्कार की ख़बरों से जूझते हुए मेरे दिमाग़ में यही सवाल आता था। वर्ष 2012 के दिसंबर में निर्भया बलात्कार और हत्याकांड के बाद हुए व्यापक आंदोलन में शिरकत करते हुए मैंने एक साथी के अलावा एक पिता की हैसियत से अपनी बिटिया की ओर से भी इस विषय पर सोचा और एक कविता लिखी जिसकी अंतिम पंक्तियां थी कि “मेरे पापा मेरे साथ पुरज़ोर आवाज़ में दोहराते हैं / पितृसत्ता का नाश हो / PATRIARCHY DOWN DOWN.”
मैंने यह कविता लिख तो ली लेकिन फिर इन्हीं पंक्तियों ने मुझे मथना शुरू कर दिया कि क्या यह वास्तविक है? और अगर हां, तो कितना।

उस समय जब लगभग सभी लोग एक सुर में महिलाओं के लिए और ज़्यादा सुरक्षा, अपराधियों के लिए और सख़्त कानून और सज़ा की मांग कर रहे थे मैं देख और समझ रहा था कि और ज़्यादा सुरक्षा का मतलब महिलाओं पर और ज़्यादा पाबंदियां ही है। और सुरक्षा भी कब तक और कहां तक? क्योंकि अपराध के आँकड़े तो कोई और ही कहानी कह रहे थे। इन आँकड़ों के मुताबिक महिला उत्पीड़न और बलात्कार में सबसे ज़्यादा परिजन, परिचित ही शामिल होते हैं। तो जब अपराधी घर में या पड़ोस में ही हो तो फिर किससे सुरक्षा, कैसी सुरक्षा! इसलिए उस दौरान जब “कैसे सुरक्षित होंगी महिलाएं?” विषय पर हर टीवी चैनल पर बहस हो रही थी, मैंने “कैसे बनेगा नया पुरुष?” विषय को लेकर अपने चैनल में कई प्रोग्राम किए।

महिला सुरक्षा के मुद्दे पर हर बहस का अंत मैंने इसी विचार या जुमले पर देखा है कि “समाज की सोच बदलने की ज़रूरत है।” लेकिन यह सोच बदलेगी कैसे इस संबंध में किसी के पास कोई ठोस तरीका या कार्य योजना नहीं है। दरअसल  सोच बदलने का मामला कोई सीधा-सरल नहीं है। सोच हवा में नहीं बदलेगी, इसके लिए हमें अपना पूरा धार्मिक, सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक ढांचा ही उलटना-पलटना होगा। लेकिन अभी तो हम स्त्री शिक्षा का सवाल ही हल नहीं कर पाएं हैं।

फिर भी मैं निराश नहीं हूं और देख रहा हूं कि आज घर-परिवार में पिता की भूमिका में काफी कुछ परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। इसलिए मैं चाहता हूं कि बदलाव के इन सूत्रों को पकड़ा जाए और उनके आधार पर आगे की कोई बड़ी कार्ययोजना बनाई जाए। इसमें हम पुरुष की सकारात्मक भूमिका को भी रेखांकित करते हुए उसे प्रोत्साहित और सम्मानित करें ताकि इस प्रक्रिया को बढ़ावा मिल सके।  मैं यह भी चाहता हूं कि “पापा बदल रहे हैं?” वेबसाइट कोई एकालाप बनकर न रह जाए। मतलब मैं सिर्फ इसमें अपने और चंद बुद्धिजीवियों  या नारीवादियों के ही विचार न पेश करुं। मैं इसमें उन आम लोगों के विचार भी रखूं जिनसे मिलकर ये समाज बना है या जिसके बदलने की हम कोशिश और कामना करते हैं, ताकि बदलाव के सही सूत्र को पकड़ा जा सके। इसलिए इस साइट का सबसे महत्वपूर्ण कॉलम या पन्ना है “पिता : मेरी नज़र में ”।

इसमें स्त्री, पुरुष सभी से उनके विचार और अनुभव आमंत्रित किए जा रहे हैं। इसके लिए मैं खुद भी लोगों के बीच जाकर इस संबंध में बात कर रहा हूं। मैं समझता हूं कि “पिता: मेरी नजर में” ऐसा विषय है जिसपर स्त्री विर्मश को न जानने-समझने वाला या लिखने से जी चुराने वाला शख़्स भी चार-छह लाइन तो लिख ही देता है। इसमें मैं सभी आयु, जाति और आय वर्ग के लोगों को शामिल करना चाहता हूं ताकि हमारे समय-समाज की एक समग्र तस्वीर उभर सके और आगे जाकर उसका आर्थिक और सामाजिक विश्लेषण भी किया जा सके। मेरे लिए यह एक शोध कार्य जैसा है। अभी यह प्रयास मैंने अकेले शुरू किया है लेकिन मैं चाहता हूं कि इसमें अन्य साथी भी जुड़ें और हम एक टीम बनकर इस दिशा में काम करें।

स्वीकारोक्ति/ SELF ASSESSMENT
पिता, नया पुरुष, नई स्त्री...जब मैं इन विषय पर यह सब बाते कह रहा हूं, बहस आयोजित कर रहा हूं तो इसका यह मतलब कतई नहीं निकाला जाना चाहिए कि मैं पुरुषों की सभी बुराईयों या कमियों से आज़ाद हूं, अलग हूं। पुरुषों की आलोचना से मैं खुद को बरी नहीं करता। इन सब विचारों का यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि मैं कोई अपवाद या इस नई सोच के मुताबिक नया पुरुष हूं। सच तो यह है कि मुझमें भी एक पुरुष होने के नाते तमाम संस्कारगत और अन्य खामियां हैं। हां, बस इतनी रियायत ले सकता हूं कि मुझे खुद की आलोचना में कोई आपत्ति नहीं है। आप बस इतनी तारीफ़ कर सकते हैं कि मैं अपनी बुराईयों की शिनाख़्त कर पा रहा हूं और उनसे लड़ने की कोशिश करता हूं। एक पुरुष होने के नाते प्राकृतिक तौर पर मैं भी स्त्रियों से प्रेम करता हूं। एक कवि होने के नाते कुछ और ज़्यादा ही। उन्हें लेकर सपने देखता हूं, फैंटसी (Fantasy) रचता हूं लेकिन हाँ, उन्हें अकेले में दबोचना नहीं चाहता। मौका मिलते ही दबाना या कुचलना नहीं चाहता। अपना वर्चस्व थोपना नहीं चाहता।
स्त्रियों के प्रति सच्ची संवेदनशीलता बहुत से लोगों में है। बहुत से स्त्री-पुरुष समाज में सबके लिए स्वतंत्रता, न्याय और समानता को लेकर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। कई साथी भी इसी दिशा में लगे हैं। इन्हीं सब से मैं भी प्रेरित हूं। इसके अलावा एक वजह शायद यह भी है कि बचपन में ही पिता की मौत के बाद मुझे मां-बहनों ने ही पाला है। मां मेरी पिता जैसी है तो बहनें मां जैसी।

एक बात और कि “पापा बदल रहे हैं?” मैंने शीर्षक ज़रूर रखा है लेकिन मैं हर समय लड़कियों-स्त्रियों का ‘बाप’ या ‘भाई’ बनकर अपनी या उनकी भूमिका की शिनाख़्त नहीं करता, बल्कि हर स्त्री मुझे साथी के रूप में पसंद है। इसलिए मैंने तमाम लोगों की आपत्ति के बाद भी अपनी बड़ी बेटी का नाम भी सखी रखा है।मेरी ख़्वाहिश है कि यह फोरम समाज को लेकर हमारे अनुभवों और विचारों का एक ऐसा प्लेटफार्म बने जिसके जरिये हम अपने समाज की दशा-दिशा को सही तौर पर समझ-समझा सकें और नये समाज के निर्माण के आंदोलनों में कुछ साझेदारी कर सकें।

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