12वीं लोकसभा में महिला आरक्षण पर बहस ( 8 मार्च )

राष्ट्रपति , उपराष्ट्रपति  दोनो ने महिला प्रतिनिधियों की सभा में महिला आरक्षण बिल पारित किये जाने की जरूरत पर बल दिया , परन्तु प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चुप रहे. बल्कि उन्होंने  अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर सिर्फ महिला सांसदों के बोलने का प्रतीकात्मक आहवान जरूर किया , लेकिन उनकी रुचि महिला प्रतिनिधित्व के ठोस उपायों में नहीं दिख रही है . आज अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस पर स्त्रीकाल के  पाठकों के लिए 8 मार्च 1999 को लोकसभा में हुई बहस का एक अंश : महिला आरक्षण के लिए अडचनों का अंदाजा इस पहली ही बहस से लगाया जा सकता है . 

मुलायम सिंह यादव (सम्भल) : हम भी इस पर बोलेंगे। यह हमारा मामला है।
उपाध्यक्ष महोदय : आपको मैं चान्स दूंगा पर ऐसे नहीं बोलिये।
श्री मुलायम सिंह यादव : आप मुझे नहीं बोलने देते तो मुझे निकाल दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : मुलायम जी, मैं आपको कह रहा हूं कि श्रीमती कृष्णा बोस ने नोटिस दिया है और उनका नाम लिस्ट में है,  इसलिए वह पहले बोलेंगी।
श्री मुलायम सिंह यादव : हमारी लड़ाई है इस पर ।
उपाध्यक्ष महोदय : आप सीनियर लीडर हैं। कया मैंने आपको कभी चान्स नहीं दिया?
उपाध्यक्ष महोदय : श्री मुलायम सिंह जी, यह आप कया कर रहे हैं। कया मैंने कहा कि आपको बोलने का चान्स नहीं देंगे।आप कम्पैल नहीं कर सकते हैं। आपको बिहेव करना आना चाहिए, आप एक सीनियर लीडर हैं। कया मैंने आपको चान्स नहीं दिया, मैं आपको भी चान्स दूंगा। आप इस तरह से मत करिये
श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : यह राबड़ी देवी की गरदन काटने वाले लोग हैं। ये महिलाओं को क्या  प्रधानता देंगे। बैकवर्ड कलासेज और माइनोरिटीज सोसाइटीज को जब तक प्रधानता नहीं मिलेगी तब तक इस पर हमारी सहमति नहीं है।
श्री बूटा सिंह : उपाध्यक्ष महोदय, इस पर सदन को ऑब्जेक्शन है
श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, आप इनकी कया सुनेंगे, यह गला काटने वाले लोग हैं
श्री मुलायम सिंह यादव : हम बहुत सुन चुके हैं
उपाध्यक्ष महोदय : आपकी बात भी सुनी जायेगी, पहले उनकी बात खत्म होने दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : आप इतने सीनियर लीडर हैं, आप बीच में कयों खड़े होते हैं, यह कोई तरीका नहीं है।
श्री लालू प्रसाद : सर, जब आप खड़े होते हैं तो हम लोग डर जाते हैं ...  यहाँ दंगाई खड़े हैं
यह एंटी दलित हैं, एंटी माइनोरिटीज हैं
उपाध्यक्ष महोदय : ऑर्डर प्लीज।
श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : सर, आप खड़े होते हैं तो हम लोग डर जाते हैं
उपाध्यक्ष महोदय : अब आप कया करते हैं?
श्रीमती  भावना देवराजभाई चिखलिया (जूनागढ़) : माननीय उपाध्यक्ष जी, आज 8 मार्च, अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है और जिस तरीके से हाउस में, खासतौर से लालू जी और मुलायम सिंह जी ने व्यवहार किया है, वह बिलकुल सराहनीय नहीं है। आप कहते हैं कि श्रीमती राबड़ी देवी जी भी महिला हैं, हम इस बात को मानते हैं और अगर कोई महिला अच्छा शासन करती है, तो सारा देश उसकी सराहना करता है और उसे स्वीकार करता है, लेकिन जिस महिला के राज में अच्छा शासन नहीं हुआ, उसकी हम सराहना नहीं कर सकते और उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उपाध्यक्ष महोदय, आज के दिन महिला अंतरराष्ट्रीय  दिवस के अवसर पर मैं सभी महिलाओं की तरफ से देश  के प्रधान मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी का अभिनन्दन करती हूं कयोंकि महिलाओं के लिए अटल जी ने अपने नेतृत्व में बहुत सारे ऐसे निर्णय किए हैं और करने जा रहे हैं,  जिनके कारण सम्मान जनक रूप से इस देश में महिलाएं जी सकती हैं। मैं आपके माध्यम से स्पष्ट कहना चाहती हूं कि आज के दिन महिलाओं को आर्थिक दृष्टि से समर्थ बनाने के लिए महिला विकास बैंक की स्थापना, महिला उद्यमियों को प्रोत्साहन की योजना और महिलाओं के लिए पार्ट-टाइम जॉब के लिए सकारात्मक रूप से विचार करने की बात अटल जी ने कही है। इसके लिए मैं उनकी सराहना करती हूं।
उपाध्यक्ष महोदय, इस सदन में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का बिल पूर्व में ही प्रस्तुत किया जा चुका है, लेकिन अभी तक पास नहीं किया गया है। इसलिए मैं आज महिला अंतरराष्ट्रीय  दिवस के अवसर पर अपने सभी सांसद भाइयों से अपील करती हूं कि उसे सर्वसम्मति से पारित किया जाए। धन्यवाद।
 श्री मुलायम सिंह यादव : उपाध्यक्ष महोदय, मेरी आपसे एक प्रार्थना है कि आप कभी गुस्सा न करें। कभी टेंशन  मत रखिये।
उपाध्यक्ष महोदय : जीरो ऑवर में थोड़ी टेंशन तो होनी चाहिए।

श्री मुलायम सिंह यादव (सम्भल): उपाध्यक्ष महोदय, जहां तक महिला दिवस का सवाल है तो मैं सारे हिन्दुस्तान और सारी दुनिया की महिलाओं को इसकी शुभकामनायें देता हूं। वे तरककी करें, आगे बढ़ें और उनको उनका हक मिले। जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो मेरी राय यह है कि आज हमें इस विवाद में नहीं पड़ना चाहिए। जब महिला दिवस मनाया जा रहा है तो हमारी भी उनको शुभकामनायें हैं। इसको विवाद में नहीं डालना चाहिए। जहां तक महिला आरक्षण का सवाल है तो शुरू से लेकर आज तक हम प्रधान मंत्री जी से दो बार मिले और उनको चिट्ठी भी लिखी। हमारी स्पष्ट राय है कि इस विधेयक का जो वर्तमान स्वरूप है, उसको उसी तरह से पास करने से हमारे देश के अंदर जो अल्पसंख्यक हैं विशेषकर मुसलमान हैं, दलित हैं, पिछड़े हैं, उनके साथ गैरबराबरी होगी। उनका और अधिक शोषण व अपमानजनक जीवन होगा इसलिए हमारी शुरू से यही राय है कि वर्तमान विधेयक तब तक नहीं आना चाहिए जब तक अल्पसंख्यक, दलित, पिछड़े विशेषकर मुसलमानों की जनसंख्या के अनुसार उनकी महिलाओं को आरक्षण मिले।
दूसरा हमारा यह कहना है कि जहां से लोकतंत्र आया है, हम महिलाओं के आगे बढ़ने के विशेष अवसर की नीति को इस सदन में कहना चाहते हैं कि हमारी समाजवादी पार्टी ने आज से नहीं बल्कि 1954 से ही अमेरिका और इंग्लैंड की महिला आरक्षण की नीति का अनुसरण किया है। अमेरिका और इंग्लैंड की पार्लियामैंट में अभी तक नौ फीसदी से ज्यादा निरक्षर महिलायें नहीं आ सकी हैं। हमारे यहां जो निरक्षर महिलायें हैं, दलित हैं, गरीब हैं, दबी-कुचली हैं, वे इस सदन में वर्तमान विधेयक के चलते नहीं आ सकती हैं। मैं महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण के पक्ष में नहीं हूं। इसे कम किया जाये। इसे ज्यादा से ज्यादा 10 फीसदी किया जाये। श्री गुजराल साहब अभी खड़े हुए थे। जब वे प्रधान मंत्री थे तब भी हमने इसका डटकर विरोध किया था।आप जानते हैं कयोंकि आप उस समय यहां थे। हमारी संयुकत मोर्चा सरकार के प्रधानमंत्री श्री देवेगौड़ा थे,  तब भी हमने इस हाउस के अंदर अपने साथियों को खड़ा करके जो नहीं करना चाहिए था, उस वकत भी कराने की कोशिश करवाई थी। इसलिए हम चाहते हैं कि इस विधेयक को तब तक नहीं आना चाहिए जब तक मुसलमान, पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों, चाहे ईसाई ही कयों न हो , उनका आरक्षण न हो। अभी तक जो अध्ययन किया गया है कि बाद में संशोधन किया जायेगा, वह संशोधन नहीं हो सकता है। वह धोखा है, चतुराई है। पिछड़े और अल्पसंख्यकों के बारे में संविधान के अंदर कोई प्रवाधान नहीं है। हम संशोधन दे भी देंगे तो वह संशोधन अमल होगा, इसमें शक है। आप बताइये कयोंकि आप खुद भुकतभोगी हैं। आज आधे हिन्दुस्तान में से कोई भी मुसलमान लोक सभा का सदस्य नहीं है।
आज गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश , पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश आदि आधे हिन्दुस्तान में से एक भी मुसलमान लोक सभा में नहीं है। हमारी राय है कि इस विधेयक को पेश  नहीं किया जाना चाहिए।
वर्तमान नौकरशाही के चलते दूसरे दल की सरकार बनने पर, एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए सीट आरक्षित कर दी जाएगी। हमारी राय है कि इसका अधिकार पार्टी को मिलना चाहिए, चुनाव आयोग को अधिकार नहीं देना चाहिए। पार्टी को अधिकार देना चाहिए कि कितना आरक्षण है और महिलाओं को कहां आरक्षण देना है। यदि कोई पार्टी उसका पालन न करे तो उस पार्टी की मान्यता खत्म कर दी जाए, इसमें ऐसा प्रावधान कीजिए। इलेक्शन कमीशन को आरक्षण का अधिकार नहीं मिलना चाहिए, यह हमारी राय है। जब तक इस विधेयक में संशोधन नहीं होता तब तक हम इसका हर तरह से विरोध करेंगे।

श्री चन्द्रमणि त्रिपाठी (रीवा): उपाध्यक्ष महोदय, हमारा भी नाम है। यदि इस प्रकार बहस होगी
मैं दस दिन से शून्य में नोटिस दे रहा हूं।
श्री गौरी शंकर चतुर्भुज बिसेन (बालाघाट) : उपाध्यक्ष महोदय, एक सप्ताह से शून्य काल में मेरा नाम नहीं आया है।
आप व्यवस्था दीजिए।
उपाध्यक्ष महोदय : मैंने उनको बुलाया है, आपको भी बुलाऊंगा, आप बैठिए।
श्रीमती भावना कर्दम दवे : आज महिला दिवस पर महिलाओं के साथ मजाक हो रहा है। इस विषय पर इस तरह से ये लोग बोलते हैं।
श्रीमती भावना देवराजभाई चिखलिया : आप बैठिये, महिलाएं बोल रही हैं।
श्रीमती भावना कर्दम दवे : कुछ तो महिलाओं का सम्मान करो, आज के दिन तो सम्मान करो।

श्रीमती सुमित्रा महाजन : माननीय उपाध्यक्ष जी, मुझे थोड़ा दुख हो रहा है। सोमनाथ दादा जैसे जिन लोगों से हम रूल सीखते हैं, मुझे ऐसा लगा था कि वे अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर गीता दीदी की बात का और समर्थन करने के लिए खड़े हैं, लेकिन बीच में जिस तरीके से बात हुई, उससे मुझे थोड़ा सा दुख हुआ, कयोंकि हम इन्हीं लोगों से सीखते हैं। उन्होंने एक प्रकार से मंत्री की बात पर आज जो चर्चा छेड़ी, वह नहीं छेड़नी चाहिए थी, ऐसा मुझे लगता है।आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस है, मेरा यह मानना है कि ऐसा नहीं है आज महिला दिवस है, इसलिए महिलाओं के सम्मान की कुछ बात कहें। वास्तव में अच्छी तरह से इस पर चर्चा होनी चाहिए थी, लेकिन उसमें भी जिस प्रकार से खलल डाला जा रहा है, वह एक दुखदायक बात है।उपाध्यक्ष महोदय, मैं आज इस महिला दिवस के उपलक्षय में प्रधान मंत्री जी को भी धन्यवाद देना चाहूंगी कि उनके मन में महिलाओं के लिए सम्मान है। जिस दिन उन्होंने प्रधान मंत्री पद की शपथ ली थी, उसके तुरंत बाद उन्होंने सम्पूर्ण देश की महिलाएं शिक्षित  बनें, समझदार बनें, इस बात को दृष्टि में रखते हुए महिलाओं को सभी प्रकार की शिक्षा फ्री देने का, उच्च शिक्षा तक फ्री दिए जाने का ऐलान किया था। इतना ही नहीं उनको व्यावसायिक शिक्षा देने के बारे में भी सोचने की बात जो कही थी, मैं चाहूंगी कि सरकार इस बारे में जल्द ही कुछ योजना लाए। इसी प्रकार महिलाओं के आत्मसम्मान और सुरक्षा की दृष्टि से जो भाव हमारे प्रधान मंत्री जी के मन में है, इस सदन में भी कई बार इस बात की चर्चा हो चुकी है। जब-जब भी दो जातियों में या कहीं भी झगड़े होते हैं तो वास्तव में भुगतना स्त्री को ही पड़ता है, अत्याचार होता है तो उस जाति की महिलाओं पर ही होता है, मातृत्व पर आघात होता है, इस बात को दृष्टि में रखना चाहिए। इसीलिए प्रधान मंत्री जी ने और गृह मंत्री जी ने जो यह बात बार-बार कही है कि बलात्कारियों को फांसी तक की सजा दी जानी चाहिए, मैं उनका इस बात के लिए अभिनन्दन करना चाहती हूं। मैं चाहूंगी कि महिलाओं के हित में जो कानून हैं, उनके बारे में सोचा जाए और आवश्यक  संशोधन किए जाएं तथा महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण वाला जो बिल है उसके बारे में भी सोचा जाए।



श्रीमती सुमित्रा महाजन : उपाध्यक्ष महोदय, मैं केवल इतना ही निवेदन करना चाहूंगी कि 33 प्रतिशत आरक्षण देकर हम इतना ही चाहते हैं कि निर्णय की प्रक़िया में महिलाओं का भी ज्यादा से ज्यादा सहभाग हो। हो सकता है इस पर किसी के विचार अलग हों, लेकिन बिल पर चर्चा के समय वे उसमें संशोधन  दे सकते हैं। अगर मित्रता के नाते, सर्वानुमति से यह बात हो जाती है तो महिलाओं का सम्मान रखने के लिए जो हम अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मना रहे हैं, उसको मनाने में ज्यादा खुशी होगी।मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि महिलाओं को कृपया जाति में न बांटे। स्त्री की एक ही जाति होती है और वह मातृत्व की जाति होती है। वैसे भी स्त्री देश में पिछड़ी हुई है, उस पर अत्याचार हो रहे हैं, वह आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसलिए निर्णय की प्रक़िया में अधिकार दिलाने की दृष्टि से अगर कोई महिला बात करती है तो वह पूरे महिला समाज की बात करेगी। इस सदन में भी अगर वह बोलने के लिए खड़ी होगी तो मुस्लिम, दलित या अगड़े-पिछड़े की बात न करके पूरे स्त्री समाज की बात करेगी। इसलिए जब वह प्रतिनिधित्व करेगी तो पूरे महिला समाज का करेगी। मेरा पूरे सदन से निवेदन है कि इस दृष्टि से इस पर सोचें और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण वाले बिल पर भी सर्वानुमति होनी चाहिए।

श्री  चंद्रशेखर (बलिया) (उ.प्र.): उपाध्यक्ष जी, आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है। महिलाओं के लिए जितना भी किया जाए, वह कम है। मैं बधाई दूंगा सरकार को कि इन्होंने बहुत अच्छी इच्छा व्यकत की है महिलाओं को शिक्षा देने के लिए और उनके उत्थान के लिए। मैं उस पर नहीं जाऊंगा कि यह कितनी क़ियान्वित होगी, यह तो अगले एक साल में देखा जाएगा। उसके लिए जो श्रीमती महाजन ने बधाई दी है प्रधान मंत्री जी को, मैं भी देता हूं। लेकिन दो बातें मैं और कहना चाहता हूं। अभी मुलायम सिंह जी ने जो बातें कहीं, उनका अपना महत्व है। उनकी भावनाओं को भी समझना चाहिए। यह भी समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के दिन हम लोग एक राष्ट्रीय कार्यक़म, जो अपने में अनोखा है, लागू करना चाहते हैं। मैं अपने मित्र गुजराल जी से पूछ रहा था कि जिस दिन आप यह बिल यहां लाए थे, उस दिन आपने कया सोचकर ऐसा किया था, कयोंकि थोड़ा बहुत दुनिया के बारे में मुझे भी ज्ञान है, मैं दुनिया के देशों में ज्यादा नहीं गया हूं, लेकिन भारत निराला देश होगा।
जहां इस तरह का बिल पार्लियामेंट में लाया जाएगा और कयों लाया जा रहा है, इसका कारण हमारे मित्र गुजराल साहब को भी नहीं मालूम है। उन्हें सिर्फ यह मालूम है कि उस समय कोई कोर कमेटी थी, उसने कहा कि यह बिल ले आओ और उसी दिन उसको सर्वसम्मति से पास कर दो। उमा भारती जी आज यहां हैं या नहीं, उन्होंने भी उस दिन यही सवाल उठाया था जो आज मुलायम सिंह जी उठा रहे हैंमैं कहना चाहता हूं लोगों के मन में शंका है। जो गरीब, पिछड़े, दलित और अल्पमत के लोग हैं, उनकी महिलाएं ज्यादा पिछड़ी हुई हैं। चुनाव आज जिस तरह से हो रहे हैं, उनका भी हमें रूप मालूम है, इसलिए हम समझते हैं कि उनका इतना प्रतिनिधित्व इस सदन में कम हो जाएगा, इसलिए यह भेद मत पैदा करें। यह सही है कि पिछड़े और अगड़ों में इस सदन में अंतर नहीं करना चाहिए। मैं सुमित्रा महाजन जी से यह कहूंगा कि पुरुषों और औरतों में अंतर करना भी उतना ही बुरा है जितना इस तरह की बातें करना बुरा है। इसलिए मैं कहना चाहता हूं कि यह जो बिल लाया गया, बिना सोचे-समझे, बिना जाने-बूझे और केवल भावनाओं, जज़बातों में बहकर लाया गया। इसके कया परिणाम होंगे, उसके बारे में कभी नहीं सोचा गया। अगर कोई माननीय सदस्य यह बता दे कि दुनिया के किसी देश में क्या एक तिहाई रिजर्वेशन महिलाओं के लिए किया गया है?

श्रीमती सुमित्रा महाजन : हम अपने देश में तो आरक्षण की बात करते हैं।
श्रीमती भावना कर्दम दवे : कया हम दूसरे देशों का अनुकरण ही करते रहेंगे या फिर अपनी प्रतिभा को सम्पन्न करेंगे?
श्री दादा बाबूराव परांजपे (जबलपुर) : उपाध्यक्ष महोदय, पूरा सत्र हो गया। एक कागज देता हूं।
आज तक मौका नहीं मिला, नए सदस्यों के साथ आम तौरपर यही हो रहा है। इस सदन में कुछ लोग ही बोलते रहते हैं, इसके बारे में भी विचार होना चाहिए।
श्री दादा बाबूराव परांजपे : बाकी लोग बोल भी नहीं पाते हैं।
इस पर आपको विचार करना पड़ेगा। जितने लोगों की यहां पर बोलने की ठेकेदारी हो गई है, वे ही बोलते हैं। बाकी लोग नहीं बोल पाते हैं, यह मेरा कहना है।
श्री एच.पी.सिंह (आरा): सेशन चलाने वाले दोनों मंत्री जी यहां बैठे हैं और वहां सारे भारते के लोगों को महिला दिवस पर बधाई दी जा रही हैं और महिलाओं पर अत्याचार हो रहे हैं।

श्री मोतीलाल वोरा (राजनांदगांव): उपाध्यक्ष महोदय, आज अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मैं अपनी बहिनों को मुबारकबाद देता हूं। दुनिया में सारी महिलाएं संगठित होकर रहें, आज इस अवसर पर मैं कहूंगा कि महिलाओं को सुविधाएं मिलनी चाहिए। जो महिलाएं अत्याचार से पीड़ित हैं, उनके ऊपर जिस प्रकार के अत्याचार होते हैं, उसके लिए हमें देश के अंदर इस प्रकार का कानून बनाना चाहिए कि महिलाओं पर अत्याचार करने वालों के विरुद्ध कड़ी से कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।माननीय मंत्री जी और आडवाणी जी ने हाल ही में इस बात को कहा है कि जो महिलाओं के साथ दुर्वयवहार करते हैं या बलात्कार की घटनाएं होती हैं, उन्हें फांसी की सजा दी जानी चाहिए। उन्होंने जो कुछ कहा है मैं समझता हूं कि जब तक वह कानून के रूप में नहीं आएगा तब तक इस प्रकार की घटनाएं बढ़ती जाएंगी और सब लोग कहते ही रहेंगे। धन्यवाद।

श्री  शिवराज वी.पाटील (लाटूर) : उपाध्यक्ष महोदय, आज हमें इस बात को नहीं भूलना चाहिए कि हम संसार की आधी मानव संख्या के प्रति अपना आदर व्यकत करने के लिए यह दिन मना रहे हैं। हमारे देश  में और संसार में भी महिलाओं का आदर किया जाता है, महिलाओं के प्रति प्रेम की भावनाएं व्यकत की जाती हैं। इसमें कोई दो राय नहीं हैं। मगर हमारे देश  में और संसार में भी जब महिलाओं को अधिकार देने की बात की जाती है तो सब के सब पीछे हट जाते हैं। यहां तक कि कुछ महिलाओं का भी उनको समर्थन नहीं मिलता है। कुछ पुरुष आगे जरूर आते हैं लेकिन बहुत सारे ऐसे कारण दे देते हैं जिनका एक ही उद्देश्य होता है कि आदर मिले, प्रेम मिले लेकिन उनको अधिकार न मिलें - इस बात को भी हमें इस दिन ध्यान में रखना पड़ेगा। यह शताब्दी अधिकार देने वाली शताब्दी है। जो सर्वसाधारण लोग हैं, समाज के अंदर कमजोर लोग हैं, उनको अधिकार देने वाली यह शताब्दी है। यह शताब्दी हमारी माताओं, बहनों और बेटियों को अधिकार देने वाली शताब्दी है। इसलिए हमारे भाई लोग कुछ ऐसे कारण बताकर पीछे न हटें जिसकी वजह से लोग यह न कहें कि दिल में बात एक है और दूसरी तरह से यहां पर रखने की यह कोशिश कर रहे हैं। मैं बड़े आदर से यहां पर कहना चाहता हूं कि बहुत ही सोच-समझकर कहने वाले, दूरदृष्टि रखने वाले नेता हैं, उनकी बातों को काटना बड़ा मुश्किल  है। उनकी बात काटते समय या उनके खिलाफ कहते समय मन में दुख होता है। इसलिए पहले ही हम क्षमा-याचना करना चाहते हैं।मगर यहां पर कहा गया कि संसार में ऐसी कोई चीज नहीं हुई है, इसलिए यहां पर कयों होना चाहिए?कया हम दूसरों के पीछे ही चलते रहेंगे?कया हम दूसरों को कोई रास्ता नहीं बताएंगे? अगर संसार में कहीं नहीं हुआ है तो कया हमारे देश में वह बात नहीं होनी चाहिए? हमारे देश की कोई बात हो और दूसरे लोगों ने अगर उसे अपनाया तो उसमें कौन सी बुरी बात है? दक्षिण एशिया ने बताया कि सबसे पहले हिन्दुस्तान में महिला प्राइम मिनिस्टर हुई और वह श्रीलंका, पाकिस्तान और बंगलादेश में भी हुई। यहां महिला पार्टी अध्यक्ष और प्राइम मिनिस्टर हुई हैं। यहां महिला प्रधान मंत्री और अध्यक्ष दूसरी जगहों के मुकाबले कहीं ज्यादा संख्या में हुई हैं। कया हमें यह चीज नहीं अपनानी चाहिए?हम जानते हैं कि मुख्यमंत्री भी महिलाएं हैं। महिला मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री ने अपने-अपने तरीके से यहां काम किया। एक सवाल यह पूछा और उठाया जा रहा है कि कया ऐसा होने पर पिछड़ी जाति की महिलाओं को हिस्सा मिलने वाला है? मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि जो पिछड़ी सो-कॉल्ड बैकवर्ड कलासेज की महिलाओं की बात की जा रही है तो सो-कॉल्ड मैन के बारे में भी कहा जाए। कितने फारवर्ड कलास के लोग और जैंटलमैन यहां चुन कर आते हैं? फारवर्ड कलास की महिला हो या जैंटलमैन हो, वे टिकट मांग सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं लेकिन फारवर्ड कलास के वोट देने वाले लोगों की संख्या ज्यादा नहीं है। वोट देने वालों में बैकवर्ड कलास के लोगों की ज्यादा संख्या है। वोट देने वालों में बैकवर्ड कलास के लोगों की संख्या ज्यादा होने से बैकवर्ड कलास के लोग ही चुन कर आ जाएंगे और फारवर्ड कलास के चुन कर नहीं आएंगे। हमें यह बात ध्यान में रखनी पड़ेगी।इसका हिसाब होना चाहिए। हम यह बात बर्दाश्त नहीं करेंगे।

श्री शिवराज वी. पाटील : पूछा जाता है कि इसके पीछे कया लॉजिक है? लॉजिक यह है कि जो सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं, वे अपनी बहनों, बेटियों, मां और अर्दधांगिनी को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं। ऐसे में वे किस सामाजिक न्याय की बात करते हैं। वे अपने घर वालों को सामाजिक न्याय नहीं देते हैं और बाहर के लोगों को सामाजिक न्याय देने की बात करते हैं। ऐसी चीजों पर कौन भरोसा करने वाला है? अगर आपको नहीं करना है तो मत करिए लेकिन समाज और देश  को बांटने की कोशिश मत कीजिए। अगर आपने महिलाओं को बांट कर इस प्रकार से टिकट दिए तो जैंटलमैन को किस आधार पर नहीं कहने वाले हैं। हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जाने के बाद किस आधार पर नहीं देने वाले हैं। कया आपका संविधान सैकुलर रहने वाला है? आप कह दें कि हमें यह नहीं करना है। यहां आप कह दीजिए कि आपको यही डर है कि महिलाओं को अधिक संख्या में सीटें देने के बाद हमारी सीटें चली जाएंगी। अगर ऐसा डर है तो वह डर खत्म करने की दवा लोगों और सोचने वालों के पास है। वे उसे देंगे और इसे करेंगे। आप इस डर को छुपाने के लिए सामाजिक न्याय की बात कर रहे हैं तो मेरी दृष्टि से ऐसा करके आप खुद को धोखा दे रहे हैं और दूसरों को धोखा दे रहे हैं।

मैं अंत में इतना ही कहना चाहता हूं कि अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर समाज के आधे हिस्से के लोगों को अगर न्याय देने के लिए आगे नहीं आए तो दूसरों को न्याय देने की बात पर लोग बहुत कम भरोसा करेंगे, ऐसा मुझे लगता है। ...

श्री लालू प्रसाद (मधेपुरा) : उपाध्यक्ष महोदय, हम लोगों को भी यह मामला उठाने की इजाजत दी जाए।
श्री गंगा चरण राजपूत (हमीरपुर) (उ.प्र.) : उपाध्यक्ष महोदय, हमने भी नोटिस दिया है। हमे बोलने दीजिये।
श्री चन्द्रमणि त्रिपाठी (रीवा): उपाध्यक्ष महोदय, आप सब को बोलने दे रहे हैं, कया हम लोगों को नही बोलने देंगे?
श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी (दरभंगा): उपाध्यक्ष महोदय, आपने मुझे बोलने के लिये समय दिया, उसके लिये धन्यवाद।
उपाध्यक्ष महोदय : आपको जल्दी समाप्त करना है कयोंकि

श्री मोहम्मद अली अशरफ फातमी : उपाध्यक्ष जी, मैं दो मिनट में खत्म कर दूंगा। आज इंटरनेश्नल वुमैन डे पर महिलाओं को आगे बढ़ाने के लिये जो कदम उठाये जायेंगे, उसमें हम और हमारी पार्टी पूरा पूरा समर्थन देने का काम करेंगी। आज इंटरनेशनल वुमैन डे की अलग बात है और हिन्दुस्तान की महिलाओं का चैप्टर अलग है। जब इस सदन के अंदर महिलाओं के लिये रिजर्वेशन की बात होती है, उस समय बहुत सारी सामाजिक चीजों को पीछे छोड़ दिया जाता है। हमारा और हमारी पार्टी के लोगों का सीधा मानना है कि जब भी इस पर विचार हो तो इसमें शेडयूल्ड कास्टस एंड शेडयूल्ड ट्राइब्स और अदर बैकवर्ड कलासेज का प्रावधान हो। उस वक्त  निश्चित रूप से जो हिन्दुस्तान के अंदर 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक लोग बसते हैं, पहले उनके बारे में सोचा जाना चाहिए। इसलिए कि आज अगर आज़ादी के बाद से आज तक के आंकड़े उठाकर देखें तो जो मुसलमानों की 12 परसेंट आबादी है, उस हिसाब से आप देखिये कि कम से कम 65 सांसद चुनकर इस लोक सभा में आने चाहिए लेकिन आज इस सदन के अंदर सिर्फ 27-28 मेम्बर हैं। न जाने कितने राज्य ऐसे हैं जहां पर एक भी विधायक नहीं है। आप अगर रिजर्वेशन विमेन्स का करते हैं तो हमारी मांग है कि उनकी आबादी के अनुपात में आरक्षण किया जाए, 50 परसेंट रिजर्वेशन किया जाए। हम पाटिल जी से ऐग्री करते हैं कि उनको 50 परसेंट आरक्षण मिलना चाहिए जितनी उनकी आबादी है, लेकिन उसके अंदर जो 43 प्रतिशत बैकवर्ड कलासेज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए, जो 25 प्रतिश त शेडयूल्ड कास्टस और ट्राइब्ज़ के लोग हैं, उनको आरक्षण मिलना चाहिए और जो अल्पसंख्यक और खास तौर से 12 प्रतिशत मुसलमान हैं, उस 50 प्रतिशत में उनकी महिलाओं को उतना हिस्सा मिलना चाहिए। तभी इस मुल्क के अंदर समान न्याय मुमकिन होगा और समाज के हर तबके के लोग इस सदन के अंदर पहुंच पाएंगे।

श्री मोहन रावले (मुम्बई दक्षिण-मध्य) : हमें बोलने का मौका नहीं मिला है। हम शिव  सेना की तरफ से राय रखना चाहते हैं। हमें भी बोलने दीजिए।
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