दुनिया के मजदूर-मजदूरनें एक हों...

डॉ. आरती  
संपादक , समय के साखी ( साहित्यिक पत्रिका ) संपर्क :samaysakhi@gmail.com
मार्क्स  की सौंवीं बरसी पर अमेरिका में हुए सेमिनार में, कैथराइन ए. मैकनिनन ने मार्क्सवाद और नारीवादी चेतना के वैचारिक पक्षों का सकारात्मक विश्लेषण करते हुए कहा- 'कोई भी वास्तविक नारीवाद प्रकृति के रूप में उत्तर मार्क्सवादी नहीं हो सकता। लेकिन इसके साथ यह भी सचाई है कि दैनंदिनी जीवन के बारे में लैंगिक विभाजन को समझे बिना चर्चा नहीं कर सकते। वर्चस्व का मर्म समझने के लिए हमें उसके मुख्य रूप, पुरुष प्रभुत्व को समझना होगा। यौनिकता का नारीवाद के लिए वही महत्व है जो श्रम का  मार्क्सवाद के लिए। (पूँजीवाद श्रम का मूल्य हड़प लेता है, इसलिए  मार्क्सवाद उसकी आलोचना करता है। यौनिकता को स्त्री से छीने जाने के खिलाफ नारीवाद विचारक आवाज उठाता है).... वर्ग श्रम की सामाजिक संरचना होती है, उत्पादनकारी प्रक्रिया होती है और पूँजी उसका संक्रेद्रित रूप है। नियंत्रण इस पूरे कार्यव्यापार का केन्द्रीय मुद्दा है जिसके लिए संघर्ष होता है।...नारीवाद में इसी का समानांतर तर्क निहित है।... यौनिकता समाज को दो भागों में बाँटकर संगठित करती है। एक भाग स्त्रियों का दूसरा भाग पुरुष का।... यौन विभाजन उसकी सामाजिक प्रक्रिया का नाम है। परिवर्तन उसका जमा हुआ संक्रेद्रित रूप है। यौन भूमिका इसका गुण है जो दो सामाजिक व्यक्तियों में सामान्यीकृत हो जाती है और अंत में प्रजनन या पुनरुत्पादन उसके परिणाम के रूप में सामने आता है।’

मैकनिनन का यह वक्तव्य एक ऐसा बिन्दु है जहाँ से मार्क्सवाद  और नारीवाद के संबंधों को एक नया आयाम मिलता है। नारीवाद पर देहवादी विमर्श का आरोप लगाते हुए सिद्धांतशास्त्री (और मार्क्सवादी) अक्सर यह भूल जाते हैं कि प्रजनन से पूर्व पुरुष को स्त्री के साथ सहवास करना पड़ता है यहाँ स्त्री और पुरुष के बीच नियंत्रण केन्द्रीय मुद्दा बन जाता है जिस प्रकार पूँजी और श्रम के बीच नियंत्रण केन्द्रीय मुद्दा होता है। मार्क्सवादी सिद्धांतों में ‘मूल्य’ का जो स्थान है वही नारीवाद में ‘कामना’ का है। जिस प्रकार श्रम समाज की रचना में भूमिका निभाता है उसी प्रकार कामना यौनिकता की रचना करते हुए समाज की संरचना करती है। इस प्रकार यौनिकता के प्रश्नों, संशयों को उठाए बिना नारीवाद पर चर्चा नहीं हो सकती। मार्क्स ने स्त्री प्रश्नों को यथासमय उठाया किन्तु उन्हें कोई नई दिशा देने का माहौल मार्क्सवाद  के भीतर नहीं मिला। यहाँ हमें मार्क्सवाद  और नारीवादी प्रश्नों की सही पड़ताल करने के लिए अतीत में जाकर झाँकने और विश्लेषण की जरूरत है।

श्रम और वर्ग चेतना जैसे महत्वपूर्ण प्रश्नों के साथ ही  मार्क्सवादी स्त्रियों द्वारा लिंगभेद के प्रश्नों को उठाया गया। यहाँ नारी मुक्ति के प्रति संवेदनात्मक दृष्टिकोण रखनेवाले पुरुषों ने भी उनका साथ दिया। वर्षों आंदोलनों के भीतर आंदोलन सक्रिय होने के कारण उन्नीसवीं सदी के चौथे दशक में मार्क्सवादी पार्टियों और उनके सिद्धांतकारों ने यौन विभाजन को मान्यता देना शुरू किया। यहाँ यौन विभाजन को केवल मान्यता मिली। उसका कोई विकास नहीं हुआ। मार्क्सवाद  ने नारी प्रश्नों को लेकर अपने सिद्धांतों को उलटने- पलटने का, उन्हें पुनव्र्यवस्थित करने का काम नहीं किया। स्त्री प्रश्नों पर मार्क्सवाद  यहीं रुका रहा। हाँ बल्कि स्त्री आंदोलन की संभावना को बेहद गुपचुप तरीके से रोक दिया गया। यहाँ कामरेडों के भीतर सहस्त्राब्दियों से जड़ जमाए बैठी पितृसत्ता स्त्री प्रश्नों को कई दशकों तक हाशिए पर धकेलती रही।  मार्क्सवादी  आंदोलनों में, धरना-प्रदर्शनों, जुलूसों में साथ दे रही स्त्री घर की दहलीज पर कदम रखते ही कामरेड पुरुष को पूँजीपति में बदला पाती। घर के भीतर स्त्री एक श्रमिक थी। यौन विभाजन को झेलने के लिए मजबूर क्योंकि मार्क्सवाद के सिद्धांतों में घर के भीतर क्रांति की सैद्धांतिकी का अभाव था।

स्त्री को लेकर मार्क्स की इच्छा थी कि वह श्रम करे। यदि वह श्रम (घर से बाहर) करेंगी तो नियंत्रित होने वाली शक्ति से बदलकर नियंत्रणकारी शक्ति बन जाएगी। परिवार संस्था का पुनर्निमाण भी होगा और स्त्री संबंधों को भी एक नया धरातल मिलेगा। मार्क्स के विचारों से प्रभावित होकर कई महिलाएँ क्रांति के मैदान में उतरीं। नए संबंधों की व्याख्या करनी चाही। यहाँ क्या महसूस किया? इस संदर्भ में फ्रांसीसी महिला ज्याँ डेरियन का प्रसंग जरूरी है- डेरियन अपने पुरुष साथियों के साथ बिखरी हुई मजदूर यूनियनों को इक_ाकर महासंघ बनाने की योजना पर काम कर रही थीं। वे ‘द ओलीनियम डेम फेम्मे’ नारीवाद पत्र में नियमित स्तंभ भी लिखा करती थीं। एक दिन पुलिस ने यूनियन के अन्य साथियों समेत उन्हें पकड़ लिया। मुकदमे से पहले वकील जो, उनसे मिलने आया ने जो कहा, वह चौका देनेवाला था। वकील के अनुसार- ‘वे महासंघ बनाने में अपनी भूमिका का उल्लेख न करे अन्यथा यूनियनों को एकसूत्र में पिरोने की योजना को अधिकारियों की स्वीकृति नहीं मिल पाएगी, क्योंकि वे एक नारीवादी हैं।’ यहाँ व्यवहार में मार्क्सवाद के भीतर, नारीवाद होना अश्पृश्य होने जैसा था। पुरुष के मुकाबले स्त्री के सामाजिक, वर्गीय योगदान पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह। यह घटना मजदूर, क्रांति के भीतर स्त्री को अपनी असली जगह दिखा देने के लिए पर्याप्त थी। डेरियन ने सच के साथ समझौता इसलिए किया कि मजदूर महासंघ की योजना साकार हो सके। इस घटना के बाद पेरिस कम्यून में महिला योद्धाओं के अनुभव भी आंदोलनों के भीतर लैंगिक भेदभाव से भरेपूरे रहे। इन महिला योद्धाओं के साहस और कर्तव्यनिष्ठा की प्रशंसा स्वयं कार्लमार्क्स ने की थी। कम्यून में करीब आठ सौ स्त्रियाँ हथियार बंद होकर घर से निकलीं। इन्होंने क्रांति के लिए ही जीवित रहने का संकल्प लिया। और तमाम रोड़ों को पारकर, शत्रुओं का निडरता के साथ सामना किया। तत्कालीन क्रांतिकारी और पत्रकार आंद्रेलुई लिखती हैं कि- इन महिलाओं का संघर्ष दोतरफा था। एक ओर वे वर्साई के शत्रुओं से लड़ रही थीं दूसरी ओर अपनी ही कतारों के पुरुषों की मानसिकता से। इस आंदोलन के बाद भी वही हुआ। जिस क्रांति ने उन्हें निष्क्रियता के बाहर निकाला, उद्देश्य पूरा हो जाने पर क्रांतिकारी कतारों का यौन विभाजन, उनकी अधीनस्थ भूमिका पर शब्दाघात करता रहा। ये प्रहार उनकी उभरती भूमिका के लिए हमेशा घातक सिद्ध हुए हैं। इसीलिए क्रांतियाँ सार्विक मुक्ति का दावा करने के बाद भी पुरुष केन्द्रित रह जाती हैं और आधे-अधूरे प्रयास की बाहक भी। तेलंगाना में पेरिस कम्यून के लगभग 175 वर्ष बाद चंद्र राजेश्वर राव ने एक स्त्री संगठन की आधारशिला रखी और ब्रिटिश उपनिवेशवाद एवं निजाम के रजाकारों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का ऐलान कर दिया। तेलंगाना की इस क्रांति में मल्लू स्वराजमन और ब्रजरानी जेसी महिलाओं ने मिशाल कायम की थी। लेकिन इसके बाद भी लिंगभेद की शिकार हुईं और पुरुषों की बराबरी का दर्जा पाने में असमर्थ रहीं। राजेश्वर राव ने स्वयं स्वीकार किया कि- ‘जब स्त्रियाँ आईं तो हमने उन्हें हाथोंहाथ लिया लेकिन हमने उन्हें आगे बढऩे हेतु प्रेरित करने के लिए कुछ नहीं किया। इन महिलाओं के साथ यदि सहयोग किया जाता, पार्टी के दरवाजे उनके लिए खोले जाते तो निश्चित उनके कार्यों का फायदा पार्टी और विचारधारा दोनों को मिलता। इसके करीब पचास साल बाद शायद 1994-95 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की सदस्य वृंदा करात ने अचानक अध्यक्ष मंडल को कमेटी से अपना इस्तीफा सौंप दिया। वे पार्टी के भीतर लगातार स्त्रियों की उपेक्षा, विशेषकर पार्टी में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने से असंतोष में थीं। हालाँकि इस घटना को तत्कालीन महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत ने सँभाल लिया।’

ये घटनाएँ चाहे, ज्यां डेरियन की हों या पेरिस कम्यून या तेलंगाना संघर्ष या वृंदा करात के इस्तीफे की इनमें समानता है। ये वे क्रांतिकारी स्त्रियाँ हैं जिन्होंने समाज के हित, कमजोर वर्ग के शोषण के खिलाफ लडऩे का साहस दिखाया। इन्होंने ‘दुनिया के मजदूरों एक हो’ के साथ ही ‘दुनिया की मजदूरिनें एक हो’ का नारा दिया और संगठनों के सामने प्रस्ताव रखा कि मार्क्सवाद, शोषण और दमन की वर्गीय परिभाषा में लैंगिक दमन को भी शामिल करे। स्वयं मार्क्स ने सर्वहारा स्त्री के शोषण के प्रश्नों को उठाया। उन्हें क्रांति में सम्मिलित किया। फिर प्रश्न उठता है कि नारीवाद की जरूरत क्या है? या क्यों पड़ी? कि स्त्री के उठाए गए प्रश्नों को अलग -थलग कर दिया गया। मार्क्सवाद स्त्री को किस वर्ग में रखेगा? शोषक या शोषित, तो क्या कोख के भीतर मार दी जानेवाली कन्या शिशु, दहेज के लिए जला देनेवाली सामंत परिवारों की स्त्रियाँ, खाप पंचायतों द्वारा खुलेआम कत्ल हो रही प्रेम करनेवाली सवर्ण स्त्री, मार्क्सवाद के अध्ययन का विषय नहीं हैं?

इन जैसे प्रश्नों से जूझती, मार्क्स के शोषण नियामक विचारों से प्रभावित स्त्रियों जैसे ज्यां डेरियन, मेरी वोल्स्टन क्राफ्ट, सीमोन, एलक्जेंडा कोलंताई, क्लारा जेटकिन, ओलाइव श्राइनर, (ये स्त्रियाँ वैचारिक व सांगठनिक रूप से मार्क्सवादी क्रांतिकारी हैं) ने एक लंबी लड़ाई, संगठनों के भीतर लड़ते रहने के बाद अंतत: खुद को स्त्री हितों के लिए नारीवादी स्वीकार किया। सीमोन ने एक लंबे समय बाद अंतत: स्वीकार किया कि वे नारीवादी हैं।

इसका एक दूसरा पहलू कि इन स्त्रियों के साथ और हजारों स्त्रियों ने मार्क्सवाद के भीतर कि वह लैंगिक संघर्ष के प्रति संवेदनशील बने, क्रांति पुरुषकेन्द्रित होकर ना रह जाए, लंबे समय तक संघर्ष किया। इस प्रयास में पुरुष मार्क्सवादी सिद्धांतकारों बेबेल, एडवर्ड कारपेंटर, विलियम मारिस, हैवलॉक और स्वयं मार्क्स व लेनिन ने भी वैचारिक संरचना प्रस्तुत करने में मदद की। इनके वैचारिक प्रयासों ने मार्क्सवाद के भीतर एकता और संघर्ष को जीवित रखा। सर्वहारा के प्रश्नों को लेकर लड़ी गई लड़ाईयों में स्त्रियों ने बार-बार अपनी भूमिका निभाई, किन्तु उनके सहयोग को भुना लेने के बाद पुरुषकेन्द्रित नेतृत्व ने उन्हें खारिज किया और वापस दहलीज के भीतर लौट जाने का निर्देश दिया। यदि मार्क्सवाद का सर्तक अध्ययन किया जाय तो स्पष्ट होगा कि उसके बुनियादी अस्तित्व में ही समाजवाद और नारीवाद के परस्पर संबंध की संभावनाएँ निहित हैं। यद्यपि ध्यान देने की बात है कि मार्क्सवाद स्त्री शोषण खत्म होने के लिए साम्यवाद का इंतजार करने को कहता है। दूसरी तरफ उसका संकेत क्रांति की ओर जाता है कि बगैर क्रांति बदलाव संभव नहीं।। तो क्या साम्यवाद आने पर मुक्ति स्त्रियों को उपहार की तरह मिल जाएगी? लगभग यही धारणा उन्नीसवीं सदी के प्रारंभिक चरण तक प्रसिद्ध नारीवादियों विलियम थाम्पसन, मेरी वोल्स्टनक्राफ्ट, फ्लोरा टिस्टन, अन्ना विलहर आदि ने बना रखी थी। इस धारणा को तोडऩे में बेवेल की पुस्तक ‘वूमेन एण्ड सोशलिज्म’ ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई। एंगेल्स और बेवेल के विचारों ने नारीवाद की मृत देह में हिम्मत जगाई। इस पुस्तक का ही प्रभाव था कि 1891 में जर्मनी की राजनैतिक पार्टियों में स्त्रियों की समानता को स्वीकृति मिली। बेवेल ने स्त्रियों को आगाह किया कि- ‘जिस तरह मजदूरों को पूँजीपतियों से उम्मीद नहीं रखनी चाहिए उसी तरह स्त्रियों को पुरुषों की तरफ कोई आशा नहीं बाँधनी चाहिए।’ बेवेल का कथन स्पष्ट करता है कि पूँजीपतियों की भाँति पुरुष (कामरेड पुरुष भी) स्त्री के दमन और शोषण की अनुभूति के लिए तैयार नहीं हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि माक्र्सवाद सिद्धांतकार यौनिकता, प्रजाति और वर्गभेद के अंतर्विरोधों को हल करने के बजाय उन्हें छिपा देते हैं। यह प्रक्रिया नए समाज की रचना में अवरोधक की भूमिका निभाती है। जबकि माक्र्स ने स्त्री की प्रगति को सामाजिक प्रगति का सूचकांक माना है। स्त्री की प्रगति को समूचे समाज की प्रगति मानते हुए भी उन्होंने यौन उत्पीडऩ को अपने अध्ययन का विषय नहीं बनाया। माक्र्स का पूरा ध्यान श्रम और पूँजी पर ही केन्द्रित रहा। उत्पीडऩ के प्रश्नों को हल किए बिना स्त्री विषय पर आगे नहीं जाया जा सकता। स्त्री वर्गसीमा से परे केवल श्रमिक है, शोषित है, उत्पादनकर्ता है और यौन शोषण उसका अहम पहलू। वह दोतरफा शोषण की शिकार है-पहला कि, उसके श्रम का, घरेलू श्रम का कोई मूल्य निश्चित नहीं। दूसरा, यौनिक विभाजन और शोषण उसकी उत्पीडऩा का कारण है। माक्र्सवाद ने इन प्रश्नों को टटोला, सुलझाया नहीं बल्कि आगे जाकर दरकिनार किया जिसका परिणाम नारीवाद का जन्म है।

नारीवाद भी प्राण वायु मार्क्सवाद में निहित है, यह सत्य है कि वह मार्क्स के चिंतन से पल्लवित, फलित है कि, मार्क्स के चिंतन ने मानव इतिहास और समाज के सभी पहलुओं का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत किया जिस आधारशिला ने आगे बढक़र श्रम, शोषण, लिंगभेद, वर्णभेद से जुड़ी क्रांति की अवधारणाओं को स्पष्ट परिभाषाएँ दीं। बेवेल के विचारों को और खोलने का काम एंगेल्स की पुस्तक ‘परिवार, निजी-संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति’ करती है। इस पुस्तक में उन्होंने रोजगार को स्त्रियों की मुक्ति का प्रस्थान बिन्दु बताया। एंगेल्स ने कहा कि वे (स्त्रियाँ) सार्वजनिक उद्यम में आएं। इसके पूर्व 1845 में ‘इंग्लैंड में मजदूर वर्ग की दशा’ पुस्तक में एंगेल्स ने स्त्री मजदूरों की दयनीय स्थिति से संवेदित होकर रोजगार को औरतों से, उनके औरतपन के छीने जाने का कारण बताया था। जिसे सुधारकर उन्होंने माना कि श्रम (घरेलू श्रम के अलावा) की दुनिया में कूदकर ही स्त्री अपने आपको और अपने शोषणों को पहचान करेगी। आज नारीवाद की अवधारणा को देहवाद कहकर नाक-भौं सिकोडऩे वाले, वर्गीय क्रांति में स्त्री यौनिकता के प्रश्नों को आड़े मानने वाले, मार्क्स की प्रतिस्थापनाओं पर ध्यान दे। मार्क्स ने अपने अध्ययनों में, जैसे ‘इकोनोमिक एण्ड फिलोसोफिकल मैन्यूस्क्रिप्ट’, ‘जर्मन आइडियोलाजी’, ‘हॉली फैमिली’ से लेकर ‘दास कैपिटल’ तक लगातार स्त्री मुक्ति को श्रम से जोड़ा और कहा कि उत्पादन में स्त्री के जुडऩे से तीन बड़े परिवर्तन होंगे। पहला, पुरुष और स्त्री के संबंध उच्चतर स्तर पर पहुँचेंगे, दूसरा-एक नए तरीके से परिवार का जन्म होगा और तीसरा- श्रमिक स्त्री का अपने बाह्य जगत पर नियंत्रण स्थापित होगा। साथ ही मार्क्स की स्थापनाओं से स्पष्ट होता है कि वे उत्पादन के सामाजिक संबंधों के साथ ही प्रजनन के सामाजिक संबंधों के बदलने से उत्पन्न शोषणमुक्त समाज की तस्वीर पेश करना चाहते हैं। मार्क्स और एंगेल्स के साथ ही स्त्री अधिकारों के प्रश्नों के संदर्भ में अगस्त बेवेल की वैचारिकी, कार्यप्रणाली और उनके लेखन का विशेष योगदान है। उनकी पुस्तक नारी और समाजवाद ने फर्दीनांद लॉसाल के प्रतिगामी विचारों को पनपने से रोका। उन्होंने स्वयं भी सामने आकर लॉसाल पंथियों के पूर्वाग्रहों का विरोध किया। वे (लासालपंथियों) रूसो-अरस्तु और उनके समर्थकों की तरह औरतों को जन्मजात ही पुरुषों से हीन मानते थे। वे उनके किन्हीं भी राजनैतिक-सामाजिक अधिकारों के विरुद्ध थे। जिसका बेवेल, बेल्हेम और उनके समर्थकों ने पार्टी के भीतर ही संघर्ष करके पराजित किया। आज नारीवादियों के अधिकारों के संरक्षण के लिए भी पार्टी और यूनियनों के भीतर ऐसे विरोधों की जरूरत है। बेवल के समय में जो स्थिति जर्मनी में अत: वैचारिक टकराव की थी वही स्थिति उसी समय में यूरोप और अमेरिका की सोशलिस्ट पार्टियों में भी थी। यह समय रूस में समाजवादी क्रांति का था जिसका प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ा। लेनिन ने इसी समय तीसरे कम्युनिस्ट अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की घोषणा के साथ ही ‘अंतरराष्ट्रीय महिला आयोग’ के कार्यों का प्रारूप भी पेश किया। इस प्रारूप के अनुसार सबसे महत्वपूर्ण बात थी कि, लेनिन ने महिलाओं की गुलामी को समाप्त करने के लिए, कम्युनिस्टों को नारी आंदोलन को सर्वहारा के वर्ग-संघर्ष और क्रांति के साथ जोडऩे की जरूरत पर बल दिया था।

लेनिन ने यह भी कहा कि-‘हमारी विचारधारात्मक अवधारणाओं से ही हमारे सांगठनिक विचार पैदा होते हैं। हम कम्युनिस्ट महिलाओं का कोई अलग संगठन नहीं चाहते, महिला कम्यूनिस्ट को पुरुष कम्यूनिस्ट की तरह ही पार्टी के अधिकार व कर्तव्य हासिल है।’ साथ ही लेनिन ने वर्किंग ग्रुप, आयोगों, समूहों, कमेटियों के रूप में पार्टी के अलग अंग बनाने की जरूरत पर भी जोर डाला था ताकि वे स्वतंत्र रूप से स्त्री सर्वहारा के हितों पर ध्यान दे सकें। जिस समय लेनिन अपने विचार रख रहे थे उस समय रूस में भी पार्टी और यूनियनों में महिलाओं की संस्था बहुत कम थी। साथ ही उनके विचारों का पार्टी के भीतर के शुद्धतावादी पुरुषों ने विरोध किया। ध्यान देने की बात है कि लेनिन ने यहाँ कामगार, किसान महिलाओं के साथ ही वे महिलाएँ जो संपत्ति रखती हैं यानी उच्चवर्ग की महिलाओं को भी शामिल किया। मेरी एलाइस की पुस्तक ‘फेमीनिज्म एण्ड द मार्कसिस्ट मूवमेन्ट’ में लेनिन के कार्यों की सराहना की गई है। उन्होंने कम्यूनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में कामगार महिलाओं के जन आंदोलन को सक्रिय करने की जरूरत पर बल दिया। साथ ही सारी दुनिया में समाजवादी नारी आंदोलन को विकसित किया जाय इस हक में क्लारा जेटकिन के प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय कांगे्रस को बुलाने के प्रस्ताव को भी समर्थन दिया। तीसरी कांग्रेस में महिलाओं के विषय में एक प्रस्ताव, पास किया गया- ‘महिलाओं के बीच प्रचार कार्य की थिसिस’ जिसमें कहा गया कि यदि कम्यूनिस्ट क्रांति के पक्ष में महिलाओं  को लामबंद नहीं कर पाते तो प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ उन्हें क्रांति के विरुद्ध संगठित करने की कोशिश करेगी। यहाँ महिलाओं को इक_ा करने के कई प्रस्ताव भी पेश किए गए थे। चौथी कांग्रेस अधिवेशन 1922 में, तीसरी कांग्रेस के इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई। लेनिन से पूर्व मार्क्स ने भी ‘अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ’ की स्थापना के समय स्त्री प्रश्नों के समाधान की जरूरतों को समझते हुए उसकी महिला शाखा की स्थापना की पेशकश की थीं और ब्रिटेन की मजदूर नेता हेनरिश लॉ को संघ का सदस्य बनाया था।

इन प्रयासों में एक नाम एंलेक्जेन्द्रा कोलोन्ताई का और आता है जिसने अपने नारीवादी विचारों को मार्क्सवादी विचारधारा और क्रांति से जोडक़र हमेशा देखा। वे पहली महिला थी जो 1917 की अक्टूबर क्रांति के बाद सोवियत सरकार में समाज कल्याण मंत्री बनी। उन्होंने स्त्रियों के पक्ष में विवाह के भीतर के भीतर कानूनी स्वतंत्रता व समानता, गर्भपात का कानूनी अधिकार एवं समान वेतन के सिद्धांत को सोवियत सरकार में लागू करवाया। उन्होंने मातृत्व के प्रश्न को स्त्री की इच्छा पर निर्भर होने एवं मातृत्व की जिम्मेदारी समाज की जिम्मेदारी है, जैसे प्रश्नों और परिवर्तनों की बात उठाई। मार्क्सवादी नारीवाद दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की जरूरत पर जोर देते हुए कोलोन्ताई ने कहा कि सिर्फ आर्थिक ढाँचा बदल जाने से सांस्कृतिक अधिकार में स्वत: कोई परिवर्तन नहीं आएगा।

इस प्रकार देखा जाय तो मार्क्सवाद के पास नारीवादी प्रश्नों को उठाने और क्रांति में सहयोग देने की पूरी विरासत मौजूद है। इसका सकारात्मक पक्ष था कि रूस में पृथक साम्यवादी सत्ता स्थापित होने पर लेनिन ने इन प्रश्नों को सुलझाने की पहल की जो, पूर्व नारीवादियों ने उठाए थे जिन्हें माक्र्स का भी समर्थन प्राप्त था। यह सच है कि माक्र्सवादी विचारधारा के पास ही ऐसी अंतर्दृष्टि है जो स्त्री प्रश्नों पर सुनियोजित काम करने में सहयोगी होगी। क्योंकि स्त्री के उत्पीडऩ का मामला इतना विसंगतियों से भरपूर है कि उसका उपाय सरल और तात्कालिक नहीं हो सकता। अन्य सामाजिक समस्याओं के साथ-साथ, विशेषकर, मजदूर, किसानों, दलितों, आदिवासियों के प्रश्नों के साथ-साथ वैचारिक प्रतिबद्धताओं के आइने में शनै: शनै: प्रश्नों से जूझने की आवश्यकता महसूस करता है। केवल मार्क्सवाद ही वह धरातल हो सकता है जो क्रांति (सामाजिक एवं ऐतिहासिक) के बीज को पनपने का अनुकूल माहौल बनाता है। यह मानव इतिहास और समाज का व्यापक विश्लेषण करनेवाली विचारधारा है। लेकिन, जैसा कि पूरे विश्लेषण में जरूरत महसूस की गई कि आज के मार्क्सवाद के भीतर वह माहौल बनाने की आवश्यकता है जहाँ, क्रांति के बीज फलफूल सके। पुनर्विचार की आवश्यकता है यहाँ ताकि संगठन शक्तियाँ और सुदृढ़ हों।

भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता विनोद मिश्र के बारे में जनसत्ता में एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसमें खास बात थी कि वे मृत्यु से पहले, अंतर्राष्ट्रीय पूँजी के बदलते चरित्र के बरक्स नई ‘दास कैपिटल’ लिखने की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। यह जरूरत वाजिब भी है किन्तु यही नेतागण विचारधारा में स्त्री प्रश्नों को शामिल करने, पुनर्विचार करने, का आहवान कभी नहीं करते बल्कि ठोस जमीन पर टिके स्त्री प्रश्नों को हाशिए में धकेलने के लिए उस पर प्रति वैचारिकी का आरोप मढ़ देते हैं। स्त्री प्रश्नों को विचारधारा और क्रांति की संभावनाओं के लिए साजिश के रूप में देखते हैं, ऐसी परिस्थितियों में क्या आश्चर्य कि नारीवादियों ने अपनी ढपली अपने राग अलापे। प्रारंभ में ही मैकनिन के वक्तव्य को उठाया गया था जो, स्वस्थ प्रयासों और नारीवाद को समझने की संभावनाओं का वाहक हो सकता है। विनोद मिश्र की तरह ही आज दास कैपिटल के साथ ही मार्क्सवाद के भीतर स्त्री प्रश्नों के लिए पर्याप्त स्पेस और ‘नए घोषणा पत्र’ की भी जरूरत है जो बदलती पूँजी के छल-छद्म, उपनिवेशवादी चरित्र के साथ-साथ यौन विभाजन की तमाम विसंगतियों को अपने खाके में शामिल करे जिसने दुनिया की आधी आबादी को दरकिनार किया है। प्रतिक्रांति की आशंका स्त्री प्रश्नों को हासिए पर धकेले जाने से उभरती है ना कि उन्हें शामिल कर पुनर्विचार की संभावनाओं को खुला आसमान मुहैया कराने से।

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