‘‘....एण्ड सन्स’’ का कपटतंत्र और एक चिरविस्थापित: वैश्वीकृत भारत में स्त्री के सम्पदा अधिकार ( पहली क़िस्त)

डा. अनुपमा गुप्ता

बचपन में बाजार से गुजरते हुए दुकानों पर लगे ‘मुरारीलाल एण्ड सन्स’ जैसे नामों पर जब भी नजर पड़ी तो हर एक नई चीज को देख कर उत्सुकता से भर जाता बालमन इसका मतलब यही निकालता था कि ‘एण्ड सन्स’ कोई गहन पारिभाषिक शब्द है और आवश्यक कम्पनी नियमों में शामिल रहता होगा- क्योंकि वयस्क दुनिया में हर काम समझदारी और अनुशासन से होता है, कुछ ऐसा विश्वास हर बच्चे की तरह मेरे मन में भी था। धीरे-धीरे जब यह नजर में आना शुरू  हुआ कि ‘एण्ड सन्स’ दरअसल बेटियों को पारिवारिक सम्पत्ति से बेदखल कर देने की ‘सामाजिक मान्यता प्राप्त घोषणा है तो इसकी इतनी सरल और खुली क्रूरता पर हैरत से भर गई थी मैं! आधुनिक सभ्य राष्ट्र -समाज में किसी भी तरह के पक्षपात को हेय दृष्टि से देखा जाता है, यहाँ तक कि अपराध की श्रेणी में रखा जाता है; फिर यह पक्षपात स्वतंत्र भारत में कानूनी-सामाजिक रूप से इस तरह मान्य कैसे हो सका?



यह समझ समय के साथ बाद में आ ही सकी कि मानव जाति ने अपनी समृद्धि यात्रा के लिये जो पथ चुना है, उसमें सामूहिक शारीरिक श्रम की अनिवार्य आवश्यकता के कारण समाज के कुछ घटक दासत्व को प्राप्त होने ही थे, उन्हें समर्थों की चल-अचल सम्पत्ति में गिना ही जाना था। और उन्हें इस स्थिति से उबारने के लिये सभ्यता चाहे जितना जतन कर ले, वे तब तक दास बने रहेंगे, जब तक किसी विज्ञान-गल्प की भांति हमारे साइंसदान श्रमिक रोबोट दासों की एक फौज इस अनिवार्य सामूहिक श्रम के लिये तैयार न कर लें;
अथवा हम विकास की अपनी परिभाषा न बदल लें!

चूँकि तथाकथित विकास के इस पथ पर इस वास्तविकता से हम हमेशा परिचित थे, और हैं, कि ये दास भी तभी तक दास बने रहेंगे जब तक वे सम्पत्तिहीन रहें, जब तक धन के असीमित निजी संग्रह को ही समृद्धि और विकास का नाम दिया जाता रहे। तो इस स्थिति में श्रमिक वर्ग को सम्पत्ति की संभावना से हर हाल में वंचित रखना ही इस असमताकारी विकास को जारी रखने की सबसे बड़ी षर्त थी। विश्व  के कई अन्य देषों की तरह भारतीय स्त्री जाति भी आज अपनी इसी अनिवार्य श्रमिक सेवा से निकलने की कोशिश कर रही है। सच यही है कि वह अब तक अपने किसी परिधान में एक जेब लगवाने की जरूरत महसूस नहीं कर पाई है- किसी व्यक्ति की वेशभूषा में जेब तभी तो होती है जब उसे अपने पास किसी मूल्यवान वस्तु को रखने की जरूरत हो। मैं समझती हूँ कि वंचित पुरुषों को भी इसी नजर से देखने का तर्क तब कमअसर हो जाता है जब हम उनके घर में प्रवेश करें और पायें कि उनके परिवार की स्त्रियाँ हर हाल में अधिक वंचित हैं।



सम्पदा पर अधिकार की बात करते हुए पहले हम यह समझ लें कि सम्पदा से हमारा आशय क्या है तो इस विशय पर हम आसानी से आगे बढ़ सकेंगे। यदि सम्पदा/सम्पत्ति को जीवन का लक्ष्य न मान कर लक्ष्य प्राप्ति का साधन मानें जो कि उसका सच्चा स्वरूप है, तो सम्पदा का अर्थ ऐसे हर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संसाधन से लिया जा सकता है ‘जिस पर प्रभावपूर्ण अधिकार से व्यक्ति स्वयं के, अपने परिवार तथा समुदाय के भौतिक जीवन को बेहतर बना सके तथा समाज में प्रतिष्ठा प्राप्त कर सके ’। इस परिभाषा के अन्तर्गत मैं निम्न सभी संसाधनों को रखती हूँः
1. प्रत्यक्ष भौतिक सम्पदा- जिसे आम तौर पर सम्पदा/सम्पत्ति/दौलत के अकेले अर्थ के रूप में लिया जाता है। इसमें चल-अचल एवं निजी/सामुदायिक सम्पत्ति के सभी प्रकार आते हैं जिनमें नियमित आय तथा घर के अलावा उपभोक्ता वस्तुयें व भूमि, जल, वन जैसे प्राकृतिक संसाधन मुख्य हैं।
2. अप्रत्यक्ष सम्पदा- जिसमें वे सभी संसाधन शामिल हैं जो प्रत्यक्ष सम्पदा को अर्जित करने में सहायक हों, जैसे स्वतंत्रता, ज्ञान, अवसर, गरिमा, स्वास्थ्य व सुरक्षा। इन संसाधनों के मुफ्त व समतापूर्ण वितरण के संकल्प कभी हमारे संविधान में किये गये थे, लेकिन आज सम्बन्ध उलट-पुलट गये हैं और अब स्वयं सम्पदा का रूप ले चुके इन संसाधनों को पाने के लिये प्रत्यक्ष सम्पदा भी एक माध्यम बन गई है न कि मात्र उनका सुफल। यह दुष्चक्र प्रतिदिन सुरसा के मुँह के समान बढ़ रहा है और वंचित मानवता बेहतर जीवन से प्रतिदिन और दूर हो रही है।

यह अधिकाधिक स्पष्ट होता जा रहा है कि सम्पत्ति पर अधिकार का सवाल मात्र कानून से हल नहीं हो सकता। हमारे सम्पत्ति विषयक व निजी अन्य कानूनों का समय के साथ बदलता स्वरूप इंगित करता है कि दायित्व का व्यापक सामाजिक बोध ही जहाँ एक ओर न्याय की दिशा-दशा व स्वरूप को निर्धारित करता आया है वहीं दूसरी ओर यदि यह बोध न हो तो कितना भी बुद्धिमत्तापूर्ण कानून स्त्री को (या अन्य वंचितों को) उसका हक नहीं दिला पायेगा। और अब वैश्वीकरण की प्रक्रिया ने भी फिर एक बार यह सिद्ध कर दिया है कि वंचितों के हक यदि आगे बढ़ कर प्राथमिकता से तय नहीं किये गये हैं तो उन्हें इस विकास की दौड़ में आसानी से भुला दिया जा सकता है, चाहे नीतिनिर्धारकों की मंषा प्रारंभ में ठीक यही न भी रही हो। इसलिये इस दिशा में युद्ध स्तर पर काम करने की अत्यंत आवश्यकता है जो आज का स्त्री आंदोलन स्थानीय-राष्ट्रीय –अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नहीं कर पा रहा है।



स्त्री के आर्थिक अधिकार इस वैश्वीकरणकरण के दौर में अब पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गये हैं क्योंकि न सिर्फ शिक्षित और तकनीकी रूप से दक्ष स्त्रियाँ बल्कि वंचित वर्गों की स्त्रियाँ भी विश्व के आर्थिक परिदृष्य पर अब अधिकाधिक सक्रिय दिखाई देने लगी हैं। जहाँ एक ओर उनके पारम्परिक कार्य जैसे खाद्यान्न उत्पादन (लगभग 60 प्रतिषत कृशि श्रम)1, जल व ईधन के एकत्रीकरण, परिवार निर्माण एवं प्रबन्धन जैसे कार्यों का आर्थिक महत्व पहली बार प्रकाश में लाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर वे अब संगठित श्रमिक दलों (अधिकांश क्षेत्रों में लगभग एक तिहाई श्रमिक)2, सामूहिक कृधि कर्मियों व परिवारों की मुखिया के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। स्त्री आंदोलन ने विश्व  में स्त्री की देह, शिक्षा व कार्य को महत्व दिलाने के लिये अथक परिश्रम किया है किन्तु भौतिक सम्पदा अब तक उनके संकल्पों में पूर्णरूपेण नहीं जुड़ सकी है। स्त्री के सम्पत्ति अधिकारों के विषय  में राजनीतिक, शैक्षणिक, सामाजिक-सांस्कृतिक अनिच्छा उनके आर्थिक रूप से सबल होने की दिशा में अब भी बड़ी बाधायें हैं और इस अनिच्छाओं के मूल में एक ही कारण है- स्वयं सम्पत्ति के एक रूप की तरह भोगी जाती रही स्त्री आज यदि इस भौतिक सम्पदा में हिस्सा बंटाने की बात करने लगे तो यह तर्कपूर्ण कैसे लगेगा? स्त्री आज भी पारिवारिक व सामाजिक सम्पत्ति मानी जाती है- परिवार की ओर से उसके श्रम, देह एवं प्रजनन क्षमता को वधू-मूल्य ले कर बेचा जा सकता है, दान किया जा सकता है, दहेज के साथ मुफ्त उपहार के रूप में पाया जा सकता है अथवा राजनीतिक/सामाजिक/आर्थिक सौदों में व्यक्तिगत बढ़त हासिल करने के लिये उसका निवेष किया जा सकता है, प्रतिष्ठा के नाम पर घर के बाहर काम करने की चाहे मनाही हो लेकिन घर में बेगार करवाई जा सकती है। भ्रूण हत्या से ले कर त्याग की छांव में पलते कुपोषण , दहेज, वैधव्य की सादगी, चादर ओढ़ाना, सती दहन, डायन के इलजामों और अंत्येष्टि व विरासत की सभी परम्पराओं तक, अत्यंत सावधानी और क्रूरता से गढ़ी गई प्रत्येक पारिवारिक व सामाजिक स्त्री-छवि के पीछे सम्पत्ति को स्त्री के हाथों में सौंपने से इनकार ही तो है।

यही नहीं स्त्री सामाजिक सार्वजनिक सम्पत्ति भी है जिससे सरेआम छेड़खानी करके न सिर्फ अपने पुरुषत्व को सिद्ध किया जा सकता है बल्कि घर के बाहर आने से रोका भी जा सकता है, जिसे वेश्यावृत्ति  के द्वारा खरीदा जा सकता है, बराबर श्रम के बदले कम मेहनताना दे कर संतुष्ट किया जा सकता है। यही नहीं, उसे पुरुषों द्वारा थोपे गये युद्धों के दौरान घर-समाज को संभालने के लिये मजबूर किया जा सकता है, सेना के हमलों के वक्त रिश्वत अथवा कृतज्ञता ज्ञापन के तौर पर पेश किया जा सकता है अथवा साम्प्रदायिक दंगों के समय दूसरी कौम के वर्तमान व भविष्य के मानव संसाधनों को नष्ट करने के लिये कुचला जा सकता है। आर्थिक स्वतंत्रता पाने की अपनी धुन के कारण वह पहले ही घर-रोजगार के बीच पिस रही है और अब, ‘स्त्री सशक्तीकरण अर्थात स्थाई सामाजिक विकास’ जैसे नये सरकारी नारों के उदय के बाद गरीबी उन्मूलन और सामाजिक सुधारों का बोझ भी उसी के ‘निर्बल’ कहे जाने वाले कंधों पर आन पड़ा है।

उसे सम्पत्ति की तरह निरंतर उपयोग करने का आदी हो चुका यह समाज अपनी समृद्धि में उससे हिस्सा बांटने की बात सोच भी कैसे सकता है? आज कुछ सम्पत्ति अधिकार राष्ट्रीय –अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आधे अधूरे कानून बन कर जरूर आ गये हैं लेकिन समाज में उनके सक्रिय अस्तित्व को स्थापित व सिद्ध करना अब भी बहुत विशाल चुनौती है। और जैसे ये रुकावटें ही पर्याप्त नहीं थीं तो अब भूमण्डलीकरण का नया खुला बाजार तथा उग्र पूंजीवाद इन अधिकारों के अभाव में उस पर कहर बन कर टूट पड़े हैं।

वैश्वीकरण के दौर में जब समता के लोकतांत्रिक मूल्यों का मन्थन एक बार फिर नये सिरे से किया जा रहा है, जब संगठित श्रम में स्त्री की हिस्सेदारी हर क्षण बढ़ रही है, जब सामाजिक जीवन में निजी सम्पत्ति का महत्व बढ़ता जा रहा है, तब संसाधनों पर स्त्रियों का नगण्य अधिकार (जैसे कि विश्व की कुल नामित भूमि में 1-2 प्रतिशत)2 और भी असहनीय लगने लगता है। यह न सिर्फ स्त्री के बल्कि परिवारों, देश और अंततः मानव जाति की तरक्की के रास्ते में रुकावट है यह बात हमें समझनी ही होगी। विश्व की प्राचीन सभ्यताओं में हुए कुछ मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के परिणामों के अनुसार गैरपूंजीवादी परम्परावादी समुदायों में संसाधन-वितरण के समय उसके अर्जन में व्यक्ति की भागेदारी को नजरअंदाज कर संसाधन को सभी में समान रूप से बांटे जाने की प्रवृत्ति अधिक देखी गई है। इसीलिये सामाजिक रूप से अधिक संगठित-सुगठित संस्कृतियों, जैसे चीन व भारत में खुली अर्थव्यवस्था के प्रवेश के पहले परिवारों के भीतर जहाँ यह वितरण सभी सदस्यों की समानता पर आधारित था3 वहीं समाज में वितरण भी परिवारों की न्यूनतम आवश्यकताओं से जुड़ा होता था जिसमें वंचितों के लिये भी, हाशिये पर ही सही लेकिन जीविका के कुछ अधिकार अवश्य होते थे। इन परम्परागत कृषि आधारित समुदायों में पारिवारिक आय अथवा भूमि मूल रूप से भोजन व वस्त्र प्राप्ति का साधन हुआ करती थी, भौतिक समृद्धि सबका ध्येय नहीं थी और इसलिये भूमि व अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार अक्सर परिवार व गाँव में व्यक्ति की भूमिका पर निर्भर करता था न कि कागज पर मालिकाना हक पर, और इस तरह समाज के हर स्त्री-पुरुष को इनके इस्तेमाल का हक हुआ करता था।4 लेकिन उग्र पूँजीवाद के चैतरफा पैर पसारने से प्राकृतिक न्याय की ये कुछ परम्परायें भी अब छीज रही हैं। पहले उपनिवेशी काल और फिर औद्योगीकरण व वैश्वीकरण की आर्थिक प्रक्रियाओं ने धीरे-धीरे आय आधारित रोजगारों का महत्व बढ़ा दिया है जिससे भूमि व अन्य संसाधन अब नकदी फसलों, इमारतों के निर्माण और व्यवसायिक कार्यों के लिये प्रयोग किये जाने लगे हैं तथा कई तरीकों से समृद्धि व रुतबा बढ़ाने का जरिया बन गये हैं। हालांकि वैश्वीकरण की शुरुआत में माना गया था कि खुली अर्थव्यवस्था से होने वाला आर्थिक विकास समाज में पितृसत्ता के प्रभाव को धीरे -धीरे घटा कर समृद्धि को जेण्डर के स्तर पर संतुलित कर पायेगा, किन्तु पिछले 25 वर्शों में गरीब-अमीर तथा स्त्री-पुरुष के बीच आर्थिक खाई और भी गहरी होती गई है। और विडम्बना यह कि इस खुले सच को आंकड़ों द्वारा सिद्ध करने के लिये हमारे पास कोई अंतरराष्ट्रीय  स्तर के ठोस अध्ययन व साक्ष्य नहीं हैं।5
विश्व के इतिहास से स्पष्ट है कि स्त्रियों के श्रम का भरपूर निवेश करती आई इस सभ्यता ने आर्थिक विकास की प्रक्रिया में उन्हें अपने लाभांश में हिस्सेदारी देने की कोशिश कभी नहीं की और इसीलिये आज आर्थिक या कृषि आपदाओं की पहली शिकार वे ही हो रही हैं। समाज की आर्थिक संरचना में इक्कीसवीं सदी में हुये वैश्विक व स्थानीय परिवर्तनों का कहर खासकर स्त्रियों पर इसलिये अधिक टूटा कि धन व निजी सम्पत्ति की अवधारणा पर आधारित नई अर्थव्यवस्थाओं में एक ओर उनके भूमि/पारिवारिक सम्पत्ति पर अनौपचारिक अधिकार समाप्त हो गये हैं और विरासत के औपचारिक अधिकार अब तक उनके पास नहीं पहुँचे हैं, वहीं दूसरी ओर परिवार के बच्चों/बुजुर्गों के भोजन व रोजमर्रा की जरूरतों की जिम्मेदारी अब भी उन्हीं पर है और ये जरूरतें खुले बाजारों के बढ़ने व आवश्यक वस्तुओं पर सरकारी अनुदान कम होने के कारण प्रतिदिन मंहगी होती जा रही हैं। विश्व के अधिकांश गरीब देशों में किये गये अध्ययन दिखाते हैं कि खुली अर्थव्यवस्था के आने के बाद ग्रामीण क्षेत्रों में पुरुष जहाँ हर वर्ष कृषि से इतर अन्य आय आधारित रोजगारों के लिये शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, क्योंकि वे विभिन्न तकनीकी प्रशिक्षण पा कर अन्य रोजगारों में अपना भाग्य तलाश सकते हैं, वहीं स्त्री पहले तो घर और बच्चों से बंधी होने के कारण, और फिर कम शिक्षित, अप्रषिक्षित /अल्पप्रषिक्षित होने के कारण तथा सम्पत्ति पर अनाधिकार के कारण कृषि अथवा असंगठित घरेलू श्रम पर ही निर्भर रह जाती है।



दूसरे, कुछ देशों  में ऐसा इसलिये और भी अधिक हुआ है कि वे वर्षों से युद्धरत हैं या फिर वहाँ एड्स की चपेट में आये पुरुषों की संख्या अधिक है।6 इस प्रकार स्त्रियों द्वारा सम्भाली जाने वाली कृषि सम्पत्तियों और परिवारों की संख्या (भारत में 20-35 प्रतिशत)7 प्रतिवर्ष अधिक होती जा रही है।तीसरे, क्योंकि जैविक व कई जेण्डरीकृत कारणों से स्त्रियों का जीवनकाल पुरुषों से सामान्यतः अधिक होता है तो वरिष्ठ नागरिकों में स्त्रियों की संख्या उम्र बढ़ने के साथ-साथ बढ़ती है और इनमंस अधिकांश  निराधार विधवायें होती हैं जो कुल मिला कर स्त्रियों में गरीबी अधिक पाये जाने का एक और कारण हो सकता है।फिर पुरुषों की आमदनी से चलने वाले घरों में भी परिवार की आर्थिक स्थिति भी इसी से तय होती है कि स्त्री को उस आय को खर्चने में स्वतंत्र निर्णय लेने का हक कितना है, चाहे परिवार को उस आमदनी के कारण गरीब न माना जा रहा हो। वैश्विक स्तर पर देखा जाये तो आज 41 प्रतिशत स्त्री-संचालित परिवार स्थानीय गरीबी की रेखा से नीचे हैं तथा एक तिहाई स्त्रियाँ बेघर हैं।9 बावजूद इसके कि विश्व के 50 प्रतिशत अन्न का उत्पादन स्त्रियाँ करती हैं, 47 प्रतिषत शारीरिक श्रम वाले कृषि कार्य वे ही करती हैं और कई विकासशील देशों में तो 80 प्रतिशत तक कृषि कार्य स्त्रियों पर थोपे जा रहे हैं।4 अब ऐसी स्त्रियों के लिये चल व अचल सम्पत्ति में कानूनी अधिकार न होने से समूचे परिवार के लिये रिहाइश, स्वास्थ्य, शिक्षा, जीविका के साधनों का संचालन व प्रबन्धन और बहुत बार जीवन की रक्षा तक करना बड़ी चुनौती बन जाता है। वैश्विक संदर्भों में इसे ‘निर्धनता का स्त्रीकरण8 नाम दिया गया है,स्त्रियों तथा बड़े परिप्रेक्ष्य में समाज के लिये स्त्री-सम्पत्ति अधिकारों का प्रभावी होना आज इसलिये महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि सम्पत्ति पर अधिकार जहाँ उन्हें अन्य कई जरूरी संसाधनों जैसे भोजन, स्वास्थ्य व शिक्षा पर भी हक़ दिलाता है वहीं सम्पत्ति का न होना उनके लिये अधिक विडम्बनापूर्ण हो जाता है क्योंकि बच्चों/बुजुर्गों के पालन पोषण की सारी जिम्मेदारी उन पर अकेले ही आ जाती है यदि पति इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ ले।

गरीबी की स्थिति आने पर पुरुषों और स्त्रियों के इस चुनौती को स्वीकारने के तरीके में बड़ा अन्तर देखा गया है। स्त्रियाँ सामान्यतः सिर्फ अपने लिये संघर्श नहीं करतीं, उनकी नजर में हमेशा पूरा परिवार होता है और परिवार का भार उन पर बढ़ते जाने के बावजूद, वे हार कर बैठने की अपेक्षा आमदनी का कोई न कोई जरिया ढूँढ़ लेती हैं, चाहे वह उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप न भी हो। इस क्षेत्र में हुये सभी अध्ययन दर्शाते हैं कि स्त्रियाँ अपनी कमाई का अधिकांश घर की आवश्यकताओं में खर्च करती हैं इसलिये सम्पत्ति व संसाधनों पर उनका सीमित अधिकार भी परिवार के आश्रितों को भुखमरी से बचाने में अधिक कारगर सिद्ध हुआ है।7
हालाँकि आर्थिक जगत के सामान्य नियमों के उलट, जिम्मेदारी को अधिक सम्भालने या ज्यादा घंटे काम करने के कारण उन्हें कोई विशेष निजी पुरस्कार, प्रतिष्ठा या आर्थिक लाभ प्राप्त नहीं होता और न ही उनकी अथक चेष्टाओं का कोई सामाजिक मूल्य आंका जाता है।5 अधिक श्रम स्त्रियों की निजी आर्थिक स्थिति में कोई सकारात्मक परिवर्तन नहीं ला पा रहा है, मेहनत का फल उनके लिये मीठा नहीं है। जिम्मेदारियों को किसी भी प्रकार निभा ले जाने और मुसीबतों से पलायन न करने के गुण ने अब उन्हें व्यक्तिगत तौर पर और भी नुकसान पहुँचाना शुरू कर दिया है क्योंकि अब सरकारें भी अपने गरीबी उन्मूलन कार्यक्रमों की सफलता के लिये उन्हीं पर अधिकाधिक निर्भर हो रही हैं और इस तरह उनके झुके हुये कंधों पर और भी बोझ डाला जा रहा है। सिल्वििया चेंट5 इसे निर्धनता का नहीं बल्कि ‘जिम्मेदारियों व मजबूरियों का स्त्रीकरण’कहती हैं। लाभ से श्रम-निवेश का यह सम्बन्ध-विच्छेद मूल व सार्वभौमिक आर्थिक सिद्धांतों का भयावह क्षरण है और बहुत बड़ी चिंता का विषय।

वहीं दूसरी ओर पुरुष न केवल परिवार को सिर्फ अपनी आमदनी से चलाने में अक्सर असमर्थ हैं बल्कि गृहकार्य तथा बाकी गैर कमाऊ कामों में उनकी हठीली गैरहिस्सेदारी भी पहले की ही तरह बनी हुई है। वे अपनी काहिली के चलते स्वयं को गरीबी हटाने की मुहिम से भी बचा ले रहे हैं, वह भी बिना कोई अधिकार खोये। सम्पत्ति पर पुरुष का परम्परागत अधिकार उसे वैश्वीकरण तथा भूमि आधिग्रहण की प्रक्रिया में सम्पत्ति बढ़ाने और उसे खर्चने की जो ताकत दे रहा है अधिकांश स्त्रियाँ उससे वंचित हैं।10 किशोर11 द्वारा सुझाये गये स्त्री-सशक्तीकरण के 32 सूचकांकों की सूची में से कुछ को ग्रामीण नेपाल में किये गये एक शोध में परखा गया और परिणाम बताते हैं कि स्त्री के परिवार में रुतबे को यदि छोड़ दें जो इनमें पहले स्थान पर है तो दूसरे स्थान पर शिक्षा व रोजगार के साथ सम्पत्ति में अधिकार भी स्त्री-सशक्तीकरण में बराबर की भूमिका निभाता है।12
संयुक्त राष्ट्र द्वारा समय समय पर की गई विभिन्न अंतरराष्ट्रीय घोषणाओं और प्रपत्रों की समीक्षा में स्त्रियों के सम्पत्ति व उत्तराधिकार से सम्बन्धित निम्न अधिकारों की पहचान की गई हैः13
-असमानता से मुक्ति
-जीविका एवं आवास की पर्याप्त स्तरीय सुविधा
-आर्थिक स्वाधीनता
-रोजगार का अधिकार
-सम्पत्ति रखने/उस पर दखल, प्रबन्धन व विक्रय का अधिकार
स्त्रियों के लिये संघर्षरत हर व्यक्ति को इन सार्वभौम अधिकारों का बोध होना चाहिये ताकि देश की नीतियों व कानूनों की पुनर्समीक्षा करते वक्त इन्हें चर्चा के केन्द्र में रखा जा सके। आज जब अधिकांश  जनतांत्रिक सरकारें अपने कानूनों व जनकल्याण कार्यक्रमों को स्त्री-पुरुष समानता की कसौटी पर कस रही हैं, अब भी निम्न बाधायें इस राह में खड़ी हैंः
-कई बार राष्ट्र सरकारों के हित इन मार्गदर्शक मानकों से मतभेद रखते हैं
-मात्र कानून बना देने से ही उन पर अमल होना अवश्यम्भावी नहीं होता जब तक कि प्रशासनिक-न्यायिक तंत्र उनके अनुकूल न हो
-सम्पत्ति के लिये वास्तविक संघर्ष सरकार से इतर यानि परिवारों और समुदायों के स्तर पर होते हैं जहाँ परम्परा व रीतिरिवाज संविधान व कानून से अधिक प्रभावी होते हैं। अधिकांश समाजों में स्त्रियों का अपने कानूनी हक जानना तक गवारा नहीं किया जाता, जताना तो दूर की बात है। यह बाधा सभी गरीब देशों में कमोबेष एक जैसी है और जहाँ भी न्यायपालिका ने सकारात्मक दिशा में कदम बढ़ाये हैं, कानूनों में मौजूद अस्पष्टता अथवा विरोधाभास अब भी इस स्वप्न के साकार होने पर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं कि विश्व की सभी स्त्रियों को सम्पत्ति के बराबर के अधिकार मिलें।

अब अर्थशास्त्री फिर एक बार यह दावा करने लगे हैं कि ‘गरीबी को रचने वाले व उस पर निर्भर व स्थायी बनते जा रहे आर्थिक ढांचों के विनाश  से ही गरीबी का स्थायी उपचार संभव है न कि गरीबों के लिये अस्थायी कल्याणकारी योजनाओं से।14  लेकिन यह सच तो हम हमेशा से जानते थे। हाँ, यह अवश्य हो सकता है कि खुली अर्थव्यवस्था के आने के बाद समृद्धि के नये मानकों को हासिल करने की धुन में इस सच को कुछ समय के लिये भुला दिया गया था क्योंकि हमें यह विश्वास दिला दिया गया था कि यह अर्थव्यवस्था अंततः गरीबी को नेस्तनाबूद कर देगी।

दरअसल हमें इस पुराने ‘घिसे पिटे तर्क की ओर बार-बार तब तक लौटना होगा जब तक हम उसे सार्वभौमिक सत्य मान कर उस पर काम शुरू नहीं करते। कार्य व सम्पत्ति का लोकतांत्रिक पुनर्वितरण ही समाज में पांव पसारे बैठी असमता को सदा सर्वदा के लिये हटा सकता है और इसके लिये कोई ‘शाॅर्ट कट नहीं है।

लेखिका  स्त्रीकाल के  सम्पादक मण्डल की सदस्य हैं. तथा महात्मा गाँधी आयुर्विज्ञान संस्थान, सेवाग्राम, महाराष्ट्र, में पैथोलॉजी  विभाग में प्राध्यापक हैं . संपर्क : anupamagupta@mgims.ac.in
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