स्त्री मुक्ति की नेत्री सावित्रीबाई फुले

रजनी तिलक 
साल का पहला सप्ताह पूरे देश में धूमधाम से उत्साह के साथ मनाया जाता  रहा है. नये साल के साथ नये सकल्प लिए जाते है पुराने संकल्पों का मूल्यांकन किया जाता है . महिलाओ की जिन्दगी और उनके संघर्षो का बिगुल बजानेवाली अनेक विदूषी महिलाओ में सावित्रीबाई फुले नाम अग्रणीय  है. सावित्रीबाई का जन्म महराष्ट्र के पिछड़े समाज में ऐसे समय में हुआ जब स्त्रियों एवं अछूतों के लिए शिक्षा और सम्पति सवर्था वर्जित थी सत्ता सभी स्त्रोतों से उन्हें  बाहर रखा गया था. पुरोहितों और ब्राह्मण  धर्म की दुहाई दे कर पवित्रता के नाम पर अंधविश्वास फैला रहे थे. बाल विवाह प्राय हर समाज की परम्परा थी. पांच छः वर्ष की उम्रमें लड़की की शादी कर दी जाती थी.
  
 3 जनवरी 1831 को महारष्ट्र के नायगाव में पैदा हुई सावित्रीबाई फुले की शादी 1840में, 9 वर्ष की छोटी उम्र में 12 वर्षीय ज्योतिराव फुले के साथ हुई.सावित्रीबाई जब ससुराल आई तब वे अशिक्षित थी और ज्योतिबा फुले मिशनरीज स्कूल में शिक्षा पाए हुए थे. सावित्रीबाई ने  अपने पति  के सहयोग से 1841 में  मराठी और अंग्रेजी पढना लिखना सिखा और अभ्यास किया. पूना में रे जेम्स मिचेल की पत्नी मिसेज मिचेल जो स्त्री शिक्षा की हिमायती थी , के सानिध्य में सावित्रीबाई फुले 1846-47 में नार्मल स्कूल से शिक्षिका का प्रशिक्षण ले कर वे ब्रिटिश भारत में पहली प्रशिक्षित शिक्षिका बनी. अपने अदम्य साहस से अपने पति के साथ कंधे से कन्धा मिला कर  उन्होंने पुरोहितो और धर्मशास्त्रों  के विरुद्ध जा कर स्त्रियों और शूद्रों के लिए शिक्षा की ज्योति जलाई. फुले दम्पति ने  बालिकाओ के लिए पहला स्कूल 1 जनवरी 1848 को पुणे के बुधवारपेठ में खोला जिसकी वे प्राचार्य बनी.  चारो तरफ तहलका मच गया सावित्रीबाई फुले का राह  में चलना दूभर कर दिया. सावित्री पर राह चलते लोग कीचड़ – पत्थरों की बौछार करते क्योंकि  तत्कालीन समय में स्त्री शिक्षा धर्माचरण के विरुद्ध थी. 15 मार्च 1848 उन्होंने महारवाडा में जा कर सहशिक्षा विद्यालय शुरू किया.

स्त्री शिक्षा और शूद्रो की शिक्षा के साथ साथ उन्होंने महिलाओ के दमन प्रताड़ना बहिष्करण की जड़ो को तलाश कर उसका खुलासा किया. सावित्रीबाई फुले ने अपने पति के साथ मिल कर ब्राह्मणवाद और उनके अस्त्र धर्मशास्त्रों को इसका कारण माना अत: उन्होंने न केवल ब्राह्मणवाद का प्रतिकार किया बल्कि उसमे व्याप्त पितृसत्ता की घोर आलोचना की.  महिलाओं के मान को बरक़रार रखने के लिये महिलाओ और शूद्र  के बीच जन चेंतना व जन- आंदोलनों का सूत्रपात किया. उनके विद्यालय में पढ  कर निकली एक छात्रा मुक्ताबाई जो मांग समाज की थी ने शूद्र और शूद्र स्त्रियों के दमन पर बहुत ही मार्मिक लेख लिखा जो एक ऐतिहासिक दस्तावेज है. वे अछूत और उनकी महिलाओ पर  ढाए गये जुल्मो की दास्तान का साक्ष्य है.

1848 में एक तरफ इंग्लैंड में स्त्री सिक्षा की माग हो रही थी तो दूसरी ओर फ्रांस  में मानवाधिकारों के लिए संघर्ष चल रहा था , भारत में शूद्रों - अतिशूद्रों  और स्त्रियों के लिए शिक्षा की नीव रख कर सावित्रीबाई और ज्योतिबा ने  नए युग का सूत्रपात किया. समाज में दबे कुचले  लोगो को शिक्षा देने व उनके अधिकारों की पैरवी करने के कारण 1849 उनेह अपना घर छोड़ना पड़ा. उसी समय उन्होंने  पुना, सतारा, अहमदनगर जिले में 18 पाठशाला खोली. 1 मई 1852 शुद्रो के लिए वेतालपेठ में  विद्यालय खोला जिसकी भूरी भूरी प्रशंसा 29 मई 1852 के समाचार पुणे ऑब्जर्वर में की गयी

13 जनवरी 1852  को उन्होंने  सभी समाज की महिलाओ के साथ मीटिग रख कर मकरसंक्राति बनाने की पेशकश की और साथ में यह बात भी रखी की सभी स्त्रियों को एक तरह का आसन  मुहैया कार्य जाएगा बिना किसी जाति या पक्ष भेदभाव रहित.  तिल गुड कार्यक्रम में सैकड़ो महिलाए आई. महिलाओ को सावर्जनिक जीवन में जाति भेदभाव के बावजूद उनेह एकसाथ लाने का उनका प्रयास अतुलनीय था. 28 जनवरी 1863 से उन्होंने बाल विधवाओ हेतु शेल्टर खोलने प्राम्भ किये . बाल विधवाओ के रिश्तेदारों द्वारा  उन्हें  को फुसला कर उनके साथ जबरन शारीरिक सम्बन्ध बनाकर उन पर अनचाहे गर्भ से लाद दिया, जिसके परिणामस्वरूप शरम से वे आत्म हत्या करने हेतु मजबूर होती या प्रसव बाद बच्चे की हत्या करवा दी जाती. ठीक उसी तरह उन्होंने विधवाओं के मुंडन का विरोध किया. नाई समाज के पुरुषो के साथ बैठक करके इस कृत्य को न करने का अनुरोध किया व आन्दोलन चलाया.

सावित्रीबाई फुले ने अपने पति के साथ मिल कर सत्यशोधक समाज की स्थपना की. जिसका उद्देश्य था सांस्कृतिक  कार्यक्रमों द्वारा समाज में बदलाव लाना.  सत्यशोधक के माध्यम से उन्होंने धार्मिक पाखंडवाद की  पोल खोली, सादा समारोह करके सामूहिक विवाह भी कराये. फुले दम्पति  ने अपने मित्रो के साथ मिल कर स्त्रियों की सुरक्षा आर्थिक सामाजिक , राजनीतिक  व  जीवन के सभी क्षत्रो में बराबरी दिलाने के किये शिक्षा से ले कर समाज के धरातल पर खड़े हो कर उनके लिए अनुकूल वातावरण बनाने हेतु सभ्य समाज से गुजारिश की. सती-पुरुष समानता हेतु स्त्रीवादी विचारों को महत्व दिया . छुआछूत की भयावह बीमारी ने शूद्रों  और अतिशूद्रों  के जीवन कष्टमय बना दिया था सन 1868 में  पीने  के पानी के लिए सवर्ण स्त्रियों से चिरोरी करती अछूत औरतो हेतु उन्होंने अपने घर का तालाब खोल दिया जिसके लिए  उसके ससुर  ने उन्हें   खूब डाटा. 1873 में विधवा के पुत्र को गोद ले लिया और उसका पालन-पोषण स्वयं किया.

1876-77 महाराष्ट्र में अकाल पड़ा भुखमरी के इस आलम में बच्चे बूढ़े हजारो की संख्या में मर रहे थे, सत्यशोधक समाज के माध्यम से  पुणे के भीतरी गांवो में वे स्वयं  देखभाल कर रही थी. 2000 से भी ज्यादा निराश्रित बच्चो के खाने पीने की व्यवस्था,  52 भोजन केंद्र व अन्य सुविधा केन्द्रों की स्थापना की. 20  अप्रैल 1877 को ज्योतिबा को पत्र लिख कर उन्होंने गावो की अन्दुरुनी स्थिति की जानकारी दी. 1890 में अपने पति ज्योतिबा के देहांत के बाद किर्या कर्म  पर उठे विवाद के पश्चात उन्होंने स्वयं अपने पति को मुखाग्नि दी. तत्पश्चात 1891 -1897 सत्यशोधक समाज का बखूबी नेतृत्व सम्भाला .. 1885 में  ब्लैकआन्दोलन के नेता टामसन क्लर्क की जीवनी अंग्रेजी में पढ़ी जिससे उनको अछूत और महिलाओ की मुक्ति हेतु  आन्दोलनरत होने की प्रेरणा मिली. 1897 , अभी महाराष्ट्र की जनता अकाल से उबरी भी नहीं थी कि  प्लेग की महामारी ने आ घेरा. गावं के गाव खली होने लगे. सावित्रीबाई ने इस महामारी से निबटने के लिए खुद को झोक दिया. अपने डाक्टर पुर यशवंत की मदद से प्लेग पीडितो की जान बचाने हेतु दूर दराज गावों से मरीजो को निकाल कर लाती. जीवन के अंत में एक अछूत बच्चे को गावं से निकाल कर लाते हुए  ही वो भी प्लेग की  चपेट में आ गयी. 10 मार्च 1897 तक वे जीवन अविराम समाज बदलाव हेतु संघर्षरत रही. सावित्रीबाई फुले से प्रेरणा  ले कर दलित व पिछड़ी महिलाओ ने अपने आन्दोलन को पितृसत्ता और जातिवाद , ब्राह्मणवाद के मूल्य को नकारा है. इसी चश्मे से हम अपने देश के महिला आन्दोलन को देखना चाहेंगे.

बीसवी सदी का 7 वे  दशक में  भारत में महिला आन्दोलन अपनी सुध लेने लगा था. महिलाओ के साथ भेदभाव, दहेजलोभियों द्वारा बहु को जला कर मार देना, या छोड़ देने जैसे कृत्य उभर कर आ रहे थे. प्रतिबंधित घरेलू जीवन ही उसका पर्याय था. पढी-लिखी औरतो ने संघठित हो कर सार्वजानिक रूप से इसका विरोध करना शुरु किया. औरत भी एक इंसान है उसकी भी अपनी एक पहचान है. दहेज़ हत्या, भ्रूण- हत्या, बलात्कार , भरण पोषण, स्वास्थ्य , योंन हिंसा मुद्दों पर जन चेतना अभियान चलाए गये और कानून बनवाये गये.

स्त्रीमुक्ति आन्दोलन के बिन्दुओ को छूते हुए हम वापस 19 वी सदी में लोटते है तो पाएँगे आज हम उन्ही मुद्दों पर लड़ रहे है जिन पर सावित्रीबाई फुले लड़ रही थी जबकि  तत्कालीन समाज आज से ज्यादा  भयंकर व  रुढ़िवादी जातिवादी था, ऐसे विपरीत समय  में वो तूफान बन कर उठ खड़ी हुई थी और निर्भीकता से बाल विधवाओं की, अछूत  महिलाओ की मदद कर रही थी. किसी बाहरी वित्तीय  सहायता से नहीं बल्कि अपने ही संसाधनों और अपनी राजनीति  के सरोकारों के दम पर प्रतिकियावादियों  लोहा ले रही थी. शिशु और महिलाओ को मान देने हेतु प्रसूतिगृह खोला ताकि वे अपने बच्चे को जन्म दे कर वापस अपनी जिन्दगी में  लौट सके.  इस काम के लिए उन्होंने अत्यधिक आलोचना का सामना किया

महिला आन्दोलन ने अपने संघर्षो की लम्बी यात्रा में अनेक पड़ावों को पार किया है. अपने संघर्षो से अनेक कानून पारित कराये है मसलन दहेज विरोधी कानून, भूर्ण हत्या, कार्यस्थल पर योन शोषण, घरेलू हिंसा इत्यादि . महिलाओ को न्याय दिलाने के लिए अनेक संस्थानों की अनुशंसा की जैसे फैमिली कोर्ट, वुमेन सेल, राष्ट्रिय महिला आयोग,  इत्यादी. अपने नारे में कि पर्सनल और पालिटिक्स एक है, बहनापा के छत्र के नीचे सब एक है समान है यंहा तक सामाजिक जिन्दगी और राजनीति एकनिष्ठ है... आदि

35 -40 वर्ष के लम्बे इतिहास में भारतीय स्त्री-मुक्ति महिला आन्दोलन के संघर्ष मध्यम-वर्गीय मुद्दों और वैश्विक सरोकारों को अभिव्यक्त  करते रहे है, जो अंतराष्ट्रीय स्तर पर एका  तो जाहिर करते है परन्तु देश की बहुसंख्यक आबादी की  दलित आदिवासी,  डीनाटीफाईड, अल्पसंख्यक समुदायों की महिलाओ की  रोजमर्रा की समस्याओं को समझ कर उनके साथ खड़े होने की ललक नहीं देखि गयी.  न ही उस ओर  प्रयास ही हुए है. महिला आन्दोलन की नेत्रियोऔर दलित आन्दोलन के नेताओ और नेत्रियो से इस ओर  ध्यान दिलाते हुए हम उनसे अनुरोध कर रहे है कि अपने बीच सावित्रीबाई फुले जैसे सरल व्यक्तिव  के नाम के  माध्यम से अपने देश और समाज के मुद्दों को उठाने के लिए सावित्रीबाई फुले का जन्मदिनांक  को स्त्री मुक्ति दिवस  की जरुरत को  तर्कसंगत समझते हुए जमीनी स्तर और सांगठनिक स्तर पर मानना शुरू करे  इसी आशय से राष्ट्रिय महिला आन्दोलन दलित अपनी पहल पर, दलित राईट, भारतीय महिला जाग्रति परिषद्, महिला मैत्री, जन विकास महिला फाउंडेशन, सावित्रीबाई फुले महिला संस्था ,युविडीएमाआर, यशोधरा महिला उद्यम ट्रस्ट , संभव नेकडोर एवं अन्य   संस्थाओं ने  मिल कर दिल्ली और अन्य राज्यों में दूसरी बार A.P. Bhavan , Gurajada Conference Hall  में 3 जनवरी  2016   समय 3 बजे मनाया  इस अवसर पर महिलाओ के लिए आरक्षण में आरक्षण और जयपुर में मनु महाराज की मूर्ति हटाने  के अभियान की  शुरुआत की.
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