‘‘अनाघ्रातम पुष्पम, असूर्यंपश्या से रमणेषु रम्भा तक’’

संध्या सिंह
विभागाध्यक्ष ‘हिन्दी’ डी0ए0वी0पी0जी0 कालेज लखनऊ. संपर्क :sandhyasinghdr1@gmail.com
इस लेख में कोशिश की गई है  स्त्रीलेखन के बहाने मानव सभ्यता के सबसे पुराने विवाद से साक्षात्कार की । आॅखें मूंदने से काम नहीं चलने वाला। शुतरमुर्ग को रेत से सर निकालना ही है क्योंकि आॅंधी तो आ चुकी है। क्या है यह विवाद जिसे पितृसत्ता, धर्म और बर्चस्व - दासता के गणित ने सदियों से एक आवरण से ढक रखा है।|

विवाद इस मान्यता का है कि पुरूष प्राकृतिक रूप से बहुगमन (पाॅलीगेमी) के लिये बना है और स्त्री एकनिष्ठता(मोनोगेमी)  में ही सुख-दुःख पाती है। - कि यह प्रवृत्ति देश-काल -परिस्थिति जन्य नहीं प्राकृतिक है। पड़ताल के कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं कि प्रेम को देह से पृथक कैसे करेंगे! और देह से मानव को पृथक कैसे करेंगे! और प्रेम और मानव से साहित्य को पृथक कैसे करेंगे सम्भव नहीं है। साथ ही सामाजिक संरचना और विधि निषेध का इतिहास तो है ही पृष्ठ भूमि में। तमाम उतार-चढ़ाव और पड़ावों से गुजर कर हमारा साहित्य आज जिस मुकाम पर है, उसके फलक पर एक तरफ है पुरातन संस्कृति के प्रति रूमानी आदर्श दृष्टि, दूसरी तरफ अतीत के विधि निषेधों से असहमत होने के लिये तत्परता से सहमत समूह और उनके बीच खड़ी स्त्री की वास्तविक व्यावहारिक समस्याएं-सपने। आज स्त्री प्रश्न इन तीनों बिन्दुओं से टकरा रहा है। वर्तमान परिदृश्य पर अकादमिक बहसों की निरर्थकता भी है (अपवाद भी है) बौद्धिक वाग्जाल भी है और निजी संस्थाओं के सार्थक निर्रथक प्रयास भी हैं। कुछ नहीं बदला या यह विमर्श कुछ खंगाल नहीं पाया  यह तो कहा ही नहीं जा सकता पर आज मानव सभ्यता जिस मुहाने पर आ खड़ी हुई है,  उसकी आधी दुनिया अपनी यात्रा के जिस पड़ाव पर है,  वहाँ से आगे भी रास्तों का एक जाल है जैसा पीछे था। ज्ञात अतीत से दोनों तरफ के उद्धरणों की फेहरिस्त दी जाती रही है। अपने विश्वासों, सुविधाओं , मनोभावों के अनुरूप, उन्हें पुष्ट करते हुए एक तरफ स्त्री के महिमामण्डन की और दूसरी तरफ उसके प्राकृतिक रूप से दोयम दर्जे का होने की। पुराण, कुरान, हदीस, मनुस्मृति, रामायण आदि के उद्धरणों की यहाँ आवश्यकता नहीं है। जिस तरह आजका पढ़ा - लिखा समुदाय पश्चिम के नारीवादी आन्दोलन के प्रमुख सोपान, हिन्दुस्तानी स्त्री मुक्ति आन्दोलन पर उसका प्रभाव, कमोबेस जानता ही है वैसे ही इतिहास के-सुविधाजनक प्रसंगों की भी उसे जानकारी है ही!

बात स्त्री की जैविकता - देह से गुजरते हुए उसके अस्तित्व और अस्मिता पर आ टिकने की है। स्त्री अस्मिता के प्रश्नों की पड़ताल का एक प्रमुख धरातल स्त्री लेखन में प्रतिबिम्बित स्वप्न और यथार्थ हैं। जो पैमाने और जो मापदण्ड बने बनाए हैं, उनके आधार पर अधिकांश स्त्री लेखन के स्वप्न अधिक रूमानी (अमूर्त) और यथार्थ अधिक कठोर (पतनशील) है। वे मापदण्ड इसका ठीकरा पश्चिमी तर्ज के नारीवाद के भारतीय महिला लेखन पर गहरे प्रभाव के सर पर फोड़ते हैं। पिछले दो दशक का महिला लेखन आग और पानी साथ लेकर चल रहा है, पर यह परिणाम है। कारण पीछे है। ज्ञात अतीत के आखिरी छोर पर कहीं न कहीं इसका बीज है। जब मानव सभ्यता के इतिहास में स्त्री मानव होने की गरिमा से वंचित कर दी गई। यह गहरे शोध का विषय है कि वह कौन सा प्रस्थान बिन्दु था जब धर्म ने स्त्री की यौन शुचिता को परिभाषित और नियंत्रित किया और उसका वस्तुकरण कर दिया। दूसरी तरफ 1789 की फ्रांसीसी क्रान्ति के बाद 1792 में मेरी बुलैस्टन क्राफ्ट की कृति ‘‘द विंडिकेशन आॅफ द राइट्स आॅफ वीमेन’’ को नारीवाद की पहली लहर माना जाता है। उत्तर मार्क्सवादी  नारीवाद, उग्र नारीवाद है। राधा कुमार की ‘‘स्त्री संघर्ष का इतिहास’’ भारत में सन 1800 से 1990 तक के नारीवादी आन्दोलनों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करती है और इस भ्रम पर जबरदस्त प्रहार करती है कि ‘‘भारत में नारीवाद एक अप्रासंगिक पश्चिमी - आयात है जो प्रथभ्रष्ट भारतीय स्त्रियों द्वारा किया गया है।’’1 पुस्तक के ‘उन्नीसवीं सदी’ वाले अध्याय में सती प्रथा और विधवा विवाह के प्रसंगों 2 से गुजरते हुए अनायास अज्ञात हिन्दू महिला (सीमंतनी उपदेश ) और दुखिनी बाला (सरला: एक विधवा की आत्म जीवनी) की रचनायें बीज के बाद भ्रूण की तरह सामने आती हैं। रोहिणी अग्रवाल मानती हैं कि ‘‘मीराबाई के बाद अज्ञात हिन्दू महिला हिन्दी की दूसरी स्त्री विमर्शकार है जो पातिव्रत्य धर्म की चुधियाती रोशनी के पीछे छिपे जानलेवा अंधेरों को साफ-साफ देख सकी है। उनकी दृष्टि में विघटित सम्बन्ध का कारण है पुरूष का व्यभिचारी स्वभाव विवाह का अर्थ यदि पति की लातें खाकर उन चरणों को पूजना है तो अज्ञात हिन्दू महिला डट कर इस विवाह संस्था का विरोध करती है.3 उनका कड़वा सच तत्कालीन स्त्रियों को आगाह करता है ‘पंडित लोग स्त्रियों को पतिव्रत महात्म्य सुनाकर दबाते हैं और पुरूषों को कोकशास्त्र और नायिका भेद की रसीली चर्चाएं सुना कर बेबस - अवश स्त्रियों को बाजार में बैठा कर व्यभिचार कराते हैं।’’ (सीमंतनी उपदेश पृ0 112) 4 बहरहाल, भड़काऊ अंदाज में कड़वा सच बोल- लिख कर स्त्रियों को उकसाने (चेतन करने) के अपराध में अज्ञात हिन्दू महिला ने एक लम्बे अरसे तक हिन्दी साहित्य से निर्वासन का दण्ड तो भोगा ही।’’5 अज्ञात हिन्दू महिला का सर्वसमावेशी आवेश और दुखिनीः बाला का प्रशांत गाम्र्भीर्य हिन्दू धर्म और पितृसत्तात्मक व्यवस्था के पुनर्मूल्यांकन की मांग करते हैं।’’6 रोहिणी प्रश्न उठाती हैं ‘‘स्त्री की सामाजिक स्थिति में सुधार के लिये कानूनी अधिकार मांगता नवजागरण कालीन हिन्दी समाज स्त्री स्वरों से इतना भयभीत क्यों हो गया कि उनके साहित्यिक अवदान के साथ-साथ उनके नाम को भी ‘‘खा’’ गया । ऐसी कौन सी वर्जनाएं और दबाव बनाए कि उन्हें नाम से नहीं, वरन बंग महिला, अज्ञात हिन्दू महिला, दुखिनी बाला सरीखै विशेषणों के साथ जाना गया ? ..... नव जागरण कालीन पुरूष मानसिकता भले ही अपने युग की स्त्रियों के अधिकारों की सीमा तय करने के विवाद में अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं कर पा रही थी लेकिन क्या हमारा अपना युग उनकी संकीर्ण द्वन्दों पूर्वग्रहों और तिरस्कार उपहास सही-सही व्यापक पाठक समाज के समक्ष ला रहा है।’’7

कुमार संतोष की चित्र  श्रृंखला ' युग्म' से 
मृणाल पाण्डे नारी-लेखन के सन्दर्भ में 
लिखती हैं - ‘‘ पाठक - समीक्षक प्रायः नारी आन्दोलन को या तो सम्पन्न सवर्ण लेखिकाओं का पीड़ा - विलास या दलित और वर्णाश्रम  विरोधी आन्दोलनों का ही एक नन्हा अनुपूरक साबित करने की हड़बड़ी में दिखाई देते हैं।8 जबकि निकट अतीत का बाहरी और आन्तरिक दुनिया का आलोड़न स्त्री लेखन को लगातार प्रयोगधर्मी बनाता रहा है।’’ समाज की गहराई में पैठ कर भी भटकन और असंपृक्ति महिला - लेखन की ही नहीं पूरे आधुनिक लेखन की समस्या है।’’9 इस भटकन और असंपृक्ति से परे अपने गहरे शोधपरक लेख में राहिणी अग्रवाल स्त्री देह और उसके उपभोग पर उसके अपने स्वामित्व पर उठती आपत्ति (मुझे चाॅद चाहिये की वर्षा वासिष्ठ के सन्दर्भ में ) पर ध्यान आकृष्ट करती है। ‘‘वस्तु से व्यक्ति और व्यक्ति से व्यक्तित्व- संधान का लोमहर्षक संघर्ष यदि किसी प्रायोजित साजिश के तहत पुनः वस्तु में तब्दील कर दिये जाने का लुभावना उपक्रम बन कर रह जाये, तो अनापत्ति होगी ही।’’10 इस प्रायोजित साजिश के अन्दरूनी घटक क्या हैं- भूमंडलीकरण , बाजार (पूंजी) मीडिया, स्वतंत्रता का छद्म चारा (उग्र नारीवाद  इसे पुराने परिवार, विवाह, धर्म यानि पितृसत्ता के नए बदले रूप में देख रहा है) . रोहिणी लिखती है ‘‘अनादि काल से साहित्य (लोक परम्परा सहित ) मीडिया का सशक्त रूप रहा है, इसने स्त्रियों की जिन छवियों को रचा है, उन्हें बीसवी शताब्दी की शिक्षा और समानाधिकार की लहर तथा इक्कीसवीं शताब्दी की सनसनीखेज तकनीकी क्रान्ति भी नहीं बदल पाई है।’’11 मीडिया ने ‘‘सर्वगुण सम्पन्न’’ ‘‘षड्गुणवती’’ का जो तिलस्म रचा है, उसे आज महिला लेखन तोड़ रहा है। अनामिका जिजीविषा (फ्राॅयड जिसे लिबिडो कहते हैं) के अतिरेक को सृजनात्मकता का मूल मानते हुए कहती हैं कि हर कलाकार के पास एक वैकल्पिक दृष्टि होती है जो उसे व्यवस्था विरोध तक खींच ही लाती है।’’ ‘‘और व्यवस्था - विरोध की यही बदमाशी जब स्त्रियां करती हंै तो उनकी मिट्टी पलीद करना और भी आसान हो जाता है।‘‘12

2004 सितम्बर के हंस में विख्यात-कुख्यात राजेन्द्र यादव प्रेम चन्द के नाम से जुडे़ कहानी पुरस्कार ( जो अन्ततः दिया नहीं गया) के सन्दर्भ में ‘‘लिखते हैं - मगर ये पांचों कहानियां आश्चर्यजनक रूप से उसी कथ्य को लेती हैं जिसे आज ‘स्त्री विमर्श’ कहते हैं, इतना ही नहीं स्त्री- देह इनके केन्द्र में है। इनमें तीन स्त्रियों की लिखी हैं।’’ ‘‘पुरूष द्वारा नियंत्रित उसकी देह और अनिवार्य रूप से जुड़ी यौनिकता को पुर्नपरिभाषित करने की मांग स्वयं स्त्री की ओर से उठाई जा रही है।’’ 13 इसके बरक्स सूरज पालीवाल इसे भूमण्डलीकरण के प्रभाव के रूप में देखते हैं। ‘‘मुझे चाॅद चाहिये’’ ‘‘आवां और ‘चाक’ के कथानकों के सन्दर्भ में वे लिखते हैं ‘‘ऐसी गलतियाँ हम जानबूझ कर करते हैं, जिससे उन शक्तियों को ताकत मिले जो स्त्री लड़ाई को यौन मुक्ति तक ही सीमित रखना चाहते हैं। बहुत सारी लेखिकाओं के नाम गिनाने की यहाॅ आवश्यकता नहीं है, लेकिन क्या वजह है कि वे सब यौन सम्बन्धों की स्वतन्त्रता को ही स्त्री स्वतंत्रता मानती हैं।‘‘14

जाहिर है समय का अन्तराल आपसी संवाद की पुरजोर वकालत करता है, क्या है आज का जटिल ‘सच’ जो लेखन और स्त्री लेखन को भी ऐसा धरातल दे रहा है जहाॅ भोक्ता और साक्षी को पृथक करना सम्भव नहीं।’’ तेजी से फलांगते वक्त में आज एक साथ कई युग और संस्कृतियाँ जी रहे हैं हम। इक्कीसवीं सदी की ग्लोबल लेस्वियन और गे कल्चर के बरक्स है प्रेमी युगल की हत्या करता बर्बर कबीलाई अभिमान, सनसनी, रोमांच और ग्लैमर की चंुधियाती रोशनी के बरक्स है जहालत, अज्ञान और पिछड़ापन1’’15 इन्हीं के बीच, इन्हीं के साथ रचनाधर्मिता के नए चुनौती देते आयाम विकसित हो रहे हैं।

देह पर स्वामित्व, उसका उपभोग सम्बन्धों की नई जमीन गढ़ रहा है और जाहिर है यह समाज के परम्परागत विधि निषेधों को तब और चुनौती दे रहा है जब उसके साथ ‘बेवफाई’ जुड़ जा रही है। मन्नू भंडारी की ‘‘एक कहानी यह भी’’ की समीक्षा के अन्त में मैनेजर पांडे मन्नू जी से एक पात्र के लिये परानुभूति या समानुभूति से न सोच पाने का गिला करते हैं। जाहिर है वह पात्र है मन्नू के पति राजेन्द्र यादव की प्रेयसी ‘मीता’। सुधा अरोड़ा प्रश्न पूछती हैं - क्या पति अपने रकीब को सहानुभूति देंगे? ‘अन्या से अनन्या’ के सन्दर्भ में ‘जन्नत की हकीकत’ जानने वाले कलकत्ता के साहित्यकारों से भी सुधा अरोड़ा पूछती हैं कि ‘अन्याओं’ से सम्बन्ध रखने वाले अधिकांश लेखक की बीबियों की पीड़ा अनकहीं क्यों है? ‘‘लेकिन इसका क्या किया जाए कि हिन्दी साहित्य में आलोचना क्षेत्र के अधिपतियों की आस्वाद ग्रन्थि में जादुई यथार्थ (मैजिकल रियलिजम) के बदले आभासी यथार्थ (वचर््युअल रियलिज्म) का चस्का लग गया है। ........... ताकि बौद्धिक लंपटई का साहित्यीकरण कर सकें।16 बात फिर वहीं आती है। विभूति नारायण राय नया ज्ञानोदय में साक्षात्कार में  बिना नाम लिए विभूति ‘‘नमो अन्धकारम’’ के नायक (!) के लिए कहते हैं ‘‘लेखक ऐसे पुरूष का प्रतिनिधि चरित्र है जिसके लिये स्त्री कमतर और शरीर से अधिक कुछ नहीं है।’’17 आगे विभूति कहते हैं - ‘‘महिला लेखिकाओं द्वारा बडे़ पैमाने पर अपनी यौन स्वतंत्रता को स्वीकारना पावर डिसर्कोस का भाग बनने की इच्छा है। आप ध्यान से देखें - ये सभी लेखिकाएं उस उच्च मध्य वर्ग या उच्च वर्ग से आती हैं जहाॅ उनकी पुरूषों पर आर्थिक निर्भरता अपेक्षाकृत कम है।’’18  क्या यह अधूरा सच है? भविष्य उत्तर देगा परन्तु एक ही व्याकरण नहीं हो सकता भिन्न धरातल की स्त्रियों को समझाने का, और ना ही एक ही औजार से सभी मृत परम्पराओं का ‘‘पोस्टमार्टम’’ सम्भव है। याद रहे कि वो कसौटियां भी हमारे इतिहास ने ही दी हैं स्त्री को मापने की, जिसे बदले रूप में आज का बाजार भुना रहा है।

सन्दर्भ:-

1. स्त्री संघर्ष का इतिहास - राधा कुमार - पृ0 374 वाणी प्रकाशन
2. वही - पृ0 48
3. बहुवचन अक्टूबर - दिसम्बर 09 नव जागरण: स्त्री-प्रश्न और हिन्दी साहित्य - रोहिणी अग्रवाल पृ0 200
4. वही - पृ-208
5. वही - पृ-201
6. वही - पृ-208
7. वही - पृ-209
8. हंस 8 मार्च 2001 - अन्दर के पानियों का सपना - मृणाल पाण्डे - पृ-70
9. वही  - पृ-71
10. वही-आकाश चाहने वाली लड़की के सवाल - रोहिणी अग्रवाल - पृ-172
11. वही - पृ-170
12. हंस - नवम्बर 2000 परख अनामिका पृ-93
13. हॅस - सितम्बर - 2004 - मेरी-तेरी उसकी बात पृ-8
14. अन्यथा अप्रैल 2005-पृ-107
15. कथाक्रम - जुलाई-सितम्बर-2008 - रोहिणी अग्रवाल-पृ-160
16. हंस-अगस्त 110-कठघरे में - पृ-131
17. नया ज्ञानोदय - अगस्त-10-पृ-32
18. वही - पृ-33
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