लूसर

कलावंती सिंह  
कविता और कहानी लेखन .विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित. संपर्क :kalawanti2@gmail.com
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 लूसर – अपने नाम के अनुसार ही धूसर सी थी । एक मैली सी साड़ी पहने वह मेरे ससुराल वाले घर के आँगन मेँ आकर खड़ी हो गई । मेरी पहली जचगी के बाद मेरी सास ने मुझे गाँव बुला लिया था और उसे नव प्रसूता व बच्चे की मालिश के लिए कहा  गया था। उसकी एक आँख पत्थर की तरह जड़ थी । शायद उससे देख भी नहीं पाती थी। यूँ वह दूसरे आँगन की दाई थी पर पैसों के लिए अलग अलग तरह के काम भी कर लेती थी। इतनी गंदी लगी उसकी साड़ी मुझे, कि उसे बच्ची को गोद देते हुए हिचक सी हुई । जाते हुए मैंने उसे ताकीद की कि थोड़ी साफ सुथरी होकर आया करे। पहली नज़र मेँ मुझे वह विधवा लगी । न सिंदूर , न चूड़ी, सुहाग का कोई चिन्ह उसकी देह पर न था।

उसके जाने के बाद आँगन की औरतों ने  अपने दोपहर की बैठक मेँ उसकी कहानी सुनाई -- उसका पति उसे नहीं पूछता । उसने दूसरी रख ली है। कचहरी मेँ कोई काम करता है । ठीक ठाक कमाई है, पर सब दूसरकी पर उड़ाता है। इसके चार बच्चे हैं। सब यही पाल रही है, दुयारे दुयारे काम करती है । सुबह से रात तक । उसी गुस्से मेँ वह विधवा सी रहती है। इस बात से लूसर का पति खेलावन बहुत चिढ़ता है। वह जिस काम से चिढ़े, वही करने मेँ लूसर का आनंद है।

वह आती रही । एक दिन मैंने उससे पूछा, तुम ऐसे क्यों रहती हो । ठीक से रहा करो। अपने लिए सजो । तुम्हारे बाल-बच्चों को अच्छा लगेगा। आदमी ठीक नहीं तो क्या अपनी जिंदगी नहीं। लूसर मुझे थोड़ी देर देखती रही फिर जबाब दिया "सजूँगी तो लोग पीछे पड़ने लगेंगे । सब जानते हैं कि छोड़ी हुई औरत है ।" मतलब यह सिर्फ प्रतिशोध नहीं था ,एक कवच था उसके लिए। मैं चुप हो गई। महीने भर कि मालिश के बदले सास ने उसे एक साड़ी और रोज सेर भर अनाज देना तय किया था । पर मैं चुपके से उसे रोज़ दस बीस रुपए पकड़ा देती। कहती- लूसर इस पैसे से मिठाई ले लेना । वह बहुत आभार मानती । अपना अधिक से अधिक समय मुझपर लुटाती। 

धीरे धीरे वह मुझसे हिल मिल गई। उसके पास गाँव घर की ढेरों कहानियाँ हुआ करती थी। ढहते सामंतवाद के घरों के दर्दनाक किस्से! किसकी औरत बिना दवा के मर गई। पत्नी की दवा मेँ खर्च करने से क्या फ़ायदा, मर गई तो नई पत्नी मिल जाएगी, ऊपर से दान दहेज। किसकी बेटी 32 वर्ष की हो गई पर पिछ्ले 10 वर्षों से लड़केवालों को 22 वर्ष ही बताया जा रहा है। बिना जमीन बेचे विवाह का खर्च कहाँ से आए ? और जमीन बेच दें तो खाएं क्या? कैसे बरसात के दिनों मेँ अपने घर मेँ निकले करैत को उसने अकेले ही मार गिराया था। कैसे बच्चा बंद होने वाले आपरेशन के बाद दूसरे ही दिन उसने कुएं से पानी भर भर अकेले घर का काम किया था। खाना पकाया था। वैसे समय मेँ भी खेलावन ने उसे नहीं देखा- भाला। बल्कि वह तो आपरेशन करवाने के खिलाफ था। पर भला हो उस बंगाली डॉक्टरनी का ,जिसने लूसर की बात मानकर उसका आपरेशन  करना मंजूर किया। उसकी कहानियाँ सुनते मुझे बहुत अचरज और आनंद होता था। दलित जाति की स्त्रियों के अपने कष्ट थे तो सवर्ण  स्त्रियों  के अपने
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ढंग के कष्ट थे। उसकी जीवन दृष्टि अद्भुत थी। बतकही का स्वाद मुँह मेँ घुला रहता। वह  देर तक मेरे कमरे मेँ रहती थी। यह बात नोटिस मेँ ली जाने लगी। जिठानी ने कह दिया " नौकर चाकर से काम भर बात करना चाहिए। जूता पैर मेँ पहनने की चीज है ,सर मेँ रखने की नहीं। यह लूसरिया आजकल बहुत ढीठा गई है। मेरा कहा एक भी काम नहीं करती।" मैं महसूस कर रही थी कि उसपर मेरे अतिरिक्त स्नेह के कारण वह कइयों कि ईर्ष्या का केंद्र बनती जा रही थी। जिठानी ने उसे एक दिन तेल लगाने को कहा। बहुत बिगड़ी कि उन्हें तो पंद्रह मिनट मेँ निबटा दिया, छोटी के यहाँ दो-दो घंटे घुसी रहती है। मैंने लूसर से पूछा तो वह हंस दी।  "आपके पीछे तो कभी मालिस के लिए नहीं बुलातीं। आपके आने पर शौक चढ़ जाता है। मुझसे तो घिनाती रहती है। पलंग पर बैठने नहीं देतीं। अब खड़ी खड़ी कितनी देर लगाऊँ।"

मेरी दिक्कत यह थी कि मैं उसे पैसों के अतिरिक्त और कोई मदद नहीं कर पाती थी। रसोई और भंडार सास और जिठानी के जिम्मे था। जबकि लूसर को खाना मिलने पर सुविधा होती । एक दिन मैंने थोड़ा सा बचा दूध, जिसे बिल्ली ने जूठा दिया था ,लूसर से फेंक आने को कहा। मैं आँगन मेँ कपड़े उठाने गई ,लौटकर देखा तो लूसर ढ़क ढ़क दूध पी रही थी। मैं नाराज़ होने लगी कि "बिल्ली का जूठा दूध है , तुम्हें कुछ हो जाएगा तो ?" उसने कहा कि उसे कल से बुखार है । उसके पास दवा के भी पैसे नहीं । कल से कुछ खाने कि भी इच्छा नहीं । पर ज़ोर से भूख लगी थी और दूध पीने का बहुत मन कर रहा था। सो पी लिया । कल पति को खबर भी भिजवाया बड़े बेटे से, पर वह देखने भी नहीं आया। रात भर बुखार मेँ पड़ी रही । आप तो रांची चली जाएंगी सो जब तक आप  हैं, आए बिना मन नहीं मानता । आप मुझे आदमीन समझती हैं।

"मुझे कुछ नहीं होगा छोटी मालकिन , आप चिंता न करें।" पर मुझे बहुत चिंता होती रही। इसे कुछ हो गया तो इसके बच्चों को कौन देखेगा? अगले दिन सुबह वह मेरे सामने खड़ी थी साबूत, हँसती हुई । मैंने गुस्से से कहा "बड़ा हंस रही हो, बिल्ली ,कुत्ते का जूठा नहीं खाना चाहिए ।  इनका जहर बहुत दिन बाद असर करता है।" मैं उसकी स्थिति से बड़ी खिन्न थी। वहाँ एक सीमा से अधिक उसकी मदद भी नहीं कर  सकती थी। मैंने उससे कहा कि "चलो मेरे साथ शहर , मैं कुछ इंतजाम कर दूँगी।" उसने कहा "वह जाने नहीं देगा।" मैंने कहा "अच्छा ! वह तुम्हारा अब भी मालिक है।"

मैंने उससे कहा कि उसे कल बुला कर लाना तो मैं बात करूंगी । लूसर मुँह पर कपड़ा रख हंसने लगी, जैसे मैंने कोई बेवकूफ़ों वाली बात कही हो। वह बड़ा घमंडी है, कभी नहीं आएगा। उसने आगे कहा कि उसकी बहुत बूढ़ी, बीमार सास भी है और उसे गाँव छोड़कर कहीं जाना मंजूर नहीं और लूसर बूढ़ी सास को छोड़कर कहीं नहीं जा सकती ।  बुढ़िया ने बुरे वक़्त मेँ उसका साथ दिया है । आखिर बुढ़िया बेटे के बार बार कहने पर भी उसके साथ नहीं गई। आज तक नयकी को नहीं अपनाया । उसने लूसर का मान रखा है। उसे ही अपनी बहू मानती है। लूसर उसे छोड़कर कहीं नहीं जाएगी, स्वर्ग में भी नहीं। एक दिन घर मेँ किसी आयोजन के बाद मैंने एक प्लास्टिक के थैले मेँ छिपा कर उसे  पूरी और मिठाइयाँ दीं।

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वह पिछवारे से निकली । शाम का वक़्त था । बहुत सुंदर हवा बह रही थी। मैं उसे बहुत देर तक खेतों की  मेड़ पर जाती हुई देखती रही। शाम का वक़्त था, वह उड़ी जा रही थी । उसके बच्चे ,सास सब कितने खुश होंगे ,यह सोचकर वह आनंदित थी । मैं उसकी खुशी देखकर खुश थी । उसने बहुत दुआएं दीं मुझे। मुझे शर्म महसूस हुई। यह कोई बड़ा काम नहीं था पर शायद वह जानती थी कि अपने मन से काढ़कर उसे कुछ देने मेँ कितना रिस्क था। मैं अंदर जाने को मुड़ी , मेरे पीछे मेरी जेठानी खड़ी थी। उसकी दृष्टि भी पीछा कर रही थी-- लूसर के हाथ मेँ हिलते थैले का। हमारी आँखें मिली तो मैंने आँख नीचे कर ली। मैं वापस अपने कमरे कि तरफ आई। आधी  पलंग पर और आधी नीचे झूलती हुई नीली बनारसी साड़ी पड़ी थी । पति खड़े थे "यह साड़ी यहाँ ऐसे क्यों पड़ी है , इसकी कवर वाली प्लास्टिक कहाँ गई ?"
" प्लास्टिक तो लड्डू ,पूरी भरकर लूसर को मिल गई ।" जिठानी ने जबाब दिया।
यह बहुत छोटी सी बात थी पर उसे बहुत बड़ा बनाया गया । मैं दाई-नौकरों को बिगाड़ दूँगी । नौकरी की छुट्टियों पर चार दिन के लिए आती हूँ, तो घर का कायदा कानून न बिगाड़ूँ। अपने आँगन मेँ काम करनेवाली दाइयों को जब पता चलेगा तो वे कितना हल्ला मचाएंगी कि बाहर वालों को ज्यादा मजूरी मिल रही है। मैंने धीमे स्वर मेँ कहना चाहा "सबके तो घरवाले साथ हैं, यह अकेली ।" मैं जानती थी यह षड्यंत्र, लूसर के लिए कम, मेरे लिए ज्यादा है। वरना खुले हाथ की छोटी मालकिन को और कोई और चाहे या न चाहे, दाई- नौकर बहुत चाहते थे। 

रात मेँ सास ने आकर कहा सब कह रहे हैं "बेटी होने पर भी कोई मालिश करवाता है क्या ? मैंने लूसर को क्यों तुम्हें लगवा दिया । तुमने लूसर को अपने हाथ से खाना दे दिया, बड़की बहुत नाराज़ है।" सास डर रही थीं कि कल से किसी घरेलू राजनीति के तहत घर की दाइयों को कोई भड़का न दे। फिर इतने बड़े घर आँगन का काम कैसे होगा। मैंने कहा -"माई! बड़की दीदी को समझा दीजिये उनका राज-पाट कोई नहीं छिनेगा, मैं तो यहाँ हमेशा पहुना बनकर ही आऊंगी।" माईं का मलिकांव अब डगमग था। स्वयं माई को भी यहाँ घुटन होने लगी थी। जब जिसे जो चाहें, वे भी नहीं दे सकतीं थीं। पर शहर में भी उनका बहुत जी नहीं लगता था। दो कमरों का घर, उसपर से हम चारों जने, अपने अपने काम काज में सुबह के निकले, शाम को घर आते थे। पड़ोस में एक ओर उड़िया भाषी तो दूसरी ओर दक्षिण भारतीय परिवार । हमारे पीछे माई का ख्याल तो वे बहुत रखते, पर भाषा समझ नहीं पाते । माई को भोजपुरी छोडकर और कोई भाषा आती नहीं थी।

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 एक दिन दोपहर मेँ मेरी घर की दाई ने मुझे घर के पीछे खलियान की तरफ आने का इशारा किया । वहाँ एक गोरी, सुंदर सी औरत काम कर रही थी । उस सुंदर चेहरे पर एक काली सी छाया थी। सर पर आँचल था और सूप फटकने के साथ साथ उसकी नकबेसर हिलती थी। उसने बताया-" वह है लूसर की सौत, सरोज।" आगे उसने यह भी बताया कि खेलावन इसे भी आजकल बहुत पीटता है। इसे भी ठीक से खोराकी नहीं देता। इसके भी तीन बच्चे हैं।
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आजकल यह भी रोजाना काम पर आती है। एक बार मर्द का हाथ औरत पर छूटना शुरू हो जाए तो फिर रुकता  नहीं। उसका हाथ रोकने वाला है भी कौन ?मैंने लूसर से उस दिन पूछा तुम्हारी सौत के क्या हाल हैं ? उसने कहा कि "बहुत खराब , वह  रिसते मेँ हमलोगों की भगनी लगती है ,इसकी शादी अच्छे घर मेँ हुई थी । दूल्हा सूरत मेँ रहता था । मैंने इसे बहुत समझाया कि अपना घर मत छोड़, बहुत पछताएगी । पर यह अंधी हो गई थी ।  उसको भी समझाया कि भगनी ब्राह्मण होती है इसे गलत नज़र से छूएगा, तो कोढ़ी हो जाएगा । पर उसने सुना नहीं। इसके पीछे मुझे  इतना मारा, यह आँख--!" कहकर वह चुप हो गई, जैसे कोई गलत बात कह गई हो। ओह ! मैं कह उठी, मैं तो समझती थी कि  बचपन से ही--। उसकी आँखें पनिया गई , उसने मुँह फेर लिया।

उसी ने बताया, एकबार उसकी सौत कुएं पर नहा रही थी ,रास्ते पर का कुआं, खेलवान पानी खींच- खींच उसपर डालता जाता था। अपने में मगन दोनों हो हो कर हंस रहे थे। ठीक उसी वक़्त उसका पति ढेरों सामान कपड़ा -लत्ता, मर -मिठाई लिए ससुराल आ रहा था। उसने यह दृश्य देख लिया। सारा समान वहीं फेंक, उल्टे पैरों लौट गया। उस दिन लूसर बहुत रोई । जान गई कि अब उसकी कोई राह नहीं, वह उसकी छाती पर ही मूंग दलेगी।

मेरे मन मेँ इन दो पतिव्रता स्त्रियॉं के एकलौते पति को देखने की इच्छा ज़ोर मारने लगी । एक दिन मैंने उसे देखा। काला , भारी बदन वाला खेलावन, झक्क सफ़ेद कुर्ते पाजामे मेँ कचहरी के रास्ते मेँ था। हम मंदिर जाने को निकले थे। मेरी चचेरी जिठानी ने दिखाया – यह है खेलावन, तुम्हारी लूसर का पति। वह तेजी से चला जा रहा था। मैं संकोचवश उसे टोक न सकी। मैंने बाद मेँ अपने पति से कहा कि "खेलावन मिले तो उसे डांटिएगा तो। अब लूसर अपना कमा खा रही है, तब उसे क्यों बीच- बीच मेँ जाकर मार पीट करता है ? जिस कचहरी मेँ वह काम करता है वहीं उसे ले जाकर चढ़ा दूँगी, तब पता चलेगा उसे।" उन्होने कहा -"तुम मेरा बहुत सिर खाती हो। यह कौन नई बात है?"

उसके थोड़े दिनों बाद मैं वापस नौकरी पर आ गई । घर ,बच्चे ,नौकरी इन के सिवा मैं खुद को भी याद नहीं रहती थी। पर लूसर को मैं कभी नहीं भूली। गाँव से जब भी कोई आता ,मैं लूसर कि कुशल खेम जरूर पूछती। जब जाती उसे बुलवा कर मिलती । मैं जरूर उसे जबर्दस्ती चूड़ी पहन लेना या मिठाई खा लेना के नाम पर पैसे देती। जबकि मैं जानती थी कि वह इन पैसों से यह दोनों मेँ से कोई काम नहीं करेगी। वह  मेरा बिना कोई काम किए पैसे लेना नहीं चाहती थी। बड़ी स्वाभिमानी स्त्री थी । मैं उससे कहती, "तुम मेरी सखी हो न लूसर,रख लो। जब तुम्हारा बेटा कमाने लगेगा, तब मैं तुमसे चूड़ी पहनूँगी, मिठाई खाऊँगी।" वह मुस्कुरा देती- "आप सब के आशीर्वाद से वह दिन आए छोटी मालकिन।" 

एक बार भतीजा गाँव से रांची आया तो उसने बताया कि लूसर पागल हो गई है। कई बार तो कपड़ा उतार नंगे ही गाँव में निकल जाती है। उसके बच्चे कपड़ा लेकर उसके पीछे पीछे दौड़ते हैं। 12 साल का बेटा होटल में काम कर किसी तरह घर चला रहा है। उसकी यह हालत सुनकर, उस दृश्य की कल्पना कर मैं रोने लगी। मैंने सबसे विनती की - कहा, उसे रांची ले आओ। यहाँ पागलखाने में मैं इलाज करवा दूँगी। पर किसी को फुर्सत नहीं थी। एक दिन सुना कि ओझा बुलवाकर उसकी झाड़-फूँक हुई । ओझा ने बहुत मारा लूसर को। वह पीटती रही और चिल्लाती रही "अब ना, अब ना...छोड़ दो मुझे।" उसके बच्चे रो रहे थे। खेलावन देखता रहा। ओझा उसी ने बुलाया था। लूसर ठीक रहती थी, तो कम से कम वह उसके बच्चों की जिम्मेवारी से बचा रहता था। थोड़े दवा दारू होने के बाद वह ठीक हुई।

समय अपनी गति से चलता रहा। ससुर की मौत के बाद उनके क्रिया-कर्म में गाँव जाना हुआ, बहुत दिन बाद । बेटी दसवीं में थी। सास जो अब विधवा थीं, के लिए आई नेवता की सस्ती साड़ियाँ जब दाइयों के नाम पर रखाने लगी तो एक साड़ी लूसर के नाम पर भी रखी गई। मैंने कहा- लूसर को जरा बढ़िया साड़ी रख दीजिये । "जिंदगी भर नहीं पहनी बढ़िया साड़ी, तो अब क्या पहनेगी। अब तो विधवा हो गई है।" अरे कब ? मुझे किसी ने खबर भी नहीं दी।
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लूसर का सधवा रहना  और विधवा होना क्या जैसे दोनों बातें एक जैसी ही थी उनकी नजर में। पर मैं जानती थी यह एक ही बात नहीं थी । चाहे वह लाख सरापति थी खेलावन को, पर प्यार भी करती थी। अपने पति के कचहरी में काम करने का गुमान भी था उसे। उसकी जाति में स्त्रियॉं को भी दूसरा विवाह करने की छूट थी,पर वह कहीं नहीं गई। मार खा खा कर उसकी देह टूट गई थी । पर उसने अपने बच्चे नहीं छोड़े। मैंने उससे गुस्से में एक बार कहा था कि "इसके बच्चों को इसके सिर छोड़ कर चली जा। अकेली देह कहीं भी कमा खा लेगी। वाह रे , पैदा कर तुझे थमा दिये। पाँच छह पेट पालना कितना मुसकिल काम है इतनी मंहगाई में।" उसने मुझसे कहा था कि-" किस मर्द का कलेजा है दीदी, जो मेरे बच्चों को मेरे साथ रख सके। सिर्फ किसी की सेज सजाने के लिए एक नई गृहस्थी मैं नहीं करूंगी।"

मैं उससे तत्काल  मिलने को बेचैन हो उठी।मैंने खबर भिजवाई । अगले ही दिन सुबह लूसर हाजिर थी। चेहरा जस का तस। बस थोड़ी दुबला गई थी। आकर एक कोने में खड़ी हो गई। मैंने उससे पूछा ऐसा कैसे हो गया अचानक ? उसने कहा "हार्ट फ़ेल हो गया छोटी मालकिन। तुरत छटपटाया और तुरत खतम। अस्पताल ले जाने का भी मौका नहीं मिल पाया।" उसके जगह पर बेटे को अस्थायी नौकरी लग गई है। बेटे की शादी भी हो गई है ।एक गो छुनूर मुनूर नतनी भी है। सब ठीक है। कुछ पैसे मिले थे । बेटी की शादी कर दी । बेटे ने दो ठो पक्का का कमरा भी बनवा लिया है, पखानाघर  सहित। छोटका बेटा दिल्ली चला गया कमाने। मुझे थोड़ी राहत हुई। अच्छा लगा देखकर की चलो जीवन के उत्तरार्द्ध में ही सही, उसकी बहुत सी मनोकामनाएँ पूरी हो गई हैं । उसकी कितनी इच्छा थी पक्के कमरे वाले घर की।  जब वह जाने लगी तो मैंने उसे खाना दिया। थोड़ा और दे दीजिये उसके चेहरे पर कातरता पसरी थी। मैंने और निकालकर दिया । सोचने लगी अब तो सब ठीक है ऐसी कातर  क्यों हो रही है? ऐसा तो पहले भी नहीं थी। मैं उसे छोड़ने निकली । वह मेड़ों पर तेज तेज जा रही थी। जैसे कहीं पहुँचने की बड़ी जल्दी हो। आँगन में  पहुचते ही जिठानी ने बताया लूसरिया बड़ी बेवकूफ है । आजकल बेटा बहू छोडकर सरोज और उसके बच्चों के साथ उसकी झोपड़ी में रह रही है । सरोज कमाने नहीं जा पाती, सब दिन बीमार रहती है। उसके बच्चे छोटे हैं, सो देख रेख यही करती है। लूसर का बेटा चाहता है कि वह अपने बेटे बहू के साथ रहे। इस बात से बेटा उससे बड़ा नाराज़ रहता है। बुढ़ापा में पता नहीं लूसर को कौन देखेगा।
“ उसके कर्म उसे देखेंगे ”। यह माई की  आवाज़ थी, जो इस बार मेरे साथ बोरिया बिस्तर लेकर रांची आने को
तैयार थी.
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