रतन थियाम का रंगकर्म : कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय का प्रदर्शन”

मंजरी श्रीवास्तव

इस समीक्षात्मक आलेख में  युवा नाट्य समीक्षक मंजरी श्रीवास्तव ने ‘मैकबेथ’ के बहाने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम  की पूरी नाट्य प्रक्रिया पर विस्तृत बात की है. मंजरी के शब्दों में  रतन थियाम का पूरा नाट्यकर्म “कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय का प्रदर्शन” है.
           
18वें भारत रंग महोत्सव की शुरुआत किसी नाटक से नहीं बल्कि विश्व स्तर पर भारतीय थिएटर को प्रतिष्ठित करनेवाले थिएटर के जादूगर रतन थियाम के जादू, उनके तिलिस्म  ‘मैकबेथ’ से हुई. वैसे भी इस बार के भारत रंग महोत्सव की थीम ही है - “थिएटर के जादू की फिर से खोज” और जब उद्घाटन ही अगर ऐसे बेजोड़ तिलिस्म से हो तो फिर क्या कहने !



रतन थियाम का यह नाटक किसी एक बिंदु या किसी एक चरित्र या किसी एक संवाद से शुरू नहीं होता बल्कि यह अपनी परिधि में पूरे उस माहौल को समाहित और व्याख्यायित करता हुआ चलता है जो किसी काले घने जंगल की जंगली पुकारों से परिपूर्ण है. वस्तुतः इस नाटक का मूल स्वर ही जीवंत वनस्पतियों की हरी-नीली रोशनी एवं विचित्र ध्वनियों का संगम है,  जो मैकबेथ के चरित्र को चुड़ैलों-सा जामा पहनाती है. यहाँ चुड़ैलें सिर्फ़ चुड़ैलें नहीं हैं वे वैश्विक स्तर पर हमारे उस देश-काल का प्रतिनिधित्व करती हैं,  जहाँ जीवन पर संकट है, हमारी वन-सम्पदा पर संकट है, हमारी प्रजातियों पर संकट है और यह संकट दिनोंदिन गहराता जा रहा है. चुड़ैलों की देह पर गिरती-उठती हरी-नीली रोशनियों और उनकी विचित्र और हृदय-विदारक ध्वनियों से नाटक की शुरुआत होती है जो प्रत्यक्षतः कहानी के कथ्य के हिसाब से तो मैकबेथ और उसके साथी बैंको के लिए शुभ सूचनादायी है पर अप्रत्यक्ष रूप से हमारी पारिस्थितिकी पर मंडरा रहे खतरे को भी इंगित करता है. कुछ भाववाचक संज्ञाएँ जैसे महत्वाकांक्षा, लालच, सत्ता की भूख एवं उससे उपजनेवाला खून-खराबा इस पूरे प्रोडक्शन के साथ-साथ चलता रहता है. जहाँ तक परिधान, ज्वेलरी एवं वेशभूषा का प्रश्न है तो ऐसा प्रतीत होता है कि यह कई सारे जनजातीय समाजों का मिश्रण-सम्मिश्रण है जो वास्तव में इस नाटक की आदिम पहचान और स्वरूप को चिन्हित और व्याख्यायित करता है.

पर इन सबसे ज़्यादा और सबसे हटकर जो सबसे ह्रदय विदारक और रोंगटे खड़े कर देने वाला दृश्य है या यूँ कहें जो इसका क्लाइमेक्स है वह यह है कि जब मैकबेथ और उस जैसे ही दूसरे मृत या मृतप्राय मानवीय तत्व परिचारिकाओं की एक फ़ौज द्वारा व्हील चेयर पर मंच पर लाये जाते हैं. वस्तुतः यह नाटक निर्देशक की मैकबेथ की एक सामाजिक महामारी के रूप में व्याख्या का मंचीय प्रस्तुतीकरण है. मैकबेथ के इस प्रस्तुतीकरण से निर्देशक यह सन्देश देना चाहते हैं कि आदमी की अनंत आकांक्षाएं हमेशा विनाशकारी होती हैं जो सबसे पहले तो इंसान के दिमाग को भ्रष्ट करती हैं और फिर उसका विस्तार पूरे समाज तक हो जाता है. कहना पड़ेगा कि यह जो आख़िरी दृश्य है, चरमोत्कर्ष का दृश्य है वह किस तरह से १६०० ई. में लिखे गए एक महान साहित्यिक कृति का आज के परिप्रेक्ष्य में बहुत ही सटीक रूपांतरण है और उतना ही सटीक उसका मंचीय प्रस्तुतीकरण है.
मंच पर किसी सेट का न होना सांकेतिक रूप से विश्व का ही एक मंच के रूप में प्रतिध्वनन है और इस प्रकार यह नाटक भौगोलिक दृष्टि से विश्व में कहीं भी किया जा सकता है. मंच का किसी वस्तु-विशेष या सेट से अवरुद्ध न होना इस नाटक और उसके पात्रों को एक ऐसी भव्यता प्रदान करता है , जिसका विश्लेषण शब्दों के परे है. विशेष रूप से प्रकाश परिकल्पना दर्शकों को स्तब्ध कर देती है , जो शेक्सपियर के इस मशहूर दुखांत नाटक की समकालीनता की व्याख्या करती है. हमेशा की तरह भारत के पुरातन, जनजातीय और पहाड़ी (विशेष रूप से भूटान, सिक्किम और लद्दाख के वाद्ययंत्र) सुषिर (भोंपू) वाद्यंत्रों से उत्पन्न ध्वनि संयोजन न सिर्फ रतन थियाम के चिर-परिचित हस्ताक्षर के रूप में हमारे सामने आता है बल्कि तरंगित ऊर्जाओं का वह झीना जाल का सा प्रभाव उत्पन करता है जो दर्शकों को दृश्य दर दृश्य संवेदनात्मक ऊंचाइयों तक ले जाता है और कलाकारों की यह दृश्य-श्रव्य यात्रा कलाकारों और दर्शकों के बीच एक अनकहा-सा मनोवैज्ञानिक संवाद भी स्थापित करती है जहाँ हम दर्शकों को कलाकारों के रूप में परिणत होते हुए देखते हैं. 



निर्देशक रतन थियाम जहाँ एक ओर इस नाटक के माध्यम से पथभ्रष्ट मानव की आतंरिक अतृप्त क्षुधाओं (महत्वाकांक्षा, लालच, सत्ता की भूख) और ऊर्जाओं के हस्तांतरण के इस खेल को दिखाने में पूर्णतः सफल हुए हैं वहीँ दूसरी ओर उनके कलाकारों की मौन और मुखर देह-भाषा, आवाज़ और स्वरोच्चारण, भाव-भंगिमाएं और आकांक्षाओं के प्रकटीकरण, प्रस्तुतीकरण और उनके चरमोत्कर्ष तक पहुँचने के क्रम में वे अपने कलाकारों से जिन रंग-युक्तियों का इस्तेमाल करवाते हैं वह निस्संदेह अतुलनीय है. विशेष रूप से चुड़ैलों के साथ वाले उस दृश्य में जहाँ संवादवाहक लेडी मैकबेथ के लिए एक बड़ी सी चिट्ठी को खोलने के लिए मंच पर लुढ़काता है और इस चिट्ठी के खुलने के साथ ही नाटक भी ओपन होता है. सारी समस्या की जड़ यह चिट्ठी ही है और पूरा नाटक इसी के इर्द-गिर्द घूमता है और ख़त्म भी इसके साथ ही होता है. यह दृश्य ‘लार्जर दैन लाइफ़’ है, डंकन की हत्या और मैकबेथ का उसकी पत्नी से संवाद न सिर्फ मनोरम है बल्कि हाथ से सरकती हुई रेत-से किसी तिलिस्म की उत्पत्ति करता है जिसे कोई भी अपनी अंतरात्मा में उठते आतंरिक कलह के मलबे और कोप के रूप में भी महसूस कर सकता है. इस चिट्ठी के इर्द-गिर्द घूमती पूरी कहानी और विशेष रूप से इस दृश्य में जो सुख और दुःख के बीच की एक महीन-सी रेखा है दरअसल वही इस नाटक का केन्द्रीय भाव भी है और ख़ूबसूरती भी. दरअसल एक मनोवैज्ञानिक हमले की संरचना और उसका प्रभावी नाटकीय प्रस्तुतीकरण है निर्देशक रतन थियाम का यह मैकबेथ.

रतन थियाम का यह मानना है कि मानवीय मन के द्वंद्व भी अनेक तरह के होते है. जो बाहर-बाहर दिख रहा है, वही द्वंद्व नहीं है. द्वंद्व और युद्ध कई स्तरों और कई सतहों पर चलता रहता है. अतियथार्थवादी सोच है उनकी द्वंद्व और युद्ध के बारे में. उनकी यही सोच इस पूरे नाटक में कमोबेश परिलक्षित होती है. मानवीय मन का द्वंद्व का सफ़ल रेखांकन करने में वे सिद्धहस्त हैं, इस बात को एक बार फिर उन्होंने साबित किया है. मानव मन के इस द्वंद्व को दिखाने के लिए थियाम ने प्रकाश का उम्दा इस्तेमाल किया है. उनकी प्रकाश परिकल्पना कमाल की है. उनका मानना है कि जैसे मौन संवाद से ज़्यादा मुखर होता है बिलकुल वैसे ही अन्धकार, प्रकाश से ज़्यादा मुखर और प्रभावशाली होता है. शायद इसीलिए अपनी इस प्रस्तुति में वे पात्रों को पूरी रौशनी में नहीं लाते. प्रकाश के आने जाने के साथ उनकी कुछ दिखती, कुछ छिपती परछाइयाँ दर्शकों में उन्हें देखने की उत्सुकता ज़्यादा जगाती हैं और यही वो नब्ज़ है दर्शकों की जिसे बख़ूबी पकड़ना रतन थियाम जानते हैं. अपनी कमाल की प्रकाश परिकल्पना से रतन थियाम न सिर्फ मानव मन के द्वंद्व को दिखाते हैं अपितु उसकी किंकर्तव्यविमूढ़ता को भी दिखाते हैं, विशेष रूप से उस दृश्य में जब मैकबेथ मंच पर अकेला है और वह रौशनी और अँधेरे के आवर्तों के बीच भटक-सा रहा है. दरअसल नाट्यधर्मी, एब्सर्ड और अतियथार्थवादी युक्तियों से परिपूर्ण इनके नाटक “कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय का प्रदर्शन” है.



इस नाटक के माध्यम से एक बार फिर उन्होंने खुद को पुनः एक विशिष्ट रंग-विशेषज्ञ के रूप में प्रतिष्ठित किया है. कभी रतन थियाम आपको रंगमंच के चित्रकार लगेंगे, कभी प्रकाशक, कभी संगीतकार तो कभी कुछ और लेकिन उनके नाटक चित्र, उच्चारण, संगीत, प्रकाश इन सब के इतने कुशल संयोजन से समृद्ध होते हैं कि आप टुकड़े-टुकड़े में उनके काम की व्याख्या नहीं कर सकते. आप यह नहीं कह सकते कि उनके नाटक  में प्रकाश उम्दा था या कुछ और उम्दा था या कोई पक्ष कमज़ोर था. दरअसल सबकुछ इतना उम्दा होता है कि आप सोच में पड़ जाते हैं कि नाटक के किस भाग को सर्वोत्तम कहा जाए और किसे छोड़ा जाए और यही बात उन्हें तमाम रंगकर्मियों से अलग करती है. यही पर वे रंगकर्म के चितेरे, रंग-विशेषज्ञ के रूप में खुद को प्रतिष्ठित करते हैं. दरअसल उनका नाटक एक आत्मा की तरह है. यह सर्वविदित तथ्य है कि आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया शरीर धारण करती है पर  थियाम का नाटक जो कि एक आत्मा है उसे नाटक के शरीर के विभिन्न अवयव समग्रता में धारण करते हैं और ये अवयव हैं – रंगचित्र, रंगस्थापत्य, रंगविचार प्रकाश, ध्वनि, संगीत, उच्चारण आदि-आदि. रतन थियाम का नाटक रंगों के संयोजन, मंच के कक्ष्या विभाजन, उच्चारण के सौंदर्य और संगीत की सूक्ष्म लयों के सहारे दर्शकों के भीतर छिपी लगभग अज्ञात भाव सम्पदा को इतने धीरे से जागृत करता है कि दर्शक रंगभूमि से मानसभूमि पर बिना किसी अवरोध के चले आते हैं.

 रतन थियाम का चीज़ों को देखने का नजरिया ही बिल्कुल अलग है. उनका मानना है कि – “हम जो चीज़ें प्रकृति में देख रहे हैं, उन्हें उसी रूप में रखने में कलात्मकता कहाँ हैं....उसे कुछ अलग तरह से व्याख्यायित करें तब बात बनती है, तब वह कलात्मक होता है.”वे यह भी मानते हैं कि कोई ऑब्जेक्ट दिखाने के लिए किसी ताम-झाम और उस ऑब्जेक्ट को दिखाने की ज़रुरत नहीं है. रंगयुक्तियों के सहारे आप उन्हें दर्शकों के दिमाग में उत्पन्न कर सकते हैं. और ऐसा करने से वहां वही ऑब्जेक्ट एक हज़ार प्रकार का उत्पन्न हो जाएगा. हर दर्शक अपनी कल्पनाशक्ति के हिसाब से उस ऑब्जेक्ट को विज़ुअलाइज़ करेगा अपने मस्तिष्क में, अपने मन में.    रतन थियाम का यह भी मानना है कि दर्शक उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं. वो दर्शकों से वो सब शेयर करना चाहते हैं जो वह महसूस करते हैं. इनका कहना है कि – “ मैं कोई बुद्धिजीवी नहीं हूँ, मैं बस सोचता रहता हूँ कि नाटक के कथ्य का विभिन्न स्तरों पर उपयोग कैसे किया जाए. क्योंकि उस कथ्य का दर्शकों से साझा करना मेरे लिए बहुत महत्त्व का है. मैं उनसे यह कहना चाहता हूँ कि – “मैं यह देख रहा हूँ और मुझे यह बहुत ख़ूबसूरत लग रहा है, ज़रा आप भी इसे देखिये ! मैं दर्शकों से यह नहीं कहता कि जो मैं देख रहा हूँ वह सही है और आप भी इसे जानिये. मैं शिक्षक नहीं हूँ, न ही सलाहकार. मैं अपनी रचना को साझा करना चाहता हूँ. जब मैं अपनी अभिव्यक्ति से किसी हद तक संतुष्ट होता हूँ, मैं चाहता हूँ उसको साझा करूं.”

मणिपुरी भाषा में प्रस्तुत यह नाटक या उनके अन्य नाटक भी इस बात की पुनर्प्रस्थापना करते  हैं कि रतन थियाम अपनी स्थानीयता, अपनी आंचलिकता से गहराई से जुड़कर सार्वभौम और वैश्विक होते हैं. वे मणिपुरी संस्कृति को वैश्विक संस्कृति से काटकर देखने के स्थान पर उसे उसके बीच रखकर देखते हैं. इस प्रक्रिया में वे जो प्रश्न उठाते हैं वे सिर्फ मणिपुरी संस्कृति के लिए या भारतीय संस्कृति के लिए ही प्रासंगिक नहीं होते, वे वैश्विक संस्कृति के लिए भी अर्थपूर्ण होते हैं. वे इस तरह के प्रश्न इसलिए उठा पाते हैं क्योंकि वे अपने नाटकों की विशेषता को अपनी संस्कृति की विशेषता में अवस्थित करते हैं और फिर इस संस्कृति के उन तत्वों को आलोकित करने का प्रयास करते हैं जिनमें वैश्विक मूल्य झलक रहे हों. शायद यही कारण है कि उनके नाटक मणिपुरी भाषा में होते हुए भी, मणिपुरी संस्कृति से उत्पन्न होते हुए भी कभी भी आंचलिक नहीं जान पड़ते. वे अपने नाटकों में ध्वनित होती मणिपुरी भाषा और संस्कृति में मानो समूचे विश्व को बुलाते हों या कि यह कहें कि वे अपने नाटकों में इस भाषा और संस्कृति को वैश्विक स्पंदनों को सुनने योग्य बनाते हैं और ऐसा इसलिए है कि उन्होंने मणिपुरी और भारतीय संस्कृति में गुंथे हुए वैश्विक मूल्यों को अपने रंगकर्म की आभा में प्रकट करने की अनवरत चेष्टा की है. वे मणिपुरी और भारतीय संस्कृति के नागरिक होते हुए ही विश्व नागरिक हुए हैं. उनके नाटकों में हमारी सभ्यता पर छाए संकट की गहरी चेतना है. इस चेतना को वे मणिपुर से उठाकर विश्व स्तर पर स्थापित कर देते हैं और दुनिया के सामने तमाम अनसुलझे प्रश्न छोड़ देते हैं. उनके नाटकों ने वैश्विक संवाद की संभावना को निरंतर खोलने का वह यत्न किया है जिसे पिछले वर्षों के क्षुद्र राष्ट्रवाद ने निरंतर अवरुद्ध किया है.

रतन थियाम का कला-कर्म हमें मनुष्यता की मूल चिंताओं से दो-चार होने को मजबूर कराता है. आज के संवेदनहीन होते समाज में उनकी कला मनुष्यता और मानवीय संवेदनाओं की उपस्थिति में हमारा विश्वास अटूट करती है वह भी अपने पूरे सौन्दर्यबोध के साथ. उनकी कला दृढ़ता से इस बात की प्रतिस्थापना करती है कि संसार की तमाम विसंगतियों, विद्रूपताओं, विभीषिकाओं के बावजूद इस संसार में सौन्दर्य है, प्रेम है, मानवीय संस्पर्श है और बचा रहेगा.

रतन थियाम का नाट्यकर्म मणिपुर और भारतीय परम्पराओं में डूबा हुआ है. वे अपनी स्थानीयता से गहराई से जुड़कर सार्वभौम होते हैं. इतिहास की दारुण विडंबनाओं को उघाड़ता उनका रचना संसार हमें गहरी आध्यात्मिकता के सम्मुख लाता है. आज जब मनुष्यता की चिंताओं को आसान फ़ॉर्मूलों और छिछली बातों के सौन्दर्य को औसत अनुभव बना दिया है, तब रतन थियाम का कला कर्म हमें मनुष्यता की मूल चिंताओं से दो-चार होने को मजबूर करता है. उनकी कला मनुष्य की पीडाओं की, उसके संघर्ष की और उसकी जिजीविषा की ऐसी छवियाँ गढ़ती है, जो हमें एक गहन अनुभव से साक्षात्कार कराती है.वे केवल एक नाट्यकर्मी नहीं वरन एक ऐसे कला साधक हैं जो अपने रचनाकर्म से गढ़ी हुई कोटियों के परे जाते हैं. वे शास्त्रीयता की दीर्घ परंपरा में डूबकर नया सृजन करनेवाले अनूठे कलाकार और मनीषी हैं.

रतन थियाम नित बदलते मुहावरों का पीछा करने के स्थान पर अपनी नई दृष्टि का स्वयं संथान करते हैं.. वे सच्चे अर्थों में एक ‘मार्गी’ कलाकार हैं. रंगकर्म के क्षेत्र में  थियाम ने सृजन-सक्रियता, पारम्परिकता, वैश्विक प्रतिष्ठा, नाट्य विधा और संबद्ध कला माध्यमों के विकास तथा संस्कृत नाटकों को आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है. रतन थियाम केवल रंगकर्म में रचे-बसे हैं.  पूरी दुनिया में भारतीय रंगकर्म की विजय पताका फहराने और लहराने वाले श्री थियाम अपनी तरह के अनूठे रंगकर्मी हैं. वे संस्कृत नाटकों और हिंदी नाटकों को तो मणिपुरी में लेकर आते ही हैं, विश्व के मशहूर नाटकों को भी वे मणिपुर से जोड़ते हुए उसे ग्लोबल बनाते हैं.   रंगकर्म में पूर्णतः रत और रंगकर्म को ही पूर्णतः समर्पित रंगनिर्देशक और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अध्यक्ष आदरणीय रतन थियाम ने अपनी अद्वितीय सृजनात्मक क्षमता द्वारा भारत के रंगकर्म को विश्व स्तर पर प्रतिस्थापित किया है. उनकी ख़ास बात यह है कि इस प्रतिस्थापना के लिए उन्होंने पाश्चात्य सभ्यता और कलाओं की ओर रुख तो किया लेकिन वहां से कला-तत्वों को लेकर पूर्णतः देशज और पारंपरिक रूप में भारतीय समाज के अनुरूप प्रस्तुत करने की भरसक कोशिश की जिसमें वो पूर्णतः सफल भी हुए हैं. संस्कृत नाटकों को उन्होंने आधुनिक व्याख्या के साथ प्रस्तुत करने का सफल प्रयास भी किया है.



रतन थियाम अपने रंगकर्म में वाचिक अभिनय के धागे में आंगिक अभिनय के मोतियों को पिरोते हैं. पर ये मोती मंच पर फैले रंगों के संयोजन से ऐसे आलोकित होते हैं जैसे सूर्य के उगते उजाले में किसी वृक्ष के शिखर पर हिलते पत्तों के समूह. एक ऐसे समय में जब कलाओं के अनुभव चमकीली छवियों और उत्तर आधुनिक वाग्जाल में घटाए जा रहे हैं, रतन थियाम जैसे व्यक्तित्व का होना एक गहरी आश्वस्ति देता है. रतन थियाम न सिर्फ भारतीय कला जगत में अपितु विश्व कला जगत में एक ऐसी उपस्थिति हैं जो अपनी जड़ों से जुड़कर वर्तमान समय को प्रश्नांकित करते चलते हैं. हम सबने जिन्होंने उनका सृजन देखा है अपने पर रश्क कर सकते हैं कि हमने  रतन थियाम को देखा है.

आभार
इस लेख को समृद्ध बनाने में महत्वपूर्ण योगदान है श्री उदयन वाजपेयी द्वारा लिखी गई पुस्तक ‘रतन थियाम से भेंट’ का जिसका प्रकाशन संस्कृति संचालनालय, भोपाल (मध्य प्रदेश) ने किया है. इस लेख के अंतिम कुछ अंश (जिनमें श्री रतन थियाम के रंगकर्म का विस्तृत विवेचन है) तो ज्यों के त्यों इस पुस्तक से लिए गए हैं. दरअसल वे मेरे नहीं श्री उदयन वाजपेयी और मध्यप्रदेश के तत्कालीन संस्कृति एवं जनसंपर्क मंत्री श्री लक्ष्मीकांत शर्मा के शब्द हैं जिनके लिए मैं इन दोनों महानुभावों का हृदय से आभार व्यक्त करती हूँ.  

संपर्क : manj.sriv@gmail.com
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