क्या ऐसे ही होगी 'थियेटर ओलम्पिक 2018' की तैयारी ?

कविता 

भारतीय रंग महोत्सव के शेष दो दिन बचे हैं . कथाकार और सांस्कृतिक पत्रकार कविता नाट्य प्रेमियों का ध्यान खीच रही हैं इस ओर

मंडी हाउस हमेशा से कला,संगीत, और नाटक प्रेमियों की पसंदीदा जगह रही है.पर आजकल यह (भारंगम) की सुगंध से महक रहा है.दीवारों को ढकते हुए नाटकों के चित्र और पोस्टर ,वातावरण में गीतों-आवाजों की गूँज बताते हैं कि कुछ ख़ास जरुर है. जो यहाँ चल रहा हैं. सोंधी धूप, ताजी हवा हर तरफ रंगीनी और चहकते चेहरे यदि ये सब आपको पसंद है तो एक दिन जरुर होकर आयें राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से. यहाँ की फिजां आपके भीतर ख़ुशी और मुस्कान घोल देगी.जिन्दगी में रंगों, और भावनाओं का महत्व बताएगी.



यहां जाने के लिए आपका नाटक प्रेमी होना भी जरुरी नहीं,यदि आप गीतों, गजलों, कव्वाली,लोकगीत और लोक-नृत्य और सूफी संगीत के शौक़ीन हैं. जादू देखना अगर पसंद है आपको.तो एक दिन जरुर होकर आयें इधर से.दिन भर अलग-अलग जगह बने खूबसूरत मंचों पर यहाँ कोई–न–कोई कार्यक्रम होता मिल जाएगा. यहाँ ‘थियेटर-बाजार’ नामक एक रंग-बिरंगा बाजार भी है,जहाँ ब्यूटी –पार्लर से लेकर दैनिक जीवन में इस्तेमाल होनेवाली बहुत सारी वस्तुएं मिल जायेंगी.लोगों की भीड़ जहाँ- तहां बैठकर इन वस्तुओं का,संगीत का आनद लेती मिल जायेगी. इस सबमें भी अगर मन न रमे तो आप फिल्मों और नाटक से एक साथ जुड़े हुए बड़ी-बड़ी हस्तियों से मिल सकते हैं.नाटक और अभिनय से जुड़े अलग-अलग मुद्दों परउन्हें सुन सकते हैं-बहुमुख में रोज चलटी हुई श्रृंखला –लिविंग लीजेंड, मास्टर क्लास, वर्ल्ड थियेटर फोरम और राष्ट्रीय सेमीनार के तहत.विशिष्ट पकवानों की एक लम्बी सूची यहाँ उपलब्ध है,जहां ब्रांडेड खाध्य सामग्री से ज्यादा लिट्टी-चोखा,  परांठे,चायनीज,साउथइन्डियन, जलेबियाँ-पकौड़ियाँबिक रही हैं. अगर इनकी गंध आपके मुंह में पानी न ला दें तो आप कह सकते हैं,स्वाद का आपके जीवन में उतना महत्व नहीं.

किताबों ,पोस्टरों, आयुर्वेदिक् सौन्दर्य प्रसाधनों, कशीदाकारी वाले और राजस्थानी-गुजराती दुपट्टे-कुरते, लाख की चूड़ियां-बूंदे बहुत कुछ मिलेगा एक साथ यहां,जिसके लिए आप अलग -अलग जगह भटकते फिरेंगे.
और किताबों-पत्रिकाओं के लिए बहुत सारे प्रकाशन- गृहों के स्टाल भी.जाहिर है यह सबकुछ नाटक के लिए इस्तेमाल होनेवाली चीजें हैं, उससे सम्बंधित क्रॉप्स पर इनका उदेदेश्य यहाँ के बच्चों के लिए  पहले भले ही उनकी जरुरत की चीजें कैम्पस में ही उपलब्ध करना रहा हो , पर अब यह आम लोगों के लिए भी खरीद-बिक्री और ध्यान आकर्षित करने के लिए ,उन्हें यहाँ बांधकर लाने के लिए है.



नाटक प्रेमियों लिए तो यूं भी  यह जगह काबा जैसा ही है हमेशा से, पर अभी 1 फ़रवरी से 21 फ़रवरी तक यानी तीन सप्ताह तक चलनेवाला यह नाट्य-समारोह अभी आकर्षण का सबसे बड़ा केंद्र है., जिसमें देश-विदेश और हर भाषा और प्रदेश के नाटक सम्मिलित हैं .यह खासा दिलचस्प  आयोजन रहता आया है,हमेशा से. पर इसकी इस बार की विशेषता यह है कि यह हर बार की तरह अंग्रेजी नाटकों और आभिजात्य वर्ग को केंद्र में रखकर नहीं रचा गया. यह यहाँ प्रदार्शित 80 बहुभाषिक नाटकों को देखकर भी कहा जा सकता है,और यहाँ की अभूतपूर्व  साज-सज्जा देखकर भी.सजावट में लालटेनों,परान्दों ,कागजी रंगीन झंडियों, नाटककारों की रंगीन लाईटों के साथ लटकती और क्ले((मिटटी) से बनी आदमकद  जानवरों की सजावटी मूर्तियों को देखकर भी कहा जा सकता  है. और बैठने के लिये खुले में रखे गए मूढे. कैम्पस दीवारें नाटकों के चित्रों-तस्वीरों से भरी हुई,खुशबू  देते रंगबिरंगे फूल.कुल मिलाकर कहें तो एक ग्रामीण या लोक-कलाओं वाला अंदाज  यह विशेष अंदाज इसे एक अनोखा रंग-रूप प्रदान करता है.

पर इसके विपरीत दुखी करनेवाली बात यह कि इन नाटकों के प्रचार-प्रसार में इस बार कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं जताई गई.हर बार के उलट इस बार नाटकों से ज्यादा अहमियत सेलिब्रेटीज (शख्सियतों) को दी गई.शायद इसलिए भी की नाना पाटेकर,अनुपम खेर,पंकज कपूर,नीना गुप्ता,,सौरभ शुक्ला, एम .के.रैना, सुषमा सेठ और इन जैसे तमाम राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से कभी के जुड़े नाम भीड़ खुद जुटा लेंगे, यह भरोसा इस विश्वास की वजह हो. और तो और नाना पाटेकर को बुलाये जाने की वजह मुझे कुछ ख़ास समझ में नहीं आई.जबकि उनका कोई नाटक नहीं था इस महोत्सव में. क्या सिर्फ इसलिए कि वे नाटकों से ही फिल्म में आये थे.या इसलिए की हाल-फिलहल उन्होंने ‘नटसम्राट’जैसी रंगकर्म पर आधारित फिल्म की है.जबकि नाना ने खुद ही कहा कि पिछले 15 सालों से उन्होंने कोई नाटक नहीं किया.अपने फिल्म को प्रमोट करते हुए नाना पाटेकर ने कहा –इस फिल्म ने मेरे भीतर का सबकुछ ले लिया, अब फिर से जमा होने में वक़्त लगेगा.



नाना का जादू लोगों पर अभी भी चलता है,उनके स्वागत में जुटी जनता और उनके बोलने को मंत्रमुग्ध सुनते दर्शकों को देखकर कहा जा सकताथा.अनुपम खेर ने अपनी बातचीत में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पुरानी यादों को ताजा करते हुए अपने संघर्ष के दिनों की बातें की.पंकज कपूर की ‘दोपहरी’ को सुनते हुए लोग निराश हो रहे थे.कारण यह कि वे अपना पाठ भूल रहे थे, और बार-बार दर्शकों ने उन्हें इस कहानी का पाठ करते हुए सुना है. यह दुखद है कि पंकज कपूर जैसा समरथ अभिनेता अपने पहले प्रेम नाटक के लिए वर्षों से एक नई कहानी,या फिर कोई नया पीस तैयार नहीं कर सका.

अंततः सबसे दुखद पक्ष यह कि पत्रकारों और आम लोगों के समूह को मांगने पर भी टिकट या पास नहीं मिलना. यह वही रंगमंच है जो साल भर दर्शक न होने, खासकर टिकट खरीदकर नाटक न देखने वाले दर्शकों का रोना आये दिन रोया रहता है. उन्हीं दर्शकों की ऐसी अवमानना सचमुच एक  दुखद स्थिति है.जिस नाटक में भीड़ उमड़ने की संभावना पहले से ही हो, उस नाटक के लिए बड़े मंच को उपलब्ध न करा पाना अफसोसजनक है. शायद भविष्य में मिल पाने वाले180 करोड़ रुपये के प्रस्तावित बजट से इस दिशा में कुछ बेहतर हो सके. शायद  फिर आधुनिक तकनीकों से युक्त उस बड़े प्रेक्षागृह को उपलब्बध कराया जा  सके जो अभी तक सिर्फ प्रस्तावों में है. उम्मीद यह है कि प्रस्तावित ‘थियेटर ओलम्पिक 2018 ’  तक ये सारी योजनाएं अपना प्रारूप ले सकेंगी.

लोकगायक और नाटककार संभाजी भगत पूछते हैं कि क्या वजह है कि हिन्दी क्षेत्र में नाटकों का अपना दर्शक वर्ग तैयार नहीं है , जिसके बीच प्रोफेशनली नाटकों की प्रस्तुति हो सके . वही एन एस डी के निदेशक वामन केंद्रे इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि अपने कार्यकाल में वे बहुत कुछ बेहतर कर सकेंगे. 

लेखिका हिन्दी की चर्चित कथाकार हैं . इन दिनों ऑनलाइन हिन्दी पोर्टल 'सत्याग्रह' के लिए काम कर रही हैं . सम्पर्क : kavitasonsi@gmail.com
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