स्त्री संवेदना का नाटक गबरघिचोर

संजीव चंदन

स्त्री की यौनिकता पुरुष प्रधान समाज के लिए हमेशा से चिंता का विषय रही है. अलग –अलग समय में यह चिंता रचनाकारों की रचनाओं से भी अभिव्यक्त होती रही है. लोक कथाओं और लोकमिथों में अन्य केन्द्रीय विषयों में से एक विषय स्त्री की यौनिकता भी हुआ करती है. इस विषय पर कहन के ढंग और कहने के उद्देश्य से ही रचनाकार की स्त्री के प्रति अपनी संवेदनशीलता का भी पता चलता है .



7 फरवरी को भारतीय रंग महोत्सव में भिखारी ठाकुर लिखित नाटक (गबरघिचोर- मूल नाटक ,पुत्रवध )  का युवा निर्देशक प्रवीण गुंजन के निर्देशन में मंचन हुआ . भिखारी ठाकुर,  यानी भोजपुरी लोक के महान रचनाकार,  के क्लासिक की मंच –प्रस्तुति इसलिए एक चुनौती है कि बिना उसके मूल स्वभाव को ज्यादा छेड़े उसे समसामयिक कैसे बनाया जाये और इसलिए भी कि उसकी कई प्रस्तुतियां अनेक बार हो चुकी हैं, तो नई प्रस्तुति को अलग और जरूरी कैसे बनाया जाये

कहानी के केंद्र में स्त्री की यौनिकता और उसके मातृत्व का अधिकार है. काम के लिए महानगर गया गलीज जब बरसों बाद लौट कर गाँव आता है , तो वह अपने बेटे ‘ गबरघिचोर’ को अपने साथ ले जाना चाहता है. यह उसके लिए इतना आसान नहीं रह जाता, जब गाँव का ही एक व्यक्ति ‘ गड़बड़ी’ उसे अपना बेटा बताता है, गलीज की अनुपस्थिति में उसकी पत्नी से उत्पन्न गड़बड़ी का बेटा . गलीज की पत्नी भी अपने बेटे को शहर भेजने के खिलाफ है . मामला पंचायत के पास जाता है और अंततः पंचायत उसे तीन टुकड़े में काटकर बराबर –बराबर तीनों दावेदारों के बीच बांटने का निर्णय देती है. नाटक के कथानक में कई विषय प्रत्यक्ष –परोक्ष रूप से व्याख्यायित होते हैं. पलायन, स्त्री के प्रजनन और श्रम पर पुरुष का अधिकार. बेटे के रूप में सम्पत्ति का उतराधिकार के अलावा श्रम के रूप में उसकी उपयोगिता पर पुरुष का अधिकार आदि विषय नाटक के कथानक से उभर कर आते हैं , और पुरुष नियंत्रित व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाती है, जो  स्त्री की ‘ नियति’ तय करती रही है.
भोजपुरी के इस नाटक में लोक संवाद और संवेदना का मिठास है और पितृसत्तात्मक व्यवस्था को ग्राम समाज किन भोले तर्कों के साथ ढोती है, इसमें इसकी झलक भी मिलती है. हालांकि इस व्यवस्था को प्रश्नांकित करती, अपने हक़ के लिए तर्क उपस्थित करती स्त्री की भाषा में भी ग्राम समाज की भोली तर्क पद्धति ही उपस्थित होती है. भिखारी ठाकुर स्त्री संवेदना के रचनाकार रहे हैं, लोक का यह हिस्सा उनके रचनाकर्म की कालजयिता के एक कारणों में है. यह नाटक निर्देशक के लिए भी इसलिए चुनौती की तरह है कि सवाल उसके सामने होगा कि भिखारी ठाकुर की इस संवेदना के साथ वह कितना न्याय कर पाया है. क्या उसका मंचन टेक्स्ट  की  तरह अंततः स्त्री के साथ संवेदनशीलता के साथ न्याय कर पाता है ? यह सवाल इसलिए भी  कि नाटक का विषय है विवाहेत्तर पुरुष से प्राप्त बेटे पर अधिकार प्रश्न और इस तरह स्त्री की यौनिकता- जो रचनाकारों से लेकर नीतिकारों तक का विषय रही है – जिसके कारण कुछ समझदार पुरुष वैराग्य लेते हुए दिखाए जाते रहे हैं,कामुकता को कोसते नजर आते हैं. ज़रा सी चूक नाटक में स्त्री को उपहास का पात्र बना सकती थी . लेकिन युवा निदेशक इसके मंचन और इसके साथ प्रयोगों में सफल रहे हैं, जिससे  मंचन की संवेदना स्त्री के प्रतिऔर सशक्तता से जुडती है .

एक चर्चित क्लासिक में प्रयोगों की संभावनाएं बहुत कम होती हैं, मंचन की सफलता इस तथ्य में भी है कि वह कथानक के टाइम और स्पेस में रचकर उसे समकालीन भी बनाये. मूल टेक्स्ट में कुछ नये गीतों को जोड़कर यद्यपि प्रयोग भी किये गये हैं . मंचन के क्राफ्ट में हर पात्र एक अलग चरित्र है,  तो समाज की एक समवेत सोच का प्रतिनिधि भी. वह खुद को जीता है और पात्रों के साथ सामाजिक हर्ष  -विषाद –तर्क और प्रतिवाद को भी-परकाया प्रवेश का क्राफ्ट.



नाटककार और निदेशक की संवेदना स्त्री के साथ होने के कारण ही पुत्र पर अधिकार के हास्यास्पद बंटवारे के बावजूद स्त्री का पक्ष न सिर्फ उसके ममत्व के कारण मजबूत दिखता है , बल्कि उसकी अपनी यौनिकता पर उसके खुद के निर्णय से उसका पक्ष मजबूत होता है – वह दृढ़ता के साथ न सिर्फ विवाहेत्तर पुरुष के साथ अपने जाने की स्थितियां बताती है बल्कि अपने इस निर्णय के पक्ष में भी खाडी होती है और अपनी कोख पर अपने अधिकार के प्रबल पक्ष के साथ पंचों को निरूतर भी कर देती है – इस मायने में यह स्त्रीवादी कथ्य के रूप में है- आधुनिक स्त्री की चेतना से संपन्न. नाटक का संवाद ही स्पष्ट करता है कि  ‘ तथाकथित पर पुरुष –गमन ’ को जब सीता नहीं बचा पाई तो साधारण स्त्री क्या – इस मामले में यह समसामयिक कथन सा है और समसामयिक हस्तक्षेप भी- अतिवादी सांस्कृतिक चेतना पर एक चोट.

मंचन के अंतिम आधे घंटों में एक प्रायः स्पष्ट कहानी के साथ दर्शकों को बांधे रखना भी निदेशक की सफलता ही है, क्योंकि हर दर्शक को यह स्पष्ट था कि क्या घटित होगा, लेकिन इस आधे घंटे की करुणा के साथ दर्शक बंधा रहता है – उद्दीपन का काम करता है निदेशक की परिकल्पना के साथ जोड़ा गया एक सोहर – जो न सिर्फ मातृत्व का कारुणिक प्रसंग उपस्थित करता है, बल्कि अट्टालिकाओं की हृदयहीनता को भी- महाकाव्य की आदर्श मां’ कौशल्या’ की लोकछवि इस सोहर में ह्रदयहीन रानी का है.  निस्संदेह भारतीय रंग महोत्सव की यह ख़ास प्रस्तुति थी.
लेखक स्त्रीकाल के संपादक हैं. संपर्क: themarginalised@gmail.com
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