नताशा की कविताएँ

नताशा
विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में कविताएँ प्रकाशित , शिक्षिका और दूरदर्शन कार्यक्रम संचालिका . संपर्क : ई-मेल : vatsasnehal@gmail.coom
1. 

तय हुआ था बिछड़ते वक्त
हम मिला करेंगे मौसमों के मार्फत
अपने अपने शहर से
मैं भेजूंगी
दिन भर की जद्दोजहद के बाद
निढाल सी बेंच पर पडी हुई शाम
और सूखे पीले पत्तों पर राहगीरों की चहलकदमी
वह कानों को बेचैन करने वाला संगीत
भेजूंगी हवा के मार्फत
तुम भेजना
सुबह की बेदाग किरण
जिसपर लोग धब्बे लगाकर
स्याह कर डालते हैं
और मार डालते हैं रात में
तुम भेजना
उस हर रोज जन्म लेने वाली
अपराजित किरणों को
यही तय हुआ था बिछड़ते वक्त
हम दोनों के बीच
बस यही...

हम ज़ार ज़ार रोये बिछड़ते वक्त 
बेबस और निर्दोष होने के अभिनय में माहिर
विकल्पों की संभावनाओं ने हमें ढीठ कर दिया था
त्याग और समर्पण का नया अध्याय लिखने के लिए उद्धत
इन सबसे बढ़कर रोना सुकूनदेह था
हम दुख में थे
मगर दुख असह्य नहीं था
हमारे बीच वादा था
एक पक्का वादा.

काफी दिन बीते इस वादे को
अब रोना भी नहीं आता तुमको याद कर
इस सूखे का कारण
सावन भादो का सूख जाना है
या उधर बादल फटने की घटनाओं में
बह गया है मेरी आंखों का पूरा जल
रद्द हुआ कब ये वादा
कुछ ठीक ठीक नहीं बता सकते हम तुम
कितने मौसम बदले
तुम्हारी भेजी हुई चांद की चूड़ियां
मेरे शहर की आंधी में बिखरी पड़ी हैं
मैंने पिछले कई वसंत भी नहीं भेजे तुमको
अब चैत की उदास दुपहरी
उम्र की ढलान से फिसलती ही नहीं
तुम्हारे शहर की चिट्ठियां
कर्फ्यू की खबरों में तब्दील हो गई हैं
कोई चेहरा, कोई नाम तुमसे मेल न खा जाए
मन्नत के धागों का ढीला पड़ना
यह डर पैदा करता है
मैं नहीं भेजना चाहती थी
मेरे शहर का मातम
लेकिन बहुत तेज रास्तों से
पहुंचती ही होगी खबर तुम तक भी
मैं भेजना चाहती थी चुप्पी
तुम तक शोर पहुंच जाती है

शहर बदल गया
पते बदल गये
हम बदल गये
खबर बहुत जल्द आती है
बस मौसम बहुत देर से बदलता है!!
कुमार संतोष की पेंटिंग


2.
तुम्हारी आंखो में सागर है
जिस दिन कहा तुमने
सूखा नहीं पानी उस दिन से
नमकीन, गमगीन
मेरी आंचल में हवा का झोंका है
कहा जिस दिन तुमने
उघड़ने लगे धागे बेतरतीब
मेरे सीने के पर्वत पर
जो उचांइया हासिल की तुमने
वहीं से ढही मैं निढाल
तुमने जिस दिन कहा
मैं पृथ्वी हूं
मेरा अधर में रहना निश्चित था!

3.
वह मथ रहा था क्षीर समुंदर
मैं गिन रही थी आसमान में तारे
वह चीरता हुआ
निकल जाना चाहता था
लहरों के प्रवाह को
और मैं चुन रही थी
मोगरे के झरते हुए फूलों को
रोक लेना चाहती थी
उसे लहरों के बीच
वह पार होना चाहता था
खिल रहे वनफूलों के
कुम्हला जाने तक
वह कांटे चुभा रहा था
उसके पा लेने की आतुरता में
मुझे खोने का भय था
उसे खेलने की आदत थी
ओैर जीतने की जिद
एक खाली आसमान
मुझ पर औंधा पड़ा था.


4.
तब कितना भयानक होगा
जब एक अंगुली
दूसरी की पहचान कर दे खारिज
और मुट्ठी बांधने के मुद्दे से हो जाए लापरवाह
उससे भी भयानक शायद तब
जब एक आंख
तय करे अपनी अलग दिशा
और छो़ड दे साथ दूसरे का
आपको क्या नहीं लगता
कि यह भी एक भयानक स्थिति होगी
की जीभ के चारों तरफ के दांत
चबाना समझ लें फिज़ूल काम
और उदर की पूर्ति के लिए
निगल जाना  ही बेहतर समझे
क्या कहा आपने
एक हाथ दूसरे से अलग भी रहे
तो फर्क नहीं पड़ता
पर सोचा जा सकता है
कि सबसे जरूरी वक्त में
सुख को समेटना
और दुख में थामना अपनों को
क्या संभव हो पाएगा
चलिए
यह सब होना भयानक तो होगा
लेकिन मुझे लगता है
तब शायद उससे भी भयानक होगा यह
जब पीठ से टिकी रहे पीठ
और ओंठ से लिपटे रहें ओंठ
दूसरी तरफ
आंखे सुदूर अलग अलग दिशाओं में
टंगी रहे तृष्णा में,
फिर शायद नहीं रह जाएगी जरूरत
उंगलियों को उंगलियों की
न बाहों को बांहों की
तब जीभ भी भूल चुके होंगे स्वाद
और हो सकता है
दांतों का प्रहार बढ जाए इतना
कि लहूलुहान हो जाए
इस बावत
बचानी है हर पहचान
यह जरूरी है
उतना ही जरूरी
जितना हमारा अस्तित्व!
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