स्त्री मुक्ति के प्रश्न

कर्मानंद आर्य
मह्त्वपूर्ण युवा कवि . बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय में हिन्दी पढाते हैं. संपर्क : 8092330929
अन्य अनुशासनों में शोध और अनुसंधान की स्थिति और गति क्या है, मैं नहीं जानता किन्तु हिंदी में शोध की गुणवत्ता से हम सभी परिचित हैं. समकालीन दौर में जो विमर्श चर्चा के केन्द्र में है,  उनमें स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श सर्वाधिक महत्वूपर्ण है. पिछले दिनों ‘इरावती’ नामक एक साहित्यिक पत्रिका ने पुरुष विमर्श को उठाने की असफल कोशिश की थी किन्तु वह एक प्रयास मात्र ही था या अलग दिखाने की चाहत भर.हम सभी लोग इस बात को लेकर खूब दुखी  हो ले सकते हैं कि आखिर आज के इस अति वैज्ञानिक युग में भी दलितों, आदिवासियों, स्त्रियों, अल्पसंख्यको के प्रति हमारी धारणा घोर पारंपरिक और प्रतिक्रियावादी क्यों है? इन्हें ही दुःख  से उबरने उबारने के लिए हम इन विषयों को केंद्र में रखकर गुरू गंभीर शोध करते और करवाते हैं, मोटी-मोटी पुस्तकें लिखते हैं. पत्रिकाओं के विशेषांक निकालते हैं, सेमिनार गोष्ठियाँ करते हैं और न जाने क्या-क्या करते हैं?सार्थक क्या हो पाता है यह देखने की चीज होती है.लेकिन हम इस विषय पर अपेक्षाकृत बहुत कम सोच पाते हैं कि जिस अवस्था में नवनिर्माण और विचार की निर्मिति होती है, उस समय में हम उदासीन रह जाते हैं. हम लिखते रचते समय यह ध्यान नहीं रख पाते कि हमारी साहित्यिक सामाजिक बनावट में उनका भी महत्वपूर्ण हिस्सा है. रचना का सृजन, पठन-पाठन, मूल्यांकन, आलोचना आदि का निरन्तर विकास होता रहता है. संस्कृत में एक कहावत है ‘मृजया रक्षते रूपम’ अर्थात निरंतर साफ़ सफाई से हम अपना रूप लावण्य सुधार सकते हैं. हमें अपने अंतस को भी बार बार धोना, साफ़ करना चाहिए. इसी तरह का कार्य होता है जब हम कोई वैचारिक सृजन करते हैं.

अभी हाल ही में डॉ. अल्पना सिंह, डॉ. आलोक कुमार सिंह की स्त्रीविमर्श पर एक महत्वपूर्ण किताब आई है. किताब कई अर्थों में पठनीय है. डॉ. अल्पना आजकल बाबा साहब भीमराव आंबेडकर केन्द्रीय विश्वविद्यालय, लखनऊ के भारतीय भाषा विभाग में शिक्षण कार्य से जुड़ी हुई हैं.अपने जीवन और लेखन में उनकी गति अध्यावसायी की है. डॉ. आलोक कुमार सिंह लखनऊ नगरनिगम डिग्री कालेज, में सहायक प्राध्यापक हैं. लखनऊ विश्वविद्यालय से जुड़ी डॉ. अल्पना सिंह की स्त्री विमर्श पर यह दूसरी किताब है. उनकी पहली किताब ‘लोक साहित्य और संस्कृति का वर्तमान स्वरूप’ में अधिकतर पक्ष स्त्री के लोक पक्ष को लेकर थे.अल्पना सिंह की यह दूसरी पुस्तक ’’स्त्री मुक्ति के प्रश्न और समकालीन विमर्श’’ स्त्री, विशेषकर दलित एवं आदिवासी स्त्री से जुड़े सवालों को लेकर पूरे सामाजिक-सांस्कृति परिदृश्य की नब्ज पर हाथ रखती हैं, वह समय के पुनर्निमाण में युवा पीढ़ी के जोश, जुझारुपन और दिशा को संकेतित है. आज के उपभोक्तावादी युग में बाजार के तमाम प्रलोभनों को अस्वीकार करते हुए प्रतिबद्धता की लड़ाई में अपने को झोंके रखना कोई आसान काम नहीं. स्त्रियों को जहाँ कुछ क्षेर्तों में कार्य करने का मौका मिला है वहीँ पर उनका शोषण का दायरा भी लगातार बढ़ रहा है. दूसरी बात इधर स्त्री लेखन के क्षेत्र में कुछ समय से यह प्रमुख मुद्दा रहा है कि ’स्त्री विमर्श अपनी बुनियादी जमीन और सवालों से कुछ भटक सा गया है. विस्तृत फलक तक को छू लेने का वाला हौंसला रखने वाला यह विमर्श संकीर्ण होता हुआ नित्य प्रति नये विवादों में घिरा दिखाई दे रहा है. यही कारण है कि स्त्री विमर्श से ’स्त्री मुक्ति’ का स्वर धीमा पड़ता जा रहा है. यह विडम्बना ही है कि जो विमर्श अब तक पुरूष सत्ता के वर्चस्व के समानांतर स्त्री की भागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए प्रारम्भ किया गया था, वही अब स्त्रियों द्वारा पुरूष वादी लेखन किये जाने के आरोपों से घिर गया है. यह किताब बने हुए ऐसे कई प्रतिमानों को तोड़ने का कार्य करती है.
प्रत्येक समय अपने समय की आलोचना स्वयं करता है और अपने मानकों का निर्माण करता है.यह पुस्तक भी अपने समय की आलोचना मात्र है. स्त्री का इतिहास और कुछ नहीं स्त्री कैनन निर्माण की प्रक्रिया मात्र है.यही प्रतिमानीकरण‘हिंदी नवरत्न’ की भूमिका में भी हुई. क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि नवरत्नों में कोई एक भी स्त्री रत्न नहीं है. बहुत सारी श्रेष्ठ कृतियों के सृजन के बावजूद महिलाएं, दलित, आदिवासी’ ‘अस्मिता’ के कारण कैनन में जगह नहीं बना सके.इन्हीं कैननों के निर्माण की कड़ी है यह पुस्तक. यह सम्पूर्ण पुस्तक २८० पृष्ठों की है और इसका फलक बहुत व्यापक है.सुप्रसिद्ध आलोचिका और महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक के हिन्ढी विभाग अध्यक्ष डॉ. रोहिणी अग्रवाल अपने ‘आमुख’ में लिखती हैं कि ‘स्त्री विमर्श पुरुष समाज को वयस्क बनाना चाहता है और भारतीय पुरुष है कि ’बिगड़ैल’ बच्चा’ बन कर सदा मां की गोद में दुबका रहना चाहता है. पत्नी की सार्थकता भी तभी है जब शयनकक्ष में वेश्या का रोल निभा कर वह शेष समय मां की तरह उसके आगे पीछे खाने का कौर लिए डोलती रहे.

स्त्री विमर्श किसी के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा खोल कर नहीं बैठता. लेकिन वह तभी मुकम्मल दृष्टि से काम कर सकता है जब औरत को औरत बनाने वाली व्यवस्था पर उंगली उठाते हुए पुरुष को बिगड़ैल बच्चा बनाने में अपनी भूमिका की भी शिनाख्त करे. साथ ही इस बात की पड़ताल भी करे कि क्यों वह सूक्ति रूप में प्रचलित इस प्रवाद को मिथ्या साबित नहीं कर पाया कि औरत ही औरत की दुश्मन है. स्त्रीवादी विमर्श स्त्री की मानवीय अस्मिता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है. वह स्त्री की उपस्थिति को लक्षित करने वाली इस कालजयी मान्यता को स्वीकारता है कि स्त्री आधी दुनिया है, लेकिन तराजू और पैमाना लेकर स्त्री-पुरुष के लिए जमीन और आसमान, घर और समाज, संसद और सड़क को आधा-आधा बांट देना नहीं चाहता. यहीं से स्त्रीवादी विमर्श आंख की किरकिरी बन जाता है क्योंकि दूसरों की जमीन पर कब्जा जमा कर अपना कारोबार चलाने वाले ’इज्जतदार घुसपैठियों’ पर यह नालिश ठोंकने लगता है. समाज का इज्जतदार तबका इसे ’टिड्डे के पंख उग आना’ मान कर मसलने को आमादा न हो तो क्या करे? स्त्रीवादी विमर्शकारों को अपनी लड़ाई की दिशा का ज्ञान है और स्खलनों को मुट्ठी भर घुन लगी गेहूं की तरह फटक देने का विवेक भी. विरोध में जुटी जिन प्रतिगामी ताकतों से वह लड़ रहा है, उनके फतवों से घबरा कर चैके में जा घुसने की कायरता उसमें नहीं. हां, इतना जरूर है कि चौका उसने छोड़ा नहीं क्योंकि कोख के साथ संरक्षण, नेह के साथ दायित्व, समर्पण के साथ स्वतंत्रता उसे सम्बन्धों के साथ-साथ वर्तमान और भविष्य के प्रति भी आशान्वित करती है.

आर्थिक स्वावलम्बन स्त्री-विमर्श का एक महत्वपूर्ण विमर्श है. आर्थिक आत्मनिर्भता के अभाव में स्त्री-मुक्ति का कोई अर्थ नहीं है. दलित, आदिवासी अथवा अन्य निम्न वर्गो की स्त्रियां आर्थिक रूप से उतनी परतंत्र नहीं है जितनी मध्यम और मध्यम वर्ग की स्त्रियां है. क्योंकि इन वर्गो की स्त्रियां घर से बाहर भी, दूसरों के घरों, खेतों, कारखानों, खदानों में पुरूषों के समान काम करतीं है. अब महानगरों की मध्यम और उच्च वर्ग की स्त्री भी पुरूष पर निर्भर होना नहीं चाहती है, अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती है. पुरूष द्वारा किये-कराये जाने वाले सुख और एैश्वर्य को त्याग कर वह स्वावलम्बन का जीवन जीने के लिए प्रयासरत है. घर की चारदीवारी से बाहर निकलकर वह दफ्तरों, कारखानों से लेकर पुलिस, सेना तथा विज्ञान और प्रौद्योगिकी तक प्रत्येक क्षेत्र में पदार्पण कर रही है. आर्थिक आत्मनिर्भरता उनमें आत्मविश्वास और दृढ़ता पैदा कर रही है, साथ ही उनके जीवन को नए अर्थ भी दे रही है. ऐसी बहुत सी स्त्रियां है जो पति द्वारा प्रताडि़त या त्याग दिए जाने पर, विधवा हो जाने पर अथवा इसी प्रकार की अन्य परिस्थतियों में किसी पर निर्भर न रहकर अपनी आजीविका स्वयं चलाती है तथा अकेले रहती हैं और इस तरह वे स्त्री के अकेले न जी सकने की परम्परावादी सोच को ध्वस्त करती हुई अपनी स्वतंत्र अस्मिता के साथ जीती हैं.

अनीता भारती का ‘सामजिकहिंसा और उसके पूर्वाग्रह’ पर एक बहुत ही सार्थक और सारगर्भित आलेख है.प्रजातान्त्रिक मूल्यों में लगातार स्त्री की सहभागिता बढ़ रही है. स्त्रियों ने लगभग उन क्षेत्रों में प्रवेश पा लिया है जो आज तक उनके लिए प्रतिबंधित था. अब वह केवल आत्मकथाए संस्मरण या कविता तक ही सीमित नहीं है अपितु साहित्य समाज के हर क्षेत्र में उसकी धमक महसूसी जा सकती है. पर वह हिंसा और शोषण का शिकार है.पुरुष ने अपने स्वार्थ के लिए कैसे स्त्री के दोहन की शब्दावली रची है. अन्तराष्ट्रीय महिला वर्ष के बीस बरस से अधिक बीत जाने के बावजूद भारत में अभी तक कोई ऐसा मुखर स्त्रीविमर्श नहीं आया जिसे हम भारतीय स्त्री विमर्श मान सकें. जो कुछ उपलब्ध है उसे केवल प्रॉक्सी द्वारा ही हिंदी का अपना विमर्श कहा जा सकता है. अर्चना वर्मा अपने एक आलेख में कहती हैं कि हिंदी के अपने स्त्रीविमर्श का अर्थ क्या हो सकता है इसकी कोई साफ़ तस्वीर भी हमारे पास नहीं थी और इस सन्दर्भ में शुद्ध हिन्दीनुमा किसी वैचारिक साम्पदायिकवाद या बौद्धिक जातीयतावाद जैसा कोई खास दुराग्रह भी नहीं था.

डा. अल्पना सिंह 
डॉ. अल्पना सिंह अपने सम्पादकीय में स्त्री स्वरूप की परंपरा को लेकर कई बड़े सवाल खड़ा करती हैं. वे लिखती हैं कि पुरूष लेखन में स्त्री देह को भोगने का सिलसिला तो विद्यापति से चला आ रहा है वर्तमान साहित्य में भी वह न केवल उपभोग की वस्तु बना दी गई है बल्कि अब तो उपमानों और प्रतीकों के द्वारा भी उसे भोगा जाने लगा है. आज स्त्री के शरीर के विविध अंगों को विविध प्रकार से भोगा जा रहा है. एक छोटा सा उदाहरण उल्लेखनीय है, समकालीन कविता के सशक्त हस्ताक्षर ज्ञानेन्द्रपति के प्रसिद्ध काव्य संग्रह ‘मनु को बनाती मनई‘ की एक लघु कविता ‘अंगूरी पेठे सी‘ है-
आगरा के अंगूरी ’पेठे सरीखी
शुभ्र, सुडौल, रसगर
तुम्हारी देह,
निहारूँ कि जुठारूँ.

यहाँ स्त्री का जो पाठ किया गया है वह सीधे तौर पर स्त्री को मात्र देह मानने का नतीजा है.स्त्री वादी लेखिका निवेदिता स्त्रीवादी पत्रिका ‘स्त्रीकाल’ में छपे अपने एक आलेख लेख ’हर पुरूष अपनी चमड़ी के भीतर मर्द ही होता है’ में कहती है कि ’हर नैतिकता स्त्री से यही कहती फिरती है कि स्त्री को दूसरों के लिए जीना चाहिए. सच तो यह है कि पराजित नस्लों और गुलामों से भी ज्यादा सख्ती और क्रूरता से स्त्री को दबाया गया. यह हम नहीं कह रहे हैं, यह स्त्री का इतिहास बताता है. क्या कोई भी गुलाम इतने लम्बे समय तक गुलाम रहा है जितनी स्त्री?’ इस प्रश्न की व्याख्या करके नवीन निष्कर्ष निकालने में एक पूरा इतिहास ग्रन्थ तैयार किया जा सकता है. यह विडम्बना ही है कि इतने लम्बे समय से गुलामी का दंश झेल रही स्त्रियों का एक वर्ग ऐसा है जो अब तक अपनी गुलामी से पूर्णतः अनजान है. यह सत्य है कि कम स्त्रियाँ ऐसी हैं जो जानती हों कि उन्हें करना क्या है? उनके उद्देश्य क्या है ?उन्हें क्या चाहिए ? इस दृष्टि से देखा जाए तो इस बहुसंख्यक वर्ग के लिए यह विमर्शीय राग बेमानी हो जाता है. क्योंकि इस पूरे स्त्री विमर्श में स्त्रियों का यह वर्ग कहीं भी खड़ा दिखाई नहीं देता है.भारत में अधिकांश नारी संगठन अभी भी मुख्यतः महानगरों-शहरों की शिक्षित मध्यवर्गीय औरतों तक ही सिमटे हुए हैं. अभी भी किसान-मजदूर औरतों की व्यापक आबादी एक उनकी कोई पहुंच नहीं बन पायी है. यहां तक कि बुद्धिजीवी जमातों से बाहर आम मध्यमवर्गीय औरतों तक भी उनकी पहुंच अभी नाममात्र की ही है. अव्वल तो कई संगठन ऐसा कुछ सोचते ही नहीं, दूसरे, यदि कुछ सोचते भी हैं तो एक ठोस कार्यक्रम और सही दिशा के अभाव में उनके प्रयास या तो निष्फल हो जाते हैं या फिर सुधारवादी और अनुष्ठानिक कार्यवाइयों के दायरे तक ही सिमटे रह जाते हैं.

अपने आलेख ‘समकालीन हिंदी साहित्य में स्त्री विमर्श’ में डॉ. जयप्रकाश कर्दम लिखते हैं कि  ‘स्त्री केवल घर से बाहर ही असुरक्षित नही है, घर के अन्दर भी उसकी सुरक्षा की कोई गारंटी नही है.’पायदान’ उपन्यास की आंचल को घर में उसका चाचा ही दबोचता है. और भी ऐसे बहुत से नाते रिश्तेदार हैं जो मौका पाकर स्त्री को अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं. यदि स्त्री इसके खिलाफ मुँह खोलती है तो परिवार, परिवार की इज्जत की दुहाई देकर उस पर चुप रहने और अपना मुंह बंद रखने का दबाव डालता है और स्त्री शोषण के इस दंश को चुपचाप सहती है. रंजना श्रीवास्तव की कविता ’जब मैं स्त्री हूँ’ स्त्री के इस दर्द को बयान करती हैं-’’मैं स्त्री हूँ और जब मैं स्त्री हूँ तो मुझे यह मानकर चलना चाहिए/कि लक्ष्मण रेखा के बाहर रहते हैं/सिर्फ रावण इसलिए घर के भीतर अपनों द्वारा चुपचाप लुटती रहना चाहिए/क्योंकि स्त्री की बुद्धि से ही बना रहता है घर. नया ज्ञानोदय, जुलाई,2007 यही रजनी तिलक अपनी कविता ’तिरस्कार’ में कहती हैं-’सखी स्त्री चुप रहने की कहानी है हमारे परिवार में चुप रहो, झुकती रहो, सब्र करो और घुट-घुटकर मरती रहो.’(पदचाप,पृ0-8) जाति की जकड़बन्दी के कारण बहुत सी स्त्रियां अपनी पसंद के योग्य पुरूष से विवाह नहीं कर पातीं तथा बेमेल और सजातीय के साथ जीवन जीनें को अभिशप्त होती है. कारण कि जातिवादी समाज अन्तर्जातीय विवाह को स्वीकार नही करता. दूसरी जाति, विशेष रूप से निम्न जाति के पुरूष के साथ प्रेम या शादी करने को जातीय अपमान के रूप में देखा जाता है. किन्तु आज बहुत सी स्त्रियां समाज की इस जड़ व्यवस्था का प्रतिकार कर रही है. रमणिका गुप्ता की कहानी ’दाग दिया सच’ की मालती न जाति पांति के बंधन को मानती है और न समाज के निषेधों को.’कुर्मी जाति- की होर वह ’चमार’ जाति के महावीर नाम के युवक से प्रेम करती है और समाज की वर्जनाओं के समक्ष न झुकते हुए महावीर के साथ गांव छोड़ कर भाग जाती है.

प्रसिद्ध दलित चिन्तक और रचनाकार अनीता भारती अपने आलेख में लिखती हैं कि आज देश में जिस तेजी से महिलाओं के साथ हो रहे बलात्कारए छेड़खानी एसिड अटैक हत्या आदि की घटनाएं बढती जा रही है उनके बारे में लोग पढ़, सुन देखकर बहुत चिंतित और दुखी हो रहे है. इसी दुख और निराशा में देश के सभी वर्ग और तबके के लोग-बाग इस हिंसा विरोध का कोई और रास्ता ना पा निराशा में सड़को पर उतर आए है. उनका निराश होकर सड़को पर उतरना तथा व्यवस्था के विरुद्ध होकर जंतर-मंतर से लेकर हर आम खास जगह इकट्ठे होकर विरोध, प्रदर्शन, धरने आदि करने पर उतारु होना यह बताता है कि देश के लोग अब चाहते है कि महिलाओं पर होने वाली हिंसा रुके और इसे रोकने के लिए ऐसा सख्त कानून बने जो महिला हिंसा के अपराधी को कडी से कडी सजा दिला सके.कुल मिलाकर यह स्त्री विमर्श की एक मुकम्मल किताब है.

पुस्तक का नाम : स्त्री मुक्ति के प्रश्न और समकालीन विमर्श
संपादक : डॉ. अल्पना सिंह, डॉ. आलोक कुमार सिंह
प्रकाशक : देव प्रकाशन, दिल्ली
मूल्य : 550
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