धारावी

राजकुमार राकेश  
चर्चित कथाकार . चार उपन्यास और चार कहानी संग्रह . दो कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन - ' आपातकाल डायरी ' और 'अश्वमेध' संपर्क :7087799025
राजकुमार राकेश की यह कहानी थाने की केस डायरी में बिखरा मुम्बई के सबसे बड़े स्लम ' धारावी' का जीवन  है- वह जीवन, जो नायिका समीरा की कहानी बन जाता है, जब वह ब्याह कर 'मंडी' की सुकून भरी जिंदगी से धारावी की एक खोली में आ बसती है . महानगरों के चकाचौंध में कुछ जिंदगियां यूं रेंगती भी हैं. 

इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर ने कुर्सी पर बैठे -बैठे, जरा सा पहलू बदलकर कहा, ‘हे समीरा, मला तुशचा विषयी पूर्ण सहानुभूति आहे...देखो, मुझे तुमसे पूरी हमदर्दी है। मगर पोलीस-फ़ोर्स में हम लोगों को कुछ कायदे-क़ानून में रहकर काम करना होता है। सो केस के हर पहलू पर पूछताछ करना हमारी ड्यूटी बनती है। और शुभा म्हात्रे की मौत का ये मामला गंभीर भी है। या तो ये आत्महत्या है या फिर सीधा सीधा क़त्ल का मामला है। इसलिए तुमसे पूछताछ करना जरुरी है। पूछताछ का मतलब किसी को दोषी करार देना नहीं होता।’
       
समीरा की जीभ सूख रही थी। पानी का गिलास उसके सामने था जरुर, पर जितना बार वह पानी पीने की कोशिश करने लगती उसे पानी पीने के प्रति नफरत के भाव उमड़ आने लगते। इन्स्पेक्टर की बात सुन लेने के बाद उसने गिलास को उठाया और होंठों से लगाकर जबरन दो घूँट पीने के बाद वापस इसे मेज़ पर रख दिया। ‘समीरा,’ इन्स्पेक्टर शीतल ने कहा। ‘भ्याम्चे काही कारण नाहीं...डरने की कोई बात नहीं है। बस ये समझ लो कि बतौर इन्क़ुएरी-अफसर मुझे सच तक पहुंचना है। इसमें तुम्हें मेरी मदद करनी होगी। इससे ज्यादा कुछ नहीं।’
मीरा ने जवाब दिया, ‘जो जानती हूं, वो सब मैं बता देगी। आपको जो पूछना है पूछ लो।’
‘धन्यबाद,’ इन्स्पेक्टर ने कहा। ‘समीरा, मुझे तुमसे यही उम्मीद थी। सबसे पहले तो तुम अपने बारे में तफसील से बताओ। ये मत सोचना मुझे तुम्हारी निजी ज़िन्दगी में कोई दिलचस्पी है, मगर उतना तो जरुर है, जितना इस केस में मुझे जानना चाहिए।

 समीरा ने जबरन सा मुस्कुराने की कोशिश की और इसमें असफल रह जाने के चलते, बिना मुस्कुराए बोलने लगी, ‘मेरी ज़िन्दगी में ऐसा कुछ नहीं है जिसे छिपाया जाना जरुरी हो या जिसे बताकर ही आपको ऐसा कुछ लगे कि वाहजी, ये भी क्या ज़िन्दगी थी। ऐसा वैसा कुछ नहीं। पर अगर शुभाजी के उस ख़राब तरीके से मर जाने की तफ्तीश में इससे आपको मदद मिलती है तो मैं जरुर बताऊँगी।’ आगे वह पूरी सपाटता से बयान करने लगी और इन्स्पेक्टर शीतल ने अपने कान उसके मुंह से निकलते कथनों पर केन्द्रित किये। समीरा ने शुभा म्हात्रे की मौत से अगले दिन से शुरू किया था, जब वह काम पर चली आ रही थी और सोसाईटी के अहाते में लोगों की भीड़ थी, पर उसे रत्तीभर भी अहसास नहीं हुआ था कि यहां किसी की लाश पडी है। जब वह गेट के अन्दर आई तब दोपहर के दो बजने में अभी पांच मिनट बाकी थे। जब वह गेट से आगे निकली, तो उस भीड़ की तरफ उसका सरसरी तौर पर ध्यान जरुर गया था। आसपास पोलिस के कुछ लोग असावधान सी मुद्राओं में हलकी चहलकदमी कर रहे थे। पर उसी सरसरी सी नज़र से ये देखकर वह आगे बढ़ गई थी। किसी ने उसकी तरफ ध्यान तो नहीं दिया, पर पता नहीं क्यों अनायास उसके दिल में एक धडाका सा बैठ गया था। खुद को संयत बनाए रखने के लिए उसने इस तर्क के साथ अपने आपको तसल्ली दी कि क्योंकि आज इतवार है, तो लोगबाग जरा फुर्सत में हैं। वैसे भी उसे ऐसी कोई गरज नहीं थी कि वह संसार की गति पर ध्यान दे। उसे रोजाना की तर्ज़ पर डाक्टर म्हात्रे के घर में अपना काम निपटाना था और ठीक वक़्त पर अपने घर धारावी को लौट जाने से ज्यादा कुछ देखने सुनने की उसे जरुरत या फुर्सत नहीं थी।

वह लिफ्ट में चढ़कर आठवीं मंजिल पर आ उतरी। पर ज्यों ही उसने डाक्टर म्हात्रे के घर के द्वार की तरफ कदम बढ़ाया तो सामने महाराष्ट्र पोलिस के दो सिपाही खड़े दिखे थे। उसने पास जाकर उनसे एक ओर हटने का इशारा किया तो फीतीवाले सिपाही ने पूछा, ‘तु कोण आहेच?’ समीरा ने सामान्य सा जवाब दिया, ‘मैं बाई! डाक्टर म्हात्रे के इस घर में काम करती।’
         फीतीवाले पोलीस ने कहा, ‘आज घर उघडणार नाहीं। म्हात्रेच्या बाथको हत्या केली आहे। म्हात्रे की जोरू की हत्या...तुला माहिनी नाही? तुझे पता होना चाहिये था, तू इस घर में काम करती है।’
          समीरा की जीभ गले में अटक कर रह गई और होंठ अचानक सूख गए। जब तक वह खुद को संभाल पाती, उस फीतीवाले पोलीस ने कहा, ‘या घराला सील केले गेले आहे। पर्यंन आन मध्ये कोणी ही जाऊ वाकल नाहीं…ऐसेइच अन्दर नाहीं जाने का। सुना क्या? कोई अन्दर नहीं जा सकता है। इस घर को सील कर दिया गया है।’
 कुछ पलों तक विमूढ़ सा खड़े रहने के बाद, समीरा के सिर पर जैसे अचानक कोई गाज गिर आई थी। विश्वास नहीं हो रहा था कि शुभा म्हात्रे नहीं रहीं, पर तत्काल ये ख्याल भी चला आया कि इन पोलीस वालों ने इस घर को कोई यूं ही तो सील नहीं किया होगा। जरुर कोई बड़ा कारण रहा होगा। वह भीतर तक कांप गई थी। कुछ लम्हों के बाद उसने खुद को जरा संभाला और कहा, ‘मेरे पास इस घर की चाबी है।’ पोलीस वाले ने कुछ देर तक चलने वाली सोच की अपनी मुद्रा में दिख सकने वाला व्यवधान डालते हुए, अपने हाथ में पकडे वाकी-टाकी सिस्टम पर किसी के साथ बात करना शुरू कर दिया। उधर से दूसरे आदमी की आवाज़ सुनाई देने लगी थी। वह मराठी में बोल रहा था कि इस औरत से चाबी अपने कब्ज़े में लेकर फर्द बना लो और इसे फरमान दो कि जब जरुरत होगी तुम्हें बुला लिया जाएगा। याचा पता-ठिकाणा लिहून ध्या। ठीक से लिख लो इसका पूरा पता ठिकाना...जरुरत पड सकती है ! फीती-वाला द्वार से पीछे की ओर मुडा और खुले बरांडे को लांघकर, पीछे की तरफ बनी चपड़ी के पास आ गया। उसने अपने एक हाथ में पकडे वाईरलेस हैंडसेट और दूसरे में पकडे फाईल के पुलिंदे को इस चपड़ी पर रखा और अपनी छाती पर बनी जेब में से पैन निकालकर आधी गर्दन पीछे की ओर घुमाकर अपने साथी पोलीस से बोला, ‘आप्टे, वा बाईला माश्या जवळ पाठवुन दया।’ समीरा को उसके बोलने का ये अंदाज़ अच्छा नहीं लगा, आखिर क्या मतलब ये कहना ‘आप्टे, उस औरत को मेरे पास भेज,’ ये बोलने का कौन सा तरीका हुआ पर इससे पहले कि उससे कुछ कहा जाता, वह खुद ही चपड़ी के पास तक चली आई।
 
फीतीवाले ने चाबी उसके हाथ से लेकर चपड़ी पर रख दी और उससे उसका खुद का नाम, पति का नाम, पूरा पता बगैरह पूछा और अपने कोरे कागज़ पर चेप लिया। ‘धारावी मध्ये तुला ओल थणान्य दोन प्रौढ़ माणसांचे नाव पते लिहून ध्या...धारावी में तुम्हें जानने वाले दो व्यस्क व्यक्तियों के नाम और पते लिखवाओ।’ उसने एकदम जैसे शाही से अंदाज़ में आदेश दिया। समीरा को तत्काल कुछ नहीं सूझा कि आखिर वह किसका नाम और पता लिखवाये। ‘तिकडे तुला कोणी ओलखन नाहीं...उधर तुम्हें कोई नहीं जानता?’ जरा सी देर में उसने वापस पूछा था। एक बार फिर को समीरा असमंजस की हालत में बनी रही। लेकिन उसे समझ आ गया था कि कोई दो नाम बताये बगैर जान छूटने वाली नहीं है। उसने दिमाग पर ज़रा जोर डाला, ऐसे दो नाम कौन हो सकते हैं, तो अनायास पहला नाम जो उसे सूझा वह इशु का था। वही अपने पडौसियों का लड़का जो अक्सर अपने घर के झगड़ों से तंग आकर उसके यहां अपना रोना धोना करता रहता है और इधर ही कुछ कौर खाकर बाहर गली में पड़ा रहता है। कल शाम आया ही था। उसने उसका नाम लिया तो फीतीवाले ने कहा, ‘पूरा नाम बोलो...पूरा नाव सामा आणि याचा एड्रेस भी दया... और उसका एड्रेस भी दो।’ समीरा तो उसे ईश्वा ही बोलती थी, पूरा नाम उसे मालूम नहीं था, कभी जानने की जरुरत ही महसूस नहीं हुई थी। पर पता तो वह दे ही सकती थी। फिर उसे याद आया उस इशु के दोस्तों को उसने अक्सर कटारी-कटारी पुकारते सुना है। उसने उसका नाम इशु कटारी लिखवा दिया। पर इसके बाद दूसरे नाम पर उसे खासी मुश्किल पेश आई। एक बार को मन में आया कि उस लडकी अर्चना त्रिपाठी का नाम दे दूँ, जो कल शाम उसे धारावी कालेज के गेट के पास मिली थी, पर मन में झिझक पैदा हुई कि आखिर वह उसे जानती कहाँ है। पर दूसरा कोई नाम तत्काल याद नहीं आया तो उसने साहस बटोरकर अर्चना त्रिपाठी का ही नाम लिखवा दिया। पता अनुमान से लिखवाया। पास ही तो उसका घर था, ऐसे में अनुमान करना ज्यादा मुश्किल हुआ नहीं।

इस कारवाई के पूरा हो जाने के बाद फीतीवाले ने उसे जाने की इजाजत दे दी। वह जाने के लिए सामने लिफ्ट की तरफ मुडी तब उसके दिमाग में एक सवाल जरुर घूम रहा था कि आखिर इस पोलीसवाले ने किसी कागज पर उसके दस्खत काहे न लिए होंगे? और उसका मोबाईल नंबर भी नहीं पूछा। पर उसे ये दोनों बातें अच्छा ही लगीं। वह दस्खत लेना भूल गया, वर्ना क्या मालूम किस सांसत में जान जा फंसती। उसने एक लम्बी सी चैन की सांस ली और लिफ्ट के अन्दर चली आई। लिफ्ट जब नीचे खिसकने लगी तब उसे जैसे अनायास शुभा म्हात्रे के इस संसार में न रहने की याद वापस लौट आई, मानो अभी तक उस पुलिसिया कारवाई के दौरान उसे यह तथ्य याद ही नहीं रहा था कि वे इस संसार से जा चुकी हैं। उफ़्फ़! उसकी अगली सांस में अब बेचैनी थी। बहुत हौले क़दमों से वह सड़क के किनारे पर चलने लगी। पिछले तीन साल में मालाड के इस इलाके में ये उसके लिए पहला मौका था जब वह फुर्सत में थी। वापस घर पहुँचने की उसे कोई जल्दी नहीं थी बल्कि मुंबई की ज़िन्दगी के इन तीस सालों में ये फुर्सत शायद उसे पहली बार को मिली थी। उसने ऑटो किराए पर लेने की बजाये रेल-स्टेशन तक पैदल चल देने का मन बनाया ताकि शुभा म्हात्रे के न रहने की याद को भुलाए रखा जा सके, पर चलती बार उसे यही कौंच परेशान करने लगी कि आखिर उस औरत को इस तरह अचानक मर जाने की ऐसी क्या जरुरत आन पडी थी। पल भर के लिए उसे उसके पति डाक्टर आशाकिरण म्हात्रे पर भी शक हुआ, लेकिन इससे पहले ही कि ये शक उसके अन्दर पुख्ता हो पाता, उसने इसे जबरन बाहर झटक दिया। बाहर निकल आने के बाद उसके ज़हन में पिछले कल का दिन चला आने लगा। उसने इसे रोकने की जरुरत नहीं जानी। आखिर सिर्फ इस एक दिन में ऐसा क्या हो गया है कि शुभा महात्रे को अपनी जिन्दगी होम कर डालनी पडी।

 ज्यों ही काम खत्म हुआ था, वह हाथ पोंछती हुई ड्राइंग रूम में चली आई थी, फिर इधर एक किनारे पड़ा अपना खाली झोला उठाया और घर की मालकिन शुभा महात्रे के पास आकर बोली, ‘मेम साहेब! अब मैं जाती!’ दोपहर-बाद जब समीरा इधर काम पर आई थी, तब भी शुभा यहीं सोफे पर लुढकी-सी गटकती चल रही थी| उसने अपनी कलाई घड़ी पर नजर डाली। सात बजने में दस मिनट बाकी थे। मतलब शुभा म्हात्रे इसी हालत में पांच घंटे से ज्यादा वक़्त से थी। बीच बीच में वह कभी बडबडाने भी लगती थी, पर समीरा ने उस तरफ ज्यादा ध्यान दिया नहीं। ये मालिक लोग अपनी निजी ज़िन्दगी में क्या करते हैं, इससे उसने कभी मतलब रखा नहीं। हमेशा की तरह उसे अपना काम निपटाने की जल्दी थी। इन साहिब लोगों की ज़िन्दगी में दखल देने की उसे कोई जरुरत नहीं थी। अलबत्ता, सौजन्यवश, आज उसने अपना काम निपटाते हुए और अपने हाथ रोके-टोके बगैर उसके साथ उसकी मनपसंद किस्म की चंदेक अन्तरंग बातें जरुर की थीं। शुभा का स्वभाव अजीब अंतर्विरोधी किस्म का था। कभी वह एकदम हल्की-फुल्की होकर बहुत नज़दीकी से बातें करने लगती तो कभी एकदम रूखी होकर अचानक फट पड़ती थी। मानो उससे ज्यादा खूंखार व्यक्ति संसार में दूसरा कोई न हो| पर आज ऐसा-वैसा कुछ नहीं हुआ था। जैसे वह खुद ही से खासी नाराज़ हो। बीच में कभी अपने दुखों को लेकर रोने लगती तो कभी अपने पति डाक्टर म्हात्रे को कोसने-धिकारने लगती, मानो वह समीरा से संवेदना पाने की दरकार कर रही हो। बीच में समीरा ने उसे दोएक बार को इतना भर जरुर टोका था कि आज आप कुछ ज्यादा पी ले रही हैं, मगर उसे मालूम था कि उसकी ऐसे किसी परामर्श का कोई फायदा होने वाला नहीं है, तो उसने ज्यादा जोर नहीं डाला। पर उसने इन पांच घंटों में अपना ये कार्यक्रम अपलक जारी रखा था। और बीच बीच में रोते चलना भी।

 यूँ समीरा के लिए यह पीना पिलवाना देखते चलना कोई ऐसा अजब गजब काम भी नहीं था, कि इसे वह पहली बार को देख रही हो। रोज़ ब रोज़, जब समीरा इधर आती है तो वे दोनों बहुधा घर पर नहीं होते। उसके पास द्वार की चाबी रहती है, आई, द्वार खोला, पांच घंटे में अपना काम निपटाया और वापस चल दी। इतवार के दिन जब आशाकिरण म्हात्रे घर पर होते हैं तब दोनों जने अक्सर इस पीने के काम में मज़े लेते और मस्त रहते हैं। आशाकिरण म्हात्रे हड्डियों के जाने-माने डाक्टर है और पवाई के हीरानंदानी स्थित एक बड़े हस्पताल में काम करते हैं। पर आज का ये दिन बहुत कुछ अलग किस्म का था। गुजरे पांच घंटों में शुभा ने एक से ज्यादा बार समीरा को अपने पास बुलाकर इस शिकायत को तूल देने की भरसक कोशिश की थी कि ‘वह’ मेरा ख्याल नहीं रखता और इतना कमीना और विश्वासघाती आदमी है, कि उसने मेरे हिस्से में सिर्फ दुःख दिए हैं। बीच में दो बार वह मुखर जुबान में ये शिकायत कर चुकी थी कि इसके साथ काम करने वाली एक डाक्टर किसी सुधा श्रीवास्तव के साथ इसके मुन्ह्काले वाले रिश्ते ‘भी’ हैं! ऐसी हर शिकायत के बाद उसकी सुबकियों का लम्बा सिलसिला चलता और फिर वापस अपनी उसी दुःख-गाथा का टेप। तो समीरा के ‘मैं अब जाती’ कहने भर की देर थी कि शुभा ने एक कडियल व भैंगी सी नजर से उसकी तरफ देखा। कुछ पलों के लिए खामोश रहने के बाद वह लडखडाती हुई रुआंसी जुबान में बोलने लगी: ‘जा! तू भी जा, लेट दैट बास्टर्ड गो! अब देखना कैसे मैं इसका घटस्पोट कर देती है! हरामी कहीं का! खुद को समझता क्या है। डुकरा कहीं का। पूरे का पूरा सूअर। इसको माफी न देने का!’
             ‘मेम साहेब, ऐसा खोटा न बोलने का,’ समीरा ने कहा! ‘अपने आदमी को इस माफिक बुरा क्यों बोलने का। और अब बस पीना बंद करने का। चलो मैं आपको बेडरूम में छोड़ देती।’
             ‘मैं इससे ज्यादा दुःख बर्दाश्त नहीं कर सकती,’ शुभा ने कहा! ‘इस बास्टर्ड को मैं ठिकाने लगाऊंगी जरुर। इसको मैं माफी नहीं दे सकती! घटस्पोट करके रहेगी! डाइवोर्स! नो अदर वे!’

समीरा ने उसे सहारा देकर उठाया और बेडरूम में लेजाकर बिस्तर पर लिटा दिया! जब वह वापस मुड़ने को थी तो शुभा ने उसे जैसे किसी करुणाजनक पुकार से वापस बुलाया और ऐसी याचना में दिखी मानो उससे न जाने का आग्रह कर रही हो! समीरा रुक गई! शुभा अब बिस्तर में पडी रुआंसे और अस्पष्ट स्वर में बोलने की कोशिश कर रही थी, ऐसा कुछ जो बहुत साफ़ सुनाई भी नहीं दे रहा था, बल्कि असल में सुनाई भी दे रहा था! ‘ब्रिंग में अ लार्ज पेग। समीरा प्लीज़। एक भरकर ला।’ वह ऐसा ही कुछ कह रही थी! समीरा ने उसे टोकना चाहा कि अब आगे पीते चले जाना ठीक नहीं रहेगा, पर वह रोने लगी थी। समीरा ने बाहर आकर गिलास भरा और उसके सिरहाने रखकर वापस मुडी। ‘मेम साहेब, मैं जाती अब, अपना ख्याल रखने का,’ उसने कहा और बाहर कदम बढाते हुए, उस वक़्त की लम्बाई के बारे में सोचने लगी जो उसे हर रोज़ धारावी तक पहुँच पाने में लगता था। वह द्वार से बाहर निकल आई और इसके जालीदार किवाड़ को बंद कर दिया। वह एक निश्चित आवाज करने के बाद औटोमैटिक ढंग से लॉक हो गया। समीरा ने एक बार को वापस इसके बंद हो जाने की तसल्ली की और सामने बेजान सी पडी लिफ्ट के द्वार पर आ गई।

पिछले तीन साल से उसके लिए मालाड़ के इस आकाश छूते भवन के इस आठ सौ दो नंबर फ्लैट से धारावी तक का ये सफर हालांकि अब एकदम अपनत्व से भरी रूटीन की तरह लगने लगा था, पर घर पहुँचने की समय-सीमा बेहद जरुरी थी। लेकिन बीच में वह खुद को जैसे तसल्ली भी देती चलती थी कि सात हजार रूपए माहवार की ये नौकरी यूं ही को नहीं मिल जाती। घर-दर-घर भटकने से तो यही अच्छी नौकरी है कि सिर्फ इसी एक घर में निभानी है! ज़िन्दगी के बहुत सारे करतब निभाने को कुछ तो खटना ही पड़ता है। बस इस घर से वापस बाहर कदम धरते ही खटाई की यह जद्दोजहद शुरु हो जाती थी। उसने दाहिने हाथ की तर्जनी से लिफट का बटन दबाया। जैसे ही उसका द्वार खुला कि वापस धारावी पहुँचने का सफर शुरू। लिफ्ट ने चंद मिनटों के बाद समीरा को धरती पर ला उतारा!
         
वह तेज चाल से चलती मालाड़ के इस हिस्से की मुख्य सड़क पर आ गयी, जिस तरफ चमाचम ओबरॉय माल था। बहुत सारे बेफिक्र लोग उसके अन्दर बाहर आ जा रहे थे। उसने उधर से ध्यान हटाया और ट्रैफिक की भारी भरकम चहलपहल और रेलमपेल को नजरअंदाज सा करते हुए सड़क के एक किनारे आकर, सामने जो ऑटोवाला खड़ा दिखा उसीमें चढ़कर गोरेगांव स्टेशन के लिए चल दी| पर स्टेशन के ठीक पास पहुंचकर, सीधे लोकल पकड़ने को दौड़ पड़ने की बजाए वह एक किनारे इस तरफ सजी सब्जी मार्किट के पास आकर उतर गयी और अपनी रोजाना की इस रुटीन में सब्जी-भाजी की खरीदारी के लिए चुराया जाने वाला वक़्त चुरा लिया। आज उसने एक लौकी, एक पौवाकिलो भिंडी, एक पौवा बैंगन, पांच का हरा धनिया और तीन हरी मिरच खरीदकर अपने थैले में भर ली। मोलभाव करते दो चार मिनट का वक्त ज्यादा ही लग गया होगा। पर अपने गणकों के इस्तेमाल के दौरान उसे अहसास हुआ कि आज के इस सौदे में उसने यही कोई ढाई रूपया तो जरूर ही बचा लिया होगा। इस काम को निपटाने के बाद वह तेज कदमों से लोकल की तरफ दौड़ पड़ी।
         
स्काईवाक के पहले पुल का जीना उसने अपने कदमों की मशीनी गति से चढ़ दिया था और स्कालईवाक पर आकर अचेतन सी भागती भीड़ को चीरती हुई खुद भी बदहवास भागने लगी। जैसे ही उसने प्लेटफार्म की तरफ उतरने वाले जीने पर कदम धरा तो याद आया कि आज के सफ़र के लिए कूपन तो पंच करना वह भूल गई है| वह उलटे पाँव उपर की तरफ लौटी, और वापस स्कातईवाक पर भागी। सामने का अगला जीना उतरकर दौडती हुई वह पंचिग मशीन तक गई, क्यू में खड़े होकर बेचैनी से अपनी बारी का इंतज़ार किया और फिर बारी आ जाने पर जितना तेजी से हो सकता था कूपन पर पंच लगाया और वापस दौड़कर, प्लेटफार्म को उतराने वाले जीने को कुछ सकिंटों में निपटाकर, सीधे प्लेटफार्म की उस जगह पर आ खड़ी हुई, जहां जनाना डिब्बे को आ रूकना था। चालीस पचास सैकिडों के बाद ट्रेन आ गई थी। हमेशा की तरह आदमियों के रेले उसके द्वारों की तरफ अचेतन से भाग खड़े हुए थे। जनाना डिब्बे में भी हाल अलग नहीं था। समीरा ने इसके साथ जुड़े सामान के डिब्बे में घुसने की कोशिश की, पर उधर भी वही अफरातफरी का आलम था। जितने लोग भीतर घुसने की हफडादफ्डी में थे, उससे ज्यादा इस रेले को अन्दर से बाहर की तरफ धकेले चले जा रहे था। कहने भर को ही सामान की ये जगह जनाना थी, जबकि उसमें से भी मर्द लोग ही ज्यादा से ज्यादा बाहर निकल रहे थे। पर गनीमत थी कि असल जनानी सवारी-डिब्बे में मर्दों ने अभी घुसने की आदत बनाई नहीं थी। पर उसमें भी सम्भ्रांत औरतों का ऐसा रेला बिल्कुल उन्हीं जाने पहचाने तौर तरीकों में, अंदर बाहर होने की कोशिशों में लगा था। सामान के केबिन में घुस लेना भी उतना आसान नहीं था। पर अपनी रोजाना की ट्रेनिंग से भीड़ के उस रेले के साथ वह अंदर आ गई। आरपार देखा तो तत्काल पता चल गया कि कहीं जरा सा पैर टिकाने की जगह मिलना भी मुश्किल है। दिन में इसमें ढोकर ले जाई गई मच्छियों के टोकरों की सुवास अभी तक बेहूदे तरीके से पसरी पड़ी थी। पर समीरा को मालूम था कि कुछ ही देर की बात है, उसके बाद ये वास ऐसी परिचित हो जाएगी कि नाक इसे सूंघना बंद कर देगा। जब तक किसी जादुई से तरीके से वह इसमें जरा सी जगह की ईजाद कर पाती तब तक गाड़ी अगले स्टेशन पर जा रूकी थी। गनीमत कि एक पोलीसवाले ने इस सामान डिब्बे में चढ़ आए मर्द यात्रियों को बाहर निकाल दिया और सवारियों का अगला रेला भीतर आने तक समीरा को दो औरतों के बीच बैठ लेने की करीब छः इंच जगह मिल गई। उसने कुछ लंबी सांसे लीं और खुद को तनिक स्थिर करके, झोले के अंदर हाथ डालकर ताजा खरीदी भाजी-तरकरी को अपनी गोद में रख लिया। फिर झोले में स्थाई रूप से वास करने वाले अपनी धार तकरीबन खो चुके खुंडे चाकू को निकाला और तरकारी को टुकड़ा टुकड़ा काटने लगी। गाड़ी और आदमियों का शोर यथावत कानों के भीतर आने की कोशिशों में जुटा था, पर कुछ सुनने की बजाये वह अपने काम में डूब गई थी। अब तक इतना तो वह जान ही चुकी थी कि ये बहरों का संसार है, जितना मर्जी शोर हो ले, किसी को किसी के बारे में सुनने या जान पाने की कतई गरज नहीं थी। जिसको जो करना हो करे। अपनी सब्जी काटे या किसी दूसरे का सिर मूंड दे, या चाहे तो गला रेत दे, कोई सरोकार नहीं। जैसे इनसे उलट सारी भलमानसहतें मण्डी  जैसे उसके छुटपन के उस छोटे से नगर के लिए सुरक्षित थीं।

 समीरा को अपने मायके के उस शहर की याद आते ही भीतर मीठी छुरी जैसा कुछ खनखनाने का अहसास जैसा हुआ। वह अब जैसे कोई लौकिक शहर न होकर महज़ एक जिन्दा याद भर थी, जो जितना तेज़ी से आती थी, उतना ही अकस्मात चली भी जाती थी। ऊई, उसके मुंह से अनायास निकला। चाकू हाथ के अंगूठे में हल्का सा चीरा लगाकर गया था। ज्यादा पैना होता तो जरुर खून की तेज़ धार देकर लौटता! उसने अंगूठे को मुंह में डालकर सोखा और एक बार इसपर नज़र दौड़ाकर, वापस तरकारी को काटने लगी। अब उसके हाथ ये सोचते हुए ज्यादा तेजी से चलने लगे थे कि जब तक अंधेरी स्टेशन आये, तब तक उसे तरकारी कटकटाकर झोले में बंद कर देनी होगी। जब तक उसने अपनी कटी तरकारी समेटी तो साक्षात अंधेरी स्टेशन आ गया था। गाडी के रूकते ही वह आदमियों के तमाम रेलों को चीरती हुई, कई चढ़ाईयां-उतराईयां लांघकर बाहर की तरफ लपकी, और बस स्टॉ प की दिशा में दौड पडी थी। बस-स्टॉप पर हमेशा की तरह बहुत से लोग खड़े थे। इनमें कुछ चेहरे जाने पहचाने भी थे, जिन्हें वह रोज़ धारावी की तरफ जाते देखती थी। इंतज़ार ज़रा ज्यादा लम्बा खींचने लगा था। उसने अपने मोबाईल हैंडसैट पर टाईम देखा। धारावी जाने वाली उसकी सीधी बस तकरीबन पंद्रह बीस मिनट लेट हो गई थी। पर बेचैनी की जगह उसने अपने भीतर सांत्वना और उसके पार संयम के भाव पैदा करने की कोशिश की, पर शाम ढलने पर घर पहुँचने की जल्दी में यही कोशिश काफी मुश्किल भी लगती थी। हालांकि इतने बरसों से मुम्बई की जिंदगी में घुलमिल जाने के बाद, अब तक ऐसी किसी बात पर कम से कम बाकी कुछ हो न हो, पर बेचैनी होना बंद हो ही गया था, और इंतजार जिंदगी का स्थाई भाव बन गया था। आगे लारी किसी भी वक्त आ सकती है। पर मुम्बई की सार्वजनिक रेल और इस लारी जैसी इन तमाम सवारियों की खासियत उनका आना या जाना नहीं था, बल्कि ये थी, कि वे भले ही अपने नियत समय पर आ पहुंचें या नहीं, पर उनमें अंदर घुसने की कवायद बेहद मुश्किल होती है। इसके तईं एक खास किस्म की ट्रेनिंग की जरूरत थी। जब वह अपने पति रामसजीवन के साथ पहली बार को इधर आई थी, तब उसे इस महानगर की ये हफड़ादफड़ी अपने उस छोटे से शहर मंडी के बीचोंबीच बहती ब्यास नदी की धारा के उपर स्काईवाक करते आते उन कऊओं के किसी झुंड की तरह लगती थी, जो धरती पर खाने को दिखती किसी चीज पर जा टूट पड़ते और देखते ही देखते वापस कां कां करते उसी धारा के उपर पसरे असमान में उड़ लेते थे।

मुंबई आ चुकने के बाद उसके दिमाग में सवालों का जो जाल था, उसे साफ करने को वह रामसजीवन से एक-एक कर पूछना चाहती थी, पर कभी कुछ पूछ पाने का वक्त  मिल ही नहीं पाया था। असल में इधर आ पहुंचने के बाद उसे एक जबरदस्त मानसिक धक्का लगा था, उससे उबर पाने में ही इतना वक्त लग गया था, कि जिन्दगी के पूरे गणित को समझ पाने और थैणे-थमने का मौका मिला ही नहीं। बहुत अजीब सा भी लगता है कि ऐसे दो चार पल कभी एक बार को भी नहीं मिल सके, जिनके साये में बैठकर वह अपने इत्मीसनान में रामसजीवन से कुछ पूछ पाती। जैसे इधर आ पहुंचते ही वह खुद भी एक अपिरिचत अंधी दौड में जा शामिल हुई थी।

मुम्बई में जाकर काम करने वाले रामसजीवन की छवि मण्डी नगर में किसी फिल्मी हीरो से कमतर न थी। मुंबई चले जाने का मतलब ही हीरो हो जाना था। पूरा नगर अपने इस विश्वाीस में जी रहा था, कि किसी भी वक्त अपना रामसजीवन किसी खूबसूरत हीरोईन के साथ बारिश में नाचता गाता, उनके कृष्णा टाकीज़ या इधर कुसुम थिएटर के परदे पर दिखना शुरू हो जाएगा। जब साल में एक बार को वह इधर अपने उस शहर में आता तो लोग गर्दनें उचका उचकाकर उसे देखते रहने की कसरत किया करते थे। किसी को नहीं मालूम था और कोई मालूम करने की जरूरत भी नहीं समझता था, कि वह उधर कपड़ा बनाने वाली किसी फैक्टरी में काम करता है,  और तब के एशिया भर में सबसे बडी झोपडपटटी होने के लिए कुख्या त हो चुकी धारावी की एक दडबेनुमा पटटी में रहता है! समीरा के लिए इस धारावी की खासियत यह निकलकर आई थी कि इधर ऑटोरिक्शा  वाला कोई भी सज्जन बता देगा कि इस झोपड़पट्टी, जिसे अब तक संसार कि अपनी तरह कि सबसे बड़ी पट्टी होने के लिए कुख्यात हो जाना था, इसके अंदर अगर तीन साल को भी पैदल टहलते रहे, तब भी इसको पूरा घूम लेने का दावा नहीं किया जा सकता था। पर ऐसे तथ्यों में भी फिल्मी रोमांस की सम्भाावनाएं तलाश लेने वाले अपने मण्डीै नगर में तब तहलका मच गया था, जब ये खबर फैली कि रामसजीवन ने अपने ही मुहल्ले  के नंदू नम्बाड की बेटी समीरा से ब्यारह रचा लेना पक्का कर लिया है। इस खबर के सार्वजानिक हो जाने के बाद प्रत्येक नगरवासी ने समीरा के भाग्य को भरसक सराहा था। यही नहीं वे हसरतभरी सी निगाह से देख, सोचते थे कि क्या तो इस समीरा ने किस्मत कनैक्शन पाया है, और बस रामसजीवन से उसका ब्याेह हुआ नहीं कि सीधे फिल्मी महानगरी का उसका टिकट कटा ही जानो! क्याे मालूम कि आने वाले किसी कल में वह भी पर्दे पर सजी सजाई हीरोईन बनकर दिखने लगे। ऐसे में कौन जरा सी भी अशंका मानता कि अपना रामसजीवन उधर कपडा बनाने वाली किसी मिलसिल में चपरासगिरी या सेवादारी जैसा कुछ करता है। बल्कि ऐसा कुछ सुनकर पूरे नगर को गहरा सदमा लग जाने की पूरी पूरी सम्भाकवना थी। बहरहाल, ऐसे में समीरा को भी मुम्बई पहुंचकर धक्का लगना ही लगना था। रामसजीवन कोई फिल्मी हीरो नहीं निकला था और उससे भी बड़ा धक्का था कि वह धारावी की इस झोपड़-पट्टी का बाशिंदा था।

उस वक्त् ये पट्टी भी किराए की कोख जैसी थी। बाद में ये उनके मालिकाना हक में आ गई है जरूर, पर चार फुट की चौड़ाई वाली इस गली में तब की तुलना में आज तीन गुणा ज्यादा लोग रहने लगे हैं। पर अब तक समीरा के तईं वो सारी अजनिबयत खत्म हो गई है। तब तो यहां इतना अजनबी माहौल लगा था कि मन होता अगली गाड़ी से टिकट कटाकर वापस अपने उसी ऊंघते शहर को लौट ले। इस धारावी की तुलना में उधर अपना वह सूहड़ा मुहल्ला भी इतना साफ और मानवीय लगने लगा था, कि अगर उसे चुनने का अधिकार दिया जाता तो वह तब के बम्बई की किसी फिल्म में हीरोईन बनने की बजाए वापस अपने मंडी को लौट लेती और वहीं किसी सिलाई कढाई केंद्र बगैरह में लड़कियों को काम सिखाते हुए अपनी जिंदगी गुजार देती। पर रामसजीवन के बम्बई का जो क्रेज उसके अपने माता पिता और नाते रिश्तों , खासकर युवा तबके के लोगों में ही नहीं, बल्कि खुद उसके खोपड़े के अंदर ऐसा जा विराजा था कि धारावी की इस खोली में कदम धरते हुए जितना धक्का अन्यथा लगना चाहिए था,  उससे बहुत बहुत ज्यादा लगा था। फिर बहुत आहिस्ता चाल से एक नए किस्म की सामान्य होती जिंदगी ने उसके अन्दर आकर ग्रहण किया था। वह अपने शुरूआती सदमे से उबर आई थी और रामसजीवन की इस जिन्दगी को स्वीकार कर लिया था। धीरे- धीरे जिन्दगी ने उन्हीं शर्तों पर जीना मान लिया था।

हैरानी कि बात यह रही कि इस स्वीेकार में उसकी अपनी मंडियाली मां-बोली का काफी गहरा योगदान रहा था,  जो इधर आने से पहले तक उसे अपने आगे बढ पाने और दुनिया की भीड में कुछ अच्छा  कर गुजरने में, सबसे बड़े व्यवधान की तरह लगती थी। उसे तब ठीक से हिन्दी बोलना भी नहीं आता था, पर उसे धीरे -धीरे एक निश्चित किस्म का इत्मीनान मिलने लगा, जब उसने पाया कि उसकी वही मां-बोली एकदम मराठी के आसपास बैठती थी। हालांकि अचानक ये विश्वास मान पाना एकदम नामुमकिन भी लगता रहा था। दो ढाई हजार मील दूर उसके मंडी नगर की बोली इस मराठी से कैसे मिल सकती थी! मंडी में तो जब कृष्णा टाकीज या कुसुम थियेटर में वह अपनी सखी सहेलियों के साथ फिल्म देखने को जाया करती थी तो बम्बई के बारे में जिन मायाबी अहसासों से वह भर जाती थी, वे ही अपनी मां-बोली के इस मराठी से मिलता जुलता होने के बाद ऐसे दर्दीले तरीके से टूटे थे, कि अनायास बम्बई का ऐसा होना उसे अविश्सानीय लगने लगा था, या शायद वह खुद ही इसे ऐसा बनाए रखने में सहज महसूस कर सकती थी।


पर एक बार ‘बेस्ट’ की लाल रंग की बस में बैठे -बैठे जब वह इन दोनों बोलियों पर विचार करने लगी तो इस अहसास को बल मिला था कि मराठी उसके तईं एकदम अजनबी बोली नहीं है। मसलन उस रोज लारी की चिरंतन भारी भरकम भीड़ के बीच कंडक्टर कह रहा थाः ‘गरजू प्रवाशाला जागा द्यावी!’ उसने इस वाक्य को गौर से सुना और मन ही मन समझने का प्रयास किया था। मने असहाय यात्री को बैठने के लिए जगह दें। पहले तो उसे यही विश्वास नहीं जमा कि ये मराठी में कहा गया होगा, क्योंकि अचानक उसे लगा था,  मानो यह उसकी मंडियाली बोली में कहे गए शब्द रहे हों। वह इन्हें मुंह जुबानी दोहराने की कोशिश करने लगी। फिर उसने इन्हें उस तरीके से बोलना चाहा जिसमें इन्हें अपनी उस बोली में बोला जा सकता था। और चंद मिनटों के बाद वह हैरान रह गई कि ये तो सचमुच उसकी मंडियाली बोली में बोला गए वाक्य जैसा कुछ थाः ‘गरजू जात्रुआं जो जाघा द्योआ!’  वह इन दोनों कथनों को अपने मुंह में बारी बारी उच्चारते हुए इनमें मौजूद शब्दों की समता पर चमत्कृत होने लगी। इसी के आसपास दूसरा वाकया, जिसने उसके इस बनते विश्वाास को पुख्ता किया था, वह भी उसने उतनी ही रोचकता से सुना और समझा थाः ‘कान उघड़े आहेत का तुमचे?’  इस वाक्य का मंडियाली अनुवाद भी वैसा ही रोमांचक निकला थाः ‘कान उघड़ी रे तेरे?’ महज इन दो वाक्यों के सुनने समझने के बाद उसने मान लिया था कि उसके पूर्वज जरूर ही आक्रमणकारियों के भय से इधर मुम्बई से भागकर मंडी में जा बसे होंगे और एक दूसरे से लड़ने के लिए ब्यास नदी के किनारे अपनी मुट्ठियाँ उछालते रहे थे।

धारावी आन पहुंचने के बाद उसे कुछ रोज तक अपनी उस बोली को मराठी में आत्मसात होते देख, इस असीमित बस्ती में अपनत्व का अहसास होने लगा था। आस पड़ौस में यूपी और बिहार के भी खूब सारे भैईयों और उस सारी भीड़ के बीच मुसलमानों की घनी आबादी की संगत में रहते हुए उसने हिन्दोस्तानी बोलने का शऊर सीखा! वे सब के सब जैसे अपने अपने मुलकों की वंचनाओं से ऊबे और पशेमान होकर इधर जीविका की तलाश में चले आए लोग थे और अब तक भलीभांति जानने लगे थे कि इधर ऐसे ही रहकर जीविका चलानी होगी। तब उसे यकीन हुआ था कि हर कोई कदम धरते ही बम्बई में फिल्मी  हीरो नहीं बन सकता। नतीजन उन्हें इस जनजीवन में ही खपना था। सबसे पहले, अपना काम धंधा सीखने से भी पहले, समीरा उन्हीं में से कुछ लोगों की संगत में मुम्बामदेवी मत्थाक टेकने गई थी। और उसी दौरान बुर्का पहने औरतों की एक टोली के साथ वह हाजीअली की दरगाह पर जाकर ये भी महसूस कर चुकी है, कि असल में भगवान को मानने की विधियों में एक से दूसरे धर्म में ज्यादा फर्क नहीं है। बाद में तो कई बार ये हुआ है कि जब मन घणा उदास हो जाता और जिंदगी के संघर्ष तोड़ डालने की कगार पर आ खड़े होते, तब वह अकेले ही सुकून की तलाश में हाजीअली तक जा पहुंचती थी और अपने अंदर की पूरी श्रद्धा से मत्था टेककर लौटती। जिंदगी को परेशान कर रहे उन अनेक पलों में, उसे सचमुच वैसा ही सुकून मिलता, जितना उस छोटी काशी कहे जाने वाले अपने शहर मण्डीू के भूतनाथ मंदिर या मगवाईं मुहल्ले के गुरूद्वारा सिंह-सभा में मिला करता था।

पर जल्दीं ही उसे ये भी समझ आ गया था कि जिंदगी में घुलने मिलने का असल जरिया महज गप-गपियाना भर नहीं हो सकता था। इस नई जिंदगी में काम करने से ज्यादा उर्जा और सम्ब-ल मिल सकता था। वह भरसक समझ गई थी कि इस नये घर में सुबह से शाम तक नकारा होकर बैठे रहने से खालीपन के सिवाय कुछ नसीब होने वाला नहीं था। रामसजीवन तो सुबह रोटी से भरा टिफिन लेकर अपने काम पर निकल जाया करता था और देर रात गए टूटा बदन और खाली हुआ वही टिफिन लिए वापस आता था। ऐसे में वह अकेली इधर किस इंतजार में बैठी रहती। अपने इन भईयों की पत्नियों को उसने जब खुद को दिनरात काम में खपाते महसूस किया तो खुद का घर में ठल्ल बैठे रहना उसे और भी ज्याादा खराब लगने लगा था। उसने उन्हीं की संगत में काम ढूंढना सीखा था। शुरू में भले ही वह ये देखकर हैरान रह जाती हो कि इस मुंबई में कभी रात ही न होती थी, पर धीरे धीरे इस रात न होने में उसे कुछ भी असामान्या लगने वाली स्थिीति नहीं रही थी। काम करने की तरकीब सिर्फ टैमपास का ही जरिया नहीं थी, बल्कि अपनी नई बसी गृहस्थी की आमदनी बढ़ाने के लिए बेहद सार्थक पहल साबित हुई थी। आने वाले एकरोज जब अपनी किस्म के एकदम बेरहम तरीकों से इस महानगर की तमाम कपड़ा मिलें बंद हो गई थीं और दूसरे झटके में उन्हें दूर किसी दूसरे गुजरात नाम के प्रदेश में स्थापित करने का फरमान सुनाया गया था, तब रामसजीवन अचानक बेरोजगार हो गया था। आमची मुम्बई के उस बेहद मुश्किल दौर में समीरा को काम की इसी ट्रेनिंग ने उसके पति, एक बेटे और एक बेटी के इस परिवार की जिंदगी को अपनी रीढ पर खडे रह सकने काबिल बनाए रखा था। इतने लंबे अरसे में उसने रामसजीवन के साथ अब तक इतना कुछ इधर जी भोग लिया था,  कि अब मण्डी नगर कभी कभार को सिर्फ किसी अच्छी याद की तरह याद भर आता है। आज अगर इस मुम्बई को छोड़कर वापस मण्डीन को चले भी जाएं तो एक विकराल समस्या सामने आ खड़ी होगी। वे वहां करेंगे क्या। तमाम रिश्तेी नाते अब इतना बदल चुके हैं कि सबसे पहले वे ही उनकी किसी भी सम्भावित वापसी को ही स्वीकार नहीं करेंगे।

समीरा अपने अंदर के ऐसे तमाम निष्कर्षों तक पंहुचकर अब हैरान नहीं होती। किसी बड़े दार्शनिक के अंदाज में तो शायद नहीं,  मगर एक बेहद आम आदमी की तरह वह इसे जिंदगी के सामान्य मगर जरूरी बदलावों की तरह जरूर लेती चलती है। अपनी ही सोच में अचानक खो जाने की यह जो शैली विकसित हुई थी, ये असल में बड़े काम की थी, और अगर मुम्बई की भीड़ में उसने इसे न सीखा होता, तब तो इस महानगर की जिंदगी का हिस्सा हो पाना ही जैसे नामुमकिन बना रहा होता।

सामने से बेस्ट की बस अपने अगले मुहाने की लहरीली और लपटदार रौशनियाँ छोड़ती आती हुई दिखी। उसने अपनी ऑंखों के उपर छतरी की मुद्रा में हथेली टिकाकर बस का नम्बर पढने कि कोशिश जरुर की मगर वह उसके सही होने को लेकर किसी किस्म के संशय में नहीं थी। अपनी गति सीमा कम करती हुई ये ठीक उसके सामने आकर रुक गई थी। वह हर दूसरे रोज़ मिलने वाले इसके कंडक्टर को जानती थी। बस आ रुकी तो कंडक्टर की आवाजें पुकारने लगीं थीं...‘धारावी...धारावी...चाला धारावी...’

समीरा ने दाहिने हाथ में पकड़ा थैला अपने कंधे पर लटका लिया और लारी के प्रवेश द्वार की तरफ बढ़ती भीड़ का ऐसा हिस्सा हो गई जो अपने ही धक्कों से आगे बढ़ती चलती है। वह एकदम मशीनी तरीके से खोई उसमें चढ़ी चली जा रही थी। उसके साथ यही होता था। पता ही नहीं चलता कि कब वह लारी या लोकल ट्रेन की तरफ बढ़ी और कब किसी ढलान पर बहते पानी की गति से ज्यादा तेजी से आदमियों की भीड़ का हिस्सा होकर उसके अंदर जा चढ़ी। हमेशा की तरह भीतर कदम धरने को भी जगह न थी। उसने किसी तरह पैर टिकाए और बाएं हाथ से लारी के छत के डंडे का सहारा लेकर खुद को टिकाकर जरा इत्मीनान की सांस भरी। अब कुछ ही मिनटों वक्फे के बाद वह धारावी पहुंचने वाली थी। यह वक्फा तीस पैंतीस मिनट से लेकर पचास साठ तक कुछ भी हो सकता था। पूरी निर्भरता अब आगे सड़क पर मिलने वाले टैफिक पर थी। ‘पुढी चाला, पुढी चाला,’ कंडक्टर कदम दर कदम आगे सरकता बोले चला जा रहा था। मानो कोई राबोट बोलता चल रहा हो। या जैसे कोई रिकार्ड बजता चलता है...‘तिकीट...तिकीट...बाला साहेब रुग्णालय। न बाबू, रुग्णालय के बाजू से निकल जाने का...तिकीट मावशी, तिकीट...योग्य तिकीटा शिवाय प्रवास करू नये...बोल मावशी...धारावी को जाने का...’ समीरा को टिकट पकड़ाते हुए उसने कहा, ‘बसा मावशी...’ फिर पास की एक सीट पर बैठी औरत से बोला, ‘ओ आत्या, इस मावशी को अपने बाजू में बिठा ले...रोज की सवारी है। आत्या, ई मावशी गरजू आहे...जागा द्यावी...’ पर उस औरत की स्थिति पर कोई फर्क पड़ा नहीं। जैसे उसने सुना ही न हो।

‘कोणाला फिकर आहे,’ कहते हुए समीरा ने उससे छुट्टे पैसे वापस लेते हुए, जरा सा एक ओर हटकर अपने पैरों को टिकाने के लिए छः ईंच जगह बना ली। अब वह आराम से थी। कोई बेचैनी नहीं। किसी घने जंगल में फैले उस परिचित से लगने वाले एक अज्ञात शोर के बीच पूरे का पूरा इत्मीनान आ पसरा था, जिसमें खोए रहकर समीरा अपने भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे में सोचती चल सकती थी। पर बार बार वह अपने गुजरे हुए पर ही जा अटकती थी। अब तक तो उस पूरे वक़्त की तमाम मुसीबतों की याद भी उसे अच्छी लगने लगती थी।
अचानक झटका लगा था। कंधे पर लटका झोला सीट पर विराजे किसी सज्जकन के खोपडे से जा टकराया था और वह खुद एक तरफ आ लुढकते बची थी।

कंडक्टर का वही स्थाई टेप लगातार बजता चल रहा था...आगे चलो, पुढी चाला, चलो...गाड़ी बिंदास चल रही है...ठीक टैम पर पहुंच जाएगी...आज ट्रैफिक कम है...बसा मावशी, बसा...समीरा को हंसी आ गई। तेरे सिर पर बसूं...? पर उसने इस सवाल और हंसी दोनों को ही अपने होठों पर ही रोक लिया और अपने पैरों के तईं खड़े रहने को बनाए गए उस कोने में खामोश बनी रही। क्या इस भांजू को दिख नहीं रहा कि उसके हर आग्रह के बाबजूद न तो सामने की सीट पर बिराजी उसकी उस आत्या मने बुआ ने उसकी इस मावशी के तईं बैठ पाने को जगह बनाने की कोशिश की थी और न ही उसकी इस मावशी ने बैठ जाने का इरादा बनाया था। पुढी चाला...
ठीक आधे घंटे बाद भांजू की अगली आवाज धारावी ही थी।पुढील स्थाआनक...धारावी...धारावी...चाला मावशी। सवा आठ बज रहे थे। समीरा ने मन ही मन संतोष की सांस ली कि शुक्र है अभी ज्यादा देर नहीं हुई है। कई बार तो घर पहुँचने में साढे नौ दस तक बज जाते हैं। वह भीड़ को चीरती हुई, लारी से उतरी और सड़क के आरपार नजर दौड़ा चुकने के बाद तेज कदमों से इसे लांघती, इधर कॉलेज के गेट के बाहर से उसी आवेग से निकल चली थी। गेट की बगल में गुलमोहर का एक बड़ा सा पेड़ था। वह आते जाते इसके तने के गिर्द बने सुडौल टियाले पर कुछ लड़कों को धुंआ घोटते देखती थी। बल्कि दिन की अपेक्षा शाम को ये ज्यादा इत्मीनान में दिखते थे। हालांकि उसके लिए ये देखना कोई एकदम नया अनुभव भी नहीं था, मगर कुछ दिनों से वह इन लड़कों की हरकतों के बारे में जानकर परेशान जरूर थी। उसने इतना सुना भी था कि ये लोग आती -जाती लड़कियों पर गंदी फब्तियां कसने लगे हैं। बाजवक्त तो जवान और अधेड़ तक का फर्क न करने से भी गुरेज न करते थे। पिछले कल जब ठीक इसी वक्त वह काम से लौटकर आई थी तो उनमें से किसी ने उसकी तरफ जरूर वैसा ही कोई संबोधन फैंका था, जो उसके कामकाज पर खराब टिप्पणी जैसा कुछ था। पर उसने ज्यादा गौर किया नहीं। उसे घर पहुंचने की जल्दी  थी। कौन इनसे मुंह लगाके अपना टैम खराब करता। यूं भी वय के गणित से वह उनकी मांओं के करीब बैठती थी, और उनसे ये आशा रखना कि वे अपनी मांओं पर फब्तियां कसेंगे, उसे ज्यादा अर्थवान नहीं लगा था। ये ऐसे भी शोहदे नहीं थे कि इन फब्तियों से आगे कहीं बढ़ लेते। समीरा को इनकी हरकतों से लगता था, जैसे ये नये नये सुल्फई बने हैं, और फिल्मों में दिखने वाले भाईयों जैसी हरकतें करने में मजा लेना चाहते हैं। वह तेज कदमों से बढ़ी चली जा रही थी, जब अचानक उसके कानों में कुछ बेढब से शब्दों ने आकार लिया। अब तक खूब जोर से फैल रही उनकी हॅंसी के बीच, उसने गौर किया तो जैसे उन्होंने उसी के उपर ताना कसा थाः ‘मुम्बई आमची, बान्डी घसी तुमची’। समीरा को ये सुनना बहुत खराब लगा। अगर वह अपने घर परिवार की जीविका चलाने के तईं भांडे मांजने का काम करती भी है तो इसमें आखिर वे बुराई किस बात की ढूंढ रहे हैं, जो उनको राह चलती एक औरत पर इस तरह की सस्ती फिब्तकयां कसने की नौबत चली आई है। दूसरा कोई मौका होता तब शायद वह मन मारकर निकल भी ले सकती थी, पर आज उसने जरा कदम थामे और उनके अगले बोल के आने को सुनने का इंतजार करने लगी। सचमुच में उन्होंने बस नहीं की थी, ‘वृद्ध असो किवां जवान’...इसके साथ ही एकबार को हॅंसी का सामूहिक ठहाका गूंजा और आगे फिर को कोई नया संवाद चला आया था, ‘आलटे! अक्खा स्पेशल गावठी हन्डी आहे। बोले तो इसको जरा स्वाद लेके चखने का।’

अब समीरा खुद को रोक नहीं पाई। उसने अपने ठहरे कदमों को उधर मोडकर तेजी कर  दी और मवालियों जैसी दिखती उस महिफल की तरफ दौड पडी। पहले तो लगा कि वे सब हक्के-बक्के  हुए उसे अपनी तरफ उस वेग से आते देख तत्काल कोई फैसला न ले सकने की सी मुद्रा में बने रहे और एक दूसरे की तरफ डरी बहकी ऑंखों से ताकने लगे। तब बीच में से किसी एक ने चेताया, ’भागो’ और देखते ही देखते आने वाले अगले एक पल में वे सब अपनी एड़ियों के बल भागे। खुद को समेटते-समेंटते एकाध जरा पीछे छूट गया था। समीरा ने तेजी से दौड़ते हुए उसे ही उसकी कमीज के कॉलर से पकड लिया। उसे फंसता महसूस कर भी उसके साथियों में से किसी एक ने भी उसकी मदद पर लौट आने की कोशिश नहीं करी। जो लडका पकडा गया था, उसने वक्त  की नजाकत को भांपते हुए अपने भीतर की सारी समझदारी को बाहर निकाल लिया और घिघयाती सी आवाज में बोलने लगा, ‘मावशी, मला क्षमा करने का। बोले तो गलती हो गई। ये लडका लोग समझलेला धाकटा तरूणी जा रई है।’
 ‘मने जवान लडकी दिखी भर कि उसको छेडोगे,’ समीरा ने उसका कॉलर छोड दिया। ‘पौंगडे किधर के। ढपोरशंख मुए। जादे टशन न मारने का इधर आके। समझे। मी खोटे बोलत नाहीं, पण इतना तो याद रखने का जो ये ज्यादा भाईगीरी सिर पर सवार हुई पडी है, मैं निकालके रख देगी। इधर धारावी में आके ज्या‍दे मस्कारी नहीं करने का। समझे। अब फूट लो। उन सबको भी जाके येईच समझाने का।’
लड़के ने उससे गुहार लगाई, ‘मावशी, माफी देने का। भोत थकलेला।’

वह छूटते ही बेतहाशा दौड पडा। समीरा उन सबको सिर पर पांव रखे सडक किनारे भागते देखती रही, पर उसके मन में उनके तईं नफरत के बजाए सहानुभूति ही ज्यारदा पैदा होने लगी। उसे अहसास हुआ कि ये लोग अपनी उगती जवानी का बोझ उठाने को मजबूर बिचारे हैं। आने वाले कुछ क्षणों तक वह उसी जगह पर अपने कदम रोके विमूढ सी खडी रहकर उन्हेंच दूर ओझल होते देखती रही, और जब वापस चलने लगी तो उसे लगा कि उसकी चाल पहले से काफी मंद पड गई थी। मानो अचानक किसी अपिरिचत थकान ने आ घेरा हो। अभी चार कदम ही लांघे थे, कि सामने से सडक पार कर आती हुई एक जवान सी लडकी दिखी। वह उसके पास आकर बोली, ‘क्या हुआ आंटी। आज फिर से इन पोंगडों ने कोई लफडा कर दिया क्या ।’
समीरा ने उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दिया, ‘खाक लफडा करने काबिल नहीं हैं ये मुअे बेबडे। एकदम डरपोक मुलगे हैं।’
लडकी भी मुस्कुराने लगी थी। कुछ कदम चल देने के बाद वह बोली, ‘आंटी, इन बेवकूफों से क्या मुंह लगाना। इधर बैठे आती -जाती लडिकयों को देख लार टपकाते रहते हैं। इनको क्या  मालूम लडकी का दिल कैसे जीता जाता है।’
समीरा ने उसकी समझदारी भरी ये बात सुनकर गर्दन घुमाई और नजर के एक कोण से उसके चेहरे का जायजा लिया। ‘अरे,’ उसने कहा। ‘तुम तो घणी शहाणी हो भई।’ आगे एकदम मजाक की मुद्रा बनाते हुए बोली, ‘कहीं धोका तो न खा चुकी हो।’
‘अरे, नहीं आंटी,’ लडकी ने जवाब दिया। ‘ऐसा वैसा कुछ नहीं। बस यूं ही बात कर रही थी। वैसे भी आप देखो जिसको प्यार करने का शऊर आता हो वह भला इस तरह किसी लडकी को परेशान करने की कोशिश करेगा। ये तो सचमुच के पोंगडे हैं। कुछ समझते नहीं।’
लडकी अपने धारावी की ही थी। अर्चना त्रिपाठी नाम था। चर्नी रोड पर किसी होटल में कौंटर गर्ल की नौकरी करती थी। आधे दिन के बाद से डियूटी शुरू होती थी तो जाहिर हुआ शाम को आने में देर होनी ही थी। पर दस बजे तक हर हाल में वह घर लौट आया करती थी। आज यही कोई आध घंटा पहले निकल आई थी। नवरातरों में इतनी सुविधा रहती थी। गेट से अंदर आकर वे दोनों चौडी गली में तकरीबन पौन मील तक साथ साथ चलती रहीं। आगे जहां से ये गली एक तीखा मोड लेती थी, लडकी ने जरा सा रूकते हुए कहा, ‘आंटी, अब विदा करते हैं, मेरा घर इधर है।’
‘एकदम पास है,’ समीरा ने कहा। ‘मेरा घर भी बस आने ही वाला है। दो मोड आगे। इतना पास रहते हुए भी कभी मिलना न हुआ था।’ कायदे से बात यहीं खत्मद हो जाती थी, पर उसने लडकी से पूछा, कि तुम्हारे घर में कौन- कौन लोग हैं और जवाब में पता चला मां है, पिता हैं, एक भाई है। मूलत तो बिहार के नालंदा जिले से हैं, पर वह और उसका छोटा भाई दोनों इधर पैदा हुए हैं। क्या हुआ कभी एकाध दो बार को उधर गांव गए हों। लडकी का घर का नाम माही निकला। समीरा को ये भी उतना ही सुंदर लगा जितना अर्चना था। उसने ऐसा कहा भी, और लडकी सुनकर मुस्कुंरा दी थी। उसके चले जाने के बाद समीरा ने अपने कदमों को एक बार फिर तेजी दी और चौडी गली के रास्ते  को पूराकर उस मुहाने पर आ गई, जिधर से अंदर जाना होता था। आगे के इस रास्ते को गली कहना तो किसी गली के होने के साथ ज्यादती थी, बल्कि ये तो किसी भलीचंगी गली को गाली देने जैसा भी हो सकता था, पर अपनी गली की तो शायरों ने भी तफसील से तारीफें की बताते हैं और समीरा ने तो जिन्दगी के तीस साल इसी तंग गली में गुजारे हैं। ये उसे क्यों कर खराब लगती भला। कदम अंदर की तरफ मोडते हुए वह सोच रही थी कि हर बार पता नहीं यही क्योंकर होता चलता है कि जिस भी चीज के बारे में उसे कम से कम सोचना चाहिए, वह असल में उसी पर ज्यादा से ज्यादा सोचती चलती है। मसलन ये गली....
दोनों तरफ एक दूसरे से सटी और होड लेती झुग्गियां थीं। उसने भी सुन रखा है कि धारावी पूरे संसार में सबसे बडी झुग्गीी कॉलोनी है। होगी। संसार भर के लोगों के लिए ये टूरिस्ट-स्पॉट जैसा कुछ भी बन गया था, पर जिस गली को वह इस वक्त  लांघ रही थी, वह दुनिया की सबसे तंग गली जरूर होगी। यही कोई चारेक फुट चौडा रास्ता , अगर गली जैसा कुछ कहलवाया जा सकने की योग्यगता रखता हो तो यही समीरा की अपनी गली थी। इसमें कितने पिरवार और कितने व्यक्ति आज तक रह लिए होंगे, इसकी मर्दमशुमारी शायद ही कभी मुमिकन हो सकी होगी। जरूरत भी क्या है। कदमों को चलाते हुए इधर आरपार लोगबाग अपने कामों में व्य स्त महसूस किये जा सकते थे। औरतें खाना पका रही होंगी, बच्चे आपस में अटखेली कर रहे होंगे, और मर्दलोग घर में निपटाने को लाए, अपने कामों के निपटान में लगे होंगे। कुछ लोग तो काम के वास्ते घर से बाहर जाते भी नहीं थे। जैसे सिलाई का काम ऐसा कुछ पेशा था कि अपनी मशीन घर के अंदर खोलके दिनरात काम चलाया जा सकता था। कितने ही घरों से अभी तक सिलाई मशीनों के चलने की आवाजें गली में आती चल रही थीं। पर समीरा के लिए तो ये रोजाना का समाज-शास्त्र था, जिसे अपने आवेग से कोई रोक न सकता था।
वह अपने घर के द्वार पर आन पहुंची, तो पलभर को उसके दिल के अंदर कम्पपन का एक जरा सा पिरिचत झोंका आया पर अगले पल वह चला भी गया। द्वार के ठीक पास पहुंचकर उसने भीतर की तरफ आवाज दी, ‘रमा! मैं आ गई हूँ।’

भीतर से लडखडाती हुई सी कोई आवाज आई। ऐसा कुछ महसूस हुआ मानो किसी एक व्यक्ति के आ जाने से किसी दूसरे को व्यक्ति को भारी हौसला मिला हो। लेकिन उस आवाज को साफ सुन पाना मुमिकन नहीं था। वह सधे कदमों से अंदर आ गई। कमरा, अगर इसे कमरा ही कहने की मजबूरी हो तो, यह बारह फुट लम्बा और दस फुट चौड़ा था। अपने बीचोंबीच बनी एक तंग गली से यह दो भागों में कटा था। बाईं तरफ एक किनारे पर एक पुरानी मेज पडी थी, जिसपर किचन का सामान धरा पडा था। उसके आगे दो ट्रंक, एक के उपर दूसरा रखे हुए थे। मेज और इन इन ट्रंकों के बीच की जगह में ऐसी चीजें मौजूद दिख रही थीं, जिनका बरसों से प्रयोग किए जाने की जैसे कभी सम्भावना बनी ही न थी। घर के अन्दर की इस गली के दांई तरफ एक उंचा सा तख्त पडा था। इसपर रामसजीवन दांए कंधें के बल लेटा था। समीरा को सामने पाकर अनायास उसकी ऑंखें चमक उठी थीं।
समीरा ने सब्जी के झोले को किचन सा कुछ लगती उस मेज के एक उपलब्ध खाली कोने में रखा और तख्त पर आ बैठ चुकने के बाद रामसजीवन के माथे पर हाथ रखकर कहा, ‘आज जरा देर हो गई। तुम्हें बुरा तो न लगा।’

रामसजीवन ने अपने दाहिने हाथ से समीरा का हाथ पकडा और अपने होठों के पास लेजाकर इसे चूमने लगा। उसे तीन साल पहले अधरंग का हमला हुआ था। बदन का बायां पक्ष बेकार हो गया था| चेहरा टेढ़ा पड गया था और जुबान जैसे हमेशा के लिए चली गयी थी। समीरा तब भी गृहस्थी चलाने के लिए काम तो करती थी, पर इस झटके के बाद उसके सिर के ऊपर जो जिम्मेवारी आ पडी थी उसे अगर भयानक न भी कहा जाए तब भी वह किसी भी व्यक्ति को तोड़कर रख देने का माद्दा तो रखती ही थी। ये वह समय था जब वे दोनों मिलकर अपने दोनों बच्चों के भविष्य को बनाने के लिए दिन रात खटते चलने से बस फारिग हुए ही थे। उन दोनों का भविष्य साथ साथ बना था। एक बेटी थी चंचला, वह ब्याह करवाकर अपने पति के साथ चली गई थी और एक बेटा था, रमेश, वो एक मुस्लिम लडकी को भगा लाया था और कुछ ही दिन बाद वे दोनों अपनी जान से हाथ धो बैठे थे। बेरहम क़त्ल! मारना तो उन्हें रमेश को ही था पर लडकी उसके आगे आ खाडी हुयी थी और उससे भी पहले मारी गई थी। समीरा को उस बहू का वह मासूम चेहरा बहुत याद आता था, जिसने भरसक उसके बेटे की जिन्दगी बचाना चाही थी। आगे रामसजीवन को इस हालत में जा पडने में ज्यादा वक़्त नहीं लगा था। बहुत मुमकिन है कि इससे अपने उस जवान बेटे और बहु की मौत का गम सहन न हुआ हो। लेकिन समीरा के लिए ये सिर्फ अंदाज़ भर है। ठीक - ठीक पता तो तब चलेगा जब ये पूरी तरह से ठीक हो लेगा और खुद बतायेगा कि आखिर उसे आधी जान ले चुकने वाला ये दौरा पड़ा था तो कैसे। जबकि इन वारदात से ठीक पहले वह इतना खुश दिखता था कि बात बात पर ‘अब तो आराम करूंगा’ कहते न थकता था। तब यह अधरंग आया था और उसे अपंग करके पूरी तरह से इस बिस्तसर पर आराम करने को छोड गया था।

समीरा को हैरानी होती थी कि इस आदमी ने तो उस वकत भी हार नहीं मानी थी, जब वह कपडा मिल बंद होकर गुजरात की तरफ कहीं ले जाई गई थी, जिसकी नौकरी के हौसले पर वह इधर मुम्बई आया था, और फिर समीरा को भी साथ ले आया। अपने इन दो बच्चों की आगे की जिंदगी को अच्छी दिशा देने की अपनी अंदरूनी इच्छाशिक्ती के चलते उसने गुजरात जाने से मना कर दिया था और काम में ऐसे जा जुटा कि अपनी जिंदगी की उसने कभी कोई तमीज मुकर्रर नहीं की थी। किसी काम से उसने कभी मुंह नहीं मोडा और न कभी किसी काम के बढ़िया या घटिया होने की ही शिकायत की थी। समीरा ये देखकर हैरान रह जाती थी, कि उसने हर वक्त हर काम को प्रार्थना की तरह स्वीकार किया था। उसी के बगलगीर उसने भी अपना बदन और मन झोंककर इस ग़हस्थी को एक निश्चित आधार देने में भरसक योगदान दिया था। पर रामसजीवन के रहते कभी यह नहीं बूझा कि जिन्दगी किसी आने वाले वक्तो में इस कदर कठिन भी हो सकती है। इस विपति में समीरा के इलावा दूसरा कोई मौजूद नहीं था। वह जिन अनिगनत बाधाओं से पार पाकर अपने इस आज तक आई थी, और जिनमें वह असंख्य बार टूटते -टूटते बची थी, उन्हीं से खुद को अब बेदखलकर कैसे कर लेती। यही क्या कम गनीमत थी कि वह इन तीन बरसों में न केवल खुद जिन्दा बनी रही थी बल्कि रामसजीवन को भी वापस जिंदगी में ले आई थी। वह भले ही बोल न पाता हो, पर अब तक महज किसी जिन्दा लाश की तरह भी तो नहीं था, जिसमें उसने उसे जाते हुए और फिर वापस आते हुए देखा था।

‘मैं तुमको कितना बार समझाई,’ उसने उसके माथे पर अपना हाथ टिकाये रखकर कहा। ‘ये रोने- धोने का बिल्कुल नईं। रोने का सिर्फ तब जब मैं नहीं रहेगी।’
रामसजीवन की नाक बहने लगी थी। वह सुडक-सुडक करता हुआ, इस बहाव पर काबू पाने की कोशिश करने लगा। समीरा ने आगे बढकर अपने दुप्पटे से इसे पोंछ दिया और उठ खडी हुई। पर रामसजीवन ने उसका हाथ कसकर पकड लिया। वह वापस उसके नजदीक आकर बोली, ‘भूक नईं लगी क्या । तरकारी कटी पडी है। छः मिनट में छौंक देगी। चार रोटी सेंक के फिर सोना ही है। मैं तुमको बोली न इस तरह मेरे कू दिक नईं करने का। समझा।’
रामसजीवन जब सहमति में सिर हिलाने लगा तो समीरा उठकर आई और तरकारी का झोला खोलकर इसे प्लेाट में उंडेल दिया। मेज के नीचे बर्तन-भांडों का एक खास खान्ना  था। उसे खोलकर उसने एक बदरंग सा फ्राईपैन निकाला और गैस जलाने के बाद इसे उसपर धर दिया। सामने रखी तेल की बोतल में से चंद बूंद इसमें उंडेल दीं| जब आंच पर रखा तेल तिडकने लगा तो उसने इसमें दो लंबी सूखी लाल मिर्च छोड दी! इनके काला पडते ही उसने इसमें साबुत धनिये के चंद दाने डाले। जब तक ये भूजकर काला पड जाते, वह जीरे के दानों को अपनी हथेलियों के बीच रगडती रही। धनिये के दानों के काला पड जाने के बाद उसने जीरा छोड दिया और कटी सब्जीड को तत्काेल इसमें डालकर कर्छुल से हिलाने लगी। बीच में हाथ रोककर उसने पहले चमच से हलद-बस्वार का पौडर डाला और इसके आगे अंदाज से जरा सा नमक बरूर दिया। इसे ढककर पकने के लिए छोड वह मेज के उसी निचले खान्ने  में पडे पीपे में हाथ डालकर आटा निकालने लगी, तभी अचानक बाजू वाली झुग्गी से चीखने चिल्लामने और भांडे ठलकने की आवाजें आने लगी। पर ये तो रोज का काम था। ऐसे मे इसपर समीरा की पहली प्रितिक्रया इतनी सहज थी मानो ये अगर न होता तो ज्ररूर उसे हैरानी होती। मसलन ये ऐसा ही कुछ था, ज्योंा हर शाम रोटी पकाना और खाने जैसा कुछ। उसने जैसे खुद से ही कहा था, ‘लगी गये मुअे भांडणे।’
सामने तख्तक पर रामसजीवन भी कुनमुनाया।

‘अब एकदम से भूक लग आई,’ समीरा ने उसकी तरफ नजर उठाए बगैर कहा। ‘पहले तो बांह छोडने को तैयार न था। मालूम न है रोटी पका के त्यार होती है।’ वह अस्फु‘ट सी आवाज में बोलने की असफल सी कोशिश करने लगा था। इस बीच उधर से आने वाली आवाजें ज्या दा से ज्या दा प्रखर होने लगी थीं। चाहकर भी अब वह इनसे निरपेक्ष बनी नहीं रह सकती थी। मानो ये लडाई बगल के इस परिवार का शगल जैसा कुछ था। अभी अभी जो आवाज सुनाई दी थी वह मां की आवाज थी। वह अपने बेटे को डांट रही थी। और उसका जवान बेटा चीख रहा था, ‘मला तुझी गरज नाहीं।’ जवाब में मां ने उसे गिरयाया था, ‘तुझे हमारी गरजेलेला न है, तब हमको कौन तुम्हाेरी गरज आहे। निधूण जाणे का। बाहर का रास्ता नापणे का।’
बेटा बडबडाता हुआ बाहर निकलकर गली में आ गया था। वह इशु था। जवान-साधन लडका। मां बाप को शिकायत थी कमाता धमाता कुछ है नहीं, सारा दिन अवारागर्दी करता फिरता है, चरस घोंटता है और शाम को रोटी मांग खाणे और जान परतेचणे को इधर को चला आता है। घणा जीम के फिर बापू के तख्त  पर कब्जा  करके घोडे बेचके सो लेता है। उसके बाद बूडढा बाप फिर चाहे बाहर चार फुट की गली में सोए या पूरी रात जागता रहे, उसे काहे की गरज थी। सही कह रहा है।

अब वह बाहर गली में निकलकर चीखने लगा था। उसे बिल्कुल परवाह नहीं थी कि उसकी आवाज से डरे हुए कितने सारे कुत्ते  जोर-जोर से ऐसे भौंकने लगे हैं और कि उसकी आवाज उसी में खोए चली जा रही है। पर बाकी हर ओर झुग्गियों की इस बस्तीस में सन्नाआटा पसरा रहा था या सब के सब अपने में मस्त थे! किसी को क्या पडी थी कि कोई मदद को आता। कुछ देर की चीखो-चिलाहट के बाद वह खुद ही चुप हो गया और गली में जैसे यकायक खामोशी का आलम पसर गया था। कुत्ते भी धीरे धीरे भौंकना बंद हो गए|

समीरा ने आटा गूंथ लेने के बाद गैस पर से तरकारी का पैन उतारा और तवा धर दिया। इधर से रामसजीवन ने कुछ कहा, जिसे समीरा के सिवाए संसार का कोई प्राणी समझ नहीं सकता था। ‘अरे,’ समीरा ने उसकी तरफ देखे बिना मुस्कुरा दिया और कपडे के एक साफ से पोणे से तवे को पोंछती हुई बोली, ‘मालूम है, भूक का टैम है, पण होगा तो पका के ही न।’ रामसजीवन वापस कुछ बोला, पर जब तक वह जवाब देती, इधर झुककर अंदर आ देने वाले द्वार का परदा जरा सा उठा और पहले अंदर इशु की गर्दन झांकी, फिर उसकी याचना से भरी हुई आवाज आई, ‘मावशी।’
समीरा ने मुडकर उधर देखा। ‘क्या  रे ईश्वा,’ उसने कहा। ‘काहे मस्करी करने का।’
‘मावशी।’ उसने जवाब दिया। ‘मला दो कच्चा बटाटा उधार दे दो!’
‘क्यों। रे,’ समीरा ने कहा। ‘आज की रात कच्चे आलू खाने का है।’ उसने वापस गर्दन घुमाई। ‘काहे ऐसा मस्करी को करता रे।’
इशु ने कदम अंदर धरे और कमरे की तंग गली के एक कोने में आ बैठा। ‘मावशी, मेरी गलती क्या । बोले तो नौकरी मिलती नहीं। घर आता हॅूं तो इनकी बकझक बकझक सुनने को मजबूर। जी करता है मर लेवूं।’
‘जादे हल्लाम नई न करणे का,’ समीरा ने कहा। ‘भूक लगी है तो बैठके इधरेइच ई खा लेने का है। दो रोटी जादे दे सेंक देगी मैं। पण बोला न मां बाप को क्षमा करणे का।’
‘मावशी,’ इशु ने कहा। ‘तुम मुझको इतना बार रोटी खिला दिया जो अब शर्म लगती है। पर एक रोज मैं तुमारी पूरी उधारी जरुर चुका के रख देगा, मावशी। खाली नहीं बैठा रहेगा मैं। बरोबर। पण इन लोगों को जरा देखो कैसे मुझे घर से बाहर फैंकने को बैठे हैं। ऊ ठल्लम बेधर्मी ऊंचा मुलगा इनकी जवान मुलगी को सरेआम भगाके ले गया। बरोबर क्या । उससे पाहिले वो बडे वाली उस मनालीकूल गांजे वाले के बगल में भाग ली थी। क्याक। अब बोले तो दोनों जने मला सिर पर सवारईच रहते हैं। अभी उधर ऊ बुडढी बोलती, मैं सूअर है। सूअर! डुकरा सारखा लटठ। बोले तो, इस लट्ठ को घर से बाहर ढकेलणे का। क्या मावशी, अपुन किधर से सूअर दिखने का है| एक रोज मैं भी भाग जाएगा इस घर से। अपुन की भी कोई ईज्जअत हैईचिक कि नईं। बरोबर क्याी। दो रोटी खाने का। कहींईच जाके खा लेगा। बरोबर खा लेगा।’ फिर जैसे उसे याद आ गया कि वह इधर किसलिए आया था। ‘मावशी,’ उसने कहा। ‘दो बटाटा।’

समीरा हंस दी, ‘ठहर पकड, देती मैं तेरे को दो कच्चा  पटाका। खोपडा भून के खाएगा,’ उसने फुल्का पकाकर तवे पर ठेला और कर्छुल से तरकारी को हिलाते हुए कहा।  आलू कोई फल तरकरी है जो कच्चा् चबा लेगा।’ वह जरा सा रुकी और आगे जरा गम्भीोर होकर बोली। ‘भलेमाणुस रहके काम आने का, कि बस यूं ही अपनी ये रमैण पुढे चालू ठेवणे का। कोई सुने चाहे न सुने। तुमचा कोई गरज नाहीं। बस अपनी रौ में बोले चलो। पर पेट तो भरा चाहिए न बे, ईश्वा। तभी तो न लडने का। बरोबर!’ वह वापस हंसने लगी थी।
उसकी बात सुनकर, तख्ता पर सोया पडा रामसजीवन हंसी से हिलने लगा। समीरा ने मुडकर देखा। उसकी ऑंखों में मानो कोई खुशी आकार ले रही थी और होठों पर हँसी फूट पड्ने को आतुर थी। ‘मला तुझी गरज नाहीं,’ समीरा ने तीसरे फुलके को उतारकर प्ले ट में धरते हुए कहा। ‘काहे गरज नाहीं रे। जिस मांबाप को बुढापे में तुमारी जरूरत है उसी को कहने का मुझे तुमारी जरूरत नईं है। समझकारी से काम लेने का बे ईश्वा। जांगला माणस बणने का।’
बोलते बोलते समीरा ने गैस बंद कर दी और फ्राईपैन में कडछी डालकर तरकारी निकाल फुलकों के बाजू में परोस दी। प्लेनट उठाते वक़्त उसने ईशु से कहा, ‘जरा ठहर पकड़ वे, ईश्वा, रमा को खिलाके तेरे को देती मैं रोटी। मेरे साथ बैठके खा लेना।’ प्लेट हाथ में लिए वह तख्त  के एक किनारे आ बैठी और रोटी के छोटे -छोटे कौर तोड़कर रामसजीवन को खिलाने लगी। रामसजीवन बार-बार नाक सुडकता सा लग रहा था। समीरा ने उसे डांटने के से लहजे में कहा, ‘रमा, तेरे को मैं कितना बार बोली जो रोने का नहीं, मन से खाने का है। उसके बाद मैं तेरे से खूब बात करेगी।’ रामसजीवन ने अपनी गर्दन हिलाने की भरपूर कोशिश की। तकरीबन दसेक मिनट लगे होंगे इसे निपटाने में। समीरा ने उसे वापस लिटाया और हाथ धोकर मेज़ के पास आ खडी हुई। उसने छः रोटियां बनाईं और दो प्लेटों में तरकारी परोसकर तीन तीन रोटियां उनमें रख दीं। दोनों हाथों में प्लेटें उठाये वह नीचे आ बैठी, एक प्लेट इशू के सामने धर दी और दूसरी अपने सामने रख ली। ‘शांति से खा ले वे ईश्वा,’ उसने कहा और खुद भी खाने लगी। बीच में इशू बोला, ‘मावशी, तेरे कर्जे को मैं कैसे निपटायेगा।’ समीरा ने तत्काल कुछ नहीं कहा। कुछ देर के बाद जब रमा के हिलाने का अहसास आया तो उसकी तरफ देखकर वह बोली, ‘रमा, तू इस ईश्वा की बात पर काहे हंस रहा है। ये पूरा समझकार बच्चा है। किसी का उधार खाने वाला थोड़े ही न है। क्या पता कब हमें इसकी जरुरत पड जाए।’ वह सोच रही थी कि उसकी इस बात पर वह जरुर कोई प्रतिक्रिया देगा मगर वह खामोश बना खाता रहा। कुछ नहीं बोला। थाली साफ़ हो गई तब वह बोला, ‘मावशी, दिन बदलते कोई देर थोड़े न लगती है।’ उसने दो गिलास पानी पिया और कुछ देर किसी ससोपंज में फंसा सा वहीं बैठा रहा फिर उठकर बाहर गली में चला आया। समीरा ने बर्तन समेटे, बाहर आकर उन्हें धोया और साफ़ हुए इन बर्तनों को उठाये भीतर चली आई। इन्हें एक ओर धरकर वह रमा की बगल में आ बैठी और उसके माथे को अपनी उँगलियों से सहलाने लगी। रमा शायद कुछ बोल रहा था। समीरा ने उसी का जवाब दिया, ‘बोला न फिक्र नईं करने का। सब ठीक हो जाएगा।’ वह बोलते बोलते ही लेट गई और अधनींदी हालत में बोलने की कोशिश भी करती रही। कब नींद आ गई इसका उसे कोई अंदाज़ हुआ नहीं। लेकिन जब अचानक नींद खुल गई तो उसने मोबाईल हैंडसेट में टाईम देखा। साढ़े तीन बज़ रहे थे। उसने रमा का जायजा लिया। शायद वह भी जाग रहा था, पर समीरा ने उससे बात नहीं की। कुछ देर करवटें बदलते चलने के बाद वह गाने लगी: पहर सवेला रिये$$$$$$ गईरी नी बहुए, अड़िये; ओ गईरी नी बहुए$$$$$$$$$; दिन ढलने जो आया, दिलोजान अड़िये$$$$$$$...(शाम ढलने के साथ ही चली गई थी रे बहू तू, अब सुबह होने को आ गई है पर अभी तक तू लौटकर नहीं आई, कुछ तो इस दिल पर रहम कर!) बीच में रमा का हाथ उसे टटोल रहा था। उसने इसे अपने दोनों हाथों में ले लिया और बिना खुद को रोके गाती रही।

 हर रोज़ की तरह आने वाली सुबह भी जरा इत्मीनान से गुजरी थी। काम पर उसे दोपहर बारह बजे के आसपास निकलना था और तब तक वह रमा के साथ बातें करती रही थी। बीच में उसने गली में निकलकर कपडे भी धोये थे और भीतर वापस लौटकर जब वह खाना पका रही थी, तब ईशू आया था और रुआंसी सी हालत में, जैसे अपना कोई आख़िरी फैसला सुना गया था, ‘मावशी, आज के बाद इधर नहीं आने का है। जा रहा मैं। मेरे को डुकरा सारखा लट्ठ बोलते हैं। मैं नहीं सुनने का।’ समीरा ने उसकी बातों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, बल्कि हँसते हुए कहा, ‘जा अभी तो, शाम को बात करती में तेरे से।’

रमा को खाना खिलवा चुकने के बाद, वह धारावी के अपने इस घर से बारह बजकर दस मिनट पर निकली थी। लेकिन तब तक उसे किसी खराब से भी खराब सपने में गुमान नहीं रहा था कि आज का दिन इतना ख़राब गुजरेगा कि जिस घर में वह पिछले तीन साल से बिलानागा काम करती चली आ रही है उसी की मालकिन शुभा म्हात्रे की लाश वह सोसाईटी के प्रांगण में देखेगी। फ्लैट के गेट पर पोलिस को अपना नाम, पता और दो परिचित व्यक्तियों के पते नोट करवा चुकने के बाद वह चुपचाप सोसाईटी के उसी गेट से बाहर निकल आई थी। मालाड के रेल-स्टेशन तक आने में उसके भीतर ऐसी गुजरी कितनी ही बातें याद आती रहीं। कई विचार आते और वापस चले जाते। बीच में शुभा महात्रे का चेहरा याद जाता। एकाध बार को तो उसका मन रो आने का भी हुआ था। जब वह सब्जी मार्किट से गुजर रही थी तो उसने तय कर लिया कि आज वह भाजी नहीं खरीदेगी, बल्कि घर जाकर सेपू-बड़ी का मधरा तैयार कर रमा को खिलायेगी। उसे अपने शहर मंडी की ये खास डिश बहुत पसंद थी, लेकिन इसे तैयार करने के लिए जितनी फुर्सत की जरुरत रहती है, वह उसे जैसे आज ही मिल पाई थी। पिछली बार जब उसने इसे बनाया था, तो इशु बार-बार इसी बात को दोहराता रहा था कि मावशी आज तुमने उँगलियाँ चाटने को मजबूर कर दिया है। ‘ऐसी तरकारी तो मैंने आज तक चखी नहीं थी।’ समीरा के पैर के अंगूठे में जरा सी ठोकर लगी, तब उसे अहसास हुआ कि कितना जल्दी वह स्काईवाक के जीने के पास आ पहुँची थी। जबकि पहले वह वक्त को पकडे रहने की कोशिशों में बेतहाशा दौडती रहती थी और इसी अहसास में डूबी रहती कि ये उसकी पकड़ से बाहर होता चल रहा है, वहीं आज उसे इसके एकदम उल्ट अहसास हो रहा था कि इसने अपनी गति कुछ ज्यादा ही धीमी कर ली है और इससे ठीक उल्ट उसकी चाल ज्यादा तेज हो गई है। वह सीधे पंचिंग मशीन के पास गई और ये देखकर हैरान रह गई कि आज क्यू ज्यादा लम्बा नहीं था। महज तीन चार मिनट गुजरे होंगे कि उसकी बारी आ गई। इससे फारिग होकर वह अपने प्लेटफार्म पर चली आई और ज्यों ही वहां कदम धरे तो सामने से गाडी आती दिखी। आज उसने तय कर लिया था कि वह मेन जनाना डिब्बे के भीतर बैठेगी। उसे लग रहा था कि आज उसके भीतर इतनी सामर्थ्य नहीं बची है कि वह सामान रखने के उस केबिन में बैठकर सड़ी हुई मछियों की वास सूंघती रहे। और तो और आज उसे तरकारी भी नहीं काटनी थी। गाडी रुक आई तो वह उसके अन्दर चढने के इरादे से गाडी के द्वार के पास आ गई, लेकिन ये देखकर हैरान रह गई कि आज भीड़ का रेला उतना सघन नहीं था कि उसे उसके धक्के खाते हुए भीतर जाने की नौबत आती। वह इत्मीनान से चढी और सामने मौजूद एक खाली सीट पर जा बैठी। डिब्बे में कुछ कामकाजी औरतों के इलावा कॉलेज जाने वाली लड़कियां ज्यादा थीं। समीरा को हैरानी ये हुई कि जब इन लड़कियों के चहकने और महकने की उम्र है, तब ये सब एकदम गुरु-गंभीर मुद्रा में क्यों बनी हुई हैं? वे सब एक-दूसरी के बगलगीर होकर भी आपस में बात नहीं कर रही थीं। उसने इसपर अपना दिमाग लड़ाने की भरसक कोशिश की, पर उसे इस गाम्भीर्य का कोई जवाब या तर्क नहीं सूझा। अगले स्टेशन पर जितने लोग उतरे उनसे काफी कम लोग डिब्बे में चढ़े। कितना अच्छा लग रहा था कि हर किसी को सीट मिल रही थी। बस तीनेक लड़कियां सामने खड़ी दिखी थीं। समीरा ने उनमें से एक को अपने पास बैठ जाने के लिए कहा। वह जरा सा मुस्कुराकर आई और सटकर उसके पास आ बैठी।

 अंधेरी स्टेशन में गाडी के रुकने पर वह हौले क़दमों से बाहर निकली। यहां भी वैसी धक्कामुक्की नहीं थी, जिसकी वह आदी थी। उसे ये देखकर कोई सुखकर अहसास नहीं हुआ। ये उसके जीवन की सामान्य गतिविधि से अलग था। वह बोझिलता से भरे हौले क़दमों से बाहर चली आई और सीधे बस-स्टॉप पर जा खडी हुई, तब ये देखकर हैरान रह गई कि तत्काल बस उसके सामने थी और वही कंडक्टर जिसे वह भान्जू कहा करती थी, धारावी...धारावी...चाला धारावी...पुकार रहा था। समीरा को देखकर उसकी नजर जरा सा खिल उठी थी, चाला मावशी, चाला...आज तो आप दिन में ही धारावी लौट चलीं हैं! समीरा ने कोई जवाब नहीं दिया। चुपचाप बस के अन्दर आई और सामने खाली पडी सीट पर जा बैठी। थोड़ी देर बाद कंडक्टर उसके पास आया। ‘तिकत मावशी, तिकत,’ उसने कहा तो समीरा ने छुट्टे पैसे उसके हाथ में धर दिए। उसे लगा आज बस की गति सामान्य से ज्यादा तेज़ है। शायद सड़क पर ट्रैफिक कम था। ये बस ही नहीं जैसे हर चीज़ आज तेज़ चल रही थी।
       
‘अरे समीरा,’ इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर ने जैसे अपने अन्दर की बहुत सारी खीज खुद पर ही निकालते हुए कहा। ‘रुको रुको...बहुत हो गया। इलक्या दीर्घ कथे मध्ये काही रोमांचक नाहीं...तुम्हारी इस पूरी कथा में कहीं एक बार को भी ऐसा कोई सूत्र नहीं सूझा कि आखिर शुभा म्हात्रे की मौत हुई तो कैसे और आठवीं मंजिल से गिरकर क्यों हुई। लगता है तुम बहुत भोली हो। या फिर बहुत चालाक भी हो सकती हो। ये दोनों बातें सही भी हो सकती हैं और दोनों गलत भी। पर फिलहाल इतना काफी है। बाकी जरुरत होगी तो तुमसे संपर्क कर लिया जाएगा। अब तुम जाओ। मेरा मन सोने का कर रहा है। इतनी लम्बी कथा में कहीं कोई रोमांच नहीं। ओ माय गॉड! हैव सम मर्सी ओन मी।’

 जब समीरा मालाड के पोलिस स्टेशन से बाहर निकलकर रेल-स्टेशन की तरफ़ बढ़ रही थी, तब उसे किसी हद तक ये सन्तुष्टि हो रही थी, कि पहली बार को उसे अपनी पूरी कथा बयान करने का मौका मिला था और उसने इतने कम वक़्त में इस मौके का अच्छा भला सदुपयोग कर लिया था। रोमांच बगैरह से उसका ज्यादा कुछ लेना देना नहीं था। वह इन्स्पेक्टर की अपनी समस्या थी, मगर समीरा की समस्या दूसरी थी। उसे आगे नई नौकरी तलाश करने में जुट लेना था। बल्कि आज ही इधर मालाड के इस पोलिस थाणे में तफ्तीश में शामिल होने को चलते वक़्त उसने इशु कटारी से कोई नौकरी ढूंढ निकलने के लिए कहा था। उसके इस सवाल में कोई रोमांच नहीं था और उससे ज्यादा इशु के ठन्डे जवाब में किसी रोमांच के होने की संभावना नहीं के बराबर थी। उसने ऐसा कुछ जरुर कहा था कि जब आप ही को नौकरी नहीं मिल रही तो आपके बाप को कहाँ से मिल जायेगी। पर रोमांच उसके इस जवाब में भी नहीं था। इसे आना हुआ था इस तफ्तीश के बाद के चौथे दिन में। चौथे दिन मतलब उन तमाम बयानात की दर्ज़ा-दर्जी के बाद ठीक चौथे दिन की सुबह सवा दस बजे। जब समीरा काम की तलाश में धारावी के अपने इस घर से तैयार होकर निकलने ही वाली थी। पूर्वी अंधेरी के एक फ्लैट में दो लड़के किराए पर रहते हैं, दोनों जैट एयरवेज में पायलट हैं, उन्हें खाना पकाने वाली बाई की जरुरत है, ये खबर पिछली शाम को इशु लाया था। वही स्वघोषित ‘डुकरा सारखा लट्ठ’, जो अभी तक अपने तईं नौकरी तलाश नहीं कर पाया था और एक सुबह तो कभी न लौटने की घोषणा करके गया था, मगर उसी रात वापस लौट आया था। जरा देर से ही सही। ‘मावशी, तुम्हारा मुंह देखे बिना रह नहीं सकता न इसलिए लौट आया हूं!’ उसकी ये बात सुनकर इधर रमा भी हंसने लगा था। उसीने नए संभावित रोज़गार की ये खबर समीरा को दी थी कि उन लड़कों को खाना पकाने के लिए बाई...

 समीरा बस कुछ पलों में निकलने ही वाली थी। उसने हमेशा की तरह रमा का मुंह चूमा और जल्दी लौट आने का वायदा कर द्वार की तरफ कदम बढाए ही थे कि बाहर से इशु की मरिअल सी आवाज़ आई, ‘ओ मावशी, पोलीस...’
 समीरा के पांव जरा सा ठिठके पर तत्काल संभल जाने के बाद वह बाहर निकल आई। इशु के पीछे कुछ बाबर्दी पोलिस वालों के बीच इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर खडी थी। ‘मावशी...,’ इशु ने कहा, लेकिन उसकी इस मंद सी निकलती आवाज़ को शीतल बर्नेकर की रौबीली पुलिसिया आवाज़ ने तत्काल दबा दिया, ‘समीरा, पोलिस को तुम्हारे घर की तलाशी लेनी है। वारंट है हमारे पास।’ समीरा की जीभ यकायक सूख गई। उसे अपना ज़हन एकदम बंजर रेगिस्तान होता हुआ सा लगा, जिसमें से सोच की नमी गायब थी और सवाल उगना अचानक बंद हो गये थे। कुछ पलों की खामोशी के बाद दो कदम आगे बढ़ते हुए, शीतल बर्नेकर ने कहा, ‘पूरा मामला तुम्हें पता है। शुभा म्हात्रे की मौत की तफ्तीश इस मुकाम पर आ पहुँची है। इससे पहले कि तुमसे अगली पूछताछ की जाए हमें उसकी लाश के पैर की एक उंगली से गायब जोडवा ढूंढ निकालना है। जोडवा बोले तो बिछवा। उसके दोनों पैरों में दो जोड़ी बिछ्वे थे। डेढ़ जोड़ी उँगलियों में पाए गए। बस, आधा जोड़ी गायब है। मने एक बिछवा गायब है। उसके मिलने की देरी है कि तफ्तीश पूरी हुई जानो। इसी से उसकी मौत का राज़ खुल जाएगा। तुम यह भी जान लो कि उसके बदन पर बहुत सारे गहने थे। सिर से लेके पाँव तक। पर बाकी हर चीज महफूज पाई गई सिर्फ वह बिछवा गायब है। अगर तुम उसे हमारे हवाले कर दो तो फिर तुम्हारे घर की तलाशी की जरुरत नहीं रहेगी।’
     
 इन्स्पेक्टर शीतल बर्नेकर के इस एक कथन के बाद, जो काफी हद तक धमकी जैसा कुछ होने का अहसास दे रहा था, कहानी की अपनी विधागत जरूरतों के आगे समीरा की यह कथा कभी न खत्म होने के लिए चल निकलती है और बहुत संभव है कि इसका अंत उसकी ज़िन्दगी के निपट चुकने के बाद ही हो पाये। लेकिन उसका इंतज़ार करने की हिम्मत किस कथाकार में होगी? आखिर किसी व्यक्ति की पूरी जिन्दगी को कोई कथाकार कैसे किसी एक विधा की सीमाओं में समेट सकता है? कम से कम मेरी अपनी हिम्मत तो बिल्कुल नहीं है जिसकी आप दाद दे सकें। अलबता कुछ फन्तासियां जरुर हैं जिन्हें उधृत करने का लोभ मैं संवरण नहीं कर पा रहा हूं और अगर उन्हें आपके साथ शेयर न करूँ तो कहानी की बात तो खैर जाने दीजिये, ये आप सबके साथ ज्यादती होगी, जिन्होंने इतना देर तक इस कहानी को सुनने में अपने कीमती वक़्त को बर्बाद किया है। उस रोज़ समीरा के घर की तलाशी में पूरे घर के धुर्रे बिखर चुकने के बाद और अंतत उसके गिरफ्तार हो चुकने पर रमा अपने तख़्त पर पड़ा रोता रहा था। बाहर जो भीड़ लगी थी, उसमें बहुत सारे लोग थे, लेकिन जो दो व्यक्ति सर्वाधिक सक्रिय थे उनमें एक तो इशु कटारी ही था और दूसरी थी वह लडकी अर्चना त्रिपाठी, जिससे समीरा की दोएक मुलाकातें हुई थीं, और वह भी उसके लिए नौकरी तलाश करने में मदद कर रही थी। अर्चना त्रिपाठी ने शीतल बर्नेकर से कुछ तीखे सवाल पूछे थे लेकिन जवाब में उसे धमकी जैसा कुछ मिला था कि अगर कानून के काम में अड़चन डालोगी तो भुगतान भी बहुत खराब करना पड़ेगा। पर अर्चना त्रिपाठी ने डरने के बजाये अपना वकील लेकर उनसे अदालत में मिलने का इरादा ज़ाहिर किया था। जब पोलीस समीरा को लेकर चली गई और कुछ देर की चेहमेगोईयों के बाद वापस धारावी की इस गली में सन्नाटा पसर आया तो इशु कटारी जैसे नींद से जागा था। वह समीरा के घर के अन्दर गया और रामसजीवन के पास जा बैठा और उसके सिर पर हाथ रखकर सहलाने लगा। अगले तीन दिन तक टीवी पर शुभा म्हात्रे के क़त्ल के समाचार अनवरत प्रसारित होते रहे थे। हर चैनल पर जो एक बात सांझा थी, उसमें कहा जा रहा था कि पोलीस द्वारा इस हत्याकांड की गुथी सुलझा ली गई है, तथा पोलिस को क़त्ल की गई महिला के दाहिने पैर से गायब एक बिछ्वे की तलाश है। चौथे दिन जब समीरा का पोलीस रिमांड ख़त्म होना था, तब टीवी चैनलों पर खबर आई थी कि समीरा नाम की कातिल महिला ने शुभा म्हात्रे का क़त्ल करने का जुर्म स्वीकार कर लिया है।
पक्षधर से साभार 
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