संजय कुमार शांडिल्य की कविताएं

पेशे से अध्यापक. मंतव्य, हंस सहित अनेक पत्र -पत्रिकाओं में कविताएं प्रकाशित संपर्क : 9431453709
एक नये कवि से परिचय करा रहे  हैं  हम, विश्वास है आप इन्हें लम्बी दूरी तय करते देखेंगे . इनकी कविताएं इस दावे की गवाह हैं . फुर्सत से पढ़ें : 

1. मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो
हत्यायों और हादसों के अभ्यस्त कस्बे के बीच
पुरातात्विक खुदाई में
टेराकोटा ईंटों से बना
एक पुराना विहार झाँकने लगता है
कुछ दिन की जगमग उत्साहों के बाद कस्बे में
उदासीन लोग हलवाई की दुकानों पर
जलेबियाँ खाने के लिए इकट्ठा होते हैं
तृष्णा ,माया ,बंधन ,मुक्ति के प्रश्न और उनके
उत्तर
हर बरसात में थोड़ा-थोड़ा बिलाते हुए
किसी खपड़े में ,किसी झिकटी में
फावड़े के साथ बाहर निकलते हैं
आपने इन चीजों को जहाँ रख दिया है
वह भी एक पृथ्वी-गर्भ है
नीली स्याही लगी हुई वह तीन हज़ार साल पुरानी दवात
अपनी इबारतों को नहीं पुकार सकती है
किन बेचैनियों में एक नफीस छिला हुआ सिरकंडा उसमें डूबा है
आज इसे कोई नहीं जानता
लोग रामायण और महाभारत याद-रखते बाँचते
समय का कितना यथार्थ बचा पाते हैं?
कोई लड़कर अपने समय की हिंसा से,
प्यार करता है
अपनी प्रेयसी को अस्थियों से बनी चूड़ियाँ भेंट देता है
नंग -धड़ंग त्रिशूल -धारी अनागरिक के हाथों अपने मृत होने से पूर्व
होए, होए पुकारता हुआ
अपनी प्रियतमा को
आँख बंद होने से पूर्व जिसकी एक झलक
मुक्ति है
यह कथा किसी त्रिपिटक में लिखी हुई नहीं है
वह भुर्जपत्र सबसे पहले सड़ा विध्वंस के बाद की पहली बारिश में
होए -होए हो सकता है उस समय की भाषा में
हृदय को विगलित करती करुणा की सबसे
अप्रतिम पुकार हों
जिसे चारागाह में जुगाली करती गाएँ भी समझती हों
जो भाषा शिष्ट हो कर बची हुई है उसमें करुणा के सबसे कम शब्द बचे हैं
हिंसा के ढूँढ़ लो तो हज़ार मिल जाएँगे
कुछ तो मैं लिखता हूँ और मुझे लिखना होगा
जब रामायण और महाभारत सृजन में होंगे
त्रिपिटक रचना में
उस मृदुभांड की वह छोटी सी दवात जिससे चिपकी हुई नीली स्याही आज भी झाँकती है
पृथ्वी गर्भ से
मर्म की विस्मृत ,असंरक्षित वह पुकार कहीं
दर्ज नहीं है
शायद उसका रचा काव्य नहीं हो ,शब्दों का घोंसला हो
कोई तो गाने वाली चिड़िया वहाँ रहती होगी
महाकवियों! मैं इस जलती हुई पृथ्वी पर रहा हूँ
मैंने प्रेम किया है, सरकंडे छीले हैं
मैंने अपनी भाषा में दुनिया की सबसे गहनतम करुणा में
किसी का नाम पुकारा है
मुझे नीली स्याही लगी एक दवात छोड़कर जाने दो ।
साभार गूगल 

2. जो नमक का है ज्वार भाटों का है
तुम उस समुद्र को जानती हो जो नमक का है
ज्वार-भाटों का है
वडवानल का है
तुम उसमें रहती हो
तुम उस कुएं को जानती हो
जिसमें नमक के और मुसाफ़िर
रहते हैं
जिससे सिर्फ़ आवाजें लौटती है
समुद्र भी एक बड़ा कुआँ है
फ़र्क सिर्फ़ नमक का है
तुम समुद्र में हो
मैं हूँ कुएं में
सुनों इस आग़ की आवाज़ सुनों
पानी की वासना के नीचे
कुएं और समुद्र से आती है
आग़ की आवाज़

जहाँ पृथ्वी निर्वसना है
बस इस कुएं औरउस समुद्र में
सिर्फ़ नमक का फ़र्क है
जो नमक का है ज्वार भाटों का हैI

3. गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं
लोग तो इस गुलमोहर का भी बुरा मानते हैं
बिखेर देता है हरियाली छोड़ने के क्षण में
सिकुड़ा हुआ लाल फूल
तुम हँसकर पूछती हो कि तुम्हारा हँसना बुरा तो नहीं है ।
जैसे इस अँधेरे में एक-एक कर
डूबने लगेंगे रात के सितारे

एक बड़े गोते में सूरज एक दूसरे आकाश में निकलेगा
और पृथ्वी पर सुबहें नहीं होंगी ।
हँसने से अच्छा कोई व्यायाम नहीं है यह सामान्य वाक्य कहकर मैं परे देखता हूँ
सचमुच तुम्हारी हँसी के बिना यह दुनिया कितनी बेडौल हो गई है
मुझे एक सामूहिक ठहाके में वह पार्क अकबकाया और बदहवास दिखाई पड़ता है
जिसे शाम को खिलखिलाते हुए बच्चे थिर करते हैं ।
फैसलों का परिणाम जिस पर पड़ता हो उसे
फैसले लेने का हक़ होना चाहिए
तुम लगातार हँसती हो और गुलमोहर से लगातार फूल झड़ते हैं ।

4. गाँव की लड़कियाँ
मैं कहूँ कि गाँव की लङकियों के सिर पर
चाँद के पास कम केश होते हैं
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गगरे में दाल का पानी ढोती हैं गाँव की लङकियाँ
सिर्फ उस दिन को छोङकर जब घर में मेहमान आते हैं लगभग बारहों महीने
विवाह तय होने के हफ्ते दो हफ्ते पहले तक

दबंगों की बेहिस छेड़ को जमाने से ज्यादा अपने भाइयों से छुपाती हैं गाँव की लङकियां
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लङकियां अपने सपनों में कोई राजकुमार नहीं देखती हैं
वह समझती हैं जीवन और कहानियों का पानी और आग जितना फर्क

मैं कहूँ कि गाँव की लङकियां किसी से भी ब्याह कर एक दुनिया बसा लेती हैं
अमुमन वैसे कि ठीक-ठीक वही हो उनके ख्वाबों की दुनिया
आप पूछोगे आपको कैसे पता है

गाँव की लङकियां खूब रंगीन रिबन से अपनी चोटी बनाती हैं
और उन्हें मेले से चूङी और रिबन के अलावा कुछ और नहीं खरीदना होता है

गाँव की लङकियां गाँव की लङकियां होती हैं
खूब गहरी
हवा में भी रौशनी में भी मिट्टी के बाहर भी
उनकी जङें हैं उनके वजूद से झाँकती हुई

इन घनी लङकियों को बारिश और धूप से आप नहीं डरा सकते हैं
आप पूछोगे कि आप को कैसे पता है?
साभार गूगल 

5. मॉल में लडकियां

आधी फीसदी की छूट के बावजूद
मुझे यह मेरी दुनिया नहीं लगती

पोस्टर थे जो कह रहे थे स्वतंत्रता
कितना ऊपर उठ सकती थी
कॉकेशियन नस्ल के लोग
मुस्कुराते हुए साथ-साथ थे

वे चाहते थे कि हम अपनी
पहुँच बढाएं इसलिए वे
दूरियाँ घटा रहे थे

हमारी समस्या थी हमारे लोग
जिनके लिए जूते फकत पाँच-सात सौ
फ्राक हज़ार-बारह सौ
और बाहर का खाना
महीने-दो महीने में मसाल-दोसे
भर का मसला था

जो प्यार इन नई झक्क सफेद
इमारतों से आता हमारे लिए
वह फरेब था
इसका पता हमें चलता
तब तक देर हो चुकी होती थी

बाहर धकलने वाले शीशे
के दरवाजे थे
जिनको खोलते हुए
हाथ सहमते थे
कि इन्हें आगे की ओर
खींचे या पीछे धक्का दें

नियोन में जो चीजों के
भाव चमकते थे
वे खाने की टेबुल पर
मेनू में बदल जाते थे

मैं उङना चाहती थी
कॉकेशियन उस हम -उम्र
युवती की तरह
यह ख्वाब मैंने मॉल की
स्वचालित सीढ़ियों को
चढते हुए देखा
एक भरे पर्स के उस प्रौढ़
के साथ
जिसे उङती हुई
युवतियां पसंद थी

प्रेम जितना दिखता
वह वहीं छूट जाता था
इस शहर का मौसम
तेजी से बदल रहा था
पृथ्वी और सूरज के
सम्बन्ध से अलग

मैं इसी दुनिया में रहना चाहती हूँ
मेरा पुरूष साथी परिपक्वता से हँसता है
तुम यहाँ आ तो सकती हो
यहाँ रह नहीं सकती

ललचाने भर दुनिया की सारी जगहें
खुली अलमारियों में रखी थी
हम उङना चाहते थे मगर उङ नहीं
सकते थे

एक लंपट सी खुशी चारों तरफ
उङ रही थी
एक उदास सा फरेब मेरे
साथ-साथ चल रहा था

न यह मेरे भरोसे की दुनिया थी
न मेरी दुनिया मेरे पसंद की

यह आधी फीसदी की छूट न थी
सौ फीसदी की लूट थी

बारह हज़ार के जूते
पाँच हज़ार की कमीज
और वह कॉकेशियन हम उम्र
युवक जो वहाँ नहीं था

फरेब इसमें था कि यह दुनिया
मेरी हो सकती है
यह हर कदम पर यहाँ लिखा था
और ऐसे कि इसपर भरोसा जगता था ।

6. सदियों हुए प्यार किए

सदियों से प्यार को राख करती ज्वालामुखी फूटती है सुबह-शाम
ये रोटियां जो मेरी थाली में हैं ये सदियों पहले
की पकी रोटियां हैं
मेरा विश्वास करो इसे पोम्पेइ में बनाया था
किसी औरत ने जो अपने मर्द से प्यार करतीं थी
अभी रोटियाँ सिंकी ही थी चूल्हे पर
कि ज्वालामुखी उस थाली को पिघला गई
जिसमें वह रोटियाँ परोसती और
अपना प्यार ।
भूख की जली हुई देह का श्राप टहल आता है
हजारों किलोमीटर
प्यार जो जल गई ज्वालामुखी में
उसकी राख आज भी गिरती है इस चाँदनी रात में ।
चूल्हे से सुबह-शाम फूटती है ज्वालामुखियाँ
खत्म हो गया प्यार का आबाद शहर
चूल्हे के राख में लिपटी हुई तुम्हारी देह
मेरी भी और एक बरबाद हुई सभ्यता ।
मैं एक पत्थर हुआ गीत हूँ सदियों से
तुम्हारे पत्थर हुए होठों में फँसा हुआ ।
सदियों से एक सभ्यता की जली हुई लाश है
चाँद की रौशनी में यह शहर मॄत और भस्म ।
मैं तुम्हें और तुम मुझे
बिना प्रेम किए जीवित हैं हम सदियों से ।

7. पृथ्वी के छोर
                                           
यह पृथ्वी का एक छोर है :
गाँव पहाड़ की तलहटी है
जहाँ एन्डीज़ मिल रहा है
सपाट मैदानों से
पेरू की किसी लोक भाषा में
कचरा बटोरने का गीत है
घोङे की बग्घी में
पुरूष जब विलासिता के
कार्टुन चुनने निकलेगें
हाथों को काम करता देख
होंठ उन्हें अपने आप गाएंगे।
स्त्रियाँ पास ही शहरी इलाकों में
बच्चे सँभालने निकलेगी
बच्चे ईश्वर सँभालता है
उसी लोक भाषा में यह भी
एक गीत है पृथ्वी के उसी छोर पर।
यह पृथ्वी का दूसरा छोर है
मेरे पङोस में :
मूँज के पौधों में सिरकंडे होने से पहले
सपाट मैदानों के भी अपने पहाड़ हैं
जिनकी तलहटियों से
कुछ स्त्रियाँ खर निकालने निकलेगी
कुछ रह जाएंगी गोबर पाथने।
अभी सरोद की तरह बजेगी पृथ्वी
मूँज धूप में सूखेगा
झूमर और कजरी के गीत साथ-साथ
झरेंगे
लकङियाँ और पत्ते पास के
जंगल से इकट्ठा कर
पुरूष घर लौटेगा।
यहाँ की लोक भाषा में भात
बनने का भी एक लोकगीत है।
फिर किसी सस्ती सी आँच पर
प्रेम वहाँ भी पकेगा और यहाँ भी
एक साथ रात की देह गिरेगी
ओस की तरह
श्रम से दुनिया को भरती हुईं
सुबहें ऊगेंगी
खाली जगहों में
लकीरों की तरह
हम दुनिया के छोर पर
काम करते हुए लोग
सुबह की इन लकीरों को
कविताओं में पढेंगे।

8. तब हम किसी से पूछ नहीं सकते थे 

तब हम खूब चटख लाल और तङके हुए पीले रंगों की कमीजें पहनते
दुख सेमल के फूलों से हलके और उजले गिरते थे
बेआवाज़
हमारे लगाव मेमने की तरह मासूम और नफरतें सिंह की तरह हिंस्र

प्यार हमने तभी किए जब प्यार के बारे में ज्ञान किताबी नहीं था ।

वह साँवली सी लङकी जिसपर पहली बार दिल आया अब दादी बन अपने पोते की मासूम मुस्कुराहट पर फिदा होती होगी
मैं जब आठवीं में था वह बी ए में पढती थी और जैसे आम में मंजर आते हैं वैसे मुस्कुराती थी
मुस्कुराहट का कोई सिलेबस तो तयशुदा होता नहीं
हम आज भी उस मुस्कुराहट का बेसदा और निर्गंध अनुवाद पढना चाहते हैं ।

वे प्यार की सङकें जिसपर हम मोरों की तरह नाचे फिर किसी कस्बे, गाँव या महानगर में नहीं ढले
तब मोहब्बतें कलगी की तरह उगी रहती ऐन ललाट के ऊपर
हम बेखौफ जमाने की आँखों में उसका लाल रंग
गङाये हुए डगरते
हाय वह दूध में मिले हुए हल्दी सी गोराई पहने बैजनी समीज और हरे दुपट्टे वाली परियाँ
हमने तब अपने प्यार को अधिकतर यतीम रखा
जिसका बेइंतहा दर्द कलेजे के किसी गोशे में
सैकड़ों सुइयों की तरह चुभता हैं ।

वासनाओं के ईल्म तब जिन्दगी के अनजाने ईलाके थे
मोहब्बतें खरगोश के कानों में हवाओं की संगीतमय सरगोशियाँ
वे फिल्में जिन्हें देखकर हम रोए रात भर और जिन नायिकाओं से जुङे दिल के सबसे महीन उजालों में
मुट्ठियां भींचते हुए कि जो पर्दे के बाहर चिन रहा होता नायक हम उन दीवारों को आग लगा देते गरचे वो नहीं होता पर्दे पर ।

तब पगडण्डी वही थी जो सरसों के फैले हुए खेतों तक पहुँचने के लिए होती
प्यार तो मैंने तभी किया जब हम प्यार कर सकते थे
लेकिन वे ही मौसम याद हैं जिसमें मुस्कुराहटें
आमों में मंजर की तरह उतरते थे
हम सिनोरिटा का अर्थ जानना चाहते थे और तब किसी से पूछ नहीं सकते थे ।

Blogger द्वारा संचालित.