थोडा तुम बदलो , थोडा हम बदलें ...............!

नाइश हसन  
सामाजिक कार्यकर्ता,विभिन्न देशों में सेमिनारों में पेपर प्रस्तुति. ' एक किताब , स्वतंत्रता आंदोलन का एक विस्मृत सेनानी' प्रकाशित. संपर्क :naish_hasan@yahoo.com>
एक दिन मुझे अमेरिकन एम्बेसी से एक पत्र के माध्यम से ये खबरमिली कि International visitors leadership program के तहत मेरा चुनाव अमेरिका जाने के लिए हुआ है,  जहाॅ मुझे उद्यमिता विकास व अन्य सामाजिक बदलाव , महिला अधिकार की लडाई लडने वाले लोगों से बहुत कुछ सीखने व उनके साथ अपना अनुभव बाॅंटने का मौका मिलेगा। अमेरिका के बारे में बहुत अच्छी और बुरी राय मन में पहले से ही मौजूद थी अपनी हर एक राय को  परखना चाहती थी मैं वहाॅं जाकर। काफी समय मिला मुझे 6 हफ्ते के प्रवास के दौरान चीजों को देखने सीखने और समझने का। मैं वाशिंगटन, फिलाडेल्फिया, शिकागो, अटलांटा, पोर्टलैंण्ड , विस्काॅंसिन, ओकलाहोमा, व टेक्सस गई । इतनी जगह घूमने के बाद मैने बहुत सी बातों को अनुभव किया। हिन्दुस्तानी व अमरीकियों के सोंचने का नजरिया बिल्कुल जुदा है। बहुत सी बातें जो हमारे लिए बहुत प्राथमिक है उनके लिए उसका महत्व नही है। जैसे कि परम्परायें जिस तरह हमारे जीवन का प्राथमिक हिस्सा है उनके जीवन का नही है। मैंने अपने प्रवास के दौरान हर तरह के लोगों से मुलाकात की उनके साथ वक्त बिताया इस लिए मैं अपने कुछ अनुभवों को आप के सामने रख रही हूॅं।

एक दिन मैं फैमिली काउन्सिलिंग सेन्टर और कोर्ट देखने गई । इजाजत लेकर पीछे बैठ गई बस कोर्ट की कार्यवाही देखना चाहती थी, उस समय कोर्ट में दो केस सुने जा रहे थे एक पत्नी के साथ घरेलू हिंसा , व दूसरा शराब पी कर गाडी चलाना । मै करीब 40 मिनट कोर्ट में बैठी। पहले केस में महिला ने केवल पुलिस में एक शिकायत दर्ज की थी कि उसके पति ने उसका गला दबाया है लेकिन वह कोर्ट आना नही चाहती थी स्टेट ने महिला की ओर से एक्शन लिया,  पति कोर्ट में बुलाया गया , उसने अपनी गलती स्वीकारी, कोर्ट से माफी माॅंगी.  परन्तु कोर्ट ने उसे सजा दी और कहा कि उसे 6 माह तक एक मावनाधिकार संगठन में काम करना होगा , जहाॅं उसके बिहेवियर में सुधार के लिए भी काम हेागा,  चॅूॅंकि वह उसका पहला अपराध था इस लिए कोर्ट ने कहा कि यदि दोबारा ऐसा अपराध हुआ तो उसे 6 माह की सख्त सजा सुनाई जाएगी।

दूसरे केस में शराब पीकर गाडी चलाने की गलती पर कोर्ट से मुल्जिम ने माफी भी माॅंगी और ऐसा देेाबारा न करने का आश्वासन भी दिया परन्तु जज ने बहुत विनम्रता से ये कहा कि वो नियमों में बन्धे है और कुछ नही कर सकते और 6 माह की सजा सुना दी गई। फौरन पुलिस मुल्जिम को लिफ्ट से लेकर नीचे उतर गई और जेल पहुॅंचा दिया। इतना त्वरित न्याय देखकर बहुत अच्छा लगा।  मैं जिस कतार में बैठी कोर्ट की कार्यवाही देख रही थी उसी कतार में मेरे ठीक पीछे एक वकील साहब बैठे थे , उनको जब ये पता चला कि मैं हिन्दुस्तान से आई हूॅं , एक एक्टिविस्ट हूॅं, कोर्ट प्रक्रिया देखने आई हूॅं , तो उन्होने केस समाप्त होने के बाद सीट पर बैठे जज साहब से कहा कि आज हमारे बीच इण्डिया से एक खास मेहमान मौजूद है, जज ने मेरा स्वागत किया और कहा कि आप का यदि कोई सवाल हो तो हमसे जरूर पूछें.  दोबारा मेरे आने का शुक्रिया अदा किया , मेरे इसरार पर उन्होने कोर्ट में फोटो खीचने की इजाजत भी दी । मै उनके इस व्यवहार को देखकर मन ही मन बहुत खुश और हैरान थी क्योंकि मैने हिन्दुस्तान में बहुत कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाए हैं,  पर ऐसा कभी नही देखा था। एक बार तो लखनऊ फैमिली कोर्ट के एक जज ने हद कर दी थी -वह पीडित लडकियाॅं,  जो अपने केस की पैरवी के लिए आती थी,  उनके गालों को छूता , छाती को छूता और अपने चैंबर तथा अपने घर में बुलाता. जब हम महिला संगठनों ने काफी हल्ला मचाया तब कही जाकर वह हटाया गया.

मैं मिल्वाकी शहर , जो विस्कान्सिन राज्य का एक बडा शहर है,  के एक पुलिस स्टेशन भी गई ये देखने कि पुलिस किस प्रकार कार्य करती है। चूॅंकि हिन्दुस्तान में एक एक्टिविस्ट होने के नाते मैं जिन लोगों के साथ डील करती हॅंू उन सभी महकमों  को मैं वहाॅं भी देखना चाहती थी , मेरा पुलिस ने बहुत अच्छी तरह स्वागत किया। मुझे अपना पूरा सिस्टम समझाया , उनकी कार्यकुशलता देख का मैं हैरान थी। मैने एक महिला पुलिस से बहनापे वाला सवाल पूछा कि आप लोगों को दूसरे पुरूष सहकर्मियों से हिंसा का सामना तो नही करना पडता, तो उसने बहुत तपाक से जवाब दिया नही ऐसा कभी नही होता । मैने ये भी देखा कि हिन्दुस्तानियों को अमरीकी बहुत इज्जत की निगाह से देखते है, हमारी डेमोक्रेसी की बहुत कद्र करते है, हिन्दुस्तानियों को बहुत बुद्धिमान  और मेहनती मानते है, ये बुद्धिमानी  और कडी मेहनत हम दूसरे देश  में जाकर क्यों करते है अपने देश में क्यों  नही ये मेरी समझ में ठीक से नही आता।

पुलिस महकमें  की बहुत इज्जत है , सडक के नियमों का पालन न करने पर आप पुलिस को 10 , 20 या 50 डालर देकर अपना काम नही बना सकते गलती पर फाइन देना ही होगा, पुलिस पैसों में नही बिकती, नियमों का पालन करवाती है, लोग नियमों का पालन करते भी है , आमतौर पर ईमानदारी है,  दुकानों में ठगी भी नही है। पुलिस और कानून दोनो के आदेशों का ही त्वरित और सख्ती से पालन होता है।

मैं एक तजरबा आप के साथ और शेयर करना चाहती हूॅं । एक दिन मैं विस्कान्सिन स्टेट की कैपिटल मैडिसन में कैपिटल बिल्डिंग देखने गई । मुझे से नही मालूम था कि वो मुझे अन्दर भी जाने देंगे क्योंकि मैं आजतक कभी लखनऊ विधानसभा के अन्दर दाखिल नही हो पाई हूॅं वहाॅं जाने की इजाजत आम लोगों को नही है ।  वहाॅं अन्दर जाकर बहुत अच्छा लगा। एक गाइड ने हम लोगों को पूरी कैपिटल बिल्डिंग की सैर कराई.  बहुत से अमरीकी लोग अपने छोटे छोटे बच्चों को कैपिटल बिल्डिंग दिखाने लाए थे । उनसे बातचीत होने लगी उनका कहना था कि बच्चा अपने संविधान, पार्लियामेन्ट सीनेट आउस, सुप्रीम कोर्ट, गवर्नर कार्यालय को यदि नही देखेगा , उसके बारे में जानकारी नही रखेगा तो उसमेे अपने नेशन के लिए रिस्पेक्ट कैसे डेवलप होगा , वहाॅं मौजूद गाइड , जो सरकार की तरफ से तैनात था,  उसका  सिर्फ यही काम था कि आने वाले लोगों को उसके विकास का इतिहास बताए सब जानकारियाॅं मुफ्त प्रदान करे । ये भी देखा कि डेमोक्रेट व रिपब्लिकन पार्टियाॅं कहाँ  बैठ कर बहस करती है और वहाॅं एक तरफ ऊपर के हिस्से में बैठकर आम जनता को ये देखने का हक है कि वो लोग क्या चर्चा कर रहे है। ये सब अनुभव हमारे सीखने के लिए बहुत महत्वपूर्ण थे शायद कभी हम भी इन बातों को अपना पाएॅं।

कैपिटल बिल्डिंग के अन्दर जाकर भी आम लोगों को सरकार के किसी भी कृत्य  के खिलाफ धरना प्रदर्शन  करने का हक है । मैं एक महिला के साथ,  जो वहाॅं गवर्नर के खिलाफ धरने पर बैठी थी उन्हें समर्थन देने के लिए धरने में शामिल हुई । वहाॅं लोगों की इज्जत बहुत है पोजीशन होल्ड करने वालों के पीछे लोग नही भागते, अपना काम कराने के लिए किसी नेता को अपना सरपरस्त बताना फख्र की बात नही है आप का काम अपने आप ही सिस्टम में हो जाएगा बगैर किसी बडे नाम का हवाला दिए। क्लास और कास्ट सिस्टम से समाज मुक्त है।

मेरे नजरिए में अमेरिका के बारे में एक बडा बदलाव तब आया जब मैने वहाॅं के आम लोगों को,  जिनका राजनीति से कोई लेना देना नही है ये कहते सुना कि जार्ज बुश  की विदेश नीति बहुत गलत थी , विशेष तौर पर अफगानिस्तान के मामले में । लोगों ने कहा कि बुश ने राष्ट्रपति बनने से पहले कभी अफगानिस्तान की यात्रा तक नही की थी,  लेकिन अफगानिस्तान के खिलाफ इतना बडा मोर्चा खोल दिया। उन्होने ये भी कहा कि देश भक्ति के नाम पर चन्द पैसों के लिए कम पढे लिखे गाॅंव के गोरे अमरीकियों को ईरान, ईराक, अफगानिस्तान या अन्य देशों में युद्व के लिए झोक दिया जाता है और लौटने पर उन्हें उनकी उचित कीमत भी नही दी जाती , तमाम ऐसे लोग जो युद्धों  से लौट कर आए , है वो आज भी अपने एक अदद आशियाने के लिए तरस रहे है सरकारी शेल्टर होम में जिन्दगी गुजार रहे है। सरकार उनकी कोई मदद नही कर रही है। मौजूदा सरकार के काम काज से भी असन्तुष्ट लोग सवाल खडे कर रहे है।  नीतियों की खुलकर आलोचना करना और किसी प्रकार की ओछी राजनीति किए बगैर अपनी बात खुल कर कहना,  ये एक अच्छे नागरिक की मिसाल देखने को मिली ।

जहाॅं तक महिलाओं की आजादी का सवाल है.  वो हर जगह नजर आई,  औरत की इज्जत नजर आई,ऐसा नही लगा कि कोई महिला किसी काम के लिए इनीशिएटिव ले रही हो,  तो वो मखौल बनाई जाए या उसे खराब औरत की श्रेणी में डाल दिया जाए, या यूॅं ही उसे कमतर समझकर उसकी बात ही न सुनी जाए, या उसे इस काबिल ही न समझा जाए कि उससे किसी मसले पर राय बात की जा सके। जैसा कि रोजमर्रा की जिन्दगी में हम औरतें यहाॅं अनुभव करती है। मैने 6 हफ्ते के प्रवास के दौरान एक भी बार सडक पर हिंसा का सामना नही किया मेरे कानों ने एक भी बार कोई भद्द्ी टिप्पणी नही सुनी , किसी ने मेरे शरीर को छूने,  चुटकी काटने , अश्लील हरकत करने जैसा कृत्य नही किया, न ही किसी ने अश्लील इशारा ही किया। कुल मिलाकर मैने अपने आप को बहुत ही सुरक्षित महसूस किया,  सडक पर।  जो कि दुर्भाग्य से हम अपनी माटी में नही देखते। किसी भी उम्र की लडकी, जवान व बुजुर्ग महिला भी सडक पर हिंसा का शिकार होती ही है।



एक आम लडकी को सडक पर चलते समय वो डर नही सताता कि कोई उसका दुपट्टा खीच कर चला जाएगा, उसको धक्का देकर उसी लडकी को गलत साबित करके चला जाएगा, चार शोहदे हल्का अन्ध्ेारा होते ही अकेली जा रही लडकी को घेर लेंगे और यौन हिंसा करेंगे। ये डर हिन्दुस्तान में जरूर सताता है हर लडकी को जो घर से बाहर कदम रखती है। इसका मतलब यह कतई  नहीं है कि अमेरिका में महिला हिंसा नही है.  वहाॅं भी महिलाओं ने काफी संघर्ष किया है, पितृसत्ता  की जडें वहाॅं भी जमी रही है। रेप की घटनाएॅं भी घटित होती हैं . लेकिन उन जडों को हिलाने में सरकार व महिला आन्दोलनों ने अपनी अहम भूमिका निभाई है। इसी लिए उसका असर नजर आता है। महिला हिंसा का रूप इतना भयावह नही है जितना कि हिन्दुस्तान व अन्य पडोसी देशों  में देखने को मिलता है।

शिकागों के महिला शेल्टर होम 'अपना घर' जो 20 बरस पहले हिन्दुस्तानी औरतों ने प्रारम्भ किया था और ' हमदर्द  सेन्टर',  जो महिलाओं के संरक्षण का काम करता है में बहुतेरी अमरीकी और दक्षिण एशियाई महिलाए नजर आई जो अपने शौहर द्वारा जबर्दस्त मार पिटीई की शिकार हुई थी।

एक और अनुभव आप के साथ बाॅंटूगी । सच कहूॅं तो मैने अपने देश  में पहले कभी इतनी बुर्कापोश औरतें नही देखी,  जितनी अमेरिका में देखी । ज्यादातर मुसलमान औरत बुरके में थी । 9/11 के बाद शायद आइडेन्टिटी क्राइसिस का सवाल इतना बडा हो गया है। ये वाजिब भी है कि जिस देश में अपनी पहचान खतरे में पड जाए वहाॅं पहचान को बहुत मजबूती से बयाॅं करने की कोशिश की जाती है, लेकिन एक सवाल और यहाॅं खडा हो जाता है कि क्या आइडेन्टिटी क्राइसिस या पहचान को पुख्ता बना कर सामने रखने की जिम्मेदारी भी औरत पर ही है  ? मर्दो ने तो कोई अरबी लिबास नही पहना हुआ था,  वो तो अपनी पहचान एक आम अंग्रेज मर्द की तरह ही दिखा रहे है , हाॅं कुछ के दाढी थी लेकिन बुर्के के अनुपात में बहुत ही कम। अगर एक कौम की पहचान उसकी औरतों से है तो फिर औरतों को एक खास दर्जा भी मिलना चाहिए,  वो कही नही दिखा। मजहब के नाम पर औरत को नियन्त्रित करने की घटिया सियायत भी काफी नजर आई , जिसमें अमरीकी मुसलमान औरत वहाॅं के ऐश  आराम तो उठाए लेकिन रौशन खयाल न बन पाए। इसकी मिसाल देना चाहूॅंगी मैं एक मुस्लिम वुमेन सेन्टर देखने गई वाकई बहुत अच्छा लगा उनका काम देखकर । वही की एक साहिबा जो मेेरे काम से बहुत खुश  हुई और मेरे लिए दुआ करते हुए मुझे एक बुर्का तोहफे के तौर पर दिया और ये कहा कि इन्शाअल्लाह आप जल्दी की कौम की खिदमत करते हुए पर्दा भी करने लगेंगी।

ये सवाल औरतों को भी समझना पडेगा कि बुर्के की वकालत कुरान नही पितृसत्ता कर रही है और औरत को हथियार बनाकर इस्तेमाल कर रही है। इस्लाम को सही तरह से समझना होगा वो हक जो अल्लाह ने हमें दिया और पित्रसत्ता ने उसे छीन लिया हमे वो हक वापस लेना होगा, गलत और भेदभाव पूर्ण नीतियों के प्रति सवाल भी खडा करना होगा।

अन्त में मैं इतना कहना चाहती हूॅं कि इतने नियमों,  सख्त कानूनों के बाद भी प्रतिवर्ष अमेरिका में औसतन 250 लोगों को सजाए मौत दी जाती है । ड्रग्स और गन उनकी समस्या की जड में मौजूद है। कोई भी व्यक्ति बन्दूक रख सकता है । चॅूकि अमेरिका की आजादी (4 जुलाई 1776) के बाद उनके संविधान में सुरक्षा के अधिकार को अधिक महत्व दिया गया और संविधान में अपनी सुरक्षा हेतु हथियार के प्रयोग को मना नही किया गया। इसी कारण आज तक जब कि गन अमेरिका में एक मुसीबत का रूप लेती जा रही है राजनीतिक पार्टियाॅं गन के नाम पर सियायत कर रही है। आए दिन ऐसी घटनाएॅं सामने आ रही है जब कोई बच्चा/युवा गन लेकर किसी सार्वजनिक स्थल पर पहुॅंचता है और एक साथ कई लोगों को मौत के घाट उतार देता है । चूॅंकि अमेरिका में 50 प्रतिशत परिवार,  टूटे परिवार है,  इसलिए बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं । हर 5 अमरीकी बच्चों पर एक पिता होता है,  देखभाल करने के लिए। इससे बच्चों की परवरिश  ठीक से नही हो पाती, उनमें अकेला पन और कुंठा पनप जाती है, उन्हें माॅं बाप दोनो का प्यार व देखभाल नही मिल पाती , बच्चे असुरक्षा में बडे होते है। परिवार टूटने के बाद अधिकतर बच्चे माॅंओं के साथ ही रहते है, पिता अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नही निभाता। बच्चे अपनी भावनाओं को शेयर नही कर पाते और कभी -कभी  स्थिति हिंसक बन जाती है।

एक और बात जो अमरीकियों को सीखनी जरूरी है वो ये कि पहले हम ऊर्जा को बर्बाद करते है उसके बाद ग्रीन इम्पावरमेन्ट की बात करते है, प्रतिवर्ष 6 बिलियन डालर सिर्फ टायलट पेपर बनाने में खर्च हो जाता है , शौचालयों  में इतना पानी बर्बाद होता है , सीट से उठते ही फ्लश टैंक से पानी अपने आप आने लगता है , लेकिन शौच के लिए पानी कही नही होता। दूकानों में लाइट हमेशा आन रहती है, शटर गिरने के बाद भी बत्ती नही बुझती संसाधनों का अधाधुन्ध गलत इस्तेमाल होता है ,अधिकतर चीजें रिपेयर नही होती,  खराब होने पर फेंक दी जाती है। इस मामले में काश अमेरिका हमारी तमाम खूबियाॅं सीख पाता, हालाकी हम भी संाधनों का बेजा इस्तेमाल करते है,  लेकिन उतना अधिक नहीं। इसके अलावा परिवार को जोडे रखने , रिश्ते निभाने की कला, रिश्तों के मायने सीख पाता, उसके मर्म को समझ पाता, और हम उनसे एक बेहतरीन वर्क कल्चर, लोगों को सम्मान देना सीख पाते, हमारी शिक्षा  का स्तर भी उनके जैसा ऊॅंचा हो पाता और हम दोनो देशो  को मोकम्मल पुरखुलूस और खूबसूरत बना पाते , उम्मीद है वो दिन जरूर आएगा। थोडा वो बदलेंगे थोडा हम बदलेंगे और हम मिलकर एक बेहतर दुनिया बनाने की अगुवाई करेंगे।

कई अमरीकी परिवारों ने हमें अपने घर दावत पर बुलाया कभी गाॅंधी का जिक्र किया,  तो कभी भारत पाकिस्तान बटवारे का दर्द हमारे साथ साझा किया । मार्टिन लूथर किंग के घर जाना , उनके मेमोरियल को देखना , हमारे अन्दर एक हिम्मत और जोश को भर देता है।  जहाॅं रंग भेद अपने चरम पर था,  ऐसे में एक लम्बी लडाई लडना अपनी जान गवां कर,  इस भेद को मिटाना एक हौसला देता है कि हम भी औरत के अधिकार की लडाई हिन्दुस्तान सहित पूरी दुनिया में हिम्मत से लडेंगे . एक दिन हम भी मार्टिन लूथर किंग के मशहूर भाषण  ' आई हैव ए ड्रीम टुडे' की तर्ज पर अपने ड्रीम को साकार करेंगे।
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