‘‘....एण्ड सन्स’’ का कपटतंत्र और एक चिरविस्थापित: वैश्वीकृत भारत में स्त्री के सम्पदा अधिकार ( दूसरी क़िस्त)

डा. अनुपमा गुप्ता

अब हम देखेंगे कि सम्पदा पर अधिकारों के मामले में भारतीय स्त्री आज कहाँ है और उसे किस दिशा  में बढ़ना है।

1. प्रत्यक्ष भौतिक सम्पदा अधिकारः
सामान्य तौर पर किसी व्यक्ति द्वारा ये अधिकार कई स्रोतों से प्राप्त किये जा सकते हैं जैसे खरीद कर, पारिवारिक विरासत में, श्रम द्वारा प्राप्त, सरकार द्वारा विस्थापितों के लिये संसाधन वितरण की योजनाओं में प्रदत्त, सरकार/समुदाय द्वारा प्रदत्त सार्वजनिक सम्पत्ति को संयुक्त रूप से इस्तेमाल करने के अधिकार आदि।



अ. पारिवारिक विरासत
आधुनिक सभ्यता के प्रारंभ से ही सम्पत्ति और उसे पाने के लिये उद्यम मूलतः पुरुषीय गुणधर्म माना जाता रहा है। स्त्री के लिये सम्पत्ति अर्जन का नहीं, मात्र उसकी उपस्थिति/अनुपस्थिति को समदर्शी भाव से भोगने का निर्देश है। उसकी नियति इसीलिये सदा एक विस्थापित की रही है- पिता के घर वह जन्म से ही ‘पराई अमानत’ मानी जाती है और पति के परिवार में ताउम्र ‘पराये घर की बेटी’। विवाह के बाद जब उसके नाम पर भी उसका हक नहीं रहता  तो किसी और मूल्यवान वस्तु पर उसका अधिकार कैसे माना जाये? प्राचीन भारत में पिता के नाम पर तथा उत्तर भारत में अभी हाल तक भी मायके के गाँव/नगर के नाम पर उसका नामकरण कर दिया जाता था तो क्या इसीलिये कि ससुराल की किसी चीज पर वह अपना हक समझे ही न? वह बंजारिन ही है, पैर टेकने को कोई जमीन उसकी अपनी नहीं, उसका अपना घर कोई है ही नहीं और हो भी क्यों जब पिता के लिये मात्र उसका इतना ही उपयोग है कि उसका कन्यादान करके वह पुण्य कमा सके और पति के घर में उसे मात्र सेवा और सम्पत्ति का वारिस  पैदा करने के लिये लाया जाता है। सचाई यही है कि सम्पत्ति के मामले में उसके साथ शरणार्थी जैसा व्यवहार किया जाता रहा है और उसके अधिकार का तर्क समाज को अजीबोगरीब लगता रहा है।

किन्तु अध्ययन सिद्ध कर रहे हैं कि सम्पत्ति की अवधारणा जीवन के हर क्षेत्र में स्त्री के सशक्तीकरण से गहरा सम्बन्ध रखती है। जैसे कि पारिवारिक व दैहिक हिंसा से बच कर निकलने व स्त्री स्वातंत्र्य में अचल सम्पत्ति एक महत्वपूर्ण संसाधन व विकल्प प्रदान करती है।15 सम्पत्ति चाहे कितनी भी छोटी हो इसके स्त्री के नाम होने पर संकट के समय अथवा नया व्यवसाय अपनाते समय बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थओं से मदद मिल सकती है। इसके अलावा सम्पत्ति पहले से मौजूद व्यवसाय की गुणवत्ता बढ़ाने में भी सहायता करती है।7
सम्पत्ति बनाने के लिये रोजगार का महत्व कम नहीं है किन्तु सत्य यह भी है कि एक स्त्री को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने में अचल सम्पत्ति रोजगार से कहीं बढ़ कर पाई गई, क्योंकि एक तो रोजगार बाजार में उपलब्ध काम की मात्रा पर निर्भर होता है; साथ ही घर/जमीन के अभाव में रोजगार मात्र किराये के मकान की व्यवस्था कर सकता है और तब अकेली स्त्री को अपने रास्ते में आने वाले अतिरिक्त आर्थिक व सामाजिक अवरोधों से भी निपटना पड़ेगा। इसके अलावा रोजगार जहाँ पारिवारिक हिंसा से स्त्री की सुरक्षा में नाकाम पाया गया है वहीं केरल जैसे सुरक्षित राज्य में भी अचल सम्पत्ति के होने मात्र से घरेलू हिंसा का प्रभाव अत्यन्त कम दिखाई दिया (दैहिक हिंसा 49 से घट कर 7 प्रतिशत व मानसिक उत्पीड़न 84  से घट कर 16 प्रतिशत )15

इस दृष्टि देखें तो ‘हिन्दू उत्तराधिकार कानून, 1956’ में वर्ष  2005 का संशोधन16 स्त्री अधिकारों की राह में एक मील का पत्थर है जिसके बाद हिन्दू स्त्री (सिख, जैन, बौद्ध भी इसी कानून के अन्तर्गत आते हैं) तो कम से कम कानूनी स्तर पर पारिवारिक सम्पदा में पुरुष के लगभग बराबर की उत्तराधिकारिणी बन गई है; हालांकि अन्य धर्मों की भारतीय स्त्रियों के लिये यह लड़ाई अभी बाकी है। इस बड़ी उपलब्धि के पीछे स्त्री आंदोलनों का अथक संघर्ष तथा कानूनविदों की न्याय के लिये प्रतिबद्धता का लम्बा इतिहास है। 2005 के अभूतपूर्व संशोधन के बाद अंततः हिन्दू स्त्री के खिलाफ सम्पत्ति में कानूनी पक्षपात बहुत हद तक समाप्त कर दिये गये हैं, पहली बार पैतृक सम्पत्ति (घर, मूल्यवान वस्तुयें, वंशागत विरासत व कर्तव्य) तथा कृषी भूमि में भी बराबर का हिस्सा उसका जन्मसिद्ध अधिकार बन गया है और इससे न केवल स्त्रियाँ बल्कि सम्पूर्ण परिवार, समुदाय और देश  लाभान्वित होगा।

इस संशोधन के पहले केरल के हिन्दुओं का एक विशिष्ट पंथ ही अपवाद-स्वरूप स्त्रियों को सम्पत्ति में गरिमापूर्ण अधिकार दे पाया था। उत्तर भारतीय हिन्दुओं में संयुक्त परिवार की मिताक्षरा पैतृक परम्परा के उलट ट्रावनकोर, मलाबार तथा कोचीन जैसे केरल के कुछ हिस्सों में हिन्दुओं में मातृ परम्परा ‘मरूमक्कथायम’ प्रचलित है जिसके अनुसार संयुक्त परिवार का एक स्वरूप माता के वंशजों से भी बनता है जिसे ‘तरवाड’ कहते हैं तथा माता की सम्पत्ति में तरवाड के सभी सदस्यों का अधिकार होता है। इस परम्परा के अन्तर्गत स्त्रियों को पिता, माता और पति इन तीनों स्रोतों से विरासत में हिस्सा मिलता रहा है।17

आंध्रप्रदेश  में भी वर्ष 1986 के उत्तराधिकार संशोधन के बाद बेटियाँ जन्मतः पैतृक सम्पत्ति की वारिस बन गई थीं किन्तु भारत के अन्य सभी भागों में वर्ष 2005 के पहले स्त्रियाँ परिवार की कानूनी वारिस नहीं थीं। हिन्दू परिवारों में ‘अर्जित’ व ‘पैतृक’ दो प्रकार की पारिवारिक सम्पत्तियाँ मानी जाती हैं। पिता यदि चाहे तो स्वयं द्वारा अर्जित सम्पत्ति में वसीयत के माध्यम से बेटी को उत्तराधिकारी बना सकता था किन्तु ‘हिन्दू अविभाजित संयुक्त परिवार’ की पैतृक सम्पत्ति में स्त्रियों का कोई सीधा अधिकार नहीं था; जीविका का अन्य कोई साधन न होने पर ही और सिर्फ सीमित रूप में वे इस सम्पत्ति को अपने भरणपोषण के लिये उपयोग कर सकती थीं। लेकिन अब हिन्दू उत्तराधिकार के 2005 के संशोधित कानून के अनुसार परिवार में जन्मी/दत्तक पुत्री अब पैतृक सम्पत्ति में भी पिता और भाईयों के साथ बराबर की हकदार है- वह बंटवारे की माँग कर सकती है, पिता के बाद परिवार की कानूनी कर्ता बन सकती है और उसकी वैवाहिक स्थिति से भी उसके इन दावों में कोई व्यवधान नहीं पड़ेगा; वह जीवन भर परिवार की बेटी के रूप में कानूनी वारिस बनी रहेगी। यह अधिकार पहले की भांति सीमित नहीं बल्कि सम्पूर्ण है जिसमें उसे सम्पत्ति को किराये पर देने, गिरवी रखने, बेचने अथवा अपने वारिसों को देने का कानूनी हक है। यही नहीं, अधिनियम की पुरानी धारा 23 के खात्मे के बाद मृत बेटे की पत्नी भी इस मिताक्षरा संयुक्त परिवार की विरासत में अब अपना हिस्सा पा सकती है, चाहे उसने पुनर्विवाह भी कर लिया हो।



लेकिन अधिकारों को मान्यता मात्र कागजी कानूनी सुधारों से नहीं बल्कि सामाजिक स्तर पर भी बराबर की स्वीकृति से इंगित होती है और इन दोनों में बहुधा खासा अन्तर पाया जाता है। हिन्दू उत्तराधिकार में इस क्रांतिकारी बदलाव के बाद ऐसी कई आशंकायें जताई गई थीं कि पैतृक सम्पत्ति में अपने हक के लिये अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली स्त्रियों की संख्या में अचानक बाढ़ आ जायेगी, तलाक के मामले बढ़ जायेंगे अथवा कृशि भूमि के इतने छोटे टुकड़े हो जायेंगे कि उत्पादन की दृष्टि  से वे अनुपयोगी हो जायें।7 किन्तु संशोधन के 8 वर्ष बाद भी स्थिति यही है कि अदालतों की नियमित रिपोर्टों में स्त्रियों की विरासत सम्बन्धी बहुत कम मामले सामने आये हैं। तलाक के मामलों की संख्या से इस संशोधन का सम्बन्ध खोजने वाले अध्ययन नहीं मिल सके लेकिन इसका आशंका को यदि सही मान भी लिया जाये तो भी किसी व्यक्ति द्वारा तलाक माँगने की स्थिति तभी बनती है जब वह किसी वजह से विवाह से असंतुष्ट  हो। ऐसी असंतुष्ट  स्त्रियाँ यदि अब तक सिर्फ इसलिये तलाक नहीं ले पा रही थीं कि उनके पास जीविका का कोई अन्य साधन नहीं था तो सम्पत्ति में अधिकार व इसके कारण तलाक ले पाना उनके लिये संकटपूर्ण विवाह से मुक्ति का एक अच्छा तरीका साबित हो सकता है। यदि मात्र सम्पत्ति हथियाने के लिये तलाक माँगने की बात करें, तो यह सामाजिक स्तर पर एक असामान्य स्थिति है, ऐसे तलाक संख्या में कभी भी बहुत अधिक नहीं हो सकते और इन्हें तो  अपराधिक श्रेणी के आर्थिक मामलों में गिना जाना चाहिये। अब रहा कृषि  भूमि के छोटे टुकड़े होने का मुद्दा, तो यह स्थिति परिवार में पुरुषों के बीच बंटवारे के कारण पहले भी आती रही है और ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिलता कि इस तरह टुकड़े होने से भूमि की उत्पादकता कम हुई हो- ऐसा इसलिये कि कागज पर बंटवारे के बाद यदि टुकड़े छोटे हो गये हों तो अक्सर उन पर सामूहिक कृषि  की जाती है और इस तरह असल में भूमि सम्मलित उपयोग में ही रहती है। जब बेटियाँ इस भूमि में हिस्सेदार बनें तो वे भी सहज ही इसी तरह सम्मलित कृषि  में सहभागी होंगी बजाय इसके कि वे एक छोटे टुकड़े पर अलग खेती करके हानि उठायें। यदि वे अपने हिस्से को बेचने का निर्णय लें तो नया खरीदार या तो परिवार का ही कोई व्यक्ति होगा या कोई अजनबी भी सम्मलित कृषि  में ही अपना लाभ देख सकेगा।7

अदालतों में अब भी स्त्रियों की ओर से बंटवारे के बहुत कम मामले होने के पीछे बेटियों का अज्ञान, पिताओं का पुत्रमोह, भाईयों का लालच और समाज की उदासीनता जैसे कारण ही गिने जा सकते हैं। भारतीय संस्कृति में स्त्री अपनी उपलब्धियों के लिये नहीं बल्कि सदा अपने त्याग के लिये ही पूज्य रही है। परिवार और समाज में स्त्रियों के लिये बनाये आदर्श आचरण के इन युगों पुराने सड़े गले मानकों ने आज भी स्त्री को सम्पत्ति के विषय में उदासीन व निष्क्रिय  बनाया हुआ है। उसे सदा त्याग का पाठ पढ़ाया जाता रहा है और इसलिये उसे परिवार से अपना हक माँगने में इन मानकों के ध्वस्त होने का भय सताने लगता है। अब भी स्थिति यही है कि उसे लगता है कि पारिवारिक विरासत में हिस्सा माँगने से एक त्यागमूर्ति बेटी/बहू के रूप में उसका वह आदर भी छिन जायेगा जो चुप रहने से उसे कभी कभार मिल जाता है। चाहे आज कानून उसके साथ खड़ा है लेकिन जब तक समाज और वह स्वयं अपना साथ नहीं देते, ऐसे कानून भी उसकी आर्थिक स्थिति में कोई बड़ा क्रांतिकारी बदलाव नहीं ला सकेंगे।

जहाँ तक नये कानून को गौर से देखने की बात है तो 2005 के इस संशोधन के बावजूद स्त्रियों के प्रति कानूनी पक्षपात अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुये हैं, जैसेः
1. पैतृक सम्पत्ति पर इस दावे में मृतक पिता की विधवा अब भी शामिल नहीं है, उसे अब भी केवल श्रेणी 1 के वारिसों में ही गिना गया है जिससे पति की अर्जित सम्पत्ति में तो वह वारिस है किन्तु हिन्दू संयुक्त परिवार के मिताक्षरा उत्तराधिकार नियम के अनुसार पैतृक सम्पत्ति में मात्र पति को मिले हिस्से में ही, बाकी के श्रेणी 1 के वारिसों के साथ उसका हिस्सा है।
2. पिता को अब भी यह सुविधा है कि अपने द्वारा अर्जित सम्पत्ति की वसीयत में वह परिवार की स्त्रियों को कुछ न दे। मुस्लिम निजी कानून इस मामले में बेहतर है जिसमें पिता अपनी सम्पत्ति के एक तिहाई से अधिक की वसीयत नहीं कर सकता और इस तरह उसके कानूनी वारिसों का हक सुनिष्चित रहता है।
3. 20.12.2004 से पहले हुये बंटवारों पर यह संशोधन लागू नहीं होता और ऐसे मामलों में बेटियाँ पैतृक सम्पत्ति में कोई दावा नहीं कर सकतीं सिवाय श्रेणी 1 के वारिसों के साथ कुछ भाग उन्हें मिल सकता है।
4. हिन्दू स्त्री की मृत्यु पर उसकी सम्पत्ति का बंटवारा अब भी न्यायपूर्ण नहीं है और माता-पिता से मिली सम्पत्ति उसकी मृत्यु के बाद वापिस मायके के परिवार में नहीं, उसके पति के परिवार को पहुँच जाने की संभावना है।
5. 2005 के संशोधन में धारा 4(2) के खात्मे के बाद स्पष्ट   रूप से कृषि  भूमि के उत्तराधिकार में भी बेटियों को पुरुषों के बराबर का हक दिया गया है लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल यह उठ खड़ा हुआ कि अन्य पारिवारिक सम्पत्तियाँ जहाँ केन्द्र का विषय हैं, कृषि भूमि स्पष्ट रूप से राज्याधीन विषय है। यहाँ तक कि उसे विभिन्न धर्मों के निजी उत्तराधिकार कानूनों के दायरे से भी बाहर रखा गया है और कोशिश यही रही है कि उसे छोटे अनुत्पादक टुकड़ों में बंटने से रोका जाये। अब राज्याधीन विषय पर उत्तराधिकार केन्द्र द्वारा बनाये गये कानून से कैसे निर्धारित किया जा सकता है?

ऐसे विषय जिन पर केन्द्र व राज्य दोनों कानून बना सकते हों, वहाँ मतभेद की स्थिति में केन्द्र का निर्णय मान्य किये जाने का प्रावधान है किन्तु संविधान की धारा 256 के अनुसार ऐसा सिर्फ तभी होगा जब केन्द्र को उस विषय में ऐसा करने की क्षमता प्रदान की गई हो। पिछले कुछ कृषि  भूमि मामलों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राज्यीय कानूनों को ही माना गया है जिनके अनुसार कृषि  भूमि में स्त्री का अधिकार सीमित उपयोग का है उससे जीविका प्राप्त करने के लिये अब भी उसे पति या परिवार के कर्ता की अनुमति चाहिये होती है।18
और इसका अर्थ यह है कि अब भारत के विभिन्न राज्यों में भिन्न कृषि  भूमि कानून हो गये हैं।
और फिर कागज पर हक तथा सम्पत्ति पर वास्तविक नियंत्रण में भी फर्क है जैसे इस आशंका से मुक्त नहीं हुआ जा सकता कि शिक्षा व परिवार में रुतबे के अभाव में सम्पत्ति पर स्त्री का सम्पूर्ण कानूनी अधिकार भी दूसरों के हाथ का खिलौना बन जाये।

 भारत में माने जाने वाले अन्य धर्म

यह तथ्य है कि लाख रूढ़िवादी होते हुये भी अपने निजी विरासत कानून में जैसे साहसपूर्ण बदलाव हिन्दू समुदाय ने होने दिये वैसा साहस कोई और भारतीय समुदाय अब तक नहीं कर सका। संविधान की धारा 15(3) सुझाती है कि स्त्रियों एवं बच्चों के लिये खास प्रावधान करने से सरकार को कोई निजी कानून भी रोक नहीं सकता और धारा 15(1) नागरिकों के बीच किसी भी आधार पर भेदभाव को प्रतिबंधित करती है लेकिन इन सरकारी विशेषाधिकारों का उपयोग हिन्दुओं को छोड़ कर अन्य किसी स्त्री समुदाय के लिये किया जा सका हो, ऐसा दिखाई नहीं देता।


मुस्लिम धर्म-
क़ुरान/इस्लाम के अपेक्षाकृत समानता को बढ़ावा देने वाले नियमों, जो कहते हैं कि ‘‘पुरुष जो भी सम्पत्ति अर्जित करते हैं उसमें स्त्रियों का हिस्सा हमेशा  होता है’’, की बजाय विश्व का ज्यादातर एवं भारतीय मुस्लिम समुदाय भी अब तक शरीयत के कानून के अनुसार चल रहा है जो मुस्लिम स्त्रियों के लिये मनु संहिता की तरह की कड़ी बंदिशों पर जोर देता है। और इसीलिये भारतीय मुस्लिम स्त्री के लिये इककीसवीं सदी में भी बाल विवाह, तीन तलाक़ और पतियों के बहुविवाह विधिसंगत हैं। असल में हिन्दू उत्तराधिकार कानून के उलट मुस्लिम समुदाय का अपना कोई विरासत का लिखित कानून अब तक बन ही नहीं सका है। वैसे परम्परागत नियमों के अनुरूप मुस्लिम स्त्री निम्न प्रकार से पारिवारिक सम्पत्ति में हकदार हैः19
1. पैतृक सम्पत्ति में बेटे को जितना हिस्सा मिले, उससे आधा हिस्सा बेटी को दिया जाता है
2. मुस्लिम समाज में ‘परिवार की संयुक्त सम्पत्ति’ और ‘व्यक्ति की अर्जित सम्पत्ति’ अलग-अलग नहीं हैं। पिता यदि वसीयत करता है तो वह अपनी कुल सम्पत्ति का मात्र एक तिहाई ही अपनी इच्छा से किसी को दे सकता है। बाकी दो तिहाई पर उसके वारिसों का ही हक होगा, जिसमें बेटी भी आती है।
3. निकाह के वक्त उसे मेहर के रूप में पति की ओर से कुछ सम्पत्ति देने का वायदा किया जाता है जिसे निकाह के वक्त, जिंदगी भर में कभी अथवा तलाक़ की स्थिति में दिया जाना होता है और इस सम्पत्ति पर सिर्फ उसका निजी हक होता है। मेहर की अवधारणा मुस्लिम विवाह को दरअसल एक आर्थिक अनुबंध  का दर्जा भी देती है और बहुविवाही तथा तीन तलाक़ के खतरों से घिरे इस रिश्ते में स्त्री को कुछ सुरक्षा प्रदान करती है। यदि मेहर अता नहीं किया गया तो वह पति को सारे वैवाहिक अधिकारों से बेदखल कर सकती है, मतभेद के सुलझने तक उससे गुजारा भत्ता माँग सकती है या उसे तलाक़(तफविज) भी दे सकती है।
4. इन सभी सम्पत्तियों की वह सर्वेसर्वा होगी। उसके पिता, पति या दोनों परिवारों का इनके उपयोग व प्रबन्धन में कोई दखल नहीं हो सकता।
5. उसे यह अधिकार भी दिया गया है कि इन सम्पत्तियों को घरखर्च के लिये उससे नहीं माँगा जा सकता। जब तक वह पति के साथ रहती है वह कानूनन उससे स्वयं तथा बच्चों के भरण-पोषण के लिये अलग से खर्चा माँग सकती है चाहे वह स्वयं कितनी ही अमीर क्यों न हो।
6. किन्तु यदि तलाक़ होता है तो उसे पति से गुजारा भत्ता इद्दत की मुद्दत (तलाक़ के बाद केवल तीन माह तक अथवा गर्भवती होने की सूरत में बच्चे के पैदा होने) तक ही मिल सकता है। इसके बाद पति की उसके लिये कोई जिम्मेदारी नहीं होगी।

विरासत के ये कानून कुछ मुद्दों पर स्त्री के हक में हैं लेकिन ये कितने माने जाते हैं, यह एक बड़ा सवाल है- जैसे कि दूल्हे की हैसियत के हिसाब से दुल्हन को अपना मेहर स्वयं तय करने का हक़ है लेकिन इस बात पर शादी न टूट जाये, इसके डर से यह हक़ भी अक्सर दूल्हे को ही दे दिया जाता है जिसकी वजह से मेहर की रकम बहुत मामलों में काफी कम तय की जाती है। इसके अलावा यदि वह पति का हुक्म मानने से इनकार कर दे(नुषुक) तो शादी के चलते हुये भी वह भरण-पोषण के हक़ से महरूम की जा सकती है। इसी तरह पिता की सम्पत्ति में हक़ माँगने पर वह भी हिन्दू स्त्री की ही तरह लालची और भावनाहीन मानी जाती है। जमीन पर हक़ यदि मिले भी, तो उसे परिवार की जरूरत के नाम पर कुछ नकद या किसी अहसान के एवज में छोड़ने को कहा जा सकता है। सार्वजनिक जीवन में मुस्लिम स्त्री की बेहद कम हिस्सेदारी और स्वयं स्त्रियों के बीच संवाद की कमी भी उसके अधिकारों को दबाये रखने का जरिया बन जाती है। उनके एक मंच पर आने और अपनी आवाज बुलंद करने को अक्सर इस्लाम के खिलाफ समझ लिया जाता है जिसके कारण स्त्री अधिकारों को ले कर अधिकांष देशों में कोई सशक्त मुस्लिम आंदोलन नहीं उभर सका है। उल्टे भारत में तो, 1986 के संसदीय संशोधन द्वारा मुस्लिम निजी कानून में किसी भी प्रकार का न्यायिक/विधायी हस्तक्षेप ही प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसी तरह विश्व के अन्य अनेक देशों में मुस्लिम स्त्री को अदालत तक पहुँचने की स्पष्ट मनाही है।

हालांकि विश्व  के कुछ देशों में कुछ कानूनी सुधारों के जरिये इस पक्षपात को कम करने की कुछ कोशिशो की गई हैं जैसे मोरक्को में पति का हुक्म न मानना तलाक या घरखर्च के हक से बेदखल करने लायक गुनाह नहीं माना जाता तथा ट्यूनीशिया में आर्थिक रूप से सक्षम स्त्री को भी घर खर्च में हाथ बंटाने की जिम्मेदारी दी गई है।

ईसाई धर्म-
मुस्लिम धर्म की ही तरह भारत में प्रचलित कैथोलिक ईसाई पंथ भी हिन्दुओं के धर्मान्तरण के फलस्वरूप जन्मा था लेकिन इसने हिन्दुओं की दहेजप्रथा को अपने नये धर्म से भी जोडे़ रखा। मूल रूप से केरल में जन्मे और वहाँ से देश  के बाकी हिस्सों में फैले ईसाई धर्म की स्त्रियों के लिये पारिवारिक सम्पत्ति में कोई निश्चित स्थान अब तक भी नहीं बन सका है। विरासत के मामलों में उनके लिये वर्ष 1986 के पहले तक ‘ट्रावनकोर ईसाई उत्तराधिकार कानून, 1916’20 का ही उपयोग किया जाता था जिसके अन्तर्गतः
1. विवाह के समय दिया जाने वाला ‘स्त्रीधनम’ (भाई को मिलने वाले हिस्से का एक चैथाई या रु. 5000, इनमें से जो भी कम हो) भी इस धन के संरक्षक के रूप में दरअसल उसके श्वसुर या पति को सौंपा जाता है और स्त्री का उस पर कोई हक नहीं माना जाता। स्त्री की सारी सम्पत्ति, यहाँ तक कि उसकी अर्जित सम्पत्ति के प्रबन्धन पर भी उसके पति का हक होता है।
2. विधवा होने पर उसे पति की सम्पत्ति में एक तिहाई हिस्सा मिलता है।
3. विवाह के समय स्त्रीधनम पाने वाली स्त्री को पिता की सम्पत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिलता। पिता की वारिस वह तभी मानी जाती है जब परिवार में कोई पुरुष उत्तराधिकारी न हो। और ऐसी स्थिति में भी पिता यदि चाहे तो वसीयत द्वारा उसे अपना उत्तराधिकारी मानने से इनकार कर सकता है।
4. जहाँ इंग्लैंड में 1970 में ही इस सच को कानूनी मान्यता मिल गई थी कि पति सम्पत्ति तभी अर्जित कर पाता है जब पत्नी उसका घर परिवार संभालती है और इसलिये किसी वजह से तलाक की नौबत आने पर उनके अलग होते समय पति की सम्पत्ति में पत्नी का बराबर का हिस्सा होना चाहिये, वहीं इस स्थिति में भारतीय ईसाई स्त्रियों के लिये भरण पोषण का कोई कानून अस्तित्व में नहीं है।
5. यदि स्त्रीधनम पति के परिवार द्वारा उपयोग कर लिया गया है तो भी पत्नी को ससुराल की संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं दिया जा सकता।
6. भारतीय उत्तराधिकार कानून 1925 के अनुसार भी पति की मृत्यु के बाद ही उसकी सम्पत्ति में पत्नी का दावा माना जा सकता है उसके पहले नहीं।
7. नन बन गई स्त्रियों को पिता की सम्पत्ति में कोई हिस्सा नहीं मिल सकता क्योंकि वे घर त्याग चुकी हैं; ऐसे कुछ निर्णय अदालतों द्वारा सुनाये भी गये हैं। हालाँकि ऐसे ही अन्य मामलों में प्रीस्ट बन गये पुरुषों को पिता का वारिस माना गया है। यहाँ लिंग के आधार पर भेद अब तक कायम है क्योंकि धार्मिक कारणों से घर छोड़ने वाले नागरिकों के लिये भारत में अलग से कोई कानून नहीं है। ऐसे में यदि कोई नन बाद में संन्यास का त्याग करना चाहे तो उसके पास पारिवारिक सम्पत्ति का कोई अवलम्ब नहीं रहेगा।
कुल मिला कर तस्वीर यह थी कि प्राचीन हिन्दू-ब्रिटिश  निजी कानूनों तथा चर्च के घालमेल ने स्त्रियों को परिवार की सम्पत्ति से करीब करीब महरूम ही कर रखा था और 1986 के पहले अदालतें भी इन्हीं के अनुसार फैसले देती थीं।



लेकिन केरल में 1986 के मेरी राय मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने यह बात साफ कर दी कि अदालतें चाहें तो स्पष्ट कानूनों के अभाव में भी मानवीय आधार पर अन्य कानूनों तथा संविधान द्वारा प्रदत्त समानता के मौलिक अधिकार का सहारा ले कर स्त्री पक्ष को न्याय दिला सकती हैं। इस मामले में अदालत ने माना कि भारतीय उत्तराधिकार कानून 1925 के अनुसार निर्वसीयत पारिवारिक सम्पत्ति में बेटे और बेटियाँ बराबर की हकदार हैं चाहे बेटियों को विवाह के समय स्त्रीधनम मिला हो या नहीं। हालाँकि इस फैसले का अन्य भारतीय राज्यों में बहुत प्रचार या उपयोग अब तक नहीं हो सका है। ऐसा इसलिये हुआ कि संसद ने 1916 के ट्रावनकोर कानून को अब तक निरस्त घोशित नहीं किया है जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश  था।21
न तो ईसाई समुदाय और न ही चर्च ने इस स्थिति में बदलाव की अब तक कोई पहल की है।

विधि परिषद जिसने हिन्दू निजी कानूनों के मामले में काफी सक्रियता दिखाई, अन्य निजी कानूनों के बारे में चुप्पी ही साधे रही है। शाहबानो मामले के जरिये सर्वोच्च न्यायालय ने मुस्लिम कानूनों में कुछ खुलापन लाने की कोशिश जरूर की थी जिसमें निराधार तलाक़शुदा मुस्लिम स्त्री को सम्पत्ति में हिस्सा नहीं तो इद्दत की अवधि के बाद भी, पति से कम से कम गुजारा भत्ता तो मिलने की गुंजाइश  थी लेकिन इस कोशिश को मुस्लिम समुदाय ने ही अस्वीकार कर दिया और अपने निजी कानून को एक संसदीय संशोधन द्वारा अपरिवर्तनीय बनवा लिया।

प्रत्येक भारतीय स्त्री को पारिवारिक सम्पत्ति में गरिमापूर्ण अधिकार मिल सके इसके लिये निम्न कदम तुरंत उठाये जाने की जरूरत है-
-कानूनों में जहाँ भी लिंग आधारित भेदभाव दिखाई दें उन्हें लिखित रूप से सभी धर्मों/समुदायों के लिये अति शीघ्र परिवर्तित किया जाये।
-स्कूली पाठ्यक्रम में प्रशासनिक कानूनों के साथ ही निजी कानूनों की भी इतनी जानकारी जरूर हो कि व्यश्क  होने तक हर पुरुष व स्त्री को अपने अत्यावष्यक निजी अधिकार व कर्तव्य मालूम हो सकें।
-विवाह के समय पर दूल्हे या उसके परिवार को दहेज देने की बजाय बेटी को पिता की सम्पत्ति में उसका हक मिले।
-मायके में बेटे बेटियों तथा ससुराल में पति पत्नी को पैतृक व अर्जित सम्पत्ति में बराबर का हक मिले, इसकी देखरेख समाज की ओर से विशेष  रूप से की जाये।
-विवाह का पंजीकरण अनिवार्य रूप से हो ताकि विवाद की सूरत में स्त्री का पति की सम्पत्ति पर कानूनी दावा बना रहे
-पालक अपने सक्षम रहते हुये ही अपनी सम्पत्ति की वसीयत अपने कानूनी वारिसों में समान रूप से कर दें ताकि उनकी मृत्यु के बाद विरासत पर कोई अनावश्यक कानूनी विवाद न हो, समय पर बंटवारा हो तथा परिवार की स्त्रियाँ गर्व से सिर ऊँचा करके अपना अधिकार प्राप्त कर सकें, न कि सम्पत्ति के कारण परिवार में कलह पैदा करने वाली कहलायें।

-सबसे बड़ा सार्थक परिवर्तन तब होगा जब खुशहाल जीवन से जुड़े सम्पत्ति जैसे किसी भी मामले में स्त्री और पुरुष को अलग-अलग इकाई की तरह देखने की जरूरत ही न पड़े। परिवार की प्रगति के पथ में वे निरंतर मतभेद की स्थिति में न रह कर एक दूसरे के पूरक हों और उनके बीच सम्पत्ति को ले कर छीज गया विश्वास अबकी बार समता की जमीन पर जड़ें पकड़े।

दो किस्तों का यह लेख एक बड़े लेख का हिस्सा है , पूरा लेख शीघ्र ही स्त्रीकाल प्रिंट में

(लेखिका  स्त्रीकाल के  सम्पादक मण्डल की सदस्य हैं. तथा महात्मा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम, महाराष्ट्र, में पैथोलॉजी  विभाग में प्राध्यापक हैं . संपर्क : anupamagupta@mgims.ac.in)
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