स्त्री, आस्था और धर्म

सविता खान 

इस आधुनिक राष्ट्र-राज्य में आधुनिकता और आधुनिक परम्पाओं, (परम्पराओं नहीं) के बीच जंग का एक बेहतरीन नमूना अभी हाल ही में  स्त्रियों  के शनि मंदिर प्रवेश सम्बन्धी विवाद के तौर पर सामने आया।  वेदांत दर्शन में किसी भी वैचारिक टकराव के निपटारे के लिए तीन तरीके सुझाये गए: वाद, विवाद और वितंडा। इस टकराहट में विवाद हुआ, वितंडा हुआ पर वाद की सम्भावना ही नहीं बनी और यह हमारे नव-न्याय की परंपरा को रचने वाले देश, अमर्त्य सेन की आर्ग्यूमेंटीटिव इंडियंस की साँचे में नहीं दिखी। मसले कुछ और भी रोचक बनेंगे जब कुछ मूल प्रश्नों की तरफ गौर किया जाए, मसलन शनि देव कौन हैं, क्या वह सचमुच न्याय के देव हैं जैसा कि पुराणों में वर्णित है और यदि वे हैं तो फिर न्याय की परंपरा क्या है? दूसरा की क्या आस्था और धर्म किसी मंदिर से बंध सकते हैं भले ही वह मंदिर न्याय के देव का क्यों न हो? तीसरा कि क्या स्त्रियों  का शनि- मंदिर प्रवेश व निषेध भारत के हर प्रदेश का एक सार्वभौमिक सत्य है तो फिर भारत के अन्य क्षेत्रों में स्त्रियां उन्हें कैसे  पूजतीं हैं, देश की राजधानी  दिल्ली  के हर चौक-चौराहे पर भगवान शनि, चंद सिक्कों के व्ययवसाय के लिए क्यों धडल्ले  से इस्तेमाल किये जाते हैं उन्हीं महिलाओं द्वारा, बच्चों द्वारा जो रोटी को हर रोज तरसते हैं, क्या यही धर्म है इस नए राष्ट्र-राज्य का कि मंदिर प्रवेश तो हो पर महिलायें और बच्चे आज़ादी के सत्तर साल बाद भी भीख की रोटी खाएं ? धिक्कार है ऐसे रैशनल पर जो न तो भूख की चुनौती से निपट पायी और ना ही आस्था को संदर्भित कर सकी।



मुद्दे और भी हैं कि जिस प्रदेश में यह 'क्रांति' किसी भूमाता ब्रिगेड( जो मंदिर प्रवेश करते-करते ही तीन टुकड़ों में बंट गयी, इसके तीन कोर सदस्यों ने अपने प्रेजिडेंट तृप्ति देसाई के 'ऑटोक्रॅटिक' व्यवहार के विरोध में भूमाता स्वाभिमानी संगठन की घोषणा कर दी) द्वारा शुरू की गयी उसका बैकग्राउंड क्या था? क्या इसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध रेशनलिस्ट दाभोलकर द्वारा सं 2000 ई में शनि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ा था, क्या हमारा आधुनिकता से जन्मा 'रैशनल' महिलाओं के लिए यही रोडमैप तैयार किये बैठा है,  जिसमें राज्य को इस 'आंदोलन' को ट्वीट द्वारा समर्थन (मुख्यमंत्री फडणवीस की समर्थन ट्वीट) और कानून और व्यवस्था के तहत उन्हीं महिलाओं को पुलिस द्वारा जबरन रोके जाने के मायाजाल में फंसा रहेगा? और भी रोचक सन्दर्भ हैं इसके, कमोबेश इसी समय एक शक्तिशाली दलित महिला नेता जब मंदिर प्रवेश को लेकर भीषण मानवाधिकार हनन का रोना संसद में रो रही थीं तो दूसरी दलित/पिछड़ा महिला नेता जो उसी प्रदेश से सम्बन्ध रखतीं हैं जहाँ यह वितंडा खड़ा किया जा रहा था, खुलेआम परंपरा को बचाने की आपाधापी में महिला मंदिर प्रवेश के खिलाफत में उतर  आयीं, यहाँ महिला, मंदिर और सत्ता का एक ऐसा कॉकटेल बना जिसमें अधिकार, आस्था और सशक्तिकरण अपने वैलिडिटी की नयी परंपरा चुनते नज़र आये जो अब लोक नहीं राज्य तय करेगा।

 क्या लोक की सत्ता जिसका जन-आंदोलन से काफी गहरा और सत्यापित रिश्ता है इस नौटंकी के बीच कहीं बहुत बुरी तरह से मात खा गयी? क्या यह प्रकरण ओरवेल लिखित एनिमल फार्म के आखिरी दृश्य की तरह प्रतीत हुई , जहाँ चेहरों को पहचानना मुश्किल हो गया कि आखिर स्त्री के मुद्दे क्या और उसके संरक्षक कौन।  इस सबके बीच द हिन्दू अखबार के अनुसार आंध्र प्रदेश के एरदानुर गाँव में. २०१३ ई में  सबसे बड़े शनि मूर्ति (गिनीज़ वर्ल्ड बुक) की  स्थापना करते वक़्त उसके संस्थापक ठाकुर सूर्य प्रताप सिंह का शनि के इर्द-गिर्द 'बैड ओमेन' की भ्रान्ति को ख़ारिज करते हुए उनका आधुनिक न्याय व्यवस्था से सम्बन्ध का पैरेलल रचना( वकीलों के काले कोट और शनि के काले रंग में) भी कम आशंकित नहीं करता कि क्या जिस तरह शनि के किसी छोटे से चबूतरे पर जहाँ तेल के फिसलन के सिवा कोई मानवीय मूल्य  निवास नहीं करता, जहाँ स्त्रियों  का प्रवेश वर्जित है (अब पुरुषों का भी), क्या वैसी ही विडम्बना न्याय के मठों में भी पलता  है जहाँ कानूनी धाराएं तो बसतीं हैं पर न्याय की आस्था, सामान्य लोक का प्रवेश  दिन ब दिन जर्जर होकर, क्रूर अ-न्याय बनतीं जा रहीं हैं।  स्त्रियों  के आस्था के द्वार और मठ जो लोकायत की विशाल परंपरा ने सदियों पहले इसी भूभाग पर मजबूती से स्थापित किया था, जिसमें न्याय का सेक्रेड स्त्री व्यक्तिगत तौर पर तय कर सकती थी, मोक्ष या मुक्ति का रास्ता तंत्र के विशाल प्रसार ने सद्यः खोल रखा था, उसका आखिर इन मंदिर-प्रवेश जैसे तुक्ष मुद्दों से क्या मुकाबला?



यदि पश्चिमी विद्वान ह्यूघ बी अर्बन को माना जाए तो वो तंत्र को यूरोपियन कोलोनाइज़र्स, ओरिएंटलिस्ट्स और विक्टोरियन माइंडसेट के क्रिस्चियन मिशनरीज के एक्सोटिक चोंचले से निकालकर उसके मात्र  सेक्सुअ लिटी एंगल  से परे, स्त्रियों  के दैवी, अन्तर्निहित विशाल शक्तिपुंज, मानवीय शरीर, कॉसमॉस और राजनीतिक समाज के बीच एक सतत धारा के तौर पर देखते हैं। इस कॉसमॉस की शक्तिपुंज को, तंत्र की मुक्तिदायिनी को, टैगोर की चण्डालिका को आनंद से, बौद्ध धर्म से, शनि हिन्दू मंदिर से किस याचना की जरूरत पड़  गयी? थोड़ी  और विशालता की तलाश में,  वेंडी डोनिगर इस लोक के संसार को एक विशाल सांस्कृतिक धरोहर के तौर पर देखतीं हैं जो कर्मकांड की दुनिया से कहीं आगे की चीज़ थी, परिष्कृत और परिमार्जित थी, आखिर हमने उन्नीसवीं शताब्दी के उपरान्त समाज सुधार के नाम पर सिर्फ धार्मिक धाराओं को सनिटाइज़ ही तो किया वर्ना क्या मजाल थी इन मंदिर रूपी क्लबों की कि वे उस विशाल लोक की अधिकारी से उसका काया प्रवेश अधिकार छीन लें?  यह नए परम्पराओं की मायाजाल है जिसमें उलझ कर कम से कम स्त्रियों  को तो निषेध के सिवा कुछ और  नहीं मिलेगा।

लेखिका 'इतिहास' की विदुषी हैं . संपर्क : savita.khan@gmail.com
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