पूजा खिल्लन की कविताएँ

पूजा खिल्लन
दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका. प्रथम काव्य-संगह ‘हाशिए की आग’ के लिए यशोधरा सम्मान। समांतर सिनेमा और नसीरुद्दीन शाह एक सद्यः प्रकाशित पुस्तक. संपर्क : pujakhillan@gmail.com 
प्रेम करती औरत

औरतें जब करती है प्रेम
तो दीवारें टूट जाती है नफरतों की
सपने बेतहाशा दौड़े चले जाते हैं
ख्वाहिशों की नींद में,
औरतें छिपकर नही करतीं प्रेम
इसलिए एक खुली किताब-सा
पढ़ा जा सकता है उनका प्रेम
उम्र के लाजि़मी चश्मे के बगैर भी,
यूँ ही अकसर,
जैसे समय के हर जरूरी रंग में
ढाली जा सकती है उसकी इबारत
और लिखा जा सकता है एक नया
व्याकरण प्रेम का।

 सपनों से खाली शहर में

कई बार खड़ी होती है वह आईने के सामने
और बिखेर देती है एक निरपेक्ष मुस्कान
खाली कमरे की सजावट में
फूलों की तस्वीर में कैद एक खुशबू
फैल जाती है उसके इई-गिर्द
किसी अजनबी जख्म के अहसास में,
नींद में उतरा गुब्बार
लौट आता है सपनों से खाली शहर
की दीवार पर दस्तक देकर
तब जबकि पहले से ज्यादा मुश्किल होता
है लौटना यकीन की परिधि पर
पोछना खुद के आँसू
तसल्ली देना अपने आप को
फुर्सत से खाली किसी लम्हे की
थकान को पोछकर
वह पढ़ती है कविता
कामचलाऊ लहजे में
किसी जमे हुए समय की नब्ज़ की जुम्बिश के लिए।

अकेली औरत
हर मुश्किल पार करने के बाद
औरत आकर छिटकती है
अपने अकेलेपन पर,
न लिख पाने की हालत में उसपर कोई
कविता
शायद इसलिए कि यह अकेलापन बोनस
में मिला है उसे, विरासत में
मिली उस चुप्पी के साथ, जो उसके
औरत होने का पहला प्रमाण है
जबकि यूँ ही नहीं चुनती वह उसे
अकसर जानबूझकर
जैसे चुनती है वह अपनी लिपस्टिक का रंग
या कोई मैचिंग ड्रेस
उम्र के  हर पड़ाव पर अकेले
ही खड़ा होना होता है उसे
बाहर मौजूद बसावट के बावजूद
जिसपर हर पल अपना जादू बिखेरती
आगे बढ़ती रहती है वह
जैसे एक खुशनुमा तितली
उड़ जाती हो फूल से, अपने सारे
रंग बिखेरकर।

 औरतें बागी होती हैं
औरतें जब जीना चाहती हैं
अपनी शर्तों पर, तो बागी होती हैं
मर्द जीने की छूट भी
अहसान की थाली में ही देना
पसंद करते है उसे
तब जबकि किन्हीं मरे हुए रिश्तों के
जीवाश्म चिपके होते हैं उसकी
जिंदा देह पर,
हर बात पर
किया जाता है सिर्फ विमर्श
या फिर  उसकी नंगी देह का साबुन बनाकर बेच दिया गया
होता है किसी बाजार में,
तब औरत खुद एक बयान होती है
अपने पर हुए अन्याय के खिलापफ।

 सपनों के लिए
सदियों से औरत देती आई है
चुंगी
अपनी देह की,
चुकाती आई है मुआवजा
अपने औरत होने के अपराध का
सूरज की तरह खटती रही है उसकी रोशनी
अंधकार  से अपने वजूद की रक्षा के लिए
कई बार उसके दुख का संचरित लावा
झरता है एक सघन नींद के सपनों में,
इतिहास के किसी उपनिवेश से
और प्रतिरोध की एक नदी बनकर,
बहने लगता है
समय के मौजूदा साँचों को तोड़कर,
और कई बार सिर्फ जारी रहता है
उसका संघर्ष, उन सपनों के लिए
जो अब भी देखती है वह
अचानक लापता हो गई उस बेचैनी
के लिए, जो सचमुच जरूरी है सपनों के लिए।

बदलो
दुनिया नहीं उसे देखने का नजरिया
बदल जाता है हर बार
जैसे शब्द पहले तत्सम था, अब तदभव है
कविता पहले तुक थी
अब लय है
और जितनी तेजी से बदल रही है दुनिया
उतनी ही तेजी से बदल रहा है अर्थ
और उसके प्रतिमान
लेखक नही पाठक जिसकी कुंजी है
अगर तुम पाठक हो तो बदलो,
चूंकि परिवर्तन अब अकेले
मेरे जैसे किसी लेखक के बस की बात नही।

Blogger द्वारा संचालित.