विष्णु जी, ब्राहमणवाद से हमारी लड़ाई जारी रहेगी !

प्रमोद रंजन

( दलित -बहुजन संघर्षों और सपनों के लिए समर्पित पत्रिका का मासिक प्रिंट एडिशन बंद होने जा रहा है . जितना इस पत्रिका का प्रकाशन कयासों को जन्म दे रहा था उससे कम कयासों को जन्म नहीं दे रही है , इसके एक हिस्से के बंद होने की सूचना . पत्रिका के प्रिंट एडिशन का बंद होना निश्चित रूप से दलित -बहुजन -स्त्री आवाज के लिए क्षति है .  पत्रिका के सम्पादक प्रमोद रंजन इसके प्रकाशन और बंद होने के साथ जुड़े कयासों पर पहली बार विस्तृत जवाब दे रहे हैं . )

''यह होना ही था। यह एक रहस्य ही है कि आप इसे द्विभाषीय और इतना महंगा क्यों निकाल रहे थे। बिना सब कुछ जाने मैं ऐसे पत्रों में कुछ नहीं लिखता’’- विष्णु खरे, वरिष्ठ वरिष्ठ हिंदी कवि, पूर्व संपादक, नवभारत टाइम्स का ईमेल, 12 मार्च, 2016।  



यह लेख न लिखता, अगर विष्णु खरे जी का उपरोक्त मेल नहीं आया होता। फारवर्डप्रेस जैसी पत्रिका के लिए जगह बहुत कीमती चीज रही है। पिछले वर्षों में पांचजन्य,आर्गनाइजर जैसे आरएसएस के मुखपत्रों समेत भारी-भरकम बजट वाली ब्राह़्मणवाद की प्रचारक वेबसाइटें व दैनिक जागरण, पायनियर जैसे दक्षिणपंथी पत्र हमारे विरोध में निरंतर अभियान चलाते रहे हैं। जबसे उन्हें पत्रिका के कथित रूप से बंद होने की सूचना मिली है, वे फू ले नहीं समा रहे हैं। इन दिनों अति उत्साह में उनकी ओर से सोशल मीडिया पर लिखा जा रहा है कि चूंकि''मोदी जी ने एफ सीआरए के नये नियम बना दिये हैं, जिससे फारवर्ड की फारेन फंडिंग बंद हो गयी, इसलिए इन्हें पत्रिका बंद करना पड रहा है।’’पहले भी कई बार इनका उत्तर देने की इच्छा हुई। लेकिन हर बार लगा कि फारवर्डप्रेस में फुले-आम्बेडकरवाद को, समानता के विचार को, बढ़ाने के लिए जो जगह उपलब्ध है, उसका उपयोग इन कम महत्वपूर्ण कामों में करना उचित नहीं होगा। वैसे भी, उन्होंने किसको छोड़ा है? फूले, आम्बेडकर, कांशीराम, पेरियार - सभी पर उन्होंने फारेन फंडेड होने के आरोप लगाये हैं। जो कोई भी ब्राह्मणवाद का विरोध करे, वह फारेन फंडेडहै। आजकल सरकार में आने के बाद उन्होंने इस ‘फारेन फंडेड’ वाले आरोप को थोड़ा और घना कर दिया है। अब तो जो ब्राह्मणवाद का विरोध करे वह देशद्रोही है। हमारे लोग इन आरोपों के सच को खूब समझते हैं। हमें उन्हें इस बारे में कुछ भी बताने की आवश्यकता नहीं है। लेकिन मैं विष्णु खरे जी का क्या करूं? वे मेरे प्रिय कवियों में से रहे हैं। उनके तीन कविता संग्रह 'खुद अपनी आँख से’ (1978), 'सबकी आवाज के पर्दे में ‘(1994), तथा 'काल और अवधि के दौरान’ (2003) मेरी प्रिय काव्य पुस्तकों में शुमार हैं।
सवाल सिर्फ  विष्णु जी का भी नहीं है। उन्हें तो मैंने ईमेल से उत्तर भेज ही दिया है। लेकिन वे अकेले नहीं है, वे हिंदी साहित्य जगत की एक विचित्र मानसिकता का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसे मैंने पिछले पांच वर्षों में फारवर्ड प्रेस के लिए काम करते हुए महसूस किया है। लेखकों-कवियों का एक भरा-पूरा समुदाय है, जो न सिर्फ कूपमंडूक है, बल्कि हमेशा किम्कर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में रहता है। विचार के क्षेत्र में कुछ नया करने के इच्छुक हम जैसे लोगों के लिए कानाफू सी में माहिर यह समुदाय उनसे अधिक पीड़ादायक है, जो सीधे हमला करते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि इन कानाफूसियों का यथाशीघ्र अंत किया जाए। जिसे हमला करना है, पूरी तरह सामने आए। आंख में आंख मिलाकर बात करे।



विष्णु जी के उपरोक्त ईमेल का जो उत्तर मैंने भेजा है, उसे बताने से पहले मैं उनके साथ इससे पहले हुए ईमलों के आदान-प्रदान को आपके सामने रखता हूं। इससे आप समझ पाएंगे कि फांस कहां हैं। पिछले साल मैंने फारवर्ड प्रेस के लेखकों के गुगल ग्रुप (एक प्रकार का सामूहिक ईमेल) से साहित्य वार्षिकी की ई-कॉपी भेजी तथा सभी से आग्रह किया कि वे 29 अप्रैल को दिल्ली में आयोजित फारवर्ड प्रेस के वार्षिक समारोह सह वार्षिकी विमोचन कार्यक्रम में शामिल हों।  इसके उत्तर में विष्णु खरे ने 26 अप्रैल, 2015 को लिखा कि : ''आपका विशेषांक पूरा पढ़ गया। बहुत महत्वपूर्ण है। इस पर सारे समसामयिक हिंदी साहित्य को गर्व होगा। 29 अप्रैल के समारोह में आ तो न सकूँगा किन्तु मुझे मालूम है कि वह सार्थक और सफ ल रहेगा। (लेकिन) आप 'डी-ब्रह्मनाइजिंग हिस्ट्री’ लिखते हैं -'डिसवर्णनाइजिंग’ क्यों नहीं ?इससे तो दूसरे दोनों वर्ण बच निकलते हैं और लगता है सिर्फ ब्राह्मणों को टार्गेट किया जा रहा है।’’ - विष्णु खरे, 26 अप्रैल, 2015
इसके उत्तर में मैंने लिखा : 
''धन्यवाद विष्णु जी। आपके स्नेह भरे शब्दों के लिए आभारी हूं। हां, यह आपने कुछ हद तक ठीक ध्यान दिलाया है। अंग्रेजी में होने के कारण 'डी-ब्रह्मनाइजिंग’ हमारे इस पूरे संघर्ष को आम जनता के सामने ठीक से अभिव्यक्त भी नहीं कर पाता। इसलिए मैं इन संघर्षों को 'गैर-द्विज’ नाम से संबोधित करने का पक्षधर रहा हूं, या फि र सुविधा के लिए 'बहुजनों’ का संघर्ष। लेकिन 'डी ब्राह़मनाइजिंग’ का अर्थ भी वह नहीं है, जो आप ग्रहण कर रहे हैं।आप कार्यक्रम मे रहते तो बहुत अच्छा लगता। फ ारवर्ड प्रेस के लिए कभी कुछ लीखिए न!’’-प्रमोद रंजन, 26 मार्च, 2015
खरे जी का उत्तर उसी दिन आया : 
''हिंदी में 'गैर-द्विज’ एकदम मौजूँ है लेकिन अंग्रेजी में दुर्भाग्यवश द्विज के लिए twice-born’ चला हुआ है इसलिए उसमें ‘de-Dwijification’  अपरिचित लगता है और ‘twice-born’  से आप वैसी संज्ञा बना नहीं सकते। लेकिन उसका कोई हल खोजा जाना चाहिए।
भाई, यह तो शायद आप जानते होंगे कि मुझे मुम्बई के लिए दिल्ली छोड़े अब चार बरस हो गए हैं और यह पत्राचार भी मैं 29 अप्रैल को देश लौटने से पहले जर्मनी से कर रहा हूँ। आना असंभव ही था। आपके लिए लिखने की हसरत तो है लेकिन अभी खुद को उसके काबिल नहीं पाता।’’

हमारा पिछला पत्र (ईमेल) व्यवहार यहीं खत्म हो गया था। मैंने फारवर्ड प्रेस के लिए लिखने की उनकी हसरत और 'खुद को उसके काबिल न पाने’का कोई उत्तर नहीं दिया। कारण यह था कि उनकी यह बात मुझे उस समय भी अजीब लगी थी। मेरे लिए यह समझना कठिन था कि 'खुद को काबिल नहीं पाता’ का क्या अर्थ निकाला जाए। यह सच है कि हिंदी के अधिकांश साहित्यकार इस काबिल नहीं हैं कि वे फुले-आम्बेकरवाद को आत्मसात कर पाएं, उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि स्वयं ही इसमें बहुत बड़ी बाधा है। लेकिन इसके बावजूद कई ऐसे लेखक हैं जिन्होंने इस बाधा को पार किया है। लेकिन विष्णु खरे के लिखने का जो अंदाज था, वह यह नहीं था। अब उनका ताजा मेल मिलने के बाद मैं ज्यादा स्पष्ट हूं कि वे व्यंग्य ही कर रहे थे कि फारवर्ड प्रेस ही इस काबिल नहीं है कि उनके जैसा जर्मनी में रह रहा हिंदी साहित्यकार इसके लिए लिखे। जबकि देश-विदेश में साहित्येत्तर अनुशासनों में काम कर रहे अंग्रेजी-हिंदी के अनेक प्रमुख बुद्धिजीवी फारवर्ड प्रेस के लिए न सिर्फ लिखते हैं, बल्कि इसके द्वारा समाज और संस्कृति के नये पहलुओं पर किये जा रहे काम की खुले मन से सराहना करते रहे हैं। लेकिन हिंदी के साहित्यकार के लिए शायद यह सब ध्यान देने योग्य बातें नहीं हैं।



बहरहाल, यह भी कितना अजीब है कि विष्णु खरे जैसा हिंदी का एक बड़ा कवि इतना भी नहीं जानता कि ब्राह्मणवाद, डी-ब्रह्मनाइजिंग (अब्राह्मणीकरण) आदि फुले-आम्बेडकरवाद के अवधारणात्मक शब्द हैं, इसका उनकी जाति अथवा किसी भी जाति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। 'ब्राह्मणवाद’ शब्द सांस्कृतिक वर्चस्व के सहारे समाज पर कायम किये गये सामाजिक और आर्थिक वर्चस्व और इसके जरिए बहुसंख्यक आबादी पर अत्याचार और शोषण को व्यक्त करता है। इसी तरह, 'डी-ब्राह्मनाइजिंग’ का अर्थ है, वर्चस्व की इस विचारधारा से मुक्त होना। मसलन, हम कह सकते हैं कि राहुल सांकृत्यायन, मुक्तिबोध, राजेंद्र यादव, वीरभारत तलवार, उदय प्रकाश आदि के साहित्य में उनके 'डी-ब्रह़मनाइज्ड’ होने की प्रक्रिया दिखती है। वैसे भी, यह इतना नया शब्द नहीं है। माक्र्सवाद के जिन घरानों से विष्णु खरे संबंध रखते हैं, उनमें एक समय 'डी-क्लास’शब्द बहुत प्रचलित था। क्या उस समय उन्हें ऐसा महसूस हुआ था कि सिर्फ  उनके क्लास को टार्गेट किया जा रहा है?
क्लास और कास्ट में यही फर्क है। डी- क्लास का जुमला किसी के लिए परेशानी नहीं खड़ी करता लेकिन डी कास्ट होने में ब्राह्मणवाद सर पर सवार हो जाता है।

खैर, अब मुख्य प्रसंग पर लौटें। विष्णु जी के ताजा मेल का मैंने निम्नांकित विस्तृत उत्तर लिखा : 
''सम्माननीय विष्णु जी, फारवर्ड प्रेस का प्रकाशन बहुत महंगा नहीं था/ न है। बल्कि तुलनात्मक रूप से साहित्यक पत्रिकाओं से काफी सस्ता है। एक पत्रिका जो एक हजार प्रति छपती है, उनका प्रति कॉपी छपाई मूल्य काफी ज्यादा होता है। फारवर्ड प्रेस की अभी 10 हजार प्रतियां छपती हैं। प्रति कापी छपाई का मूल्य लगभग 11 रूपये पड़ता है, जबकि इसका कवर प्राइस 25 रूपया है। अगर आप 'रहस्य’ ही समझना चाहते हैं तो इसे ऐसे देखें :
1. फारवर्ड प्रेस सिर्फ 64 पेज की पत्रिका है, जिसके अब सिर्फ  8 पेज कलर होते हैं और इसकी कीमत इसके आरंभ होने के समय मई, 2009 से ही 25 रूपये है। पृष्ठ संख्या के हिसाब से यह 'मार्केट’ में इस श्रेणी की सबसे महंगी पत्रिका रही है। 100 से अधिक पेजों की फु ल कलर शुक्रवार 10 रूपये का था। लगभग 76 पेज का इंडिया टुडे (फुल कलर, बहुत महंगा कागज, उच्च सैलरी) 15 रूपये का था, जो अब बढ़कर 20 रूपया हुआ है। आप एक समय में नवभारत टाइम्स के किसी संस्करण के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। उम्मीद है आप इसका अर्थ समझते होंगे। इसका अर्थ है कि पत्रिका को खरीदने वाले उसकी सामग्री के कारण अधिक मूल्य का भुगतान करने को तैयार हैं। इसका अर्थ है कि पत्रिका विज्ञापन की बजाय अपने पाठकों पर निर्भर है।
2. हमसे बहुत कम प्रसार वाली पत्रिकाओं को अच्छे विज्ञापन मिल जाते हैं। कौन सी पत्रिका कितनी छपती है, यह आप भी जानते होंगे और मैं भी जानता हूं। (उन्हें विज्ञापन कैसे मिलते हैं इसका रहस्य वे ही जानें)। फारवर्ड प्रेस प्रेस को आठ साल के प्रकाशन के दौरान सरकारी/गैरसरकारी विज्ञापन बहुत कम मिले। (क्यों कम मिले, इसका कारण हम जानते हैं। इसका कारण है समाज के कोने-कोने में बैठा जातिवाद और प्रसार संख्या के बारे में किसी भी प्रकार का लिखित अथवा मौखिक झूठ न बोलने तथा किसी भी प्रकार की घूस न देने की फारवर्ड प्रेसके मालिकों - कोस्का दंपति - की प्रतिबद्धता)
3. पिछले वर्षों में बड़े-छोटे सभी शहरों में पत्रिकाओं की दुकानें बंद होती जा रही हैं। उनकी जगह पर रेस्त्रां और जनलर स्टोर खुल रहे हैं। यह काफी तेजी से हो रहा है। हालत यह है कि अनेक नामी और 'प्रतिष्ठित’ हिंदी-अंग्रेजी समाचार पत्रिकाएं प्रमुख दुकानों को सिर्फ  पत्रिका 'रखने’ के लिए 2 से 4 हजार रूपये प्रति माह पेमेंट कर रही हैं। यानी, वे दुकानें पत्रिकाओं की बिक्री के लिए नहीं, बल्कि विज्ञापनदाताओं को पत्रिका की उपलब्धता दिखाने के लिए चल रही हैं। सिर्फ  बिक्री के बूते चलने वाले फारवर्ड प्रेस के लिए दुकानों को यह भुगतान करना संभव नहीं है।
4. हमारी डाक व्यवस्था बदहाल है, हमें सदस्यों की ओर से पत्रिका न मिलने की शिकायतें बड़ी संख्या में मिल रही हैं। इसे ठीक करने के लिए डाक विभाग के विभिन्न फोरमों का दरवाजा खटखटा कर हम थक चुके हैं। ऐसे में नयी सदस्यता लेते हुए भी हमें एक अपराध बोध घेरता है। कुछ साल पहले तक जब चिटि़ठयां आया-जाया करतीं थी, तो लोगों का एक प्रकार का दवाब डाक व्यवस्था पर बना रहता था। अब वह लगभग पूरी तरह खत्म हो चुका है। 25 रूपये के एक अंक के लिए रजिस्टर्ड डाक अथवा कूरियर का खर्च न हम वहन कर सकते हैं, न ही हमारे पाठक।
5. फारवर्ड प्रेस का पाठक मुख्य रूप से दलित-आदिवासियों और पिछड़ों का वह तबका है, जो पिछले सालों में सरकारी नौकरियों, समाजिक-राजनैतिक कार्यों व छोटे-मोटे स्वरोजगारों के बूते 'मुख्यधारा/ मध्यम वर्ग/ निम्न मध्यम वर्ग’ में आया है। यह इन बंचित तबकों का क्रीमी लेयर है और इस बाजार में फारवर्ड प्रेस का कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं है। दूसरों की तुलना में फारवर्ड प्रेस की बहुत अधिक प्रतियां बिकती हैं और हर प्रति के कम से कम दस पाठक होते हैं। विशेषकर गावों और विश्वविद्यालयों में। यानी, हम अपने पाठकों के बूते इसे चला पा रहे थे। यह भारत के दक्षिण टोलों की पत्रिका है। पाठकों के खत्म हो जाने का रोना रोते रहने वाले हिंदी साहित्य की यह विडंबना ही है कि वह समाज के वंचित तबकों में अपनी हालत को समझने तथा उसका प्रतिकार करने के लिए पढऩे की भूख को समझ ही नहीं पाया। ऐसा प्रतीत होता है कि हिंदी का बुद्धिजीवी समाज और इस क्षेत्र की बहुंसख्यक आबादी अलग-अलग दुनियाओं के वासी हैं। बहरहाल, यह हमारा सौभाग्य ही है कि हमें पाठकों की कमी नहीं रही। एक ऐसे समय में जब बाजार में उपलब्ध अन्य पत्रिकाओं की बिक्री नाममात्र की हो रही है, फारवर्ड प्रेस की मांग निरंतर बढ़ रही थी, लेकिन हम अकेले दम पर ध्वस्त हो रही पत्रिका वितरण प्रणाली को तो नहीं ठीक कर सकते। यही फारवर्ड प्रेस के प्रिंट संस्करण को स्थगित करने का मुख्य कारण है।
6. हां, आपने द्विभाषी होने के बारे में पूछा है। फारवर्ड प्रेस के अनेक थोक खरीददार अंग्रेजी सिखाने वाले प्राइवेट संस्थान रहे हैं। इसके अलावा बड़ी संख्या ऐसे पाठकों की है, जिनका कहना है कि वे इसे पढ़कर अपनी अंग्रेजी ठीक करते हैं। यह भी एक कारण है कि विभिन्न यूनिवर्सिटी कैंपसों में हम लोकप्रिय रहे तथा अहिंदी भाषी राज्यों में भी पत्रिका के सदस्य अच्छी संख्या में हैं। एक और बात ध्यान में आती है। हिंदी लेखकों के मन में अंग्रेजी में अनुदित होने की तो बड़ी ललक रहती है। उनके लिए अंग्रेजी का मतलब यूरोप के प्रभावशाली लोग होते हैं। लेकिन इस देश में जो दक्षिण भारत है, वहां जो संघर्षरत लोग हैं, उन तक पहुंचने की कोई जिज्ञासा नहीं दिखती। ऐसा क्यों है, इसका रहस्य शायद आप बता पाएं।



विष्णु जी, उम्मीद है उपरोक्त बिंदुओं में मैंने आपके प्रश्नों का उत्तर दे दिया है, लेकिन यह भी नि:संकोच बताना चाहूंगा कि आपके मेल ने मुझे कहीं भीतर गहरी पीड़ा पहुंचायी है। बहरहाल, कोई बात नहीं। होता है। हम लोगों को यह सब सुनने-सहने, बार बार सप्ष्टीकरण देने की आदत डाल लेनी चाहिए।’-प्रमोद रंजन, 17 मार्च, 2016
कई दिन बीत चुके हैं, लेकिन विष्णु जी ने न तो मेरे मेल का कोई उत्तर दिया है, न ही मुझे पहुंची पीड़ा के लिए किसी प्रकार का खेद जताया है। बहरहाल, मैं उनसे यह भी पूछना चाहता हूं कि क्या उन्हें 'शुक्रवार’ का रहस्य मालूम है, 'तहलका’ का रहस्य मालूम है, 'द पब्लिक एजेंडा’ का रहस्य मालूम है, या फि र नवभारत टाइम्स का ही, जिसमें वे वर्षों तक नौकरी करते रहे? मुझे याद है कि कुछ वर्ष पहले आउटलुक (हिंदी) में पत्रकार दिवाकर ने विष्णु खरे पर आयी किसी किताब की समीक्षा लिखी थी। उस पर वे भड़क गये थे तथा एक लेख लिख मारा था, जिसमें उन्होंने दिवाकर पर उनकी कम उम्र के लिए तंज कसते हुए कहा था कि 'मैं उस समय से पत्रकारिता कर रहा हूं, जब तुम पैदा भी नहीं हुए थे।' दिवाकर ने उसका एकदम सटीक उत्तर देते हुए कहा था कि 'मैं उस समय पैदा नहीं हुआ था, इसमें मेरी कोई गलती नहीं है, लेकिन सच क्या है यह मैं जानता हूं’। वही बात मैं विष्णु जी को एक बार फिर याद दिलाना चाहता हूँ।

पाठकों और शुभचिंतकों से
पत्रिका के कथित तौर पर 'बंद’ होने की सूचना पहुंचने के बाद आर्थिक सहयोग देने के इच्छुक लोगों के फोन और मैसेज मुझे लगातार आ रहे हैं। दूर-दराज क्षेत्रों से आने वाले इन फोन काल्स में से कुछ तो इतने भावुकतापूर्ण होते हैं कि कई बार तो लगता है कि हमने सचमुच कोई गलत निर्णय तो नहीं कर लिया। लेकिन जैसे ही मैं उन्हें पूरी योजना के बारे में बताता हूं वे बहुत हद तक आश्वस्त हो जाते हैं। मैं उन्हें बताता हूं कि पत्रिका का प्रकाशन स्थगित किया गया है, 'बंद’ नहीं। इसके सुचारू संचालन के लिए हमें अपनी वितरण प्रणाली बनानी होगी, जो तभी संभव है जब या तो सामाजिक संगठनों का व्यापक सहयोग मिले,या फिर बड़ा पूंजी निवेश हो। अगर भविष्य में ऐसा हो सका तो हम पुन: इसके प्रिंट संस्करण का भी प्रकाशन करेंगे।
छोटे शहरों के पाठकों के संदेशों से ऐसा लगता है कि वे यह समझते हैं कि इस पूरे घटनाक्रम से उनकी तरह, मैं भी बहुत दु:खी हूं। मै उन्हें बताता हूं कि जून के बाद से आपकी यह प्रिय संपादकीय टीम फारवर्ड प्रेस की वेबसाइट को भारत का सबसे विचरोत्तेजक वेब-स्थल बनाने में जुट जाएगी।

मैं 'प्रिंट’ को लेकर कतई नॉस्टलजिक नहीं हूं। लिखने के, छपाई के, ज्ञान के प्रसार के कितने माध्यम बदले हैं। कभी शाल पत्रों पर लिखा जाता था, फिर चमड़े पर, फिर कपड़े पर, विगत लगभग चार सौ सालों से कागज पर लिखा जा रहा है। और अब वेब पर। ज्ञान की दुनिया में आने वाले दशक वेब के ही होंगे। हमें कागज का मोह छोडऩा ही होगा। लिखा भी जाएगा, किताबें भी रहेंगी, पत्रिकाएं भी, पुस्तकालय भी रहेंगे लेकिन कागज पर छपी हुई चीजें सिर्फ  संग्रहालयों में ही देखी जा सकेंगी, जैसे हम आज शाल पत्रों पर लिखीं गयीं पाण्डुलिपियां वहां देखते हैं।

प्रिंट संस्करण के पाठक सवाल उठाते हैं कि गांवों और छोटे शहरों के लोगों की पहुंच अभी वेब तक नहीं हैं। जहां यह सुविधा है भी, वहां अधिक उम्र के लोग वेब पर जाने को तैयार नहीं हैं। मैं उन्हें कहता हूं कि मोदी जी के भक्तगण भले ही हमें अपना दुश्मन समझते हों, लेकिन मोदी जी हमारा एक काम जतन से कर रहे हैं। उनका 'डिजीटल इंडिया’ प्रोजक्ट ठीक-ठाक प्रगति कर रहा है। आप लोग सिर्फ  यह ध्यान रखें कि मोदी जी रहें या जाएं, डिजीटल इंडिया न रूके। यह भारत में ब्राह्मणवाद के नाश की दिशा में बहुत बडी छलांग साबित होगा।
इस बात पर हमारे प्रिय पाठक हंसते हैं, लेकिन यह जानकर कुछ आश्वस्त भी हो जाते हैं कि फारवर्ड प्रेस का वेब संस्करण चलता रहेगा और कहते हैं कि ठीक हैं हम वहां से प्रिंट आउट निकलवा वितरित करवाया करेंगें। मैं कहता हूं कि आपको इसकी जरूरत नहीं पड़ेगी। फारवर्ड प्रेस सिर्फ  वेब पर ही नहीं होगा। हम हर तीन महीने पर आठ किताबें भी छापेंगे। चार हिंदी में और चार अंग्रेजी में। वेब पर आने वाले सभी महत्वपूर्ण लेख विषयवार इन किताबों में संकलित होते जाएंगे। यानी अगर आप मासिक प्रिंट पत्रिका के हिसाब से देखते हों तब भी आपकी इस प्रिय पत्रिका का विस्तार ही हुआ है। इस पर वे हंसते नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज की खनक बता देती हैं कि इस जानकारी से उन्हें सचमुच राहत मिली है। मैं उन्हें बताता हूं कि हर किताब लगभग 128 पेज की होगी तथा कीमत होगी सिर्फ 100 रूपये। जितनी अधिक प्रतियां हो सके मंगवाइए। यह हमारे लिए सबसे बड़ा सहयोग होगा। अगर आप इसके अतिरिक्त भी आर्थिक सहयोग कर सकने में सक्षम हैं तो उसके लिए अब हमारी वेबसाइट पर 'सहयोग’ बटन होगा। आप उसके माध्यम से बहुजन पत्रकारिता का और विस्तार करने में हमारी मदद कर सकते हैं।



अपने इन पाठकों को मैं यह भी बताना चाहता हूं कि फारवर्ड प्रेस के प्रिंट संस्करण में हमारे पास सिर्फ 64 पेज होते थे। उसमें भी हिंदी और अंग्रेजी, दोनों। कवर पेज, विषय सूची आदि से जो जगह मूल सामग्री के लिए बचती है, वह बमुश्किल 28-30 पेजों की होती है। मई, 2011 में इस पत्रिका से जुडऩे के बाद मैंने पहला काम यह किया था कि इसके दो पृष्ठों में चल रहे 'पाठकों के पत्र’ वाले कॉलम को बंद कर दिया था। यह निश्चित रूप से उन पाठकों के प्रति अत्याचार था, जो प्रकाशित लेखों के प्रति अपनी भावनाएं व्यक्त करना चाहते थे। लेकिन उस कॉलम को जगह की बचत करने के लिए बंद करना पड़ा था। यही कारण रहा कि मैंने भी खुद हर अंक में लिखने की बजाय फूले-आम्बेडकरवादी विचारों के आधार पर समसामयिक समस्याओं पर शोधपूर्ण लेखन करने  वाले नये-पुराने लोगों को अधिकाधिक जगह देने की कोशिश की। लेकिन अब वेब पर जगह की किल्लत खत्म हो जाएगी। वहां खूब जगह होगी, आपके लिए भी और मेरे लिए भी। तो आइए, जून केबाद चलें एक नयी यात्रा की ओर।

हां, मैं आपको यह भी बताना चाहूंगा कि पत्रिका के प्रिंट संस्करण के स्थगित हो जाने के बाद हम पुस्तकों के प्रकाशन के लिए अब हम देश और विदेश, दोनों जगहों से सहयोग स्वीकार करने सकेंगे। हम आम्बेडकरवादी संगठनों/व्यक्तियों तथा समान विचारधर्मा अन्य संगठनों से अपील करेंगे कि वे हर संभव सहयोग के लिए आगे आएं तथा भारत का पहला व्यावसायिक बहुजन प्रकाशन गृह खड़ा करने में हमारी मदद करें।

प्यारे विरोधियों के नाम

मैं जानता हूं कि उन लोगों को मेरे इस लेख से बड़ा आघात लगेगा जो यह मानकर खुश हो रहे थे कि फारवर्ड प्रेस बंद होने जा रहा है। लेकिन मैं उन्हें कहना चहता हूं कि मित्र, फारवर्ड प्रेस आपके विरोध में नहीं है। ब्राह्मणवाद और मनुवाद का विरोध करना आपका विरोध करना नहीं है। आज जो आजादी आप और हम महसूस कर रहे हैं, वह इसी कारण है, क्योंकि इस देश में ब्राह्मणवाद और मनुवाद कमजोर हुआ है। इन व्यवस्थाओं के कमजोर करने का अर्थ है समाज में, परिवार में - सब जगह व्यक्ति की आजादी सुनिश्चित करना। आप युवाओं को आज जो आजादी हासिल है, वह भी इसी का नतीजा है। आपके दुष्प्रचारों का उत्तर भी आज दे ही देता हूं। आप कह रहे हैं कि फारवर्ड प्रेस इसलिए बंद हो रहा है कि मौजूदा सरकार ने स्वयंसेवी संगठनों (एनजीओ) को विदेशी फंडिंग के लिए बने 'एफ सीआरए’ नियम में कुछ बदलाव किये हैं। प्रिय भाई, फारवर्ड प्रेस एक पत्रिका है, कोई एनजीओ नहीं। फारवर्ड प्रेस को एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी चलाती  है। कंपनी एक्ट में प्रावधान है कि कंपनियां किसी प्रकार का - देशी अथवा विदेशी - अनुदान नहीं ले सकतीं। समाचार व सम-सामयिक मुद्दों पर केन्द्रित पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश पर 25 प्रतिशत की ऊपरी सीमा निर्धारित है। फारवर्ड प्रेस के प्रिंट एडिशन के लिए जो भी छोटी सी पूंजी रही है, वह मुख्य रू प से निदेशकों की रही है।



प्यारे विरोधियों, यह अपील आपके लिए भी है। आइए, हम को भारत को एक समतामूलक समाज के रूप में वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित करें। 
पुनश्च,

काश! यह फारवर्ड प्रेस में मेरा अंतिम लेख होता, तो मैं इसमें प्रधान संपादक श्री आयवन कोस्का और श्रीमती कोस्का के बारे में विस्तार से लिखने की अपनी इच्छा पूरी कर पाता। लेकिन अभी शायद हमें लंबे समय तक साथ काम करना है और अभी मैं जो कुछ भी लिखूंगा, वह एक अधूरा संस्मरण ही होगा। बहरहाल, इतने समय तक साथ काम करने बाद इतना तो कह ही सकता हूं कि जितना कठिन श्री कोस्का के उच्च लोकतांत्रिक और मानवीय मूल्यों की मिसाल मिलनी है, उतना ही मुश्किल श्रीमती कोस्का जैसी त्यागमयी महिला ढूंढना है। इस पत्रिका को जीवित रखने के लिए उनके द्वारा उठाये गये आर्थिक और शारीरिक कष्टों को मैंने देखा है। प्रिंट संस्करण में काम करते हुए न जाने कितनी बार कोस्का दंपत्ति और मैं एक दूसरे से असहमत हुए होंगे। लेकिन ऐसा एक बार भी नहीं हुआ, जब मुझे हारने के लिए मजबूर होना पड़ा हो। संपादकीय स्वतंत्रता के पतन के इस दौर में तो यह विरल ही है। संभव है श्री कोस्का आगामी अंक में पत्रिका के प्रिंट संस्करण से जुड़े अपने अनुभव लिखें। पाठकों के लिए, तथा स्वयं मेरे लिए भी वह कहीं अधिक उपयोगी होगा।

प्रमोद रंजन दिल्लीि से प्रकाशित भारत की पहली संपूर्ण द्विभाषी पत्रिका फारवर्ड प्रेस के सलाहकार संपादक हैं। यह पत्रिका फूले- आम्बेंडकरवाद के प्रति पक्षधरता के कारण चर्चित रही है। पत्रिका का वेब पोर्टल आप यहां देख सकते है - https://www.forwardpress.in/संपर्क : janvikalp@gmail.com
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