पहले बाबरी , फिर दादरी , फिर हिन्दुत्व के नाम पर बहादुरी


90 साल की लेखिका कृष्णा सोबती को जब दिल्ली के मावलंकर हाल के मंच पर व्हील चेयर में बैठाकर लाया गया तो जो दृश्य उपस्थित हुआ वह दुनिया के किसी भी निरंकुश सत्ता के लिए आसानी से हजम करने वाला दृश्य नहीं था. मंच से कहे गये कृष्णा सोबती के शब्द उस बुजुर्ग लेखिका के शब्द थे, जो अपने देश को सह –अस्तित्व का एक ऐसा भू –भाग के रूप में देखना चाहती है, जहां आने वाली पीढियां सुकून का जीवन जी सकें, जहां जीने –रहने –खाने के ऊपर सत्ता या किसी लम्पट तंत्र की निगाहबानी नहीं हो .


कृष्णा सोबती ने बढ़ती असहिष्णुता के प्रति अपनी चिंताओं से समाज को आगाह करते हुए कहा  ‘ पहले बाबरी , फिर दादरी, फिर हिंदुत्व के नाम पर बहादुरी’. यह पंक्ति कोई तुकबंदी नहीं है, यह पिछले कुछ दशकों से देश के भीतर बन रहे वातावरण को नकारती वरिष्ठ लेखिका का उदगार है , चिंता और आक्रोश है. 1 नवंबर को मावलंकर हाल में ‘ प्रतिरोध’ के लिए साहित्यकार –इतिहासकार –वैज्ञानिक –सामाजिक कार्यकर्ता इकट्ठा हुए . यहाँ उपस्थित लोग देश में बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ इकट्ठा हुए थे. इनमें से कई लोगों ने पिछले दिनों अपने सम्मान वापस किये थे, इस आशा में कि सरकार की संवेदना अपने देश के विवेकशील लोगों के ध्यानाकर्षण के बाद शायद जाग जाये, लेकिन दुखद था कि सरकार और उसके लोगों ने इस समूह का नाम ‘ गैंग’ दे दिया और इनकी चिंताओं का माखौल उड़ाना शुरू किया. 

                                                                         

मावलंकर हाल में वरिष्ठ लेखिका कृष्णा सोबती ने जहां अपनी चिंताएं जाहिर की, वहीं इतिहासकार रोमिला थापर ने सत्ता और संघ के लोगों के इस दुष्प्रचार कि सम्मान लौटाने वालों ने , बढ़ती असहिष्णुता के खिलाफ बोलने वालों ने इसके पहले कभी प्रतिरोध में आवाज नहीं उठाई थी, का जवाब दिया. रोमिला थापर ने इमरजेंसी , 84 के दंगों , बाबरी मस्जिद के गिराये जाने , गुजरात के दंगों सहित अनेक अवसरों की याद दिलाई जब अदीबों ने,  बुद्धिजीवियों ने अपना प्रतिरोध दर्ज कराया था. प्रसिद्ध इतिहासकार ने अपने एक अनुभव के आधार पर अफ़सोस जताया कि ऐसा समय कभी नहीं आया था जब किसी बुद्धिजीवी को अपनी बात कहने के लिए पुलिस संरक्षण में सभाओं में जाना पड़े. हाल के दिनों में मुम्बई में रोमिला थापर को एक व्याख्यान देने के पहले पुलिस ने उन्हें अपनी ओर से सुरक्षा –कवर उपलब्ध कराया. 


इतिहासकार इरफ़ान हबीब ने अपने अंदाज में इतिहास और वैज्ञानिकता से हो रहे खिलवाड़ पर सवाल उठाया- एक वाजिब तंज के साथ कि दुनिया में हुए आविष्कारों को लेकर ये लोग दावा करते हैं कि इसका उल्लेख वेदों में भी मिलता है, ये लोग वेदों के वैसे आविष्कार सामने क्यों नहीं लाते , जिसे दुनिया में अभी अविष्कृत नहीं किया गया है . ये लोग वैसे फ़ॉर्मूले क्यों नहीं बताते कि यह ज्ञान भी वेदों में है , इसे दुनिया नहीं जानती.’
1 नवम्बर को मावलंकर हाल में इकट्ठा बुद्धिजीवी किसी एक विचारधारा से नहीं थे, जिसका दावा संघ और सरकार के लोग करते हैं. वैसे लोग भी उस हाल में मौजूद थे , जिन्हें इस सभा में ‘वैष्णव जन’ के गायन पर ऐतराज था, या आयोजकों में एक,  कवि अशोक वाजपेयी ,  के द्वारा इस असहिष्णु माहौल का समाधान रामायण –महाभारत –रामचरितमानस की पंक्तियों में ढूँढने की कवायद के प्रति आलोचक रुख के लोग भी वहां उपस्थित थे. दलित लेखक मोहनदास नैमिशराय ने ‘ वैष्णव जन’ में समाधान खोजने की आलोचना भी सार्वजनिक रूप से वहां की. इसके बावजूद सैकड़ों की संख्या में अलग –अलग विचारधाराओं के लोग उपस्थित थे तो उसका एक मतलब है.  और यह मतलब है कि समाज की अगुआई का एक बड़ा तबका , देश का बौद्धिक नेतृत्व यह समझता है कि पिछले कुछ दिनों में देश का माहौल खतरनाक मोड़ पर है. 



आयोजकों ने हिन्दू आक्रामकता के शिकार लेखकों –सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धीजिवियों के परिवार से भी लोगों को आमंत्रित किया था. सत्ता और आक्रामक हिंदुत्व को निराश होने के लिए यह पर्याप्त है कि अपने परिजन की ह्त्या के बावजूद ये लोग तार्किकता और वैज्ञानिकता को समर्पित मुहीम से पीछे नहीं हटे हैं. देश की राजधानी सहित देश के अन्य हिस्सों में बुद्धिजीवियों , तार्किक और वैज्ञानिक समूहों और लेखकों की आवाज को सत्ता के द्वारा ‘ ‘मैन्युफैक्चर्ड विरोध’ मात्र कह देने से इन्हें नकारा नहीं जा सकता है. 

रोमिला थापर का भाषण यहाँ सूना जा सकता है . 




मावलंकर हाल के आयोजन के संयोजकों में भले ही अशोक वाजपेयी , ओम थानवी एम के रैना हों , लेकिन वहां बड़ी संख्या में उपस्थित बुद्धिजीवी इस बात के संकेत थे कि इस माहौल के प्रति अकुलाहट सभी बुद्धिजीवियों में है . इसके पहले भी एम. एम कलबुर्गी की ह्त्या के विरोध में जंतर –मंतर पर इसी तरह लेखक –सामाजिक कार्यकर्ता –बुद्धिजीवी जुटे थे. 
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