जितेन्द्र श्रीवास्तव की कविताएँ

जितेन्द्र श्रीवास्तव 
चर्चित कवि, संपादक: उम्मीद, कविता और आलोचना की कई किताबें प्रकाशित, इग्नू के  हिन्दी विभाग में प्रोफ़ेसर . संपर्क :09818913798
नमक हराम

आँखों के जल में होता है नमक
पर कितना
किससे पूछा जाए!

क्या वह स्त्री ठीक-ठीक बताएगी
आँखों के जल में नमक का अनुपात
जिसकी उम्र का अधिकांश
आँसुओं से भीगे आँचल को सुखाने में बीता है

या बताएगी वह अपराधी घोषित कर दी गई नदी
जिसने समुद्र में अपने विलय से इनकार कर दिया

वैसे पूछा तो उससे भी जा सकता है
जिसकी माँ स्वर्ग सिधार गई उसके जन्म-समय
प्रसव पीड़ा, रूढि़यों और सुविधाओं की कमी से

निश्चय ही उसका कंठ अब भी सूखा होगा
पर वह हुआ निरा पुरुष तो बोलेगा कितना सच!

सदियों से आँखों की गहराई का उपमान रहा है समुद्र
पर शायद ही कभी किसी ने याद किया हो
दोनों को साथ-साथ नमक के लिए
शायद ही कभी किसी ने विचार किया हो
दोनों के खारेपन के अंतर पर

समुद्र चाहे जितना हो अगम
छिपा नहीं पाता अपना खारापन
पर स्त्रियाँ अनादि काल से पी रही हैं अपना खारापन
बदल रही हैं
आँखों के नमक को चेहरे के नमक में
और पुरुष चमत्कृत है खुश है
कि यह रूप-लावण्य उसके लिए है

वह खुश होता है जैसे समुद्र पर
वैसे ही स्त्री पर
उसके लिए दोनों महज सौन्दर्य हैं
कभी-कभी क्रोध में
रक्त-मज्जा में समाए स्वभाववश
कहता वह दोनों को अबूझ भी

वैसे पूछिए कभी किसी ऐसे पुरुष से
जिसने प्रेम नहीं किया स्त्री को स्त्री में बदलकर
कि कितना नमक होता है
आँखों से बहती जलधारा में
तो वह नहीं बता पाएगा
संभव ही नहीं बता पाना उसके लिए

यह समुद्र का पानी नहीं
जिससे छान लिया नमक
यह पीडि़त खदबदाती आत्मा का जल है
इसमें चाहे जो हो नमक का अनुपात वह अनमोल है
और मुहावरे में कहें तो इस नमक को
अपना सुख समझता पुरुष पूरा नमक हराम है।

रामदुलारी

रामदुलारी नहीं रहीं
गईं राम के पास
बुझे स्वर में कहा माँ ने

मैं अपलक निहारता रहा माँ को थोड़ी देर
उनका दुःख महसूस कर सकता था मैं

रामदुलारी सहयोगी थीं माँ की
तीस वर्ष से लम्बी अवधि तक
माँ के कई दुःखों की बँटाइदार

माँ के अलावा सब दाई कहते थे रामदुलारी को
काम में नाम डूब गया था उनका
कभी-कभी माँ उनके साहस के किस्से सुनाती थीं

सन दो हजार दस में तिरासी वर्ष की आयु में
दुनिया से विदा हुईं रामदुलारी ने
कोई तिरसठ वर्ष पहले सन् उन्नीस सौ सैंतालिस में
पियक्कड़ पति की पिटाई का प्रतिरोध करते हुए
जमकर धुला था उसे
गाँव भर में दबे स्वर में
लोग कहने लगे थे उन्हें मर्द मारन
पर हिम्मत नहीं थी किसी में सामने मुँह खोलने की

रामदुलारी ने वर्षों पहले
जो पाठ पढ़ाया था अपने पति को
उसका सुख भोग रही हैं
गाँव की नई पीढ़ी की स्त्रियाँ
उनमें गहरी कृतज्ञता है रामदुलारी के लिए
वे उन्हें ‘मर्द मारन’ नहीं
‘योद्धा’ की तरह याद करती हैं

जातियों में सुख तलाशते गाँव में
हमेशा जाति को लांघा था रामदुलारी ने
कोई भेद नहीं था उनमें बड़े-छोटे का
सबके लिए चुल्लू भर पानी था उनके पास

माँ कहती हैं
व्यर्थ की बातें हैं बड़ी जाति अपार धन
रामदुलारी न किसी बड़ी जाति में पैदा हुई थीं
न धन्ना सेठ के घर
पर उनके आचरण ने सिखाया हमेशा
निष्कलुष रहने का सलीका
बाभनों,  कायस्थों, ठाकुरों, बनियों, भूमिहारों में
डींगें चाहे जितनी बड़ी हों अपनी श्रेष्ठता की
पर कोई स्त्री-पुरुष नहीं इनमें
जो  आस-पास भी ठहर सके रामदुलारी के।

रक्त में खुशी 

मैंने पूछा
थोड़े संकोच थोडे़ स्नेह से

‘कैसे हैं पति
हैं तुम्हारे अनुकूल’

उसने कहा
मुदित मन से लजाते हुए

‘जी, बहुत सहयोगी हैं
समझते हैं मेरी सीमा
अपनी भी’

उस दिन मेरा मन बतियाता रहा हवाओं से फूलों से
पूछता रहा हालचाल राह के पत्थरों से
प्रसन्नता छलकती रही रोम-रोम से
यूँ ही टहलते हुए चबा गया नीम की पत्तियाँ
पर खुशी इस कदर थी रक्त में कि कम न हुई मन की मिठास

मैंने खुद से कहा
चलो खुश तो है एक बेटी किसी की
और भी होंगी धीरे-धीरे।

परवीन बाॅबी

कल छपी थी एक अखबार में
महेश भट्ट की टिप्पणी
परवीन बाॅबी के बारे में

कहना मुश्किल  है
वह एक आत्मीय टिप्पणी थी
या महज रस्म आदायगी
या बस याद भर करना
पूर्व प्रेमिका को फिल्मी ढंग से

उस टिप्पणी को पढ़ने के बाद
मैंने पूछा पत्नी से
तुम्हें कौन-सी फिल्म याद है परवीन बाॅबी की
जिसे तुम याद करना चाहोगी सिर्फ उसके लिए

मेरे सवाल पर कुछ क्षण चुप रही वह
फिर कहा उसने
प्रश्न एक फिल्म का नहीं
क्योंकि आज संभव हैं यदि
अपने बिंदासपन के साथ
ऐश्वर्या राय, करीना कपूर, रानी मुखर्जी
प्रियंका चोपड़ा और अन्य कई के साथ
नई-नई अनुष्का शर्मा रुपहली दुनिया में
तो इसलिए कि पहले कर चुकी हैं संघर्ष
परवीन बाॅबी और जीनत अमान जैसी अभिनेत्रियाँ
स्त्रीत्व के मानचित्र विस्तार के लिए

उन्होंने ठेंगा दिखा दिया था वर्जनाओं को
उन्हें परवाह नहीं थी किसी की
उन्होंने खुद को परखा था
अपनी आत्मा के आईने में
वही सेंसर था उनका

परवीन बाॅबी ने अस्वीकार कर दिया था
नैतिकता के बाहरी कोतवालों को
उसे पसंद था अपनी शर्तों का जीवन
उसकी बीमारी उपहार थी उसे
परंपरा, प्रेमियों और समाज की

जो लोग लालसा से देखते थे उसे
रुपहले पर्दे पर
वे घर पहुँचकर लगाम कसते थे
अपनी बहनों-बेटियों पर

परवीन बाॅबी एक अट्टहास थी व्यंग्य की
उसके होने ने उजागर किया था
हमारे समाज का ढोंग

उसकी मौत एक त्रासदी थी
उसकी गुमनामी की तरह
लेकिन वह प्रत्याख्यान नहीं थी उसके स्वप्नों की
भारतीय स्त्रियों के मुक्ति संघर्ष में
याद किया जाना चाहिए परवीन बाॅबी को
पूरे सम्मान से एक शहीद की तरह
यह कहते-कहते भर्रा गया था
पत्नी का चेहरा दुःख से
लेकिन एक आभा भी थी वहाँ
मेरी चिर-परिचित वही आभा
जिसने कई बार रोशनी दी है मेरी आँखों को।

बेटियाँ

यह दिसम्बर की पहली तारीख की
ढल रही शाम है

धूप चुपके से ठहर गयी है
नीम की पत्तियों पर

इस समय मन में उजास है
इसमें टपकता है शहद की तरह
बेटियों का स्वर

बेटियाँ होती ही शहद हैं
जो मिटा देती हैं
आत्मा की सारी कड़वाहट

अभी कुछ पल बाद धूप सरक जाएगी
आँचल की तरह पत्तियों से
पत्तियाँ अनन्त काल तक नहीं रोक सकतीं धूप को
पर बेटियाँ नरम धूप की तरह
बनी रहती हैं सदा
पिता के संसार में

जितनी हँसी होती है बेटियों के अधर पर
उतनी उजास होती है पिता के जीवन में

जो न हँसें बेटियाँ
तो अँधेरे में खो जाते हैं पिता।


मैं इक चिडि़या हूँ पापा!

मैं इक चिडि़या हूँ  पापा
देखो तो!

धरती चिडि़या के पास है
आसमान उसकी आस है
पंख उसके पास हैं
बिना रोक-टोक वह उड़ती है
थक जाए तो
जिस टहनी पर चाहती है
बैठती है
गीत अपने गाती है

देखो तो पापा
चिडि़या कितनी खुश है!
दाना उसकी चोंच में है
उसका घर
उसकी पसन्द है

देखो तो पापा
उसका घर!
वह दुनिया की पहली वास्तुकार
कितनी सजग उसकी दृष्टि
कितना सघन संसार

सोचो तो पापा
मैं तुम्हारी बिटिया
इक चिडि़या हूँ
अपने मन की!

सोचो तो पापा
सेचो न!

ओ मेरी बेटियो याद रखना

आओ बैठो मेरी गोदी में
झूलो मेरी बाँहों में
ओ मेरी बेटियो!
तुम लोगों के आने के बाद
शायद मनुष्य होने लगा हूँ
तुम लोगों की हँसी में हँसने लगा हूँ

तुम लोग नहीं जानतीं
तुम लोगों की जिह्वा पर विराजती पवित्रता और होठों की हँसी
हमारे समय में जीवन की आशा है

उम्र की तिजहरी में
यदि घेरने लगे उदासी चारों ओर से
तब भी कोशिश करना हँसते रहने की
तुम लोगों के खिलखिलाने में बचा रहेगा जीवन
बचा रहेगा मेरा विश्वास

ओ मेरी बेटियो!
जब जाना यह घर छोड़कर
मेरी आँखों के आँसू मत पोछना
डरना भी मत!
इन्हीं आँसुओं में झलकेंगी
मेरी छोटी-छोटी बेटियाँ

मेरी मुझसे बड़ी बेटियाँ
मेरी छाती पर खेलतीं मेरी बेटियाँ

ओ मेरी बेटियो याद रखना
यदि जीवन में दुःख का आलाप दीर्घ होने लगे
तब भी परछाइयों के पीछे-पीछे मत भागना
डरना नहीं किसी आईने से!

ओ मेरी बेटियो!
मेरी आँख की पुतलियो!
न डरना न हारना
लड़ना समय से।

स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को


चिन्तकों ने कहा है
पेट न हो तो शायद
आदमी स्वाभिमान से जिए

वह पेट ही है
जो मुझे खींच लाया एक ऐसे शहर में
जहाँ दिन बड़े विचित्र थे
रातें बड़ी भयावह
दृश्य अमावस में पहाड़ जैसे थे

उस शहर में कुछ पल बढ़ते थे
मैं भी कुछ दूर आगे तक
फिर लगता था
कहाँ जा रहा हूँ-कहाँ आ गया हूँ
इस तरह कब तक चलेगा
कैसे मिटेगी प्यास थूक घोंटने भर से

समझ में नहीं आता था
कि आदमी के चेहरे बदले हैं
या जीवन की भाषा
या मेरी आँखों में उतर आया है
किसी पोखर का रंग

सचमुच जीने के ढेर सारे उपाय
निरर्थक बेमानी-से लगते थे
हार जाऊँगा हर पल लगता था

पर ऐसे ही पलों में
अक्सर स्मृतियों से झाँकता था एक चेहरा
बहुत उदास पर मुस्कराता हुआ
प्राणवायु की तरह

सोचता था किसी दिन लौटूँगा
सगुन का पान लिए फलों की टोकरी के साथ
जैसे लौटते हैं सपने वसन्त के दिनों में
फागुन के रंगों में
जैसे लौटते हैं पत्ते पतझड़ के बाद टहनियों तक
मैं भी लौटूंगा उस चेहरे तक

इस प्रकार एक अपरिचित शहर में
असमय मृत्यु से बचाती रही
स्मृतियों में बसी एक स्त्री

स्त्रियाँ कहीं भी बचा लेती हैं पुरुषों को।


जनवरी की एक सुबह उठीं तीन स्त्रियाँ

जनवरी की एक सुबह
लगभग साढ़े चार बजे उठीं तीन स्त्रियाँ
आँखों में नींद और देह में थकान लिए

उन्हें तैयार करना था
अपने-अपने पति को आॅफिस के लिए

उनके पति उठे जब बिस्तरों से
देह तोड़ते हुए
आँख मलते हुए

वे तैयार थीं चाय लेकर
बँध चुका था टिफिन गरम हो चुका था नहाने का पानी
रखा जा चुका था तौलिया  अपनी जगह पर
कपड़े तैयार थे इस्त्री करके
जूते में लग चुका था पाॅलिश

और अब जो करना था पुरुषों को
वह समस्या थी देह की।

सपने में एक लड़की: सोनमछरी

कस्बे में लड़का है
लड़के के सपने में लड़की है: सोनमछरी

लड़की का आना
लड़की का जाना
सिर को झुकाना
झुका के न उठाना
कभी मुस्कुराना कभी लाज से भरभराना

कभी उसकी आँखों में कातिक कभी सावन
कभी बैसाख का आना

बहुत कुछ का लड़के की समझ में न आना
उम्र की ताप में बस देह का पकना
कहीं कुछ टूटना कहीं जुड़ना कोई सपना

उसका कस्बे में होना
गरीबी में जीना
किसी हसीन शाम के लिए तरसना उभ्र भर
उसकी फितरत में भरता है कुछ
जैसे जीने की लालसा अपनी तरह से

पर जिन्दगी की अपनी कहानी है
वह लड़का जिसका दिन
शुरू होता है एक नए सपने से
और जिसकी रात
शोक की रजाई में मुँह छिपाकर
लेट जाती है उससे चिपककर

उस लड़के के सपने में
आती है एक लड़की: सोनमछरी।


आभा चतुर्वेदी

चार वर्ष बाद
आज अचानक दिखी वह
‘कहो ना प्यार है’ का पोस्टर निहारती हुई

चार वर्ष पहले वसन्त के दिनों में
आभा चतुर्वेदी से आभा द्विवेदी हुई
वह आभा शर्मा होना चाहती थी

पर जो न हो सका
विवश हो उसे आँख के काजल की तरह धोकर
उसे बनना पड़ा आभा द्विवेदी

आज वही आभा निहार रही थी पोस्टर
मैंने एक बार फिर गौर से देखा
और बढ़कर चौंका  दिया उसे

मुझे देख विस्मित उसने
पल भर में ही पूछ लिए न जाने कितने प्रश्न
पर नहीं दिया मेरे पहले ही सवाल का जवाब

मैंने पूछा पति-परिवार के बारे में
वह बताने लगी माँ-बाप भाई के बारे में

मैंने पता पूछा घर का
तो देते हुए नम्बर कहा उसने
अकेली रहती हूँ
आभा चतुर्वेदी लिखती हूं
आस-पास के लोग इसी नाम से जानते हैं

हतप्रभ-सा मैं कह न सका कुछ भी
जबकि बातें बहुत थीं मेरे पास

आज चार वर्ष बाद अचानक इस तरह
एक टाकिज के सामने खड़ी
फिल्मी पोस्टर निहारती आभा चतुर्वेदी
मुझे पहले से भली-भोली लगी।

लड़कियाँ

हमारे समय की सबसे बड़ी घटना है
कि लड़कियाँ कविता बनना नहीं चाहतीं

घर से लेकर कविता तक में
मुक्ति के लिए तड़प रही लड़कियाँ
घर और कविता को सजाते-सजाते
सजावट का सामान बनना नहीं चाहतीं

वे नहीं चाहतीं कि उन्हें बोझ समझा जाए

अपने जीवन के तमाम फैसले
स्वयं करना चाहती हैं लड़कियाँ

लड़कियाँ जीवन में पल-पल की घुटन से
मुक्त होकर इन्सान की तरह
पूरे सुकून से जीना चाहती हैं

वे अक्सर देर से घर लौटने पर
पिता या पति की आँखों में
संदेह नहीं, बस प्रेम देखना चाहती हैं

अब लड़कियाँ कहावतों से बाहर आना चाहती हैं
जीवन में देखना चाहती हैं अपनी आँखों से
‘बिन घरनी घर भूत का डेरा।’

यह स्त्री, जिसे देख रहे हैं आप
(धारचूला की अपनी छात्राओं को याद करते हुए)

चढ़ती दोपहर की
चिलचिलाती धूप में
जब चुभती हैं किरणें

उतर रही है एक स्त्री
पीठ पर घास का गट्ठर लेकर
पहाड़ी जंगल से घर की ओर

यह स्त्री मुँह अंधेरे
घर से निकली थी
कुछ रूखा-सूखा बाँधकर

घर पहुँचकर इस स्त्री को
मवेशी खिलाने के साथ-साथ
चिन्ता करनी है घर-भर के पेट की

इस स्त्री ने नहीं देखी हैं रेलगाडि़याँ
लखनऊ और दिल्ली

मुजफ्फरनगर की एक मनहूस दोपहर
शूल की तरह चुभती है इसे

यह चिडि़याघर और भूल-भूलैया नहीं चाहती
अपनों का सुख चाहती है
पहाड़ का सुख चाहती है

यह स्त्री जिसे देख रहे हैं आप
यह तीस की उम्र में
सैंतालिस की चिन्ताओं का घर है।

सोनचिरई

(एक सोहर सुनने के बाद)

बहुत पुरानी कथा है
एक भरे पूरे घर में
एक लड़की थी सोनचिरई

वह हँसती थी
तो धूप होती थी
फूल खिलते थे

वह चलती थी
तो वसन्ती हवा चलती थी

जिधर निकल जाए
लोगों की पलकें बिछ जाती थीं

और जैसाकि हर किस्से में होता है
उसका विवाह भी एक राजकुमार से हुआ

राजकुमार उस पर जान लुटाता था
उसके होंठ उसकी तारीफ में खुलते
उसकी जिह्वा उसके प्रेम के सिवा
और सारे स्वाद भूल गई थी

उसकी आँखों में नींद
और दिल में करार न था

और ऐसे ही दो-चार वर्ष बीत गए
सोनचिरई की गोद न भरी
ननद को भतीजा
सास को कुल का दिया
पति को पुरुषत्व का पुरस्कार न मिला

ननद कहने लगी ब्रजवासिन
सास करने लगी बाँझ
और जो रात-दिन समाया रहा उसमें साँसों की तरह
उसने कहा तुम्हारी स्वर्ण देह किस काम की
अच्छा हो तुम यह गृह छोड़ दो
तुम्हारी परछाईं ठीक नहीं होगी हमारे कुल के लिए

सोनचिरई बहुत रोई
मिन्नतें की
पर किसी ने न सुनीं

आँसुओं बीच एक स्त्री
घर के बाद
भटकने लगी ब्रह्माण्ड में

उसे जंगल मिला
जंगल में बाघिनी मिली
उसने उसे अपना दुःख सुनाया
और निवेदन किया कि वह उसे खा ले

बाघिनी ने कहा वहीं लौट जाओ जहाँ से आई हो
मैं तुझे न खाऊंगी
वरना मैं भी बाँझ हो जाऊँगी

सोनचिरई क्या करती!

वहाँ से साँप की बांबी के पास पहुँची
बांबी से नागिन निकली
नागिन ने उसका दुःख सुना
फिर कहा वहीं लौट जाओ जहाँ से आई हो
जो मैं तुझे काट खाऊँगी
तो बाँझ हो जाऊँगी

सोनचिरई बहुत उदास हुई
फिर क्या करती!
गिरते-पड़ते माँ के दरवाजे पहुँची

माँ ने धधाकर हालचाल पूछा
कौन सी विपत्ति में दुलारी बिटिया ऐसे घर आई है

बेटी ने अपना दुःख सुनाया
और चिरौरी की कि थोड़ी सी जगह दे दो माँ रहने के लिए

माँ ने कहा विवाह के बाद बेटी को
नैहर में नहीं रहना चाहिए
लोग-बाग क्या कहेंगे
वहीं लौट जाओ जहाँ से आई हो

और सुनो बुरा न मानना बेटी
जो तुम्हारी परछाँई पड़ेगी
तो मेरी बहू बाँझ हो जाएगी

यह कहकर माँ ने अपना दरवाजा बन्द कर लिया
अब सोनचिरई क्या करती!

उसने धरती से निवेदन किया
अब तुम्हीं शरण दो माँ
दुःख सहा नहीं जाता
इन कदमों से चला नहीं जाता
जो लोग पलकों पर लिए चलते थे मुझे
उनके ओसारे में भी जगह न बची मेरे लिए
अब कहाँ जाऊँ तुम्हारी गोद के सिवा

धरती ने कहा तुम्हारा दुःख बड़ा है
लेकिन मैं क्या करूँ
जहाँ से आई हो वहीं लौट जाओ

जो मैं तुमको अपनी गोद में रख लूँगी
तो ऊसर हो जाऊँगी

और मित्रो इसके आगे जो हुआ
वह किसी किस्से में नहीं है

हुआ यह कि सब ओर से निराश
सोनचिरई बैठ गई एक नदी के किनारे

एक दिन गुजरा
दो दिन गुजरा
तीसरे दिन तीसरे पहर एक सजीला युवक
प्यास से बेहाल नदी तट पर आ मिला

उसने सोनचिरई को देखा
सोनचिरई को देख
पल भर के लिए वह सब कुछ भूल गया

उसने विह्वल हो नरम स्वर में
सोनचिरई से दुःख का कारण पूछा
और सब कुछ जान लेने पर
अपने साथ चलने का निवेदन किया

सोनचिरई पल-छिन हिचकी
फिर उसके साथ-साथ हो ली

और उसके साथ पूरी उम्र जीकर
जब वह मरी
तो आँसुओं से जार-जार उसके आठ बेटों ने
उसकी अर्थी को कंधा दिया

सोनचिरई आठ बेटों की माँ थी
वह स्त्री थी
और स्त्रियाँ कभी बाँझ नहीं होतीं

वे रचती हैं!
वे रचती हैं तभी हम-आप होते हैं
तभी दुनिया होती है
रचने का साहस पुरुष में नहीं होता

वे होती हैं तभी पुरुष
पुरुष होते हैं!

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