हमारी पार्टी गरीबों की पार्टी है : दीपंकर भट्टाचार्य

बिहार चुनाव का तीसरा फेज 28 को है. छोटे -बड़े दलों के नेता हवाई मार्ग ( हेलीकॉप्टरों) से राज्य के खेत -खलिहानों में उतर रहे हैं-उबड़ -खाबड़ सड़कों की हकीकत से दूर. वही  खेत -खलिहानों में हमेशा संघर्षरत एक पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव उबड़ -खाबड़ सड़कों , पगडंडियों पर हिचकोले खाते  एक दिन में 5 से 6 सभायें कर रहे हैं.  भाकपा ( माले ) के राष्ट्रीय महासचिव, दीपंकर भट्टाचार्य  अपने ताजा वामपंथी गठबंधन के उन नेताओं में एक हैं , जो इस दो ध्रुवीय चुनाव की कुछ अलग तस्वीर बनाने में जी -जान से जुटे हुए हैं. उनके साथ स्त्रीकाल के लिए युवा पत्रकार इति शरण और स्त्रीकाल के संपादक संजीव चंदन ने  दूसरे फेज के चुनाव के पूर्व एक पूरा दिन उनके चुनाव -प्रचार को देखते हुए बिताया. इस दौरान दीपंकर से इति और संजीव ने बिहार चुनाव, राजनीति में महिला और जाति-प्रतिनधित्व, जाति और वर्ग के सवाल, मीडिया  की  चयनात्मक  भूमिका , वामराजनीति  आदि  विषयों पर बात की . पाठकों के लिए बातचीत का एक अंश.
                                                                                                                    संपादक
कामरेड अभी आप क्या देख पा रहे है बिहार चुनाव में.  हमें  लग रहा है कि बिहार का यह  चुनाव मुद्दाविहीन है ? 
मुद्दाविहीन बनाने की कोशिश है , मुद्दाविहीन तो बिल्कुल नहीं है,  अगर आप गाँव की बात करें,  निश्चित तौर पर उनके पास मुद्दे और सवाल हैं , लेकिन अगर आप दिल्ली और पटना की राजनीतिक परिदृश्य को देखे तो उनके पास सिर्फ एक “कुर्सी”का मुद्दा है.निश्चित तौर यह कुर्सी बचाने की लड़ाई है,मोदी जी के पास कुर्सी पर कब्जा करने का मुद्दा है और उनलोंगो को इससे ज्यादा कोई मुद्दा भी नहीं चाहिये.अगर लोंगो को इन दोनों से निराशा भी यहीं है की इन दोनों गठबंधनों के पास कोई मुद्दा है ही नहीं और इससे ज्यादा उनलोगों को
कोई मुद्दा भी नहीं चाहिए.

 जनता के राजनीतिक प्रशिक्षण का काम आपकी पार्टी करती है लगातार . सही मायने में  अगर बिहार में कोई विपक्ष है , तो वह आपकी पार्टी ही है. इसके बावजूद  आपकी पार्टी के प्रति समर्थन वोट में नहीं बदल पाता पाता है ?
देखिये,  वोट में बदलता है . अलग-अलग परिस्थितियों में जो कोर वोट है, वह हमें मिलता है या थोडा सिकुड़ता है.,इसबार लोगों का उत्साह है वोट हमें मिलेगा और बढेगा.
लेकिन लोकसभा चुनाव में जो वोट प्रतिशत रहा ....
 अगर आप पुराने चुनाव से इस चुनाव की तुलना करते हैं,  तो नीतीश जी के लिए 2010 और मोदी जी की लिए 2014 जैसी स्थितियां नहीं हैं और  लालू जी के लिए तो कतई ये 1995  वाला चुनाव नहीं है. अभी जो सवाल खड़े हो रहे हैं, वे  बहुत ही वाजिब सवाल उठ रहे है वैसे तो यह बिहार का ही चुनाव है.  लेकिन मोदीजी ने अभी इसे देश का भी चुनाव बना दिया है.इस तरह से कोई प्रधानमंत्री आकर मोर्चा संभाल ले और 40-40  रैलियाँ करने लग जाये तो यह  एक राज्य से ज्यादा देश का संदर्भ ले लेता है. वैसे भी बिहार चुनाव का अपना ही राष्ट्रीय संदर्भ हो जाता है. जब मोदीजी का सीधा इन्वाल्वमेंट है  तो यह चुनाव केंद्र सरकार के १८ महीने के कार्यकाल की भी समीक्षा करेगा. .वैसे तो 10 साल और 25 साल का एक चक्र पूरा हुआ है, उसके अन्दर से जो सवाल खड़े हुए हैं-अगर सामाजिक न्याय की बात करें तो  सामाजिक न्याय के अन्दर से  सवाल खड़े हुए हैं, विकास की  बात करें तो  विकास के अंतर्विरोध ,  विसंगति सामने आये हैं. ये सारी बातें  इस चुनाव में सामने हैं,  जिनका क्षेत्रीय और राष्ट्रीय संदर्भ में मायने बनाते हैं.


एक विश्लेषण के अनुसार सिर्फ बिहार ही नहीं 243 बिहार में चुनाव है , यानी हर सीट अपने कैलकुलेशन के हिसाब से काम कर रहा है ... 

यह बात  भी है, लेकिन यह फार्मूलेशन ही अंतिम नहीं है. यह  बिहार का चुनाव है, इसलिए हम कह रहे हैं कि इसका संदर्भ देख लीजिये.इसका राष्ट्रीय सन्दर्भ  होगा. दूसरी ओर राज्य स्तर पर  ध्रुवीकरण  भी है. जहाँ तक सरकार बनाने की बात है तो , सही मायने में दो गठबंधन  के बीच ही लड़ाई है. वामपंथी गठबन्ध जरूर हुआ है,  लेकिन अभी तक एक विकल्प के रूप में नहीं  खड़ा हो पा रहा है . यह भी सच है,  एक  हद तक,  कि हरएक सीट की अपनी कहानी है.  अभी जो सी एस डी एस ने सर्वे जारी  किया हैं,  उसने भी इस बात को रेखांकित किया  है हालांकि यह सर्वे  कैंडिडेट तय होने से पहले का है.कैंडिडेट तय होने के बाद बड़े पैमाने पर दल-बदल ,टिकट को लेकर   बगावत , खरीद फरोख्त,  फिर बहुत सारे निर्दलीय उम्मीदवार का होना ,  निश्चित तौर पर कोई सीटों पर स्थानीय परिदृश्य बदल देगा.

लेकिन आपको नहीं लगता है कि .... 
हाँ , मैं यह भी नहीं मानता कि बिहार का चुनाव 243 सीटों के समीकरणों का सम टोटल है. 243 अलग-अलग चुनाव  जरूर हैं,  लेकिन सेण्टर में बिहार का चुनाव है, देश का  मामला है.  मैं मानता हूँ कि बीजेपी के सन्दर्भ में  सिर्फ 18 महीने का मामला नहीं है,  पिछले 2005 से लेकर जून 2013 तक जो ८ साल तक वे वर्तमान सरकार के  साथ रहे , वह भी एंटी इनकम्बेंसी फैक्टर में आयेगा.  बीजेपी के लिए सत्ता विरोधी प्रसंग भी करीब-करीब 10 साल का  बनता है. चाहे स्टेट हो  या सेण्टर दोनों को जोड़ करके इनके लिए एंटी इनकम्बेंसी  बनता है.

लेकिन आप तो ये मानते हैं  न कि जो वाम का गढ़बंधन अभी बना,  अगर ये थोडा पहले बनता तो ज्यादा असरकारी होता.  
देखिये , यह  ठीक है.  लेकिन मेरा अपना मानना है हर चीज के बनने अपनी एक प्रक्रिया है.  एक लेवल पर वामपंथ का  साझा आन्दोलन पहले से चल रहा है. गठबंधन की बात तय होने में जो समय लगा, चुनाव तक  सब साथ आ गये . बात पहले भी थी लेकिन लोकसभा चुनाव में हमलोग साथ नहीं रह पाए थे,  सीपीआई  का अलग रास्ता था.    

  
  अभी भी सीपीआई  के  कई उम्मीदवार  गठबंधन से अलग भी चुनाव लड़ रहे हैं . 
 यह अलग बात है, यह पोलिटिकल मामला नहीं है, लोकल स्तर  पर कुछ लोग कई जगहों पर एकदम चुनाव लड़ने पर आमदा है, यह एक अपवाद है,  इस तरह के अपवाद सब जगह मौजूद हैं.

गठबंधन  के लिए यह  ठीक नहीं है .... 
लेकिन अब क्या कर सकते हैं ,  मान लें कि  243 में से 10-15 सीट ऐसा है.

एक बात हम नोटिस कर रहे हैं कि टीवी पर चलने वाले राजनीतिक चौपालों में आपको कहीं नहीं बुलाया गया, जबकि  आप मेजर विपक्ष हैं.
मीडिया उस हिसाब से चलता है क्या?हमलोग मेजर विपक्ष हैं सड़क के और सदन में इस समय हमारे  कोई प्रतीनिधि ही नहीं है .  सत्ता की राजनीति जो है , उसमें  हमलोग फिट ही नहीं बैठते,  तो जाहिर सी बात है कि मिडिया वाले चुनाव से पहले .....

औवीसी को मीडिया वाले चौपाल में बुलाते है तो फिर आपको क्यों नही ?
मीडिया का अपना इंटरेस्ट है,  एक पोलिटिकल इंटरेस्ट भी है ,हमलोग ये सारी बातें  जानते हैं  आम समय में मीडिया में जो जगह हमलोगों को मिलाती है , वह  चुनाव के समय पर  गायब हो जाती है. चुनाव परिणाम के बाद फिर हम वापस आ जाते हैं.

मीडिया कोई काल्पनिक इकाई  तो है नहीं,  वहां जो पार्टिसिपेंट हैं,  कम से कम हिंदी मीडिया में , थोड़ा अंग्रेज़ी मीडिया में  भी , उनका एक सरोकार है . तो इस लिहाज से  सामान्य दिनों आपके साथ-साथ तालमेल भी दिखता है .  मुझे लगता है पुण्य प्रसून वाजपयी या रवीश जैसे एंकर को अपने राजनीतिक चौपालों में माले को याद करना चाहिए.
मीडिया को तय करना है उनका टर्म ऑफ़ डिस्कोर्स क्या है

आपका आकलन क्या है लेफ्ट के लिए,  कितने सीटें आयेंगी  ? 
हम तो मानाते हैं कि लेफ्ट की वापसी का समय है,  लेफ्ट का एक रिसर्जेन्स बिहार में दिखेगा.  सीटों का आकलन लगाना थोडा मुश्किल है,  लेकिन ठीक-ठाक  संख्या आ जायेगी.

आकंड़ो के लिहाज से बताना मुश्किल है.. 
कोई तो बोल रहा है कि दोनों गठबंधन 243 सीट बाँट लेंगें.  कई और देखने सुनने वाले बता रहे हैं  कि 15-20 सीट दूसरे लोग ले पायेंगे.  हमलोगों को उम्मीद है. बड़ा कठिन समय है.  5-5 चरणों में मतदान  हो रहा है, बीच में त्यौहार  भी है-दशहरा, मुहर्रम. अभी जो बकरीद के समय पर हुआ , कोशिश किया जा रहा है यू पी  और झारखण्ड में,  उसका भी असर होगा.  इसलिए अभी  कहना थोड़ा मुश्किल है. अभी बहुत कुछ होना शेष है,  फिर भी हम समझते है लेफ्ट का प्रदर्शन काफी अच्छा रहेगा.

खैर कामरेड,  महिलाओं के प्रतिनिधित्व के हिसाब से  भी इस बार आपलोग चूक गये... 
हाँ यह  जरुर कह सकते हैं. उम्मीदवारों का जो लिस्ट है,  उसमें हमारा सबसे कमजोर पक्ष है  महिला उम्मीदवार की  संख्या.  कुछ संख्या बढ़ी है , लेकिन हम यह मानते हैं कि उम्मीदवार का जो लिस्ट है,  उसमें सबसे कमजोर बिंदु यहीं है.

हमें लगता है कि यदि इरादतन भी आपलोगों ने किया होता तो कुछ बेहतर स्थिति होती. कई सीटों को हम जानते हैं , जहां पति और पत्नी , दोनो आपके मजबूत कार्यकर्ता है. पंचायत में पत्नी चुनी भी गई हैं. हमें  लगता है वहां से पुरुष उम्मीदवार की जगह,  यानी जो टिकट आपने पति को दिया है पत्नी को दिया जा सकता था. 
देखिये चुनाव में यह जरुर है कि जहाँ –जहाँ बहुत नेचुरल तरीके से महिला साथियों का नाम आया,  हमलोगों ने प्रयास किया.  अब जहाँ महिला नेत्री हैं उनकी चुनाव प्रचार में,  चुनाव संचालन में  महत्वपूर्ण भूमिका है.  अगर हम उन्हें चुनावी उम्मीदवार बनाते तो उनकी भूमिका सिर्फ उस सीट तक सिमट जाती .महिलाओं की भूमिका को सिर्फ उम्मीदवार के रूप में परिभाषित करना  हम समझते है कि ठीक नहीं है.  निश्चित तौर पर वह एक प्रमुख पहलू है और इसमें हमारी संख्या बहुत कम है.

क्या स्वीकार करते हैं कि चूक हुई है ? 
चूक नहीं कहेंगे.  हम समझते हैं लेकिन हर पहलू को हमेशा संतुलित करना संभव भी नहीं हो पाता है. कुल मिलाकर महिलाओं की चुनाव में भागीदारी ,सक्रियता को समग्रता में आप उसे देखेंगे तो फर्क दिखेगा. जैसे महिलाओं के मुद्दे . वे  बहुत महत्वपूर्ण प्रश्न हैं.   हमारे पूरे  चुनाव अभियान में कार्यकर्ता से लेकर नेतृत्व स्तर तक महिलाओं की भागीदारी बढी है पहले से , लेकिन उम्मीदवार लिस्ट में हमारा यह कमजोर पहलू है.

जाति प्रतिनिधित्व  को कैसे देखते हैं ? 
जाति को लेकर  हमलोग बहुत सोचते नहीं हैं,  लेकिन बहुत नैचुरल तरीके से , हमारी पार्टी की जो स्थिति है,  बिहारी समाज की जो संरचना है यह प्रतिनिधित्व बन जाता है.   हमने पार्टी के जो जगह-जगह आन्दोलन के चेहरे और नेता हैं उसी हिसाब से हमने टिकट दिया है. हमारी पार्टी  गरीबों की पार्टी है तो स्वाभाविक है कि उस हिसाब से जाति का भी अनुपात होगा,  तो हमने अलग से उस पर सोचा भी नहीं.

 इस देश में प्रतिनिधित्व की लड़ाई है तो पार्टी के स्तर  पर इसको एक एजेंडे के फॉर्म में...
नहीं देखिये,  पार्टी के लेवल पर  सामजिक उत्पीडन हमारे लिए जरुर बड़ा मुद्दा है.  सामाजिक उत्पीडन और जाति व्यवस्था का खात्मा हो देश में ,  इस लड़ाई को हमने  बढ़ाये जरुर हैं.  राजनीतिक चुनाव में सामजिक उत्पीडन और जाति उन्मूलन की जो बात कर रहे है वे सामाजिक न्याय के संदर्भ में  नहीं करते कर रहे. उनका सन्दर्भ सिर्फ चुनावी  है. बिहार में हमारी खासियत यह रही है कि हम जब भी जहाँ जीते हैं वहां सामाजिक न्याय की लड़ाई एक महत्वपूर्ण कारक रही है.  जैसे रामेश्वर जी १९८९ में जब आरा से जीते थे तो  यह अकल्पनीय बात थी कि नोनिया जाति का नेता (अगर हम जाति के संदर्भ में देखें तो ) भूमिहीन गरीब, चुनाव जीत जाये.  यह हमलोगों का इतिहास ही रहा है.  इस पृष्ठभूमि का नेता आरा जैसे सीट से जीत जाय ऐसा अकल्पनीय था तब.  हमलोगों का इतिहास ऐसा ही रहा है .ऐसे  उम्मीदवार को वरीयता देना .इसलिए जो स्थापित जाति की परिभाषा है,  जो समझ है,  जो समीकरणों को लेकर हिसाब -किताब है  उस आधार पर तो हम चलते भी नहीं है.

उस समीकरण के लिहाज से हम सवाल कर भी नहीं रहे हैं. यह सवाल प्रतिनिधित्व का है. आप  संघर्ष के कारण  आरा में तब चुनाव जीते थे और उस संघर्ष में जो हरावल दस्ता था वह जीतकर आ गया.  लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो एक बड़ा मुद्दा है. जैसे कि महिलाओं के लिए  आप मानते है कि महिलाओं का प्रतिनिधित्व होना चाहिए.  उससे उनके व्यासेज भी बनते है,  तो वैसे  ही जाति का प्रश्न है .. अगर आप हमारा लिस्ट देखेंगे तो महिलाओं की संख्या कम है , बाकी हमें नहीं लगता की और लिहाज से कम प्रतिनिधित्व  है किसी तबके का.

नीतिगत स्तर पर  आप आइडेंटिटी डिस्कोर्स को .. 
आइडेंटिटी डिस्कोर्स का भी अपना आधार है.  उसे हम कोई इमेजिनरी सवाल  नहीं मानते

वाम लोकेशन से एक हद तक आप लिबरल  भी हैं आंबेडकर को लेकर और कई चीजें आ भी रही है आपके यहाँ से..  
देखिये लिबरल का मामला का नहीं है.  हमलोगों का शुरू से ही आम्बेडकर के बारे में  मानना है कि देश की आजादी में और भारत के जो ठोस सामाजिक अंतविरोध हैं उसको संबोधित करने के मामले में , तथा विचारों के स्तर पर सबसे रैडिकल नेता वही हैं .भगत सिंह एक अलग जगह पर हैं.  लेकिन हम कह रहे हैं कि  उसके बाद जितने भी हमारे नेता रहे हैं - गांधी,नेहरू,आंबेडकर, उनमें हम समझते हैं की सबसे दूर तक जाने वला व्यक्ति ,दूर तक जानेवाला विचार अम्बेडकर का ही है. यह कोई लिबरल समझ नहीं है आंबेडकर को लेकर हम समझते हैं कि मार्क्सिस्ट लोग हमेशा अपने इतिहास का, अपने समाज का  सोशल एनालिसिस भी करते हैं आइडिया  के  स्तर पर. जो लोग क्लास को इकोनोमिक कैटगरी समझते है, वे गलत हैं.  हम समझते हैं कि क्लास कोई इकनोमिक कैटगरी है नहीं . अगर आप  कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो देखें तो देखिएगा कि समाज जो है वह शुरू से  दो वर्गों में बंटा है.  इसका मतलब है कि हम जिस  रूप में class को समझते है जो उसमें इकोनॉमिक एक्सप्लॉइटेशन है,  सोशल ओप्रेसन है . जेंडर का सवाल है वह  भी class के अन्दर आता हैं और अगर कहीं race है तो वो भी class के अन्दर आता है .

 हिन्दुस्तान में जाति के हिसाब से  mode of production पर अधिकार  तय होता रहा है , डिस्ट्रीब्यूशन भी जाति आधारित है.  .
हम कह रहे है कि पूरे देश में जाति को देखने का अलग-अलग नजरिया है.  जाति कोई fixed कैटगरी नहीं है.  अगर उसको हम मानते है की कोई livingचीज है,  तो इसका मतलब उसके अन्दर गतिशीलता है ,बदलाव है.  पहले जो caste और classको लगभग एक तरह से देखते थे,  हम मानते है कि इतना सीधा समीकरण नहीं चलेगा . सामाजिक उत्पीड़न बहुत बड़ा सवाल है देश में और उस हिसाब से जो दलित ,पिछड़ी जातियों की जो लड़ाई है,  उसका हम समर्थन करते हैं, उसके प्रति हमदर्दी है सहानभूति है.  लेकिन आप वैचारिक फ्रेम में देखे तो आप पायेंगे की तमाम जातियों के अन्दर से अलग-अलग विचार, एक तरह से अलग-अलग आइडेंटिटी  इमर्ज कर रही है. जीतनराम मांझी आर एस एस के साथ उसके गोद में बैठ जाते हैं,  उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! .रामविलास जी जैसी  राजनीति करते हैं उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे ! मायावतीजी खुद कई बार भाजपा के साथ चली जाती हैं .  खुद अपनी पार्टी के अन्दर जहाँ से मायावती जी चली थीं वहां से आगे उन्होंने भाईचारा का विचार जो उन्होंने दिया उसे आप कैसे व्याख्या करेंगे !  आइडेंटिटी डिस्कोर्स को ये जो पूरा डायनेमिक्स उसकी व्याख्या नहीं कर सकते हैं. आइडेंटिटी डिस्कोर्स अपनी जगह पर है , उसकी प्रासंगिता भी है,  हमारे समाज की जो बुनावट,  जैसा हमारे देश का जो इतिहास रहा है, उसके हिसाब से.
यह  सवाल कई बार आपसे पूछा गया होगा. इसके बावजूद भी हम दोहराना चाहते हैं कि प्राय बिहार के संदर्भ में वामपंथी पार्टियों ने ही दलित-पिछड़ों की लड़ाई खडी की है,  दलितों की तो सबसे ज्यादा, लेकिन 1990 के बाद उसकी जो फसल खड़ी थी,  उसको उनलोगों ने काट लिया , जो  सीधे-सीधे जाति को संबोधित कर रहे थे ?
मैं नहीं समझता कि हमारे जो आन्दोलन केकोर बेस हैं  उसमें ज्यादा बदलाव हुआ है.  अगर आप 80-90 के दशक में हुए चुनावों को देखेंगे तो  मध्यम तबका का अच्छा-खासा हिस्सा हमारे साथ आया.लेकिन विशेषतः  90 के बाद जब लालूजी का उभार हुआ तो हमने यह भी देखा कि हमारे चार-चार विधायक उनके साथ चले गए,  वोट का एक बड़ा हिस्सा चला गया और फिर लोग जैसे-जैसे लालूजी को समझ पाए,  उनकी राजनीति को समझ पाए , उसके वर्ग –चरित्र को समझे तो लोग वापस  भी आये .नये-नये लोग भी हमारे साथ जुड़े.इसी तरह नीतीश  जी भी जब एक नया डिस्कोर्स लेकर आये,  महादलित और अत्यंत पिछडी जाति का डिस्कोर्स. हम समझते हैं कि हमने उस समय जो सवाल उठाये सामाजिक न्याय के संदर्भ में  वह था न्याय और उसके साथ सामाजिक परिवर्तन. समाज की बुनियाद को बदलना होगा,  अर्थव्यवस्था के पूरे चरित्र को बदलना होगा . लोकतंत्र के जो सवाल हैं उसे समाज से लेकर घर-घर तक पहुंचा देना होगा. एक बड़े  परिप्रेक्ष्य  में हमने सामाजिक परिवर्तन और न्याय को रखा है.  हमारा सामाजिक न्याय और सामाजिक परिवर्तन जाति के संदर्भ में नहीं है, पूरे परिवर्तन के सन्दर्भ में है. लोगों को  तात्कालिकता से आगे सोचना होगा . दूरगामी देखना है और दूरगामी बात करनी  है.  पूंजीवादी देशों में लोगों को लगता है कि पूंजीवाद शाश्वत है, स्वाभाविक है, वही  चलेगा . ऐसे में  हर एक कम्युनिष्ट को बदलाव और एक भविष्य की दृष्टि  रखना पड़ता है.  कयुनिस्ट मैनिफेस्टो में कहा गया है, '  representing the interest and movement of tomorrow in today. आज की लड़ाई में हम कल की लड़ाई और कल के  सवालों का प्रतिनिधित्व करते हैं. तो यह हमेशा रहेगा- एक तात्कालिकता का दबाव हमेशा रहेगा, तमाम तरह के सुधारों का दबाव रहेगा और हम समझते हैं कि  इसी तरह से आन्दोलन का विकास होता है.

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