अंतर्वेदना के दंश

उमराव सिंह जाटव
सुप्रसिद्ध साहित्यकार . चर्चित उपन्यास :        ' थमेगा नहीं विद्रोह', कहानी संग्रह :'आधे दलित का दुःख' संपर्क :jatavumraosinghwetelo@gmail.com 
गांव के रिश्ते में वह मेरी भाभी लगती थीं. नौकरी के सिलसिले में जो मैंने गांव छोड़ा था तो बस विदेशी हो कर रह गया था. कुछ तो नौकरी की परिस्थितिजन्य मजबूरियां थीं तथा बाकी शहरी बने मन और तन की. संतू की खबर जब मुझे दिल्ली में मिली तब अपने आपको रोक न पाया था. संतू और मैं एक ही गांव और मुहल्ले के सहवासी थे. मैंने नौकरी के चलते गांव छोड़ा था और संतू ने अन्य एक निजी कारण से गांव छोड़ दिया था बल्कि वह गांव जानेवाली स्थिति में ही न था. उसके साथ मित्रता भी न थी,खत-ओ-किताबत भी न थी. गांव के ही एक सहवासी ने फोन करके बताया था कि दिल्ली में रह रहा संतू बीमार था तथा हालत गंभीर थी और उसके बचने की कोई आशा न थी. लंबे समय से गांव न गया था सो बस पकड़ कर गांव पहुंच गया. संतू लेकिन मुझसे भी पहले वहां पहुंच गया था.

गांव में हालात ऐसे बने कि बिरादरीवालों ने भाभी रामरती को,जो संतू की पत्नी थीं, समझाने के लिए मुझे उनके पास भेज दिया था क्योंकि वे किसी की भी बात सुन न रही थीं. समझाने गया था लेकिन उन्होंने मुझे समझाना शुरू कर दिया था. सोचा रामरती भाभी ने यदि मेरी क्लास लेनी ही है तो क्यों न उनके जीवन में झांका जाय,उन परिस्थितियों में झांका जाय जिनके कारण विद्रोही बनी रामरती आज किसी की सुनने को तैयार नहीं है. हाथ जोड़ कर उन्हें बताया कि किस प्रकार मैंने कहानियां लिखने का शौक भी पाल रखा है. उन्होंने ने तनिक सी भी ना-नुकर न की. सहज भाव से अपने जीवन को खुली किताब के समान मेरे सामने वर्क-दर-वर्क रख दिया.
इस प्रकार उस दिन रामरती भाभी की कोठरी में टीन के खाली कनस्तर पर बैठा उनकी कहानी सुनने का उद्यम कर रहा था तब उन्होंने यह कह कर चैंका दिया-‘‘ वह कहूंगी जो अनकहा रह गया बाकी तो मेरी जिंदगी खुली और कटी-फटी किताब के समान है,कहीं पृश्ठ गायब हैं तो कहीं इबारत नदारद है. जिसे सब जानते हैं उसे जान कर करोगे भी क्या इस लिए वह सुनो जो अनकहा रह गया. जिसे कहने की हिम्मत न जुटा पाई थी. आज वह अवसर आ गया है. जिससे से कहना है उससे आज भी न कह पाई तो आगे कभी अवसर न आएगा. संतू भी उसे सुनने के लिए फिर न आएगा. संशय केवल इतना है कि क्या वह उसे सुन पाएगा जो उससे कहना चाहती हूं ! कौन सा छोर पकड़ूं इस किस्सा-ए-जिंदगानी का  कि उस छोर तक पहुंच पाऊं जो अनकहा रहा.’’

‘खैर,मैं धनवन्ती,धनकौर,धनवती,रामरती हूं लेकिन और भी न जाने कितने नामों से पुकारते हैं गांववासी मुझे.  उम्र पचपन से ऊपर को खिसकती हुई,रंग-बेरंग है जो खूब गोरा हुआ करता था कभी.  काया- कृश,जर्जर और अपने अन्त की बाट जोहती.  आंखें मोतियाबिंद से धुंधलाई हुई तथा कोटरों में धंसी हुई. गाँव ,मुहल्ले की सबसे दीन-हीन,दयनीय एक बुढिया हूं. आज पचपन की बुढ़िया हूं लेकिन गांववासी जानते हैं और मैं तो सशरीर साक्शी ही हूं कि जब कोई तीसेक बरस की थी तभी से बूढ़ी हूं. जल्दी बूढ़ी हो जाना मेरी लाचारगी भी थी, आवश्यकता  भी थी. जल्दी बूढ़ी न होती तो आज जो गांव की सम्मानित बूढ़ी का खिताब पा कर जीवन के अंतिम दिन सम्मान के साथ जी रही हूं, न जी पाती. जवानी में जवान बनी रहती तो गांव-समाज में व्याप्त वासना के गिद्ध मुझे नोच कर खा जाते. इस प्रकार बुढ़ापे रूपी उस सुरक्षा  के किले में मैं जवानी में ही दौड़ कर घुस गई थी.
लेकिन ऐसा भी एक समय था जब  लालसा,कामनाएं,इच्छाएं,उम्मीदें,चाह,वासनाएं,मनोरथ,अभिलाषाएं हिलोरें मारती थीं तन-मन में और संयम के तटबंध टूट-टूट जाने को हो जाते थे.  तब सब कुछ था जीवन में.  युवा मन और तन में कामनाओं की हिलोरें वैसी ही उठती थीं जैसी हर युवती के मन और तन में उठनी चाहिएं,लेकिन कुछ तो समाज ने,कुछ धर्म के झूठे और अनर्गल दर्शन  ने तथा बाकी संतू ने मुझे वह बना दिया जो आज मैं हूं. ठेठ अनपढ़,काला आखर भैंस बराबर तथा अंगूठाटेक हो कर भी मैं धर्म के झूठे मुलम्मे को अब खूब समझती हूं जिसके पीछे उसका वह अरूचिकर चेहरा छिपा है जिसने सदियों इंसान को हैवानियत के लिए उकसाया है. लेकिन मेरे समझने से कुछ भी अंतर नहीं पड़ने वाला है इसे भी खूब जानती हूं और यह कि यह धर्म और धर्मशास्त्रों की दहशत तले  समाज यूं ही शुतुरमुर्ग सा रेत में मुंह गड़ाये अवशता के पर फड़फड़ाता अनर्गल फलसफे गढ़ता रहेगा. बूढ़ी हूं,कृश-काय हूं,अशक्त हूं,निर्धन हूं तथा अवांछित और बोझ हूं इस मुहल्ले पर. ना कोई आगे है ना कोई पीछे. ना ससुराल में कोई है अपना कहने को और ना ही है मायके में. माता-पिता कब के मर-खप गए,बाकी न कोई भाई न बहन. धन-संपत्ति,माल-असबाब,दौलत ऐश्वर्य ,खजाने के नाम पर एक झोपड़ी है मेरे पास जिसमें झटोला हुई एक खाट है,एक अलगनी है जिसपर यदि गर्मी का मौसम हो तो फटे-पुराने कपड़ों के साबुत बचे रह गए टुकड़ों को जोड़-जोड़ कर सिली गई-आकार दी गई एक कथरी है जो जाड़ों में सर्दी की कंपकंपाहट को दूर करने का केवल भ्रम पैदा करती है,कोने में चाखी है जिस पर हर रोज सेर भर आटा मैं पीस लेती हूं.  पुराना और जंग लगा हुआ टिन का कनस्तर है जिसमें एक जोड़ी लहंगा-ओढ़नी और अंगिया गुड़ी-मुड़ी रखे हैं.  एक खुरपी,एक दरांती,एक सिलौटीया मिर्च-मसाले पीसने के लिए जो अधिकांशतः तो  मिर्च और लहसुन पीसने के काम ही आती है-मिर्च मसाले के नाम पर बस लहसुन की चटनी तक ही मेरी सामर्थ्य  है. चाखी भी जो वैसे तो गांव-मुहल्ले से कब की विदा हो गई है मशीनी चक्की के चलते लेकिन मैंने अपने कुछ पुराने दिनों और स्मृतियों को सहेज रखने के लिए उसे झोपड़ी के एक कोने में पड़ी रहने के लिए बख्श दिया है. एक कोने में ओखल भी है और उसके मूसल से रात में आवारा जानवरों-डंगरों-कुत्तों से बचाव के लिए झोपड़ी का दरवाजा बंद रखती हूं. रात में अवारा घूमते मर्दों से मुझे डर नहीं है,पचपन बरस की बुढ़िया हूं इसलिए. जब संतू ने मुझे मेरी इस हालत को पहुंचाया था तब सब से अधिक इन दिन-रात आवारा घूमते मर्दों से ही भय  लगता था. यही वह कारण था कि मैं जितना जल्दी हो सका बुढ़ापे के सुरक्षित  और अभेद्य दुर्ग में दौड़ कर जवानी में ही प्रवेश कर गई थी. सुरकशा  का अन्य कोई रास्ता न था. इसलिए उम्र के लगभग तीसवे वर्ष  से ही मैं इतनी ही बूढ़ी हूं जितनी आज. मेहनत मजदूरी कर के किसी प्रकार हाड़-मंास के इस पिंजर को जीवन के साथ जोड़े रखे हूं. मरना चाहती हूं लेकिन कभी हिम्मत नहीं जुटा पाई. जीना मजबूरी बन गया है क्योंकि मर नहीं पाई.’’

‘‘मेरी कहानी जानना चाहते हो !  अब,ऐसे एक जीव की क्या कहानी हो सकती है जिसका आगा-पीछा सब नदारद ! लेकिन इस गांव और मुहल्ले तथा तुमको भी आज मेरी याद आई यह मेरे लिए सुखद भी है अविश्वसनीय भी है और दुःखद भी. किस्से कहानियों  में राजकुमार-राजकुमारीयों, शहज़ादे-शहज़ादियों के महलों सुख-सुविधाओं,उन की एैशपरस्तियों , उन के अश्लील-नाजायज़,अनैतिक सम्बन्धों के किस्से तो खूब सुने हैं,  लेकिन  मोतीयाबिन्द से धुंधलाई आंखों तथा अपने चीथड़े हो चुके वस्त्रों के साथ मजदूरी करके पेट पालती एक स्त्री की कहानी तो कभी नहीं सुनी ! जब छोटी बच्ची थी तब मां कहानी सुनाया करती थी,बहुत सी कहानियां-ढ़ेरों कहानियां लेकिन उन सब में तो सुंदर-सुंदर राजकुमारियां होती थीं जो बहुत सुंदर गहने-कपड़े पहनती थीं,रोज सातों प्रकार के पकवान खाती थीं,महलों में रहती थीं तथा उनसे भी सुंदर कोई राजकुमार घोड़े पर सवार हो कर आता और उनको ब्याह ले जाता था और कहानी यहां आ कर समाप्त हो जाती थीं. लेकिन एक अभागी,बदकिस्मत बुढ़िया की कहानी !

जब एक छोटी बच्ची थी तब से जो मजदूरी करना प्रारम्भ किया था अब तक कर रही हूं.   माता पिता के घर में जब होश संभाला वह याद है कि कैसे,जब वे खेतों में,घरों में मजदूरी में खटते थे,तब उन के साथ खेलती रहती पूरा-पूरा दिन काट देती थी.  बारह एक बरस की होते न होते मैं स्वयं भी माता-पिता के साथ मजदूरी करने जाने लगी थी और ब्याह कर जब इस गांव में आई तो सास ने बस कोई चार-पांच  दिन के लिए बख्शा था मजदूरी से. लेकिन आज जो इस गाँव  में घट गया है वह कुछ ऐसा है कि अवश  हो इस मुहल्ले को, इस गाँव  को मेरी भी  सुध आई है.  मुख्यतः तो इस लिए कि इन हालात में जो अभी-अभी अनायास उपजे हैं,क्या किया जाय.  इसी क्रम में पूरा मुहल्ला इस सोच में डूबा है कि इस नये उपजे हालात में मैं क्या करूंगी. मैं स्वयं भी इस सोच में हूं कि इस अप्रत्याशित उपजी स्थिति में अब मैं क्या करूं ?  हास्यास्पद ही है कि क्या मैं कुछ करने की स्थिति में हूं ? जो सारा जीवन बेशर्मी से इस निकृश्ट जीवन को लंबा खींचने की जुगत में जिए जा रही हूं ,न किसी को मार पाई न स्वयं मर पाई. लेकिन उससे भी पूर्व उसे भी जानना आवश्यक है जो आज की मेरी दुर्गति का कारक है. यह धर्म,यह समाज,अधम संतू,मेरे माता-पिता और स्वयं मैं !  लेकिन मुझ अनपढ़ की सोच को जान कर तुम चाहे तो हंसो चाहे उपहास करो तुम्हारी मर्जी लेकिन मेरे ऊपर तरस-रहम-दया का दिखावा कतई न करना.
मेरे पिता और माता कंठीधारी कबीरपंथी थे. पिता नित नेम करते हुए प्रायः ही कबीरवाणी भजते हुए इस दोगले समाज और इसके सैकड़ों देवी-देवताओं की आलोचना तो करते ही थे,  आलोचना करने में वे अपने सतगुरू कबीर तक को भी नहीं बख्शते थे. अशिक्षित  हो कर भी उन्हें कबीर के अनगिनत दोहे-उलटबांसियां और भजन याद थे. उनके बहुत सारगर्भित अर्थ करके वे सुनाते थे. मेरी मां को लेकिन इन पदों,उलटबांसियों में कोई रूचि न थी. पति कबीरपंथी था सो मन मार कर वह भी कंठीधारी हो गई थी लेकिन मेरे पिता मुझे प्रायः ही कबीरपंथ,समाज के दोगलेपन,मुलम्मे के पीछे छुपे इस दोगले समाज के कुत्सित चेहरे के बारे में,शास्त्रों में लिखे और भरे-पड़े अनर्गल और वाहियात फलसफे के बारे में समझाया करते थे. तब तो समझ में कुछ न आता था लेकिन अब जमाने और समाज के खोखलेपन को स्वयं भुगत कर कुछ-कुछ समझ पाई हूं. मेरा ब्याह हुआ तब लगभग अठारह वर्ष की  थी. तब तक पिता के विद्रोही विचारों को सुना करती थी. जो अपने सतगुरू कबीर तक की आलोचना करने में गुरेज नहीं करते थे उसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि उनके विद्रोही तेवरों की धार कैसी चीर देनेवाली होती होगी. जाटवों में उन दिनों माता-पिता अपनी बेटियों को जब पति रूपी खूंटे के साथ उम्र-भर के लिए बांधते थे तब इतना-भर देखते थे कि मजदूरी करने लायक स्वस्थ और साबुत हाथ-पैर हों उसके लेकिन मेरे लिए उन्होंने ठोक बजा कर शिक्षित  लड़का खोजा था.

‘ वृक्ष  एक अधर में जामा,जड़ ऊपर पलई तरका
जल ऊपर लोहा उतराने,लौकी बूड़ गई तरका
बामन  वेद भेद नहिं पावत,बातों में रहता अटका’ 
सतगुरू कबीर के इस पद को गा कर पिता बताया करते थे कि यह दुनिया न केवल औंधी है इसकी सोच भी औंधी ही है. जब तक इसके साथ तुम भी औंधे बने चलते रहे बस तब तक ही ठीक है. तर्क-वितर्क करने बैठे कि धक्का दे कर अपने पाले से बाहर कर देगा समाज. या कबीर जैसा कलेजा,सोच और हिम्मत लेकर जनमो. पिता बताया करते थे कि कैसे दुर्योग,संयोग और दैवयोग जैसे शब्द मन को बहलाने-भर के उपाय हैं. मन और मस्तिष्क  इसे भली भंाति समझते बूझते हैं. मृग मरीचिका के इस मोहभ्रम को खूब जानता है मन. कुयोग और सुयोग जैसे शब्दों के भंवर जाल में अपने आप को,स्वयं अपने से ही डाल कर और संात्वना के थोथे इंदरजाल को गढ़ कर मनुष्य  कई बार स्वयं अपने आप को ही न केवल ठगता है,बल्कि अपने लिए कई सारे दुख-दर्दो को भी सायास सहेज लेता है! क्यों सहेज लेता है,क्यों अपने आप को ठगता है,क्यों उस में सप्रयास विश्वास  करता है जो नहीं है? कोई आगमज्ञानी जाने तो जाने. लेकिन क्या उस जानने को भी जानना कहेंगे,जिसमें बेतुके,अनर्गल और विरोधाभासों से भरे दर्शन में वह स्वयं आगे बढ कर विश्वास  करता है! विचित्र विरोधाभासों का पुलंदा यह मनुष्य  कभी तो निराकार की बात करता है,कभी साकार की,कभी सगुण की बात करता है कभी निर्गुण की,कभी एकेश्वर -अद्वैत की बात करता है कभी द्वैत की ! और सभी को सही ठहराने के अथक प्रयत्नों में जीवन गंवाता है. निर्गण,सगुण,साकार,निराकार की व्यर्थ की विवेचना में जीवन खपाने वाले भी अन्ततः उसी माटी में खप जाते हैं, जिसमें बिना व्यर्थ की विवेचनाओं में सिर खपाने वाले खपते हैं. हां,इस व्यर्थ के प्रयासों में अपना जीवन तो अकारथ व्यय करते ही हैं मानव समाज का भी तनिक सा भी भला किये बगैर उठ लेते हैं. विरोधाभासों का पुलिंदा यह मनुष्य  विवाह बंधन में बंधते समय पचासों अनुष्ठानों  को पूरा करता हुआ कभी तो सात जन्मों तक न बिछुड़ने और जन्म-जन्मान्तरों  तक एक दूसरे को ही पाने की बात करता है,यह समाज,यह धर्म तो दूसरी ओर जन्म-जन्मजन्मान्तरों  के जंजाल से छूटने के लिए जप तप,पूजा-अर्चना,दान,नैवेद्य का जुगाड़ करता है कि और जन्म न लेना पड़े ! इस विरोधाभास को समझने के लिए ज्ञानी-ध्यानी होने की आवश्यकता  नहीं है. एक ओर तो अगले सात जन्मों तक जीने की कामना करता है विवाह बन्धनों में बंधते समय कि अगले सात जन्मों तक दोनों का  साथ बना रहे वहीं अगले ही पल जन्म-जन्मांतरों के जंजाल से छुटकारा पाने को ही मनुष्य   जीवन का अंतिम ध्येय मान कर हजारों-लाखों पुण्य कमाने में जीवन खपाता है कि और जन्म न लेना पड़े !   शास्त्रों  के अनुसार इस जन्म में पुण्य एकत्रित न करने,बुरे कर्मो में रत रहने से जन्म-जन्म जन्मान्तरों के जंजाल से मुक्ति नहीं मिलती है और बार-बार जन्म लेना पड़ता है लेकिन वही मूढ़ अगले सात जन्मों का प्रबंध तो अग्नि के फेरे लगा कर  विवाह के समय पहले ही कर चुका है होता है या कर चुकी होती है! इस अजब मूढता की बात को निपट गंवार भी आसानी से समझ सकता है: पति-पत्नी अग्नि के सात फेरे लगा कर वचन भरते हैं कि अगले सातों जन्मों में भी वही एक दूसरे के पति-पत्नी रहें ! लीजिये, विचित्र विरोधाभास प्रस्तुत है, जन्म-जन्मजन्मान्तरों  के जंजाल से मुक्ति ही मनुश्य का प्रथम और अंतिम उद्देश्य  शास्त्रों के अनुसार यदि है तब पहले से ही अगले और छः जन्मों की बात करना क्या अभिशाप  नहीं है ! विचित्र विरोधाभास लेकिन अभी समाप्त कहाँ  हुआ है ! अब यदि  अगले और छः जन्मों के अनुबंध के उपरांत भी पति-पत्नी  दोनों में से कोई एक इस जन्म में कुकर्म करके अगले एक और जन्म की तैयारी कर ही लेता है,तब इस सात जन्मों के सिद्धांत  के अनुसार पत्नी उस अगले जन्म में सुकर्म भी यदि करे तो क्या?  पति के बुरे कर्मों के कारण, उसे अगले सात जन्मों के अनुबंध के कारण उस के साथ फिर से जन्म लेना होगा और उसी कुकर्मी के साथ परिणय के बंधनों में बंधना होगा,और अगले जन्म में जब विवाह करने के अनुष्ठान  में अग्नि  के सात फेरे लगाएगी तब पुनः और अगले सात जन्मों के अनुबंध का वचन भरना होगा.  और निश्चित  जानिये कि यह भी निश्चित नहीं है कि पति के कुकर्मों के कारण इस अगले अवांछित  जन्म में पति के संग खिचड़ रही पत्नी पति के अगले जन्मों में न पड़ने के प्रयासों को अपनी गलतियों के कारण व्यर्थ न कर देगी! आखिर तो इंसान गलतियों का पुतला है. और इस प्रकार और अगले सात जनमों का एक और अनुबंध ! इस निपट मूढ़ता और पागलपन का कोई अन्त नहीं है. कोई कितने सुकर्म करेगा ! ऐसा प्रतीत होता है कि अन्ततः अधिकाँश  को जन्म- जन्मजन्मान्तरों  से कभी भी छुटकारा न मिलेगा. तब इस पुण्य की गठरी को लादे-लादे वैतरणी को तर जाने की व्यर्थ लालसा क्यों? इस जन्म- जन्मजन्मान्तरों के ताबूत में अंतिम कील ठोकने के लिए इतना-भर कहना पर्याप्त होगा कि जन्म होते ही क्यों नहीं माता पिता संतान का गला घोंट कर बच्चे को सीधे ही इस जन्म से छुटकारा देते हैं. न रहेगा जीवन,न कुकर्म करने का अवसर मिलेगा उसे और न अगले कई जन्मों में भ्रमण का दण्ड भुगतेगा. आखिर कुकर्म तो तब करेगा जब जीवन होगा. माता पिता का तो जो हुआ सो हुआ,उन के अपने माता पिता के अज्ञान के कारण शापवत यह जीवन उन्हें जीना पड़ रहा है ,जनमते ही टेंटुआ दबा देते तो सुकर्म करने के झंझट में तो न फंसते. शास्त्रों के अनुसार चैरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात जीव को मानुश जून माने कि मानव योनि मिलती है.  समझ गए ! नहीं ? तो फिर से समझें. गिनती में चैरासी के आगे पंाच शून्य और लगाएं,उतने जीवों का नर्कमय जीवन भोग कर मिलता है

मानुष जन्म ! कहने की आवश्यक्ता  नहीं कि मानुष जन्म अनमोल है शास्त्रों में यही लिखा भी है इन महाज्ञानियों ने. तब यह नैसर्गिक ही तो है कि उस अनमोल को बार-बार प्राप्त करने की इच्छा की जाय,उस की पुनः-पुनः प्राप्ति  के लिए अथक श्रम,कर्म,सुकर्म,कुकर्म किये जायं.  सुकर्म कर के इस अनमोल मानुष जन्म को जन्म-जन्मान्तरों के जंजाल से छुटकारे की कामना क्या विरोधाभासी नहीं है ? अनमोल के खोने की भी कोई कामना करता है भला? क्या कोई इस पर चर्चा करेगा कि जो अनमोल है उसे अपने स्वयं के प्रयत्नों से सुकर्म अथवा कुकर्म कर के क्यों खोने में जीवन को खर्च किया जाय ?

मेरे पिता ने ठोक बजा कर पढ़ा-लिखा वर मेरे लिए खोजा था. दसवीं कक्षा  में तीन बार फेल हो चुका था संतू तब तक जब मेरे पिता ने मुझे उसके साथ बांधने का निर्णय लिया था. दिल्ली सरकार के मलेरिया उन्मूलन विभाग में गली-मुहल्ले-कालोनियों में मच्छरमार दवा डी.डी.टी छिड़कने की चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी की सरकारी नौकरी भी करता था. गांव के जाटव मुहल्ले में उस नौकरी के चलते संतू का मान-सम्मान किसी थानेदार से कम न था. पढ़े-लिखे संतू उर्फ संतलाल उर्फ संत प्रकाश ने या तो शास्त्रों के इस झोल को समझ कर उस का लाभ उठाया था अथवा उस के इस पापी तन की अदम्य और अतृप्त इच्छाओं ने ही उस से ऐसा कराया. खैर, जो भी हुआ हो, उस के इस सात जन्मों के अनुबंध से बंध कर और उस की सत्यता में किंचित भी अविश्वास  न कर मैंने अपने लिए जीवन-भर के नर्क भोग की नींव मेरे कबीरपंथी पिता ने मेरे लिए गैरइरादतन रख दी थी. और उस पढ़े-लिखे संतू ने जो माता-पिता का अकेला बेटा था..........’’

भाभी रामरती की कहानी सुनने जब बैठा था तब सोचा था कि ज्यों का त्यों उसके कहे को शब्दों में पिरो कर कागज़ पर उकेर दूंगा. लेकिन उसकी कहानी के विस्तार को जान कर अब सूत्रधार बनने के अलावा अन्य कोई सरल राह मुझे नहीं दिख रही है. इस प्रकार-

जाटवों में पुनर्विवाह कभी भी वर्जित और निषिद्ध  न तो पूर्व में रहे और न अब हैं,तब रामरती इस संतू के नाम पर ही क्यों बैठी रही,विचित्र है. सात जनमों के अनुबंध भी जाटवों के विवाह में नहीं कराए जाते हैं-बचे रह जाते हैं केवल इतने-भर से कि अभी कुछ ही समय पूर्व तक जाटवों के विवाहों में आने के लिए बामणों के पास न तो समय था और न कोई आग्रह. बाकी हिंदुओं के विवाह समारोहों की देखादेखी वे भी ‘मंढा’ नाम के एक स्तंभ के चारों ओर सात फेरे लगा कर मानते रहे हैं कि हो गई  शादी. सात फेरे भी अग्नी के चारों ओर न लगाए जाते थे. उस मंढ़े के,जो लकड़ी का कुंदा होता था, के चारों ओर वर-वधू को घुमा दिया जाता था तब स्त्रियों  का झुंड गीत गाता था-‘ पहला-पहला फेरा री..... दूजा-दूजा फेरा री....’ सातवें फेरे तक यही मंत्र ‘.....वां फेरा री’.  इधर मंढ़े के सात चक्कर वर-वधू ने लगाए उधर विवाह कार्य संपूर्ण.  बिना बामण,बिना मंत्रों के इस अनुष्ठान  के बावजूद भी विवाह कार्य पूर्ण होते ही माता-पिता,नाते-रिश्तेदार आशीर्वाद देते हुए कहते -‘‘ अगले सात जन्मों के बंधनों में बंधे हो अब तुम दोनों.’’

रामरती का विवाह भी इसी प्रकार हुआ था. सब कुछ बंधेबंधाए रिवाजों के साथ ही हुआ. रामरती के मामा ने बिचैलिया बन,11 रूपया संतू के हाथ पर रख कर कहा ‘ लड़का हमें ‘परसंद’ है जी’ और रोक की रस्म पूरी की,गांव के ‘ बुजुर्गों ’ने सहमति प्रकट कर दी. रामरती के पिता ने सगाई में लड़केवाले के परिवार के लिए,लड़के के लिए ‘टूक’ जिसमें सात गज कपड़ा,घर के बच्चों के लिए कपड़े,छोटा-मोटा जेवर, दस सेर चावल-दाल,घर में बनाए गए सेव,लड्डू भेंट में दिए. संतू के परिवार की स्त्रियों  के लिए ‘तीहल’ जिस में धोती-ओढ़नी  और 21 रूपया.  शर्माते हुए लेकिन मन में हुलसते हुए रामरती ने भावी पति के लिए ‘बीजना’ ;हाथ का पंखाद्ध बुनना शुरू कर दिया. बान-तेल हुए,बारात आई,मंढ़े के चारों ओर सात फेरों की भांवरें पड़ीं और विदा हो कर रामरती ससुराल पहुंच गई. बिदाई से पूर्व टीके की रस्म पूरी करते हुए रामरती की मां और पिता ने संतू और रामरती को आमने-सामने बैठा कर समझाया -‘‘ अब तुम दोनों अगले सात जन्मों के बंधन में बंध गए हो. दुःख में भी सुख में भी एक-दूसरे का साथ निभाना. तुम दोनों का सुख और दुःख आज से सांझा हुआ.’’  रामरती की मां ने दोनों की बलाएं ली,आशीर्वाद दिया. बेटी को समझाया-‘‘ बेटी,पति के सुख में ही अपना सुख मानना. दुःख भी दे तो सुख समझ कर धारण कर लेना. पति की आज्ञा से कभी बाहर न जाना.’’

संतू को देखा तो रामरती मानो निहाल हो गई. कद छोटा लेकिन खूब गोरे रंग का,तीन वर्षों तक  दसवीं में फेल होनेवाला शिक्षित  ,सरकारी नौकरी पर तैनात ! निहाल होना उचित ही था क्योंकि कहां तो पूरे जाटव मुहल्ले में 99 प्रतिशत मजदूर,गिनती के दसेक शिक्शित  लड़के,गिनती के चार सरकारी नौकरी में और यहां संतू शिक्शित भी,सरकारी नौकर भी और सुंदर और गोरा भी, बस कद तनिक छोटा था. वह पांच फुट दो इंच का हो कर भी अपने कद की कमी को बन-ठन कर रहने से पूरा कर लेता था. लाइफबॉय  साबुन का नया-नया अवतरण गांव-देहात में तब हुआ था तथा वह भी हरेक की सामर्थ्य में न था. जो पैसेवाले थे वे लक्स साबुन का भी प्रयोग करते थे लेकिन लक्स सर्वसाधारण की पहुंच से पूर्णतः बाहर था. मुहल्ले में जो लाइफबॉय से नहाने की सामर्थ्य रखते थे उनमें संतू ही अकेला था लेकिन संतू उससे भी आगे बढ़ कर लक्स का प्रयोग करता था. संतू के प्रेम और उसके तन में रची बसी उस लक्स की सुगंध से आनंद-सम्मोहिता रामरती बौराई सी रहती थी. फिल्म देखने का मानो जुनून था संतू को. हिंदी फिल्मों के पचासों गाने उसे याद थे जिन्हें वह दिन-भर गुनगुनाता रहता था. नाचने में भी उसका कोई सानी न था. रामरती को अकेला पाते ही वह देवानंद की किसी फिल्म का गाना एक हाथ अपने कान पर रख कर दूसरा रामरती के कंधे पर टिका कर ‘ इक बुत बनाऊंगा तेरा और पूजा करूंगा...... अरे मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा’ को कूल्हे मटका-मटका कर,नाच कर सुनाता. सुन कर,देख कर अभिभूत रामरती के गाल लज्जा से लाल हो जाते,नजरें जमीन चूमने लगतीं. संतू तब उसे छाती में समेट कर जोरों से भींच लेता. लजाती हुई रामरती पूछती-‘‘ कब तक?’’

‘‘ अगले सात जन्मों तक. क्या भूल गई, सात जन्मों तक साथ रहने का वचन दिया है तूने मुझे.’’ रामरती के गालों पर चुंबन की मुहर लगाते हुए वह कहता.

‘‘ अकेले मैंने ही थोड़े न अगले सात जन्मों के साथ का वचन दिया है तुम ने भी तो दिया है.’’ लाज से पुनः दोहरी होती हुई रामरती ने कहा.

‘‘ बिल्कुल दिया है,भूल ही नहीं सकता. भूलने का प्रयत्न भी करूंगा तो तुम्हारी यह अप्रतिम सुंदरता मुझे भूलने ही न देगी. तुम्हारे पल्लू में बंधा अगले सात जन्म तक यही गाता रहूंगा.’’

मच्छरों के ऊपर दवा छिड़कने की अपनी नौकरी से प्रति रविवार को जब वह छुटृी पाता तब रामरती को भी अपने माता-पिता,भाई-बंदों से छुपाता हुआ 15 किलोमीटर दूर गाजियाबाद फिल्म दिखाने ले जाता. दिल्ली से गांव लौटते हुए रास्ते में कस्बे के बाजार से सेर-भर ‘मिल्क-केक’खोया से बनी मिठाई लेकर ही घर में घुसता, लेकिन रात होने तक तथा रामरती के साथ अकेला होने तक घर में माता-पिता से उसे यहां-वहां  छुपाता फिरता. रात में रामरती के साथ निबछरा ;एकांतद पाते ही अपने हाथों से रामरती को अपने हाथ से, बड़े ही बाजारू लहजे के संवादों में लपेट कर,मिल्क-केक खिलाता-‘‘ मेरी जान.... तेरे कुर्बान.... पहले मिल्क-केक खा.... उसके बाद  देता हूं पान.’’ यह किसी फिल्म का संवाद था जो उसने हाल ही में देखी होती. ना-नुकर करती रामरती को तब वह अपने हाथों से मिल्क-केक खिला देता. उन दिनों देहरा गांव के निकटस्थ सिनेमाहाल या तो 15 किलोमीटर पश्चिम में गाजियाबाद में था अथवा पूर्व में भी लगभग उतनी ही दूरी पर सिकंदराबाद में. उन दिनों समाज में मर्दों तक का फिल्म देखना वर्जना से कम न था, लौंडे-लपाड़े छुप-छुपा कर वर्श में एकाध बार देख आते थे. संतू ने लेकिन उससे एक कदम आगे बढ़ कर रामरती को भी चार-छः फिल्में दिखा दी थीं. लड़कियों में साधनाकट बालों के स्टाइल की धूम थी सो संतू ने भी रामरती के हजार आपत्तियों के बावजूद स्वयं ही कैंची से उसके माथे पर लहराती-लटकती जुल्फों को कतर कर साधनाकट बना दिया था. बेचारी रामरती उन्हें छुपाने के प्रयत्नों में मारे शर्म के अपने हाथ-भर के घूंघट को दो हाथ का किए फिरती रही. लेकिन उसकी वे साधनाकट जुल्फें छुपी न रह सकीं और देवर-जेठ उसे ‘पर कटी’ कह कर छेड़-छाड़ करते रहे. संतू भी पत्नी-भक्त के नाम से नवाजा गया. गांव-मुहल्ले में लोग लेकिन कहते -‘ पति-पत्नी में प्रेम हो तो संतू-रामरती जैसा,मानो सारस की जोड़ी हो’.
सुख-भरे वे दिन लेकिन बस दस वर्श ही निजस्र रह पाए. उसकी गोद इन दस वर्शों में हरी न हुई. गांव की दाई के टोटके और दवाओं का भी कोई नतीजा न निकला. भगताई करने वाले काले भगत की झाड़-फूंक भी कुछ न कर पाई. पहले सास ने ताने देने शुरू किए उसके बाद ससुर ने भी. संतू की तीन विवाहित बहनें भी समय निकाल कर यही बताने के लिए जब-तब आ जातीं कि बंजर धरती में जितना चाहे खाद-पानी दो घास का तिनका तक नहीं उगता है. संतू ने भी वही कहना जल्दी ही सीख लिया. अब न फिल्में रहीं और न मिल्क-केक,रह गए सास-ससुर,ननदों और संतू के ताने.. रविवार की छुटृी में वह आता तब तोते की तरह यही याद दिलाने के लिए कि बंजर धरती में बीज बोने से कुछ नहीं होने वाला है. जब ब्याह कर आई थी तब भी संतू की मां तपेदिक की रोगी थी,इन पांच वर्षों  में पोते की आस में खाट से लग गई. उन दिनों वैसे भी तपेदिक का कोई निदान न था. तपेदिक का अर्थ ही था तिल-तिल कर निकट भविश्य में अवश्यंभावी मृत्यु. सो उसकी सास तिल-तिल कर तो मरी लेकिन खाट से लगी रह कर भी एक दिन अचानक ही. रोना-धोना हुआ. तीनों ननदें भी आईं और मां के लिए थोड़ा-बहुत रो-धो कर रामरती के पीछे पड़ गईं-‘‘ ऐसी जोंक के समान हमारे ‘बीरन’ के साथ चिपटी है कि न मरने का नाम लेती है न टरने का. अरी बंाझ! तूने हमारी मां को तो खा लिया अब और किस की बलि लेगी? अपने घर तक में तो किसी को छोड़ा नहीं तूने. वहां भी मां-बाप को खा गई इन दस  वर्शों में. अरी ! पड़ोस के पांच घर तो डायन भी छोड़ देती है. हमारे भाई को बख्श क्यों नहीं देती तू !’’

रामरती सुन कर जड़ हो गई. रात में संतू ने कहा-‘‘ अब से मैं हर रविवार को घर नहीं आऊंगा, मैंने वहीं दिल्ली में कोठरी किराए पर ले ली है,वहीं रहूंगा. तुम चाहो तो अपने पीहर चली जाओ.’’
‘‘ पीहर किसके पास जाऊं,माता-पिता तो रहे नहीं. भाई भी मेरा कोई नहीं है,क्या इसी लिए ताने मार रहे हो?’’
सुनते ही संतू ने बिफर कर कहा-‘‘ तो फिर सड़ती रह यहीं लेकिन मैं अब गांव न आऊंगा. सब ताने मारते हैं कि मेरी मर्दानगी में कुछ कमी है इसी लिए औलाद नहीं हुई. बर्दाश्त की भी एक सीमा होती है आदमी के लिए. गांव-भर के ये ताने अब मैं और नहीं सुन सकता.’’
‘‘ तुम्हारी मर्दानगी में कमी कैसे हो सकती है,तुम्हारी बहनें सारे गांव को सुना कर गई हैं कि उनकी भाभी बंजर धरती है जिसमें घास-फूस उगने के भी कोई आसार नहीं हैं. तुम भी वही बता दिया करो.’’
‘‘ तुम जो चाहे समझो.’’ कह कर संतू करवट बदल कर सो गया.

दूसरे दिन सवेरे जब दिल्ली जाने के लिए वह घर से निकलने लगा तब रामरती ने खुशामद भरे शब्दों में कहा-‘‘ मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगी. वहां अकेले कैसे रहोगे,कैसे खाना बनाओगे. मैंने सुना है वहां बहुत बड़े-बड़े अस्पताल हैं जहां बांझों का भी इलाज हो जाता है,मुझे भी दिखा देना.’’
वांग्य  का भरपूर पुट अपने शब्दों में दे कर संतू ने उत्तर दिया ‘‘ रामरती,कल्लर भूमि में कभी कुछ नहीं उगता है. औलाद तुम्हारे ‘भाग’ में नहीं है बावली. ‘भाग’ ही ओछे ले कर आई हो तो अस्पताल भी कुछ नहीं कर सकता है.’’
‘‘ मैं यहां अकेली कैसे रहूंगी,यह सोचा है?’’ सीधे संतू की आंखों में झांकते हुए रामरती ने प्रतिप्रश्न किया.
‘‘ अकेली कहां हो,पूरा मुहल्ला है,गांव है.’’
‘‘ ठीक है,मेरा इलाज मत कराना लेकिन साथ तो रख सकते हो.’’ संतू का हाथ थाम कर रामरती ने गिडगिड़ाते हुए कहा.
झुंझलाते हुए संतू ने अपना हाथ छुड़ा लिया, कहा-‘‘ रामरती,तब  जो सच बात है वह भी सुन ले. बंजर धरती को जोतते-जोतते मैं थक गया हूं. मर्द में ताकत हो तो दूसरी जमीन भी तो जोती-बोई जा सकती है.’’
रामरती सुन कर सन्न रह गई. अंदेशों की झंझाएं उसके कानों में सांय-सांय करने लगीं. तो क्या......  तो क्या... संतू के किसी अन्य स्त्री से संबंध बनाने की बात कर रहा है.
उसकी मनोदशा का तनिक सा भी खयाल न करते हुए संतू ने आगे कहा-‘‘ अब और छुपाने से कुछ लाभ नहीं है. मैं पिछले साल-भर से तुम्हें बताने की सोच रहा था लेिकन.....  रामरती, मैंने दूसरा ब्याह कर लिया है और वह दिल्ली में  मेरी उस किराए की कोठरी में ही रह रही है. मैं उम्र-भर औलाद के लिए प्रतीक्षा  नहीं कर सकता था. अब तू अपने लिए कोई इंतजाम कर ले.’’ कह कर वह दरवाजे की ओर मुड़ा.
रामरती ने लेकिन कस कर उसका हाथ पकड़ लिया. उसकी आंखों में आंखें डाल कर कहा-‘‘ और वह मेरे साथ सात जन्मों का बंधन?’’
‘‘ रामरती,ये सब कहने-सुनने की बातें हैं बस. इस जन्म का साथ ही निभ जाय .....’’
‘‘ अब मैं किसके सहारे जिंदा रहूंगी?’’
‘‘ यह मैं क्या जानूं,तुम्हारा जीवन है तुम जानो.’’ कह कर वह जाने के लिए मुड़ा.

रामरती ने पहले से भी सख्ती के साथ संतू का हाथ पकड़ कर झटके से अपनी ओर खींचते हुए कहा-‘‘ तब तो तेरी जुबान कहते न थकती थी- ‘सात जन्मों तक साथ रहने का वचन दिया है. तेरे पल्लू से बंधा हर जन्म में तेरा साथ निभाऊंगा.’ अरे,तू तो इस जनम के दस बरस भी न निभा पाया. लेकिन अब मैं तेरी खुशामद करके और अपना अपमान न कराऊंगी क्योंकि तू तो ‘मौड़’ सेहरा बांध कर,ब्याह करके,दूसरी औरत को किराए की कोठरी में बैठा कर तब मुझे बताने आया है. तू तो अब तक केवल बताने के लिए अवसर की तलाश में था. ‘ इक बुत बनाऊंगा तेरा और पूजा करूंगा...... अरे मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा’. इसे अब उस के साथ गाता होगा हुलस-हुलस कर. सात जन्मों का वचन भूलते समय तूने एक बार भी न सोचा कि मेरा क्या होगा. कैसे मेरा जीवन कटेगा ! मेरे पेट में दो वक्त की रोटी डालने का क्या इंतजाम किया है तूने?’’
‘‘ रामरती, वह तुझे अपने साथ कतई बर्दाश्त न करेगी अन्यथा तो मैं तुझे भी अपने साथ ही रखता.’’ लाचारगी दर्शाते हुए संतू ने कहा.
रामरती ने संतू का गला पकड़ लिया. कहा-‘‘ और तू समझता है कि मैं उसके साथ रह लूंगी जिसने यह भी न सोचा कि दूसरी एक स्त्री का घर उजाड़ कर अपना घर बसाने जा रही है. कभी नहीं. ’’

संतू बार-बार जाने का उद्यम करने लगा. हर बार रामरती उसे खींच कर घर की देहरी के भीतर कर लेती. अंततः संतू भी अपनी सी पर उतर आया. रामरती को जोर का एक धक्का दे कर जमीन पर गिरा दिया और बाहर जाने लगा. जैसे स्प्रिंग खींचने पर क्शणांश में दोगुने वेग से पलटती है,रामरती बिल्कुल वैसे ही उछल कर खड़ी हो गई. तब तक संतू चार कदम जा भी चुका था. उसने भाग कर संतू को पकड़ लिया. यह लड़ाई अब दबी-छुपी न रही थी,पड़ोस के दसियों लोग-लुगाई आंखे फाड़े इस तमाशे को देख रहे थे. जो मजा उन्हें इसे देखने में आ रहा था उसे ज़ाया न होनेे देने के लिए कोई भी मध्यस्तता के लिए आगे न आ रहा था. लेकिन संतू के दूसरे ब्याह की बात सुन कर वे भी अचंभित थे. रामरती ने घूंघट बेशक किया हुआ था लेकिन उसने जाते हुए संतू को खींच कर उसका मुंह अपनी ओर करते हुए चिल्ला कर कहा कि तमाशा देख रहे लोग भी सुन लें-‘‘ जब तूने सात जन्मों के बंधन को तोड़ ही दिया है तो मैं ही क्यों उन बंधनों के नाम पर तुझे बर्दाश्त करूं. देख, मैं तुझे क्या दिखाती हूं.’’ कह कर उसने कोठरी की दीवार पर अपनी कलाईयों को पटक दिया. छनाक की आवाज के साथ हाथ की सारी चूड़ियां टूट कर धरती पर बिखर गईं. गहरे हरे रंग  की चूड़ियां,जिन्हें गांवों में सुहागिनें अक्सर  सुहाग और सौभाग्य की निशानी के तौर पर पहनती हैं,टूट कर कटी फसल सी धरती पर बिछ गई. आंखें फाड़े संतू भी और पूरा मुहल्ला उस अनहोनी को देख रहा था. गांव-देहात के स्त्री-मानस में सुहाग चूड़ियों के प्रति परायणता इतनी है कि काम-धंधा करते हुए अथवा अन्य कारणों से चूड़ी यदि टूट जाय तो सुहागिनें  ‘टूट गई’ शब्द न प्रयोग कर ‘मौल गई’ शब्द का प्रयोग करते हुए बताएंगी-‘ मेरी चूड़ी मौल गई.’  पुरानी हो गई चूड़ियों को बदलने के लिए, तीज-त्योहारों के अवसर पर अथवा  शादी-ब्याह के अवसर पर जब मनिहार से नई चूड़ियां पहनती हैं तब मनिहार कलाई में नई एक चूड़ी पहनाता जाता है और उसके बदले पुरानी एक चूड़ी तोड़ता जाता है और अंत में पुरानी एक चूड़ी भी नई पहनाई गई चूड़ियों के साथ कलाई में ही छोड़ देता है कि चूड़ियां अक्शत ही रहें. विधवाएं सुहाग लुट जाने पर अपनी चूड़ियां तोड़ देती हैं और यहां तो संतू जीता-जागता उसके सामने खड़ा था. ऐसी अनहोनी किसी ने आज तक घटते न देखी न सुनी थी. संतू स्तब्ध था,चेहरे पर हवाईयां उड़ रही थीं जैसे अपनी ही लाश देख रहा हो.  अविश्वास के साथ वह फटी आंखों से धरती पर टूटी पड़ी चूड़ियों को देख रहा था.
क्लासिकल और परंपरागत कथा कहने की पद्धति में तो रामरती के द्वारा चूड़ी तोड़ देने पर एक अच्छा चरमोत्कर्ष उत्पन्न हो चुका था लेकिन एक तो यह मेरे गांव में पहुंचने से पूर्व ही घट चुका था तथा दूसरे जो इसके पश्चात रामरती ने किया वह भी चरमोत्कर्ष  की दूसरी लहर थी,जैसे समुद्र में लहर के पीछे-पीछे उससे भी बड़ी लहर. उस दूसरी लहर का साक्षी  ही मुझे बनना था. लेकिन वह दूसरी लहर भी यह न थी जो तत्क्षण  घट रही थी.

पूरा मुहल्ला तब तक एकत्रित हो गया था. जो भी सुनता,सुन कर हत्प्रभ हो रहा था, धरती पर टूटी पड़ी चूड़ियों को अविश्वास के साथ देख रहा था और रामरती को भी जो हाथ-भर का घूंघट निकाले खड़ी थी. मुहल्ले के कई चैधरी अपनी पगड़ियां संभालते,खांसते-खंखारते रामरती की लानत-मलामत करने लगे-‘‘ अरी बिच्चो.., यू तैने कहा करौ? संतू तो तेरे सामने ही जिंदौ खड्यो है.’’ मुहल्ले-भर की बुढ़ियाएं भी रामरती के ‘अगले-पिछलों’ की खबर लेने लगीं. उसके पश्चात मुहल्ले के बड़े-बूढ़ों ने संतू की खबर ली-‘‘ रै कमस्सल (कमअस्ल) पहली के होते हुए तैने दूसरी कैसे करली रे. कहां की है?  किस की बेटी है?’’


तब तक लाठी के सहारे संतू का वृद्ध पिता,जो जंगल-पानी के लिए गांव से बाहर गया हुआ था,भी आ गया. सुनते ही उसे मानो काठ मार गया. संतू की करतूत का उसे भी ज्ञान न था. बांझ रामरती पर वह ताने तो अवश्य कसता था लेकिन संतू दूसरी औरत घर में रख लेगा यह तो उसने भी न सोचा था. हरदयाल संतू का पिता,संतू की कमर में लाठी का टहोका देते हुए चिल्लाया-‘‘ तू कमस्सल ही है. गांव के बड़े ‘बुजुर्गों ’ की बात सोलह आने सच है. अरे कमस्सल,कमीन तैने तो मुंह  दिखाने लायक भी ना छोडौ मैं. ’’ उसके बाद रामरती को संबोधित कर कहा-‘‘ अरी लाली ! यू हरामी तो पागल हो ही गयौ है,का तेरी भी ‘मत’ मारी गई है? अरी, घरवाले के जिंदा रहते हुए ही तैने चूड़ी फोड़ लीं. बता बेटी,अब इस अनर्थ से निस्तार कैसे होवै? अरी बावली, इस हरामी की करतूत के बिसै में मोहे तो बताती,यू सब करनै सू पहलै.’’

ससुर की डांट सुन कर रामरती अपनी करनी पर पछताती हुई सिर झुकाए कुछ क्षण  तो चुप खड़ी रही उसके बाद घूंघट के भीतर से ही सहमी लेकिन दृढ़ आवाज में बोली-‘‘ बाबा,पिछले साल-भर से दूसरी औरत के साथ रह रहा है आज तो बस बताने का अवसर पा गया है. समझाने की,बताने की बात तो तब उठे जब कुछ कर गुजरने की सोच रहा हो. यह तो सब कुछ कर गुजरने के बाद बताने आया था.’’ लगभग गिड़गिड़ाते हुए हरदयाल ने बहू से कहा-‘‘ बेटी,मुहल्ले के सुरजन ने भी तो दो औरत घर में डाल रखी हैं,तू भी निभा लेती. अरी, किस्से-कहानियों में तो पत्नी ने कोढ़ी,लंपट,चरित्रहीन पति तक का साथ निभाया है,सौत के साथ निभाया है लेकिन पतिव्रता धर्म नहीं त्यागा. राजा-महाराजाओं की तो दस-दस रानीयां होती थीं, ‘दसरथ’ महाराज की, जो राजा रामचंदर के पिता थे, तीन रानियां थीं. सती-सावित्रियों की कथा तेरे मां-बाप ने क्या कभी नहीं बताई तुझे?’’

‘‘ बाबा,वे कहानी की बातें हैं. सचमुच के जीवन में घटती त्रासदी  की नहीं. कहानियों की वे सती-सावित्रियां राजाओं की रानियां थीं दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करती मजदूर औरतें नहीं थीं. मैं  अब अपना जीवनयापन कैसे करूंगी क्या यह सोचा इस आदमी ने यह कुकर्म करने से पहले.’’लेकिन एकत्रित हो गए मुहल्ले के बुजर्गों ने बीच में पड़ते हुए कहा-‘‘ हरदयाल, ये बातें तो बाद में भी हो जाएंगी. यह सोचो अब क्या करना है.’’ आगे संतू से कहा-‘‘ बोल संतू अब क्या करें?’’

संतू अब सिर झुकाए खड़ा था. उसके मुंह से बोल न फूट रहे थे. दिल्ली में ब्याह भी उसने गोपनीय रख कर किया था. जैसे वह दुहेजवां था उसकी उस दूसरी पत्नी का भी दूसरा ब्याह था बल्कि उसे ब्याह कहना ही गलत था क्योंकि पहले पति को छोड़ कर वह संतू के घर में बैठ गई थी. ब्याह ही क्या कराव (जाटवों में प्रचलित पुनर्विवाह का एक प्रकार जिसमें ब्याह जैसा कोई अनुश्ठान नहीं होता है बल्कि दोनों ओर के चार-छः संबंधी साथ बैठ कर तय कर देते हैं कि दोनों पति-पत्नी हो गए हैं) तक भी न हुआ था. संतू का उसके भाई के साथ हमप्याला-हमनिवाला संबंध था,उसी के विभाग में वह भी मच्छरों पर दवा छिड़कने की नौकरी करता था. अक्सर ही वह अपनी बहन के बारे में बताता रहता था कि कैसे अपने पति के साथ वह सुखी नहीं थी. संतू ने भी संतान न होने का अपना दुःख उसके सामने प्रकट कर दिया था. उस हमप्याला-हमनिवाला मित्र के घर में ही वह रहती थी अपने पति को छोड़ कर. मित्र की पत्नी इस जबरन गले आ पड़ी ननद से जल्द से जल्द छुटकारा चाहती थी. दो-चार बार जब संतू उस मित्र के घर गया तब मित्र की बहन बन-ठन कर उसकी खूब खातिरदारी करती. अगली चार-छः खातिरदारियों में ही बात यहां तक बनी कि एक पोटली में अपने कपड़े-लत्ते उठाए वह संतू के पास पहुंच गई. उसके भाई ने ही तुरत-फुरत किराए की कोठरी का प्रबंध भी कर दिया. और इस प्रकार संतू बिना ब्याह किए ही उसके साथ घर बसा कर किराए की कोठरी में बस गया. कभी ऐसी स्थिति आएगी इस विशय में उसने सिर न खपाया था. सोचा था रो-धो कर और नियति की करनी मान कर जो हुआ उसे स्वीकार कर लेगी. लेकिन......    उसने सिर नीचे किए ही उत्तर दिया-‘‘ जो आप ठीक समझें वही करूंगा.’’

मुहल्ले के ‘बुजुर्गों ’ में खुसर-फुसर हुई उसके बाद उन्होंने कहा-‘‘ जो हुआ सो हुआ,अब अपनी घरवाली को अपने साथ ले कर जा.’’ घूंघट में सिर झुकाए खड़ी रामरती से मानो पुचकारते हुए कहा-‘‘ लाली, इस प्रकार अपना घर नहीं बिगाड़ा करते हैं. मुहल्ले के रामेत मनिहार को बुलाए देते हैं,तू उससे चूड़ी पहन ले.’’
गांव के तथाकथित सवर्णों के साथ हुए तनाव में मजदूरी से बहिष्कृत  करने के प्रसंग में जब उन्होंनेे जाटवों का खेतों में-घरों में मजदूरी से बहिष्कार  कर दिया था तब असहाय जाटवों ने पचासों अन्य व्यवसायों में हाथ आजमाना सीख लिया था. मसलन रामेत मनिहार बना तो मोहरसिंह और जगसेन ने पीतल की टूटियां बनानी सीख ली थीं. तिलकू ने गंगादास के साथ मिलकर साझे में तांबे के तारों से ट्यूबवैल में काम आने वाली जाली बुनना सीख लिया तो डल्लू और हरबंसा ने चांदी के वर्क बनाना. बाबू ने ईटों का भटृा लगाना सीखा तो सुमरता ने बगल के कस्बे दादरी में परचून की दुकान खोल ली जो यद्यपि कस्बे के बनियों ने चलने नहीं दी और उस बेचारे का हजारों का नुकसान हुआ लेकिन तथाकथित सवर्णों की गुलामी से से छूटने के लिए गांव के जाटव कितने आकुल थे वह स्पष्ट  लक्षित  था.  गूजरों और तथाकथित सवर्णों के मध्य चला वह युद्ध कब का समाप्त भी हो गया था और तथाकथित सवर्णों खुशामद सी करते जाटव मुहल्ले में मजदूरों की तलाश में भटकने लगे थे लेकिन नये व्यवसायों को अपना चुके जाटवों की अब मजदूरी करने में कोई रूचि न रह गई थी. मनिहार रामेत का घर जाटव मुहल्ले के धुर पश्चिम में था. मुहल्ले के बुजुर्गों ने जब किसी को उसे बुला लाने के लिए पठाने का उद्यम किया तब रामरती ने इस बार घूंघट के भीतर से ही लेकिन स्पष्ट और दृढ़ शब्दों में कहा-‘‘ ना.’’
‘‘ अरी रामरती,ना क्यों? चूड़ियों के टूटने की चिंता तू न कर,हम कौनसे बामण-बनिया हैं जो संस्कार और अनुश्ठानों के बंधनों में बंधे हों. क्रोध में जो तेरे मन में आया तूने किया, नासमझी में जो ठीक समझा उसे संतू कर गुजरा. मनिहार से चूड़ी पहन और अपना घर संभाल.’’ पगड़ियों और मूछों पर हाथ फिराते हुए बुजुर्गों ने कहा.
‘‘ कौन सा घर? जिसमें दूसरी औरत के साथ मेरा घरवाला रह रहा है या यह घर जहां मुझ अकेली को छोड़ कर यह भाग रहा है.’’ घूंघट के भीतर से रामरती ने प्रतिप्रश्न किया.
संतूू को संबोधित करते हुए बुजुर्गों ने कहा-‘‘ अब बोल संतू,रामरती को साथ लेकर जाएगा?’’
‘‘ नहीं यह संभव नहीं है. ना रामरती उसके साथ रहने को तैयार है और न वह इसे साथ रखने को. मेरा व्यर्थ ही मरन हो रहा है दोनों के मध्य.’’
रामरती ने घूंघट को तनिक सा उठाते हुए और सीधे बुजुर्गों की आंखों में झांकते हुए कहा-‘‘ आपने सुन लिया?’’
संतू इसे सुनते ही क्रोध और हताशा में पांव पटकता हुआ दिल्ली भाग गया. मुहल्लावासी संतू और रामरती की लानत-मलामत करते हुए तथा यह भविष्वाणी करते हुए अपने घरों को चले गए कि प्रलय आने में अब देर नहीं है. रह गए रामरती  और उसका ससुर हरदयाल. हरदयाल लंबे क्षणों  तक अपना सिर पकड़े धरती में नजरे गड़ाए सोचता रहा कि क्या अब आगे और कुछ देखना बाकी है. रामरती भाग कर अपनी कोठरी में पड़ गई और हिलकियों के साथ रोने लगी. हरदयाल ने अंततः एक लंबी उसांस छोड़ते हुए रामरती के लिए हांक लगाई-‘‘ रामरती बेटा,बाहर आजा. जो होना था सो हो गया. तूने भी जो कुछ बचपना करना था सो कर दिया लेकिन इसमें तेरी कोई गलती नहीं है. तू चिंता कतई मत करना,जब तक मैं जीवित हूं अपनी बेटी के समान तेरा भरण-पोषण  और रक्षा करूंगा . मेहनत-मजदूरी तो हम किस्मत में ही लिखा कर लाए है सो कुछ तू कर कुछ मैं करूंगा. हम दो जनों का गुजारा उससे हो जाएगा.’’
रामरती घूंघट निकाले बाहर आकर खड़ी हो गई.

संतू इसके पश्चात फिर कभी गांव न लौटा. हरदयाल ने भी उसके पास दो टूक खबर भिजवा दी कि ‘खबरदार,अपना काला मुंह अब गांव में मत दिखाना. मेरे लिए संतू मर गया.’ रामरती का ससुर अगले पांच वर्ष  तक और जिया और दो दिन के बुखार में तप कर चल बसा. यदा-कदा समाचार आते रहे संतू के बारे में,उसके दो बेटों और तीन बेटियों के बारे में,उसकी उस बिनब्याही पत्नी के बारे में. जब तक ससुर जिंदा रहा ढ़ाल के समान उसकी सुरक्षा  में तैनात रहा था. रात में घर के सामने से भी कोई गुजर जाता तो गहरी नींद से भी चिहुंक कर चिल्ला पड़ता-‘‘ कौन जाता है?’’ इतना होते भी मुहल्ले के चार-छः लंपटों ने रामरती के घर के चक्कर लगाने बंद न किए. राह-बाट में,खेतों में,कुंआ पर रामरती से मिलते तो फुसफुसा कर कहते-‘‘ भाभी,क्यों अपनी जवानी को गला रही हो? चार दिन की चांदनी है सो उसका मजा लूटो. हम आपके ताबेदार हैं जब आज्ञा करोगी हाजिर हो जाएंगे.’’ एकआध ने हरदयाल की आंख बचा कर घुप्प अंधेरी रातों में उसकी कोठरी का दरवाजा तक खटखटा दिया. कईयों को पकड़ कर रामरती ने गाली-गुफ्तार भी की लेकिन कामुक पशुओं पर इसका कुछ भी असर न हुआ,तब रामरती ने एक तो उनके ऊपर बाजरा कूटनेवाले मूसल का प्रयोग कर दिया और दूसरे पहले से भी अधिक फटे-पुराने कपड़ों में रहने लगी,तेल-फुलेल और कंघी से विरत बालों को चिड़िया के घोंसले जैसा बना लिया,नहाने-धोने को मासिक आयोजन बना लिया. मुहल्ले की अन्य स्त्रियां कहतीं-‘‘ अरी !रामरती तेरे तन से दुर्गंध आती है,कपड़ों से दुर्गंध आती है.’’
निपृह वह कहती-‘‘ आने दो.’’
लेकिन ससुर के मरते ही कामुक पशु पुनः  इशारे करने लगे. अपनी कोठरी को मूसल से बंद करके रामरती ने बाकी दिन भी गुजार ही दिए.
और आज संतू की मृत देह दरियापुर गांव में लाई गई है.

संतू जब बीमार पड़ा और हालत गंभीर हो गई तब उसके बच्चों ने गांव में सूचना भिजवा दी. भाई-बंद भागे-भागे गए. जिस दिन संतू की मृत्यु हुई थी और अंतिम संस्कार की तैयारी प्रारंभ हुई तब उसका चचेरा भाई बलराम इस एक बात पर अड़ गया कि संतू का अंतिम संस्कार उसके पैतृक गांव में ही किया जाय. उधर संतू के बेटे इस बात पर अड़ गए कि उनके पिता का अंतिम संस्कार वहीं दिल्ली में ही किया जाय.
भड़क कर बलराम ने संतू के लड़के से कहा-‘‘ तेरी मां के साथ संतू का ब्याह कब हुआ था रे,बताना. कहां हुआ था? किन पंचों की उपस्थिति में हुआ था,बताना.’’
कोठरी में संतू की लाश पर उसकी बिनब्याही पत्नी विलाप कर रही थी,सुन कर झपटती हुई बाहर आई. संतू के भाई-बंदों को सुना कर लेकिन अपने बेटे से,जो बीस-बाईस बरस का था, कहा-‘‘ ले जाने दे. मेरे सिर का ताज तो गया इस दुनियां से उसका अंतिम संस्कार यहां करने से भी वापस नहीं आएगा. लेकिन इनसे यह तो पूछे कोई कि पिछले बीस बरस से हम अकेले यहां पड़े हैं तब तो किसी भाई-बंद को हमारी याद नहीं आई. आज अचानक इतने सारे भाई उत्पन्न हो गए संतू के !’’

पहले से भी अधिक भड़क कर बलराम ने भी तथा साथ आए बाकी भाई-बंदों ने भी गाली देते हुए कहा-‘‘ स्साली..... हरामजादी... दूसरी औरत की घर-गृहस्थी उजाड़ कर जो तू यहां पड़ी है उसके बारे में कभी सोचा है तूने? और गांव में संतू के पास है क्या जिसके लोभ में हम आए हैं ! हम आए हैं इस लिए कि संतू पर जिसका अधिकार है उसी को उसकी मिटृी का अंतिम संस्कार करने का अधिकार है. सारी उम्र जो उसके नाम पर बैठी रही उसी का उस पर अधिकार है,तेरी तरह खसम के होते हुए दूसरे के घर में नहीं बैठी वह. आज भी संतू की ब्याहता है वह. हम चाहते हैं कि जहां की माटी है उसी माटी में जाकर वह मिले जिससे से संतू की आत्मा को शांति मिले.’’
सुन कर संतू की वह बिनब्याही पत्नी सन्न रह गई. कुछ क्षण  सोच-विचार के बाद उसने अपने बेटों से कहा-‘‘ चलो हम भी दरियापुर चलेंगे.’’
सुन कर सारे भाई बंद भड़क गए , उसके लड़कों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा-‘‘ बेटा,ध्यान से सुन लो और कान खोल कर सुन लो कि तुम लोग और तुम्हारी यह मां यदि संतू की लाश के साथ गांव गई तो खून-खराबा हो जाएगा. पुलिस,कोर्ट-कचहरी करने से भी गुरेज न करेंगे हम अब. तुम्हारी यह मां कानूनी तौर पर संतू की पत्नी नहीं है.’’
संतू की पत्नी और बेटे बात की गंभीरता को समझ गए. टैंपो में लाद कर संतू की लाश को जब ले जाने लगे तब वह ‘ मेरे राज....मेरे राज...मुझे छोड़ कर कहां जा रहे हो..... किस के सहारे जिऊंगी अब..’ इत्यादि का विलाप करने लगी. अंततः संतू के भाई-बंद लाश ले कर गांव आ गए.

इस प्रकार दोपहर के एक बजे के लगभग संतू की लाश जब दरियापुर गांव में पहुंची तब अचानक वह विचित्र समस्या उठ खड़ी हुई जिसके चलते मुझे गाववालों को अपना दूत बना कर भाभी रामरती के पास उसे समझाने के लिए भेजना पड़ा. संतू पुनः रामरती के दरवाजे पर लौट आया था,पूरे बाईस वर्शों के बाद. संतू की परित्यक्ता पत्नी यहां गांव में है जो बाईस वर्श पूर्व उसके जीते-जी उसके नाम की पहनी चूड़ियां तोड़ चुकी थी और जिसने उसके नाम की चूड़ियां पहन रखी हैं उसे संतू के भाई-बंदों ने बहिष्कृत   कर दिया है. रात होने से पहले संतू की ‘अंजल-मंजल’ करनी अनिवार्य है. मृत शरीर को सूरज छिपने से पूर्व ही अंतिम संस्कार कर पंच तत्वों में विलीन करना ही होगा,ऐसा ही विधान है.

लाकर रामरती की कोठरी के सामने धरती पर कांस बिछा कर लिटा दिया संतू को.  मुहल्ले के बड़े-बूढ़े बांस चीर-फाड़ कर अरथी बांधने लगे. यूं अचानक उस संतू को,जिसके साथ सात फेरे लिए थे,अपनी कोठरी के सामने मृत पड़े देख रामरती जड़ हो गई. क्रोध में फुफकारते हुए कोठरी की दीवार पर मार कर चूड़ियां फोड़ देना एक बात है और उस आदमी की मृत देह को देखना और बात है जिसके साथ पूरा जीवन न सही जीवन के कुछ आनददायक वर्ष  भोगे थे. चाहे झूठे ही सही ‘एक बुत बनाऊंगा तेरा.....’ गीत उसके लिए गाए थे. जिसकी सुंदरता को देखते ही भावाभिभूत हो गई थी पहले ही दिन. चूड़ियां फोड़ कर जिसे जीवन से निकाल बाहर करने का भ्रम पाले हुए थी वही सशरीर उसकी कोठरी के सामने धरती पर पड़ा अरथी पर चढ़ने को प्रतीक्षित  था. उसकी आंखों में आंसू भर आए. दिल बैठने लगा. लेकिन कुछ ही क्षणों  में उसने अपने आपको संभाल लिया.  तब तक मुहल्ले-भर की स्त्रियां उसकी कोठरी के सामने एकत्रित होकर बैन करने लगीं. चार-छः उसकी कोठरी में घुस कर उसे समझाने का प्रयत्न करने लगी-‘‘ न रो भैन.... न रो. सबको कभी न कभी बिछुड़ना ही पड़ता है. हाय.... कैसा गबरू ‘जुवान’ हुआ करता था संतू. तुम दोनों की जोड़ी कैसी सारस की जैसी थी. लेकिन सबर कर भैन.... सबर कर.....’’ लेकिन यह देख कर कि रामरती न तो रो रही थी और ना ही वह बैन कर रही थी सांत्वना देनेवाली अकबका कर चुप होगई. आश्चर्य से वे रामरती को देखने लगी. रामरती ने तब भी उन पर ध्यान न दिया. हैरतभरी निगाहों से रामरती को देखते हुए उन्होंने और एक प्रयत्न किया-‘‘ हाय...हाय... बिचारी रामरती. अपने जोड़ीदार के दुःख में पत्थर हो गई है.’’ उसके पश्चात रामरती को कंधों से पकड़ कर झकझोरते हुए कहा-‘‘ अरी रामरती.... तेरा जोड़ीदार चला गया भैन...... रो,विलाप कर,बैन कर,चूड़ियां तोड़ दे भैन. अब तेरे भाग में सुहाग नहीं रहा. तू रांड हो गई रामरती... तू रांड हो गई.’’
सुन कर रामरती ने निस्पृहभाव से उन्हें अपनी बिना चूड़ियों की कलाईयां दिखा दीं.
‘‘ ना भैन ना... संतू तेरा जोड़ीदार था,तेरे माथे का ‘ताज’ था,तेरा सुहाग था. चूड़ियां तोड़ ... चूड़ियां तोड़.. चूड़ियां तोड़... रामरती.’’
रामरती ने दुखी स्वर में कहा-‘‘ मैं तो बाईस बरस पहले ही रांड हो गई थी.  तुम क्या जानती नहीं हो यह?’’
भड़क कर एक बूढ़ी ने कहा-‘‘ अरी ! पागल हो गई है क्या? तेरे कह देने से ही तू रांड हो गई? समाज ने इसे कब स्वीकार किया था? तू रांड हो गई थी तो किस के नाम पर अब तक बैठी रही थी? संतू के नाम पर ही ना? बोल !’’
‘‘ मैं उसके नाम पर कभी नहीं बैठी रही थी. बाईस बरस पहले ही संतू के नाम की पहनी चूड़ियां तोड़ कर रांड बन गई थी. वह मेरा अब कुछ नहीं है. उसके साथ जो कुछ तुम्हें करना है सो करो या उसकी जोड़ीदार करे.’’
बड़ी-बूढ़ियां बैन-फैन करना भूल कर रामरती को गालियां निकालने लगीं-‘‘ मरद के जीवित रहते स्त्री रांड हो सकती है क्या? तुझे संतू के साथ नहीं रहना था तो तू उससे रिश्ता तोड़ कर किसी और के घर में बैठ जाती,किसने रोका था तुझे. पति की मृत देह घर के आंगन में पड़ी है और यह सती-सावित्री कह रही है कि वह तो रांड है.’’ और एक स्त्री ने जोर-जबरदस्ती पर उतरते हुए कहा-‘‘ ऐसे ना मानेगी यह करमजली,जबरन रांड बनाओ इसे अब.’’ कह कर उसने रामरती के दोनों हाथ पकड़ कर फर्श पर मार दिए लेकिन हाथों में चूड़ियां तो थी ही नहीं. विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गई थी. विधवा कह रही थी कि वह तो बाईस वर्ष  पूर्व ही पति के जीते जी विधवा हो गई थी और मुहल्ले की स्त्रियां उसे आज और अभी ताजा-ताजा विधवा बनाना  चाहती थीं. लाचार बड़ी-बूढ़ियों ने बाहर अरथी तैयार करते पुरुषों  तक बात पहुंचा दी. मुहल्ले के कई सम्मानित बुजुर्गों ने भी आ कर रामरती को समझाया लेकिन वह अपनी बात पर अडिग रही. अंततः बुजुर्गों ने विधान का एक अंतिम और अमोघ अस्त्र चल कर देखा. सख्त शब्दों में रामरती से कहा-‘‘ रामरती,विधान के अनुसार तू अब भी संतू की पत्नी है क्योंकि विवाह संबंध-विच्छेद के लिए दोनों जोड़ीदारों में से किसी एक को तो विधिवत बिरादरी के सामने संबंध तोड़ना ही पडत़ा है. तू बूढ़ी बेशक हो गई है लेकिन तूने कभी भी संतू से संबंध नहीं तोड़ा है. तेरे द्वारा क्रोध में चूड़ियां तोड़ देने से तू विधवा नहीं हो गई थी इसे याद रख.’’

गांवों में ब्याह कर आते ही जो नई बहू दो हाथ का घूंघट तानती है वह बढ़ती उम्र के साथ छोटा होते-होते माथे तक आ जाता है. पचपन की उम्र पार कर चुकी रामरती ने भी इस प्रकार घूंघट से छुटकारा पा लिया था. बेहद दुखी रामरती घिसटते कदमों से अपनी कोठरी से बाहर आकर संतू की मृत देह के एक दम समीप उसके सिरहाने आकर खड़ी हो गई. बुजुर्गों और बड़ी-बूढ़ियों ने राहत की सांस लेते हुए,कि अंततः रामरती मान ही गई,उसके मुंह की ओर इस प्रत्याशा में देखा कि वह विलाप करना शुरू करेगी. रामरती कई लंबे कक्षणों  तक संतू की मृत देह को निहारती रही. नीचे बैठ कर उसने संतू के मुंह से ओढ़ाई गई चादर हटा दी. उसकी आंखों से आंसू झरने लगे. हिचकियों से गला रूंध गया. दर्शकों की आंखें भी आंसूओं से भर गईं. स्त्रियों का झुंड विलाप में बैन करने लगा. रोआंराट मच गया. तब रामरती धीरे से अपने घुटनों पर हाथ रख कर कराहती सी उठ खड़ी हुई. उसने झुक कर धरती पर पड़ा कांस का एक तिनका उठाया और उसे पूरे मुहल्ले को दिखाया उसके पश्चात मृत संतू के मुख को दिखाया और दोनों हाथों की चुटकियों में पकड़ कर बीच से तोड़ दिया.

देख कर दर्शक सन्नाटे में आ गए. बैन करती हुई स्त्रियों का मुंह बैन करना छोड़ खुला का खुला रह गया. बिरादरी के सामने और बिरादरी द्वारा अनुमोदित विधान के अनुसार रामरती ने मृत संतू से संबंधविच्छेद कर दिया था. यह उन दिनों की बात है जब जाटवों में तलाक कोर्ट-कचहरी में न होते थे. दोनों पक्षों  में से कोई भी इस प्रकार संबंध विच्छेद कर सकता था यदि वह बिरादरी के पंचों के सामने किया गया हो. इसके पश्चात दोनों ही पक्श अन्य एक और विवाह करने अथवा न करने के लिए स्वतंत्र हो जाते थे.

भौंचक मुहल्ले को सन्नाटे में छोड़ रामरती अपनी कोठरी में घुस गई. भीतर से सांकल  चढ़ा कर वह धरती पर जा पड़ी. बाहर धरती पर मृत पड़े संतू की सोच कर उसकी हिचकियां बंध गईं जिसने कभी उसके लिए-‘...अरे ! मर जाऊंगा प्यार अगर मैं दूजा करूंगा’ गाया था. बेआवाज,निश्शब्द हिचकियां धरती को गीली करने लगीं. हिचकियों की एक के बाद एक आती हिचकियों से उसका सर्वांग झकोरे खाने लगा.

यही वह अंक था इस नाटक का जब मुझे गांव के बुजुर्गों ने रामरती को समझाने के लिए उसकी कोठरी में भेजा था और मैं उसके सामने बैठा अपढ़ रामरती के तर्कों से सहमत होता हुआ अपने आपको बौना महसूस कर रहा था. रामरती के तर्कों की कोई काट न मेरे पास थी,न बाहर प्रतीक्षा  कर रहे बुजुर्गों के पास और ना ही बाहर-भीतर से खोखले शास्त्रों के पास. ढ़कोसलों  का लबादा ओढ़े शास्त्रों और समाज को दर्पण दिखाने का साहस कबीर और रामरती जैसे मनुष्य  कर सकते हैं लेकिन ऐसे मनुष्य  इस समाज में जन्मते कितने हैं?

अनपढ़ रामरती भी और उसका अनपढ़ कबीरपंथी पिता भी ठीक ही कहता था कि कि एक ओर तो अमोल मानुष जीवन और दूसरी ओर उसी अमोल को खोने की हजारों युक्तियों का वर्णन शास्त्रों में ! उसी अमूल्य  को खोने में जीवन गारत करने के लिए आदेश हैं शास्त्रों में कि पुनः जन्म न लेना पड़े ! और विवाह बंधन में बंधते हुए शास्त्रानुसार ही अगले सात जन्मों तक जीवित रह कर बार-बार पति-पत्नी बनने के वचन ले कर-दे कर पुनः जन्म लेने की तैयारियां करता मनुष्य  ! रामरती और उसका पिता शास्त्रों के अन्य एक अनर्गल पोल को कदाचित जानता ही न था कि इन्हीं शास्त्रों और शास्त्रमर्मज्ञों के अनुसार मृत्यु का भय यदि हो तो-‘‘ऊॅं त्रयम्बक यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम ।  उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्शीय मामृतात।।’’ नाम के महामृत्युंजय मंत्र का जाप करने से मृत्यु दूर भाग जाती है. क्यों भई ,मानुष जून से छुटकारा दिलाने के लिए जब मृत्यु आ ही रही है तो उसका स्वागत करना शास्त्रसम्मत है. इस जन्म से जितना शीघ्र छुटकारा मिले उतना ही उत्तम है,यही इस मानुष जीवन का पृथम और अंतिम उद्देश्य है शास्त्रों के अनुसार. अधर्मी ही इस जीवनकाल को लंबा बढ़ाने की मूर्खता कर सकते हैं. संतू कदाचित शास्त्रों पर तनिक सा भी विश्वास न करके सात जन्मों के वाहियात फलसफे को धता बता कर रामरती से छुटकारा पा गया था लेकिन इस ‘महामृत्युंजय मंत्र’ को न जानने की भूल वह भी कर ही बैठा था,जानता होता तो ‘ महामृत्युंजय मंत्र ’ का जाप करा कर कुछ दिन और रामरती के मानस पर दाल दल सकता था.
 
बाहर बुजुर्ग प्रतीक्षा  रहे थे और दिन ढ़लने को था. वे अब और प्रतीक्षा  न कर सकते थे. सूरज डूबने से पूर्व ही मृत शरीर का अंतिमसंस्कार करने का विधान है शास्त्रों में. मैंने भी और भाभी रामरती ने भी कुछ ही क्शणों में बाहर से आती बुजुर्गों की आवाज सुनी  -‘‘ अच्छा होता दिल्ली में ही संतू का अंतिमसंस्कार हो जाने देते. चलो भाईयो, अब इस अभागे की ‘अंजल-मंजल’ तो करनी ही होगी.’’

सुन कर और एक बार रामरती की आंखों से आंसू ढ़लक कर उसके सूखे गालों पर बहने लगे. संतू अंततः जा ही  रहा था रामरती को छोड़ कर लेकिन इस बार कभी न लौटने के लिए. मैं स्तब्ध था. भाभी रामरती के सामने बैठा हिम्मत भी न जुटा पा रहा था कि बाहर जा कर उनसे कुछ कहूं जो संतू को ले जा रहे थे. पथराई आंखों से रामरती उस बंद दरवाजे को देख रही थी जिसके पार संतू को ले जाने की तैयारियां लोग कर रहे थे. बाहर सुगबुगाहट बढ़ गई थी. और फिर ‘राम नाम सत्त है..... सत्त बोलो गत्त है..... राम नाम सत्त है....’ सुनते ही रामरती धरती पर गिर कर हिचकियां ले कर रोने लगी. उसने कुछ क्षण प्रतीक्षा  की कि संतू चला जाय. आवाजें जब दूर जा कर बिल्कुल क्षीण  हो गई तब वह दरवाजा खोल कर वहां जा खड़ी हुई जहां संतू की मृत देह रखी गई थी. धरती पर बैठ कर उस धरती को हाथों से टटोलने लगी जहां संतू की मृत देह रखी गई थी. इस बार जोरों से रोना शुरू कर दिया उसने. लेकिन वह किसी विधवा का विलाप न था. बस,रोदन था एक.

विधान -अनुसार स्त्रियां शमशान में अंतिम संस्कार के समय नहीं जा सकतीं सो घरों से बाहर निकल कर स्त्रियां उसके विलाप को सुन और देख कर हैरत भरी निगाहों से उसे देखने लगीं.
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