मातृवंशात्मक समाज में स्त्री

आकांक्षा 
महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में स्त्री अध्ययन विभाग में शोधरत। संपर्क : ई मेल-akanksha3105@gmail.com
आमतौर पर कुछ माता –प्रधान समाजों को मातृसत्तात्मक समाज कह दिया जाता है. ऐसा पितृसत्ता के विलोम के तौर पर किया जाता है. हालांकि पितृसत्ता एक सैद्धांतिक शब्दवाली है , जो पुरुष की सत्ता और स्त्रियों का आर्थिक –सामाजिक –सांस्कृतिक संसाधनों से वंचन को अभिव्यक्त करती है. समाज में इसके विलोम की सत्ता कभी नहीं रही, अर्थात स्त्रियों की सत्ता और पुरुषों का आर्थिक –सामाजिक –सांस्कृतिक संसाधनों से वंचन की स्थिति और न यह कोई स्त्रीवादी लक्ष्य है. स्त्री –अध्ययन की शोध-छात्रा आकांक्षा का यह लेख बताता है कि भारत के कुछ समाजों में मातृवंशात्मक व्यवस्था रही है, इस व्यवस्था में स्त्री की स्थिति को विश्लेषित करता यह आलेख. आलेख से यह भी स्पष्ट होगा कि मातृवंशात्मक व्यवस्था मातृसत्ता  नहीं है.

सबलोग के  कॉलम ‘स्त्रीकाल’ के लिए स्त्रीवादी दृष्टि से लिखे आलोचनात्मक विचार –आलेख और रचनायें आमंत्रित हैं. जनवरी अंक में आकांक्षा का  लेख
                                                                                   संजीव चंदन  

        
सभ्यता के आरंभिक इतिहास से यह ज्ञात होता है कि मानव समाज गुफाओं और कंदराओं में रहा करता था। उस समय न तो निजी संपत्ति की अवधारणा थी और न ही परिवार तथा राज्य की। मनुष्य (स्त्री-पुरुष) आखेट/शिकार करके अपना जीवन यापन किया करते थे। धीरे-धीरे स्त्री-पुरुष छोटे-छोटे समूह बनाकर रहने लगे और यही समूह आगे चलकर कबीले में रुपांतरित हो गया। यह युग इतिहास में कबीलाई युग के नाम से जाना जाता है। इस समय तक एक तरह से स्त्री-पुरुष के बीच काम का बंटवारा हो गया था। आमतौर पर कबीले के पुरुष शिकार करते थे और महिलाएं कंद-मूल इकट्ठा करने का काम किया करती थीं। इस युग में पुरुष वर्ग का महिलाओं के जीवन, रहन-सहन आदि पर पूर्णरुप से वर्चस्व नहीं हो पाया था और महिलाओं की यौनिकता पर भी किसी का नियंत्रण नहीं था। यह इस युग की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता थी। महिलाएं अपनी इच्छानुसार कबीले के अंदर किसी भी पुरुष के साथ संबंध बना सकती थीं। अत:, बच्चों की मां का तो पता रहता था पर, पिता कौन है, यह जान पाना मुश्किल होता था।

महिलाओं पर सिर्फ एक ही पुरुष के साथ संबंध बनाने की बाध्यता न होने की वजह से बच्चों की पहचान मां के आधार पर ही होता था। अत:, इस समाज में पैदा होने वाले बच्चों को मां की वंश व्यवस्था की तरफ से स्थायी सदस्यता मिलती थी तथा वंश भी माता के माध्यम से ही चलता था। पर, अधिकांश मामलों में निर्णय संबंधी कार्य, प्रबंधन का कार्य आदि पुरुषों के हाथ में ही होता था। इस समाज में संपत्ति का हस्तांतरण नहीं किया जा सकता था क्योंकि कबीलों की संपत्ति एक समूह की सामुदायिक संपत्ति मानी जाती थी। सभ्यता के विकास क्रम में मनुष्य संग्राहक की भूमिका भी निभाने लगा था। अब तक मनुष्य जीवन-यापन के लिए जो भी उपक्रम करता था जैसे- शिकार करना, जंगलों से कंद-मूल इकट्ठा करना आदि, उसे तुरंत ही खाकर खत्म कर देता था और दूसरे दिन पुन: वही उपक्रम करता था। पर, धीरे-धीरे इन सामग्रियों का संग्रह करना भी आरंभ कर दिया था ताकि, दूसरे दिन भी इनका उपयोग किया जा सके। धीरे-धीरे कृषि का भी विकास हुआ। वस्तुओं के संग्रहण ने निजी संपत्ति की अवधारणा को जन्म दिया। निजी संपत्ति की अवधारणा के उदय से इस बात की जरूरत महसूस हुई कि संग्रह की गई चीजों अर्थात संपत्ति को उनके ही समूह के किसी सदस्य को हस्तांतरित किया जाए।
ऐसी स्थिति में मातृवंशात्मक समूह की संपत्ति का कुछ हिस्सा जो कि किसी व्यक्ति के लिए ज्यादा उपयोगी था उसे दे दिया जाता था। पर, संपत्ति भी हस्तांतरित करने में यह अनिवार्य था कि जो संपत्ति माता के वंश की है उसे ही हस्तांतरित किया जाए न कि पिता के वंश की संपत्ति को। इस समाज व्यवस्था को ही मातृवंशात्मक व्यवस्था के नाम से जाना जाता है। इस व्यवस्था को ही अधिकाशत: लोग मातृसत्तामक व्यवस्था के रुप में व्याख्यायित करते हैं जबकि यह गलत है। मातृसत्तात्मक व्यवस्था का अर्थ यह है कि सत्ता पूरी तरह से महिलाओं के हाथ में हो और महिलाएं अपनी इच्छानुसार उस सत्ता का उपयोग करें जबकि, मातृवंशात्मक व्यवस्था में सिर्फ व्यक्ति की पहचान माता के वंश के आधार पर होता है। सत्ता पूर्णरुप से महिलाओं के पास नहीं होती है। विश्व के कई देशों में भी यह परंपरा रही है। भारतीय संदर्भ में हम मेघालय की खासी और गारो जनजातियों को देख सकते हैं। केरल के नायर जातियों की ‘तारवाड़ व्यवस्था’ को भी हम इसी के अंतर्गत रख सकते हैं।

 उत्तर-पूर्व में मातृवंशीयता

गारों जनजाति में परिवार मातृवंशीय होता है। इस जनजाति के लोग अपना मूल पूर्वज  महिला को ही मानते हैं। संपत्ति की अधिकारी भी बेटियां ही होती हैं। इस व्यवस्था के अनुसार परिवार की किसी भी बेटी को संपत्ति का उत्तराधिकारी चुना जा सकता है पर आमतौर पर व्यवहार में ऐसा नहीं होता है। संपत्ति की उत्तराधिकारी परिवार की सबसे छोटी बेटी होती है। इसी तरह खासी जनजाति नें भी वंश परंपरा स्त्री-पूर्वज के आधार पर ही चलता है। खासी समुदाय के अंतर्गत एक परिवार में माता, अविवाहित बच्चे, विवाहित बेटियां और उसका पति रहता है। परिवार में किसी महिला सदस्य न होने की स्थिति में लड़कियों को गोद लेने की परंपरा है ताकि, वंश प्रक्रिया की निरंतरता बनी रहे। समाज में हो रहे धार्मिक गतिविधियों में भी महिलाओं का महत्वपूर्ण स्थान होता है। इस जनजाति में परिवार की छोटी बेटी को ज्यादा सम्मान मिलता है और इसीलिए संपत्ति की उत्तराधिकारिणी भी वही होती है। इस जनजाति जो कुछ भी उनके पुरुष सदस्य कमाते हैं उस पर उस परिवार की बुजुर्ग महिला सदस्य का नियंत्रण होता है। पुरुष को अपनी सारी कमाई उस शादी से पहले अपनी माता को तथा शादी के बाद अपनी पत्नी को देना होता है। सतही तौर पर देखने में तो यह स्पष्ट होता है कि इस समाज की महिलाओं की स्थिति बहुत ही सम्मानजनक है, सत्ता भी महिलाओं के ही हाथ में है पर, वास्तविक स्थिति कुछ और ही है। इस समाज में रह रही महिलाएं भी उसी तरह अपने परिवार/समाज के पुरुषों के शोषण का शिकार हैं जैसा कि अन्य समाज की महिलाएं।  हां, इनके शोषण का स्वरुप थोड़ा अलग है। खासी महिलाओं के बीच इस तरह की समस्याओं का सबसे महत्वपूर्ण कारण उसके परिवार के पुरुष सदस्यों का अत्याधिक शराब पीना है। शराब के नशे में वह असंयमित हो जाते हैं और कई बार संबंधों को बचा पाना भी असंभव हो जाता है और स्थिति तलाक तक पहुंच जाती है। इसके अलावा खासी समाज एक और महत्वपूर्ण समस्या से जूझ रहा है और वह है वहां की छोटी बेटी के नाम जायदाद का आना। उस समाज के लोगों के अनुसार, अकसर जायदाद के लालच में लड़के, जिसमें से ज्यादातर मैदानी क्षेत्र से आए हुए होते हैं वे खासी समाज की छोटी लड़कियों से प्रेम का नाटक करके शादी करते हैं। और बाद में बेहतर जिंदगी का लालच देकर सारा जायदाद अपने कब्जे में कर लेते हैं। बेहतर जिंदगी का स्वप्न देखती ये लड़कियां उनके झांसे में आ जाती है और जब सारा अधिकार उसे दे देती हैं तो वह पुरुष दूसरा विवाह कर लेता है या फिर तलाक देकर उसे दोयम दर्जे पर ला देता है। ऐसी स्थिति में अकसर मां-बाप छोटी बेटी को कहीं ऐसे सुरक्षित स्थान पर तब तक छिपाए रखते हैं जब तक उनकी पसंद और अच्छे परिवार का लड़का दामाद के रुप में उनको नजर नहीं आता है। एक तरह से वह सोने की चिड़िया जैसी हो जाती है। यह स्थिति उस लड़की के लिए भी अमानवीय होती है। वह अपनी इच्छा से कुछ नहीं कर सकती। न कहीं अकेले जा सकती है, न किसी से दोस्ती कर सकती है जब तक कि उसके मां-बाप पूरे विश्वास के साथ ’अच्छे परिवार’ के लड़के से उसकी शादी नहीं कर देते।

 दक्षिण में मातृवंशीयता
केरल की नायर जाति में भी मातृंवशात्मक व्यवस्था है। यहां भी संपत्ति की उत्तराधिकारी बेटी ही होती है। लेकिन तमाम निर्णय प्रक्रिया में पुरुषों, खासकर मामा का वर्चस्व होता है। यहां इस व्यवस्था को ‘तारवाड़ व्यव्स्था’ कहा जाता है। ‘तारवाड़ व्यवस्था’ में वैवाहिक आवास का पारंपरिक स्वरुप द्विस्थानिक होता है। पुरुष की ही तरह स्त्री को भी विवाह के समय अपना मायका छोड़कर नहीं जाना होता था। पुरुष अपनी पत्नी के घर में रात बिताकर सुबह अपने घर लौट जाता था। इस तरह से स्त्री अपने मायके से अलग नहीं की जाती थी तथा वह अपने मातृवंशीय नातेदारों के साथ ही रहती थी। बच्चे भी अपनी माता के साथ अपने मातृवंशीय नातेदारों के साथ रहते थे। गृहस्थियों में रहने वाले पति या पिता को स्थायी सदस्य नहीं माना जाता था। उनकी पहचान उनके अपने ‘तारवाड़’ (वंश) से होती थी।

 महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस समाज व्यवस्था में स्त्री-पुरुष किसी को भी समूह की संपत्ति में अपने हिस्से का निजी तौर पर अलग से निपटारा करने का अधिकार नहीं है। इस सामुदायिक संपत्ति को बेचने या किसी को देने के लिए समूह के वयस्क लोगों की सहमति अनिवार्य है। कहा जा सकता है कि इस समाज व्यवस्था में स्त्री-पुरुष को समान अधिकार प्राप्त है। पति अपनी जरूरत के लिए मिले मातृवंश के हिस्से को, पत्नी की जरूरत के लिए मिले उसके मातृवंश के हिस्से को मिलाकर संयुक्त रुप से उसकी देखभाल कर सकता है पर, उसकी मृत्यु के साथ ही यह व्यवस्था खत्म हो जाती है। पुरुष अपने ‘तारवाड़’ का हिस्सा अपने बच्चों को नहीं दे सकता क्योंकि, बच्चा अपनी माता के ‘तारवाड़’ का स्थायी सदस्य माना जाता है।

आमतौर पर माना जाता है कि इस समाज व्यवस्था में बड़ी बेटी को ज्यादा महत्व दिया गया है। निर्णय लेने तथा सम्मान पाने की अधिकारिणी वही होती है यानी सत्ता उसी के हाथ में होती है। वही किसी को भी संपत्ति हस्तांतरित कर सकती है। जिन संपत्तियों को वह हस्तांतरित कर सकती थी उनमें मुख्य रुप से वृक्ष, गृह अथवा रहने के लिए तैयार किया गया कोई भी ढ़ांचा, नौकाएं, मछली पकड़ने की जगह, नारियल की जटाएं तथा कुछ अन्य  तरह की चल संपत्तियां आदि आते थे। सभी तरह की संपत्तियों पर और उसके हस्तांतरण का अधिकार तो बेटी को था पर व्यावहारिक रूप से इन संपत्तियों का प्रबंधन पुरुष सदस्यों जैसे, नानी के भाई, मां का भाई आदि के हाथ में होता है। प्रत्येक संपत्ति समूह को नियंत्रित करने वाला एक पुरुष होता है जिसे ‘कार्णवर’ कहा जाता है। ‘कार्णवर’ संपत्ति का प्रबंधन भी देखता था, उत्पादन का काम नियोजित करता था तथा गृहस्थी में रह रहे पुरुषों के बीच काम का बंटवारा भी करता था। प्रशासन से काम पड़ने की स्थिति में वह अपने समूह का प्रतिनिधित्व भी करता था। किसी भी समारोह तथा धार्मिक आयोजन में उसे विशेष आदर दिया जाता था और इस पर मुखिया की भूमिका निभाने की जिम्मेदारी सौंपी जाती थी। लेकिन ‘कार्णवर’ को यह अधिकार नहीं प्राप्त था कि वह अपनी इच्छा से किसी को कोई जमीन पट्टे पर दे दे या किसी संपत्ति को बेच सके। संपत्ति बेचने का अधिकार भले ही उसको न रहा हो पर व्यवहारिकता में निर्णय लेने का अधिकांश काम पुरुषों द्वारा ही किया जाता था जो कि सिद्धांतत: महिलाओं का काम होना चाहिए था।

विवाह-व्यवस्था में बुजुर्ग महिलाएं निर्णायक भूमिका निभाती हैं। प्रथम विवाह (स्पष्ट होता है कि इस समय बहुविवाह का भी प्रचलन था) में समूह की हर महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पर, अन्य वैवाहिक संबंध प्राय: व्यक्ति अपनी इच्छा से बना सकता था। माता को यह अधिकार प्राप्त था कि वह अपनी बेटियों और उसके पतियों पर पर्याप्त दबाब डाल सकती थी। इस मातृवंशीय समूह की महिलाएं खासकर बुजुर्ग महिलाएं बच्चे के जन्म, मृत्यु, कर्णछेदन इत्यादि से संबंधित सारे कर्मकांडों और समारोहों के संपादन और निर्णय लेने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी। कोई महिला कितनी शक्तिशाली हो सकती है यह उसकी उम्र तथा कार्णवर से उसकी नातेदारी से तय होता था। वैवाहिक विवादों में प्राय: पुरुष से यह सवाल पूछे जाते थे कि क्या अपनी पत्नी के घर उसे शाम के समय संतोषजनक मात्रा में अच्छा खाना मिलता है? यहाँ के सामाज में इस तरह के तमाम संकेत मिलते हैं जिससे एक भ्रम की स्थिति बनती है कि यहाँ के समाज में महिलाओं का ही वर्चस्व है या सत्ता उन्हीं के हाथ में है पर, वास्तविकता कुछ और ही है.  

विभिन्न समाजों में मातृवंशीय परंपरा की विद्यमानता से तो सैद्धांतिक रूप से यह कहा जा सकता है कि मातृवंशीय समाज में महिलाओं का स्थान श्रेष्ठ था लेकिन व्यावहारिक स्थिति का आंकलन करने से यह स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है कि अंतत: निर्णय और प्रबंधन के सारे अधिकार पुरुषों के ही हाथ में रहते हैं। चूंकि मातृवंशीयता समाज एक तरह से परंपरा की देन है और परंपरावादी समाज में किसी भी परंपरा को आसानी से खत्म नहीं किया जा सकता। समाज अगर परंपराओं की जड़ता से मुक्त होने में शीघ्रता बरतने लगता तो शायद सैद्धांतिक रूप से मिले महिलाओं के यह अधिकार भी कभी के छीन लिए जाते।

संदर्भ सूची-
पुस्तक,प्राचीन भारत का इतिहास, संपा.-द्विजेन्द्रनारायण झा, कृष्ण मोहन श्रीमाली, प्रकाशक, हिंदी माध्यम कार्यान्वय निदेशालय दिल्ली विश्वविद्यालय, १९८१
पुस्तक, मानव समाज, लेखक, राहुल सांकृत्यायन, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद, २००४
पुस्तक, परिवार निजी संपत्ति और राज्य की उत्पत्ति, लेखक, फ्रेडरिक एंगेल्स, संपा.- मुरली मनोहर प्रसाद सिंह, प्रकाशन, ग्रंथ शिल्पी, दिल्ली, २००८
पुस्तक, भारतीय समाज में महिलाएं, लेखक, नीरा देसाई, ऊषा ठक्कर, अनु.-डॉ. सुभी धुसिया, प्रकाशक, नेशनल बुक ट्र्स्ट, इंडिया, २००९
पुस्तक, स्त्री अस्मिता के सौ साल, लेखक, कुसुम त्रिपाठी, प्रकाशक, संस्कार साहित्य माला, मुंबई, २२१०
पुस्तक, लिंगभाव का मानववैज्ञानिक अन्वेषण: प्रतिच्छेदी क्षेत्र, लेखक, लीला दुबे, अनु.- वंदना मिश्र, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, २००४
पुस्तक, लिंग एवं समाज, लेखक, प्रकाश नारायण नाटाणी एवं ज्योति गौतम, प्रकाशक, रिसर्च पब्लिकेशन्स, जयपुर
Blogger द्वारा संचालित.