डांस ऑफ़ डेथ

मंजरी श्रीवास्तव
युवा कवयित्री मंजरी श्रीवास्तव की एक लम्बी कविता ' एक बार फिर नाचो न इजाडोरा' बहुचर्चित रही है संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com
मैं विचार बनकर पैदा होती हूँ
आह बनकर मरती हूँ और
अदृश्य हो जाती हूँ छाया बनकर हरपल

इन पंक्तियों में अपनी रचनाधर्मिता और खुद को अभिव्यक्त करती मंजरी श्रीवास्तव का यह चौथी काव्य प्रस्तुति है, जिसका मंचन शीघ्र प्रस्तावित है. इसके पहले  तीन प्रोडक्शंस (कविता रूप में ही) क्रमशः - 'एक कविता ख़लील जिब्रान के लिए', 'एक बार फिर नाचो न इज़ाडोरा' और 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते' है. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते का कई बार मंचन हो चुका है और २ वर्ष पहले के यूथ फेस्टिवल में इसे बेस्ट स्क्रिप्ट का अवार्ड भी मिल चुका है. 


कवयित्री का नोट :
ये सिर्फ़ कविताएँ नहीं, कविताओं के रूप में लिखा गया डांस-ड्रामा प्रोडक्शन है. यह प्रोडक्शन जिसका नाम मैंने ‘डांस ऑफ़ डेथ’ रखा है यह सीधे-सीधे मृत्यु की बात नहीं करता; बल्कि बात करता है रोज़मर्रे की उस ज़िन्दगी की जो मौत से भी बदतर है और जिससे रोज़ दो-चार होने के लिए हम मजबूर हैं.

यह शब्द/शीर्षक (डांस ऑफ़ डेथ) मशहूर बांग्लादेशी रंगकर्मी और निर्देशक श्री कमालुद्दीन नीलू के नाटक ‘मैकाबरे’ से लिया गया है पर व्याख्या मेरी है. पिछले वर्ष भारत रंग महोत्सव में उनका यह नाटक देखा था, तभी से सोते-जागते चौबीसों घंटे यह शब्द मुझे परेशान किये रहता था और अंततः इस शब्द ने खुद को मुझसे व्याख्यायित करवा ही लिया जुलाई में. वही व्याख्या अब आप सबके सामने है. प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में .


1. 

इन दिनों मैं मौत के तिलिस्म की तलाश में
ज़िन्दगी के पेचीदा रास्तों से गुज़र रही हूँ.

बर्फ़ के नीचे दबे बीजों की तरह
मेरा हृदय ख्व़ाब देखता है वसंत के
जिसके पीछे अनंत है
अनंत के सहस्र द्वार हैं
लेकिन आँखों में उसी समय हहराता है
मौत की सिम्फ़नी बजाता
सैलाब लाता समंदर.

ख़ामोशी का मौन दरिया मेरे भीतर
इतना धीमे-धीमे मुसलसल बहता है कि
उससे फूटने लगता है संगीत.

मौत की तलाश में बंजारन बनी भटक रही हूँ पल-पल
पर निर्जन रास्तों पर भी नहीं मिलती मृत्यु
वहां बिखरा है पग-पग पर जीवन का जादू.

हर सूर्योदय नयी जगह
और सूर्यास्त भी
आँखों में नींद भरी पृथ्वी पर भी
जारी रहती है मेरी यात्रा.

चाहे मौत मुझे छुपा ले अपनी आगोश में
या सन्नाटा घेर ले मुझे
फिर भी मेरी ज़िन्दगी तैरती रहेगी
शून्य में
निर्वात में.

रात के सन्नाटे में
गुज़रती हूँ वीरान गलियों से
आँखों में मौत का भयानक तांडव देखने की ख्वाहिश लिए
पर उन खामोश रातों की वीरान गलियों से
आती हैं प्रेम भरी धडकनों की आवाजें
धक-धक, धक-धक, धक-धक, धक-धक
प्रेम में पगी उठती-गिरती साँसें
जैसे चांदनी रात में सागर में उठते ज्वार-भाटे

मौत पर ज़िन्दगी रोज़ ऐसे हावी होती है
ऐसे छाती जाती है
जैसे कुमुदिनी अपने आनेवाले कल के लिए समेट रही हों अपनी पंखुड़ियां

पत्तों पर ठहरी
सुबह की ख़ामोश ओस-सी मौन
जीती हूँ एक पारदर्शी जीवन
अगले पल मौत बनकर उड़ जाने से पहले.

ज़िन्दगी और मौत के इस गायन में
मेरे सुर ख़ामोश हैं
गीत बेआवाज़
तभी फूलों से लदे विशाल वृक्ष पर दिखता है जीवन
दीखता है प्यार
जिसकी सुगंध मुझे पृथ्वी की छूटती हुई आख़िरी डोर से बांधती है
और प्यार मुझे उठाकर स्थापित कर देता है अंतरिक्ष में
बना देता है
शाश्वत, अमर
और यहीं से शुरू होता है
मेरा सच्चा नृत्य.


२.

चेहरे पर गुलाब और लिली के असंख्य फूल खिलाए
आँखों में उगते और बालों में अस्त होते सूर्य
तथा होंठों पर भोर की मुस्कान लिए
वह रोज़ मिलती थी मुझे
जो पहाड़ों के पीछे रहती थी.

बहुत कुछ सिखाया उसने मुझे
जैसे ...
जैसे कि खुद को कैसे छिपाकर रखा जाए झंझावातों से सीपी में बंद करके और
बरसों बाद निकाला जाए एक नायाब मोती बनाकर
जैसे कि पतझड़ के समय बंद रखी जाए अपने मन की खिड़की और उसे खोला जाए
सिर्फ़ वसंत आने पर
जैसे कि कैसे गाया जाए सपनों का गीत हरपल
कैसे बना जाए एक सपना और तब्दील हुआ जाए ओस की बूंदों में

उसने मुझे ओस को सपने में
सपने को कुहासे में
और फिर कुहासे को
सपने और ओस में बदलने की कला सिखाई.      

उसने सिखाया मुझे कि
कैसे  लिखी जाएँ ज्वार के समय
सागर की रेत पर एहसासों की इबारतें
कैसे भाटे के समय सागर की प्रचंड लहरों की तरह खुद मिटाई जाएँ
अपनी ही लिखी ये इबारतें
और महसूसा जाए विशाल समुद्र की एक बूँद कि तरह खुद को.

उसने सिखाया मुझे झरती हुई सूखी रेत बनना
अपने दिल में एक उड़ता हुआ बादल महसूसना
दुनिया को प्यार के क़ाबिल बनाना.

उसने मुझे जंगलों और पहाड़ों में रोज़ प्रकृति के बदलते हुए रंगों से वाकिफ़ कराया
पंछियों के सुबह और शाम के गीतों में फ़र्क करना सिखाया.

उसने मुझे सिखाया
बर्फ़ की तपती आंच पर नाचना
तलवारों और भालों की गति पर थिरकना
सितारों और अंतरिक्ष के रास पर नाचना
प्रकृति के सभी तत्वों को अपने संगीत और लय से वश में करना
हवा में नाचते फूलों-सा थिरकना.

उसने मुझे बताया कि
कितनी समानता थी हम दोनों में
हम दोनों की ही जड़ें इस भूरी-लाल धरती में गहरे तक हैं
हम शक्ति लेते हैं इसके धूसरपन से, इसकी लालिमा से
इसका अद्भुत सिन्दूरी रंग धारण कर
थिरक उठते हैं हम
यह हमें कई-कई ज़िंदगियाँ देती है.

शायद ज़िन्दगी थी वह
पर मृत्यु की तरह उसने जीता था सबको
और लपेटा था सबको असीम की तरह अपने आलिंगन में.

अब नहीं मिलती वह कभी मुझे
पहाड़ों के पीछे से निकलती हुई
लेकिन जाते-जाते समझा गई वह मुझे
सूक्ष्म से अनंत तक का सफ़र
सूक्ष्म से अनंत के बीच का फ़ासला
और यह भी कि
हमें खुद के लिए न सही पर
उनलोगों के लिए गाते रहना चाहिए
जो अपने ख़ालीपन को संगीत से भरना चाहते हैं

३.

ओ जीसस
मैंने खुद तुम्हारा क्रॉस चुन लिया है और धारण कर लिया है तुम्हारा काँटों से बना ताज
एफ्रोदिती (अमरीका में सौन्दर्य की देवी) और इश्तार (लेबनान में सौन्दर्य की देवी) की फूलों भरी दुनिया को तजकर
मुझे ज़्यादा ख़ूबसूरत और आकर्षक लगा तुम्हारा काँटों का ताज
बनिस्बत चम्पई माला के
मुझे ज़्यादा पसंद आई रक्त और आंसुओं की ख़ुशबू इत्र की ख़ुशबू की अपेक्षा.

पहले मुझे डर लगता था इस भरी-पूरी दुनिया में भी
पर अब...
अब मैं भूत-प्रेतों से भरी अपनी अँधेरी गुफ़ा में अकेली रहने से भी नहीं डरती
क्योंकि एक बार स्वर्ग और ईश्वर को आँखों में भर लेने के बाद
किसी चीज़ से डर नहीं लगता.

आज मैं अँधेरी गुफ़ा में बढ़ता एक पेड़ हूँ
जिसमें फूल और फल आने कि कोई संभावना नहीं होती.
पर मैंने इन अंधेरों में भी खिलाए हैं सतरंगी फूल
बिखेरी हैं रोशनियाँ-रंगीनियाँ
मैंने इतनी विस्तृत कर ली हैं अपनी शाखाएं
कि वह लहरा सकें दिन के उजाले में भी.
हर तूफ़ान के सामने खड़ी हूँ दृढ किले के समान
मेरे हृदय के राख़ में अब भी रोशन है एक मशाल और टूटे पंखों वाला वह पक्षी
जो अब भी कल्पना करता है विशाल आकाश की और सबसे ऊंची उड़ान की.

हालांकि यह दुनिया मुझे हरपल डराना चाहती है
और डराने की तमाम कोशिशें करती भी है
पर कितनी नासमझ है वह
क्यों भूल जाती है वह कि
डूबा हुआ गीलेपन से क्या डरेगा ?

सूर्य की किरणों और ताज़ी हवाओं की तरह आज़ाद मेरे वजूद को
इसलिए पसंद है अपना चुना यह अँधेरा
क्योंकि यहाँ मुझे उजाले के सांप नहीं डंसते हरपल
न ही प्रकाश में रहनेवाले भेड़िए झपट्टा मारते हैं.

कभी सोचा है किसी ने कि
वह कौन सा आध्यात्मिक नियम या कौन सा लम्हा होगा
जिसके अनुसार
मैंने ज़िन्दगी को सामने छोड़कर मौत को चुना होगा ?

इन दिनों इस अँधेरी सन्न गुफ़ा में
मैं हर लम्हा सुनती हूँ
कई-कई जिंदगियों के अलग होने का चीत्कार
शून्य में निरंतरता का चीत्कार
विराट शक्तियों की स्थिरता में एक दुर्बल शक्ति का चीत्कार
जीवन और मृत्यु के पैरों तले हताश पड़ी एक वीरांगना का चीत्कार.

मैं विचार बनकर पैदा होती हूँ
आह बनकर मरती हूँ और
अदृश्य हो जाती हूँ छाया बनकर हरपल.

मेरी ज़िन्दगी रात के समापन-बिंदु से शुरू होती है और ख़त्म हो जाती है
भोर की पहली किरण के साथ
जैसे अन्धकार की आँखों से टपकी आंसुओं की बूँदें
सूख गईं हों, उड़ गईं हों वाष्प बनकर रोशनी के स्पर्श से
जैसे एक मोती
बड़ी लहर के साथ आया हो समुद्र-तट पर
और तत्क्षण, दूसरी लहर ले जाए उसे
समुद्र की अटल गहराइयों में
एक एहसास जो जगमगा जाए हृदय को और क़त्ल कर जाए आत्मा का.

धीरे-धीरे टूटे पंखों वाले पंछी के विशाल डैनों की छाया
फ़ैल रही है मौत के आगोश की तरह
और एक गहरी और मनहूस ख़ामोशी की कर रही है रखवाली
और हरपल दफ्न कर रही है मेरी रूह को.

इन दिनों गिरने लगी हैं मेरे शरीर पर दुःख और कटुता की बूँदें
फूलों और घासों ने मना कर दिया है मुझे अपनी प्राणशक्ति देने से
मेरे माथे पर खिंच गईं हैं विषाद की गहन रेखाएं
हवा ने छीन ली है मुझसे प्राणवायु
और मिटटी ने पैरों तले की घास भरी हरी-भरी मख़मली ज़मीन
चटकने लगी हैं मेरी अस्थियाँ
चारों ओर नज़र आने लगी है विनाश की छाया
और कुछ भी सुनाई नहीं पड़ता सिवाय अपने व्याकुल हृदय की धड़कन के.

सपाट ज़मीन तब्दील हो गई है ऊबड़-खाबड़ रास्ते में
फिर भी किसी तरह उन रास्तों पर पैर जमाकर
सूर्य की ओर देखती हुई चलती हूँ मैं
लाख एहतियात के बावजूद पैरों में लिपटते जाते हैं पत्थरों और काँटों के बीच सोए सांप
रात की डरावनी आवाजें मेरी हंसी उड़ाती हैं दिन की प्रखर किरणों के बीच भी
और कहानी कहती हैं
लिली की तरह खिली
अपने चरम यौवन को प्राप्त एक युवती की
जिसका सिर तीखी दरांत से काट दिया गया हो और
उसकी ज़िन्दगी में अनायास आ गया हो पतझड़
और उसे दिखने लगी हों तूफ़ान के पहले कांपते पेड़ों की नंगी शाखाएं.
उसकी ज़िन्दगी से बसंत चला गया हो
बीत गई हो गर्मी और पतझड़ भी
टल गया हो तूफ़ान भी
हवाओं ने उड़ा दिए पेड़ों से पीले पत्ते और रास्ता बनाया आनेवाली शीत ऋतु के लिए.

अब मैं अकेली थी अपने सपनों के साथ
इस सुनसान शहर में
इस अनजान नगर में
ये सपने कभी मेरी रूह को आसमान में उड़ा ले जाते और कभी
पृथ्वी की गहरी छाती में दफ्न कर देते
शीत ऋतु रोती-चीखती आ गई थी.

मैं एक घायल हिरणी बन गई थी
जो तबतक अपने झुण्ड को छोड़कर गुफ़ा में रहती है
जबतक घाव भर न जाए
या फिर वो मर न जाए.

भावावेग अब व्याकुलता में तब्दील होने लगा था और मेरे हृदय से ख़ून चूस रहा था.
मैंने समुद्र की गहराई में फेंके जानेवाले चक्की के पाटों की तरह
खुद को फेंक दिया था
अपने ही मन की अटल गहराइयों में
मेरी खुशियाँ रेत पर पड़े पदचिन्हों में तब्दील हो गईं थीं
जो लहरों के आनेतक ही समुद्र के किनारे पर रह पाते हैं.

पहले मैं रोशनी में आँखें बंद करके चलती थी
आज खुली आँखों से अँधेरे में चलती हूँ
एक अनोखी लड़की में बदल चुकी हूँ मैं
जो सुषुप्ति और जागृति के बीच रह रही है.
मेरे हाथों में अतीत की मिटटी है और भविष्य के बीज
मैं प्यार और हताशा के दो प्रेतों के बीच खड़ी हूँ
ज्योंही, एक उँगलियों से अपने पंख फैलाकर मेरे गले तक पहुँचता है
उसी क्षण, दूसरे का कभी हृदयविदारक रुदन सुनाई पड़ता है तो
कभी-कभी घृणित हंसी.

वो पेड़,
पहाड़ों के पीछे से उगता चाँद
वह चांदनी और वह स्तब्धता
जिनमें कभी मेरी जान बसती थी
सब भयावह और बदसूरत लगने लगे हैं.
तारों के बीच उगा चाँद मोमबत्तियों से घिरा ताबूत में पड़े शव के चेहरे-सा लगने लगा है इनदिनों.
कायनात की ख़ूबसूरती, उसका तिलिस्म और उसके ज़र्रे-ज़र्रे से फूटती रोशनी
अब आग में तब्दील होने लगी है
और झुलसाने लगी है मेरी रूह तक को.
वह शाश्वत संगीत
जो मेरी आत्मा तक उतरकर मुझे सुकून पहुंचाता था
अब शोर बन गया है.
मुझमें बसता था कभी जो विराट पीपल
वह धीरे-धीरे अब धुएं के स्तम्भ में तब्दील हो गया है.
ज़िन्दगी की दोपहर में एक विशाल शिला-सी अजेय खड़ी मैं
भटकने लगी हूँ उन गुफ़ाओं में रात की दुखी भिखारिन-सी
फिर धीरे-धीरे बदलने लगी हूँ सुबह की चमकती हुई, अनंत के गीत गाती हुई छोटी-सी धारा से
बिना बच्चे की माँ के आंसुओं भरे विलाप में.

मैं डरी-डरी, सहमी-सहमी सी, दुबकी-सी
भूकंप में दब गए किसी संगमरमर खंड-सी
चुप बैठी रहने लगी हूँ आजकल
मेरे दिल के धागे इतने कमज़ोर हो चुके हैं
कि एक ज़रा-सी तेज़ सांस भी उन्हें तोड़ दे.
मैं मृत्यु के प्याले से जीवन और
जीवन के प्याले से मृत्यु का पेय पी रही हूँ इन दिनों.

शायद किसी जादूगरनी की आत्मा मुझमें प्रवेश कर गई है
मेरे आंसू होंठ बनने लगे हैं और बुदबुदाने लगे हैं कोई मंत्र
ताकि कायनात के चारों ओर उठी लपटों से
राख़ होती जा रही सृष्टि को थोड़ा नम किया जा सके.

आजकल रात की स्तब्धता में मुझे सुनाई देती है उसी टूटे डैने वाले विशाल पंछी के पंखों की सरसराहट
उसकी फड़फड़ाती हुई आत्मा का क्रंदन
उसकी आहें
मुझे दिखाई पड़ने लगे हैं आजकल उसकी मौत के संकेत चिन्ह
मैं रात के अँधेरे के साथ उसकी छाया को आते
और भोर की पहली किरण के साथ उसे जाते हुए देखती हूँ हर रोज़.

मेरा दिल उपवन से युद्धभूमि में बदलने लगा है
सपाट मैदान-सा
जहाँ पेड़ जड़ से उखड जाते हैं
घास जल जाती है
पत्थर ख़ून से सन जाते हैं
जहाँ की धरती हड्डियों और खोपड़ियों से पाट दी जाती है.
फिर सब शांत हो जाता है
जैसे कुछ हुआ ही न हो
छा जाति है अदम्य शान्ति.
इस मनहूस शान्ति में बुलबुल के गीतों को वादियाँ निगल चुकी होती हैं
गुलाब की पत्तियों को हवाओं ने तोड़कर बिखेर दिया होता है
मदिरा के प्याले पैरों तले कुचल दिए गए होते हैं
रात की मादक नर्म बयार तूफ़ानी हवा में बदल चुकी होती है.

मैं एक प्यासे परिंदे-सी
साँपों से घिरे झरने पर मंडरा रही हूँ
न जाने कबसे
और तबतक फड़फड़ाती रहूंगी शायद
जबतक प्यास मुझे बेजान न कर दे.

बुलबुल के पंखों की तरह चंचल मेरी आँखें अब पथराने लगी हैं
पर नहीं भूली हूँ मैं कि दुःख में भी बुलबुल गाती ही है.
मैं भी गाऊंगी बुलबुल बनकर, जिंदा रहकर
अँधेरा छाने तक
वसंत के गुज़र जाने तक
दुनिया के ख़त्म हो जाने तक
अनंत काल के लिए
चाहे गाते रहना पड़े
आख़िरी सांस तक मुझे
जीवन का अंतिम गीत
मौत का गीत.
अपनी आवाज़ को ख़ामोश नहीं होने दूँगी मैं
कभी नहीं होने दूँगी मौन
क्योंकि वह दुनिया के साथ-साथ
मुझे भी, खुद को भी ज़िन्दगी देती है.
अपने टूटे हुए पंखों के लिए, ज़ख्मों के लिए
ढूंढूंगी कोई न कोई मरहम
क्योंकि जब मैं अपने पंख फड़फड़ाती हूँ तो मेरे दिल पर से काले बादल छंट जाते हैं.

मैं बचा लाऊंगी खुद को
उन शहरी समुद्री सांपों से
जो बहुत सारी स्पर्शिकाओं से जकड लेते हैं अपने शिकार को
और अपनी बहुमुखी प्रतिभा से उसका ख़ून चूसते हैं पल-पल.

अपनी मौन वेदना की अनुगूंज खुद ही सुनती हूँ
गहरी व्यथा का लबादा ओढ़े-ओढ़े.

चुम्बनों की मिठास और आंसुओं का खारापन समेटे
बीच समुद्र में एक नौका-सी खड़ी हूँ
नियति के रंगमंच पर
जहाँ ज़िन्दगी अपनी भूमिका निभा चुकी है
और मौत की पारी चल रही है.
ज़िन्दगी के दौरान सागर में उठे ज्वार
अब ऊंची-ऊंची लपटों में बदल गए हैं
और मेरी देह पर छोड़ रहे हैं दहकते पीले, नारंगी, सिन्दूरी चुम्बनों के निशान.

जीवन की मधुरता और कडवाहट से मिश्रित
अलौकिक मदिरा के प्याले-सी छलकती मेरी आँखें
गुनगुनाती हैं वही ख़ूबसूरत धुन
जो कभी ज़िन्दगी के होंठों पर हुआ करती थी
पर आज वह एक ख़ामोश ज़मींदोज़ राज है
जहाँ चढ़ाई गई गुलाब की सूखी पत्तियों पर
हर सुबह गिरते हैं
मेरी आँखों से शबनम के दो क़तरे.

हैं कुछ कड़वी यादें
जिन्होंने मेरे आस-पास बुन दिया है मायूसी का ऐसा जाल जिससे मैं निकल ही नहीं पाती.

कभी जिन परिंदों की चहक और झरनों की झर-झर मुझे भर देती थी ज़िन्दगी से
आज उस चहक और उस झर-झर को सुनकर मैं बेवज़ह ही हो जाति हूँ ग़मगीन.
लेकिन सादगी से भरा यह ख़ालीपन, यह रीतापन
मुझे मस्ती से भर देता है कई-कई बार.


महसूस करती हूँ खुद को मुर्दा-सी
बर्फ़ में जमी एक लाश की तरह

शायद मैं जज़्बाती हूँ और अज्ञानी भी
तभी सबसे ज़्यादा बदकिस्मत भी हूँ.
शायद इसीलिए झूल भी रही हूँ
दो अनजानी आसमानी शक्तियों के बीच.
एक मुझे ऊपर उठाती है...सपने दिखाती है...अपने वजूद की ख़ूबसूरती से वाकिफ़ कराती है
तो दूसरी, मुझे ज़मीन से बाँध देती है
मेरी आँखों में धूल भर देती है
डर और अँधेरे मुझपर हावी हो जाते हैं.

अकेलेपन के नर्म और रेशमी हाथों में जकड़े होने के बावजूद
हर लम्हा गुज़रती हूँ एक रूहानी ख़ुशी से अपने दोस्त ग़म के साथ.
ग़म के थपेड़े सहती हुई
एक अधखिली सफ़ेद लिली बन गई हूँ मैं
जो हवा से कांपती है
दिन निकलते ही अपना दिल खोलकर रख देती है.
और रात के सांचे में अपने पत्तों को वापस समेट लेती है हर रोज़.
पर उस लिली की ज़िन्दगी तमाम झाड़ियों के बीच हो गई है एक तंग पिंज़रे-सी.

जिसका नसीब हो गया है मकड़ियों के जालों से घिरे रहना.
मकड़ियों के जालों के सिवाय उसे कुछ नहीं दीखता
कुछ सुनाई नहीं पड़ता कीड़े-मकोड़ों के रेंगने की ध्वनि के सिवाय.

मैं चारों ओर पहाड़ों से घिरे एक तालाब जैसी हो गई हूँ
जिसकी शांत सतह पर झलकते हैं भूतों, प्रेतों और जिन्नातों के साए और
बादलों, पेड़ों, सूरज और चाँद-सितारों के रंग भी.
लेकिन पानी को उससे निकलने का कोई रास्ता नहीं मिलता
जहाँ से वह कलकल करता हुआ समंदर की ओर बह जाए.

इन दिनों नियति अचानक प्रकट होती है हरपल
किसी न किसी खौफ़नाक रूप में मेरे सामने
और घूरती है मुझे भयावह दृष्टि से
जकड़ लेती है मेरे गले को अपनी नुकीली उँगलियों, अपने नुकीले पंजों से
और पटक देती है घुमाकर मुझे ज़मीन पर
अपने लोहे के पैरों से रौंदती रहती है
फिर चली जाती है अट्टहास करती हुई.
वही नियति जो कभी मुझे पवित्र फ़रिश्ते-सी लगती थी
आज भयानक शैतान लगने लगी है.

इन दिनों ज़िन्दगी के उदास रास्तों पर चलते वक़्त
मेरी आँखों से झरती हैं करुणा भरी किरणें
और समझाती हूँ मैं बार-बार खुद को कि
“ओ आत्मा, तेरे भाग्य में क़ब्र का अँधेरा है,
रोशनी का लालच मत कर.
ओ मेरी रूह...तेरी नियति रसातल की चीख है
इस स्वर्गिक गीत का लालच मत कर.”
यह उस प्यासी आत्मा की चीत्कार है दरअसल
जो झरने के पास खड़ी है
पर झरना जंगली जानवरों से घिरा है
और उसका एक सिरा ऐसे खुला है जैसे
जम्हाई लेते समय किसी खूंखार जानवर का मुंह.

सूर्य क्षितिज के पार से ग़ायब ही रहने लगा है इन दिनों
और चाँद कभी निकलता नहीं.
गहरी काली, बादलों से भरी शाम
बेलिबास कायनात को ढांपने के लिए निरंतर बुनती रहती है एक काला-झीना परदा इनदिनों
फिर यह काला परिधान बर्फ़-सा सफ़ेद भी होता रहता है धीरे-धीरे
जैसे मौत से पहले ही वह मौत से घिर गया हो.
रूह और कायनात दोनों मिलकर भयानक आवाजें निकालने लगी हैं
ऐसे, जैसे उन्होंने मौत का खौफ़नाक चेहरा देख लिया हो
या फिर कुछ शांत आत्माओं से बदला ले रही हों चीख-चीखकर.

कायनात ने मानो कफ़न ओढ़ रखा हो
दूर-दूर तक बर्फ़ ही बर्फ़ है निगाहों में
पर प्रकृति की यह पीड़ा भरी पुकार मुझे नई शक्ति देती है रोज़.

पर इस शक्ति को सोखने रोज़ मेरे सामने आते हैं कुछ विचित्र जीव
जिनकी चोंच चील की है
पंजे चीते के
दांत लकड़बग्घे जैसे हैं उनके
और कपड़े सांप-से
और सांप को कितना ही रख लो पिंजड़े में
वह फ़ाख्ता नहीं बन सकता.
वह अपनी गिरफ़्त में ले लेता है मेरी रूह तक को.

ये वो अजीब जीव हैं
जो मेरे पंखों को रोज़ अपने हाथों से काटने या नोचने की कवायद करते हैं
और चाहते हैं कि मेरी आत्मा को ज़मीन पर रेंगने के लिए छोड़ दिया जाए
कीड़ों की तरह.

सर्दियों के किसी पेड़ के अंतिम पत्ते की तरह
काँप-सी जाती हूँ मैं कई-कई बार.        

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