पत्नी कुमकुम की नजर में उदय प्रकाश

उदय प्रकाश के बारे में उनकी पत्नी कुमकुम से सुधा उपाध्याय की बातचीत पर आधारित 

जैसे यादों का कोई सिलसिला नहीं होता, वो कभी भूत भविष्य और वर्तमान देखकर नहीं आतीं...वैसे ही मैं जब उदय प्रकाश जी की पत्नी कुमकुम जी से मिलने गई और उन्हें कुरेदने की कोशिश की तो जैसे यादों का सैलाब सा आ गया....जो तकरीबन दो से ढाई घंटे चलता रहा....इस सैलाब में जब जो कुछ बेहद औपचारिक तरीके से मैंने शीतलवाणी में उदय प्रकाश पर निकलने वाले विशेषांक के लिए कुमकुम जी से उदय प्रकाश: घर और बाहर दोनों को करीब से जानने की कोशिश की तो धीरे-धीरे मुझे ढेर सारा खजाना मिलता गया....वैसे तो कुमकुम जी बेहद संयत, संयमित और संतुलित लगीं पर वो भावुक होने के नाते जितनी बार डूबती उतराती रहीं मैंने उनका पूरा साथ निबाहा....
कुल जमा पूंजी के रूप में मुझे इस जोड़े की सबसे बड़ी खूबी जो व्यक्तिगत तौर पर पसंद आई वह थी सामंजस्य और सहधर्मिता की भावना...जिसके कारण उदय प्रकाश एक बहुमूखी प्रतिभाशाली व्यक्तित्व हैं जो कई कोणों को एक साथ जीते हुए निरंतर सर्जना में रत एक सफल मुकाम पर हैं....आइए आपसे उसी बातचीत का अंश साझा करती हूं...इस बेहद अनौपचारिक बातचीत में कई जरूरी पहलुओं पर बात होगी....
उदय प्रकाश और कुमकुम जी की पहली मुलाकात/ उनका विवाह/विवाह में आने वाली अड़चनें/ उससे जुड़ी कुछ रोचक घटनाएं/ गांव परिजन बच्चे/ उदय प्रकाश का लेखन और फिल्म निर्माण/ बढ़ता परिवार और बढ़ती जिम्मेदारियां/ कुमकुम जी की पसंदीदा कहानियां/ पुत्र-पुत्रवधू, पोते-पोतियों से भरा पूरा परिवार/ जो कुछ अबतक उदय प्रकाश पर अप्रकाशित रह गया है उन सब पर खुलकर बातचीत का हिस्सा...
                                                                                                                                सुधा उपाध्याय 


उदय प्रकाश ,कुमकुम 
उदय प्रकाश की पत्नी के रूप में जब मैं बीते हुए कल का आकलन करती हूं तो सारी सुधियां ताजी हो जाती हैं....आप सब जानते हैं उदय प्रकाश की सबसे बड़ी ताकत है उनकी स्मृतियां....वे अपने जीवन से जुड़े गांव, घर, परिजन, चीजें, चरित्र और उन सबसे जुड़ी बातों को कभी भूला नहीं पाते....ठीक वैसे ही उदय प्रकाश जी से पहली बार मिलन की यादें आज भी मेरे जेहन में ताजा हैं....आज भी रह रहकर याद आते हैं वो ओपन एयर थियेटर, क्लासेज के बाद बैडमिंटन खेलना, छोटे-बड़े स्टेज शो, समूह में बैठकर गाना, पेंटिंग्स, छत्तीसगढ़ी गानों का प्रस्तुतिकरण...खुद उदय प्रकाश जी का टेबल बजाकर गाने का वह दृश्य जैसे कल ही की बात हो.... उदय प्रकाश जी को स्पेनिश लिटरेचर से बहुत लगाव था...धीरे-धीरे वही बहाना खींचकर मेरे पास ला रहा था....मुझे म्यूजिक का शौक भी उदय प्रकाश जी के कारण हुआ...जब इन्होंने स्टेज शो के लिए छत्तीसगढ़ी गाने सिखाए....उनका वह शादी के लिए प्रस्ताव देना और मेरा उन्हें केवल मित्र के रूप में स्वीकार करना उन्हें अखर गया और वे गांव चले गए.... उदय प्रकाश के गांव जाने पर पहली बार मुझे खालीपन लगा....मैंन छोटा सा शंख उन्हें पोस्ट किया...पता नहीं उसका उदय प्रकाश पर क्या असर हुआ....पर वह जब गांव से लौटकर आए तो धीरे-धीरे मेरा साहस भी बढ़ा....

बात विवाह तक पहुंची....चूंकि हम तीनों यानी मेरे पापा श्री भटनागर, स्वयं उदय प्रकाश और मैं उन दिनों जेएनयू(जवाहर लाल यूनिवर्सिटी) में ही थे....इश्क और मुश्क छिपाए नहीं छुपते...मित्रों और शत्रुओं की तादाद बढ़ती गई...मेरे विवाह को लेकर पापा के मन में तीन तरह का डर मौजूद था...क्योंकि इधर उधर से फिजाओं में उदय प्रकाश से जोड़कर मेरी बातें हो रही थीं...पापा आधुनिक विचारों के थे... उदय प्रकाश जी को पसंद भी करते थे....पर व्यक्तिगत तौर पर उनके विषय में बहुत कुछ नहीं जानते थे....पहली चिंता जाति को लेकर थी, जिसे वे जीवन भर नकारते रहे...और कहते थे मैं कोई ऑर्थोडॉक्स नहीं...मुझे कास्ट की कोई परवाह नहीं...पर यह मेरे घर से ही क्यों शुरू हो...दूसरी वाजिब चिंता थी लड़का अभी कुछ करता ही नहीं....यानी लोगों की कहासुनी से यह साफ था कि क्या खिलाएगा, कैसे रखेगा.....और तीसरी चिंता यह भी थी कि कहीं गांव में ही इसका विवाह न हो गया हो....क्योंकि कानूनी पहले विवाह को ही स्वीकारोक्ति देता है....

सम्बन्धों को लेकर उदय प्रकाश जी हमेशा पारदर्शी रहे...प्रेम विवाह को सफल करने का बीड़ा उठा चुके थे....सो कोर्ट मैरिज की तारीख निकलवाई....चूंकि कानून का यह नियम होता है---एक महीने का समय तिथि से पहले दिया जाता है...हमारे निकटतम मित्रों में से किसी ने पापा को जाकर यह बात कह दी....और तिथि उनके दिमाग में कौंधती रही....अब याद आता है तो हंसी आती है...कोर्ट मैरिज के दिन परिवार के सभी लोग सतर्क बैठे थे...मुझे जेएनयू भी जाने नहीं दिया गया... उदय प्रकाश जी अपने कुछ दोस्तों को लेकर रजिस्ट्रार ऑफिस पहुंच चुके थे....यहां मुझपर गहरा पहरा था...उस समय न मोबाइल न लैंडलाइन...पड़ोसी के घर जाने की भी इजाजत नहीं थी...तभी किसी फिल्मी पटकथा की तरह मेरी एक मित्र को उदय प्रकाश जी ने मेरे घर भेजा....उसके हाथ में एक किताब थी...किताब में चिंता वाला एक पत्र...कहां हो कबतक आओगी, हम सब वेट कर रहे हैं....मुझे अच्छे से याद है मेरी सहेली से मुझे मिलने भी नहीं दिया गया....मेरे मामा मामी घर पहुंच चुके थे...मेरे विवाह में उन लोगों की अहम भूमिका थी....उन्हीं दिनों उदय प्रकाश से जुड़े मेरे हाथ के लिखे पन्ने घर में मिले, उन्हें बड़ी संजीदगी से पढ़ा गया और मेरे परिवार ने तब समझा कि इधर भी मामला गंभीर है...मेरे दोनों मामा उदय प्रकाश जी से मिलने गए...जब लौट कर आए तो पापा को यह कहकर समझाया कि आंख मूंदकर सम्बन्ध बना लीजिए....अपनी कास्ट में ऐसा लड़का ढूंढने से भी नहीं मिलेगा....चूंकि यूनिवर्सिटी पंद्रह जुलाई से खुलती है इसलिए हम तीनों ने यह विचार बनाया कि नौ जुलाई को विवाह फिक्स हो जाए....ताकि भीड़ से बचा जा सके... उदय प्रकाश जी से जब परिवार ने पूछा—बारात की तरफ से कुल कितने लोग आएंगे, तो इन्होंने कहा सात से दस...जबकि विवाह में पूरा जेएनयू शामिल था...पापा का सर्किल उदय प्रकाश का और मेरा....बुलाया कि नहीं बुलाया सब आए...उन दिनों उदय प्रकाश जी इलेक्शन में लड़े थे इसलिए वीसी से लेकर चपरासी तक सब बारात में शामिल थे....

धीरे-धीरे समय गुजरता गया...मैंने घर की समस्याओं को उदय प्रकाश जी से अलग ही रखा...उनकी अतिव्यस्ततम दिनचर्या में एडजस्ट करती रही...उनको कभी घर गृहस्थी से उलझने की टोका टाकी नहीं की....सन 77 में हमारा विवाह हुआ, तब से 2007 तक लगातार मैं अलग-अलग जॉब में रही...क्योंकि मैं खुद को व्यस्त रखना चाहती थी...मैं महत्वाकांक्षी बिलकुल नहीं पर घर परिवार की जरूरतों को ध्यान में रखकर नौकरी करती रही.....एंबेसी में 32 वर्ष तक काम किया....पेरु, मैक्सिको विदेशी भाषाओं का अनुवाद किया, जेएनयू से फ्रेंच की पढ़ाई की...लगभग सोलह वर्ष एनएचपीसी पब्लिक रिलेशन में काम करती रही....इधर उदय प्रकाश लिखने के साथ-साथ फिल्में और डॉक्यूमेंटरी बनाने में लगे रहे....मेरे दो बेटे हैं---सिद्धार्थ और शांतनु.... उदय प्रकाश जी को अपने बच्चों से उम्मीद थी कि वे इस क्रिएटिव टीम में शामिल हो जाएं पर बच्चों को कभी फोर्स नहीं किया...उनकी इसी उम्मीद को ध्यान में रखकर मैंने मैनेजमेंट का सारा कार्यभार संभाल लिया....हालांकि उदय प्रकाश के पास एक बड़ी टीम थी पर मैं जब भी उन्हें अकेला पाती थी उनसे जुड़ी रहना चाहती थी...फिल्में, साहित्य और पब्लिक रिलेशन में मेरी रुचि उदय प्रकाश जी के कारण ही आई...मैं उदय प्रकाश जी को लेकर काफी पजेसिव हूं....बस सबकुछ ठीक चलता रहे, उन्हें उनके किसी काम में डिस्टर्वेंस न हों, इसलिए कभी कोई असंतोष या सवाल नहीं करती....करीब आने वाले लोगों को देखने का जो नजरिया उदय प्रकाश, मैं भी उसी नजर से देखने लगती हूं....

कुमकुम 
शुरू में फानेंसियली बहुत सी दिक्कतें रहीं....पर मेरी संतुष्टि इसी में है कि उन्होंने मेरे साथ, सहयोग और साहचर्य को स्वीकारा...मैंने घर में उदय प्रकाश को संभाला है बाहर तो इनके प्रशंसक ही इन्हें संभालते हैं क्योंकि उनकी सारी चाहत, उम्मीद, इच्छा, आकांक्षा सब पाठकों से ही जुड़ी है... उदय प्रकाश जी को जितना समझी हूं उनके लिए उनके पाठक और दोस्त सबसे ज्यादा मायने रखते हैं....मुझे उदय प्रकाश जी के किसी अफेयर से असुरक्षा नहीं लगती....बस वे सुरक्षित रहें, स्वस्थ रहें और आसपास रहें....

मुझे से कई बार पूछा जाता है मुझे इतनी भाषाओं का ज्ञान है..स्पेनिश, पुर्तगीज, इंडोनेशियन, फ्रेंच इन भाषाओं में मैने उदय प्रकाश जी की कहानियों का अनुवाद क्यों नहीं किया....तो मैं हंसकर यही जवाब देती हूं कि क्योंकि उदय प्रकाश ने मुझे खुद नहीं कहा.... उदय प्रकाश में एक जिम्मेदार पति टूटकर प्यार करने वाला पिता, अपने व्यस्ततम दिनचर्या के बावजूद हमारी जरूरतों का ध्यान रखने वाला मुखिया, घर की मांग, पत्नी की मांग, बच्चों की मांग कहने से पहले पूरी हो जाती है...विवाह के एक वर्ष बाद ही इनके गांव परिवार से हमें बुलावा आया....भले ही मेरा जन्म दिल्ली में हुआ हो, पिता जेएनयू में और मां स्कूल में टीचर थीं, पर मुझे ससुराल में जो इज्जत लाड दुलार मिला कि मैं अपनी पहचान मध्य प्रदेश में ही ढूंढती हूं और वहां का कहलाने में फक्र महसूस करती हूं...

उदय प्रकाश जी की लगभग सब कहानियां लिखने के दौरान और लिखने के बाद आधी-अधूरी ही सही चोरी चुपके ही सही, मैंने पढ़ी हैं....पर मुझमें धैर्य और सहनशीलता नहीं क्योंकि इनकी कहानियां बेहद लंबी होती हैं....कई बैठकों में पढ़ने वाली....मुझे इनकी छोटी-छोटी कहानी, जैसे—डिबिया, नेलकटर, अपराध बेहद पसंद है...इसका कारण है, इन कहानियों में अपने परिवार के ही लोग झलकते हैं....परिवार से जुड़ी कहानियों में पिता भाई, बहन मां सभी इनके करीबी चीन्हे पहचाने, सच्ची घटनाओं और सच्चे चरित्रों पर आधारित....इनकी तस्वीरें देखती हूं और कहानी के पात्रों से तारतम्य बनाती हूं तो सम्बन्धों को पहचानने लगती हूं....मैंने उदय प्रकाश के मां-पिता को तो नहीं देखा....क्योंकि वे मेरे आने से पहले ही जा चुके थे...दुर्भाग्यवश दोनों का देहांत कैंसर की बीमारी से हुआ....ना मालूम क्या बात है इनके जितने करीबी लोग हैं उनमें या उनके परिवार में किसी न किसी को कैंसर की बीमारी रही...बाबा, बुआ(दादी) और मां....सबका देहांत कैंसर से ही हुआ....हम समझते हैं मध्य प्रदेश में जो तंबाकू खाने का जो चलन है हो न हो वही कारण हो....

मां के देहांत के बाद ग्यारह वर्ष के उदय प्रकाश अकेले और असुरक्षित शैडोल (मध्य प्रदेश) आकर बस गए....पिता, भाई, बहन सबसे दूर वहां मोहन श्रीवास्तव जी जो एक स्कूल टीचर थे उनकी सहायता और संरक्षण में इन्होंने लिखने पढ़ने का काम आगे बढ़ाया...अपने व्यवहार में जो मैं ये एडजस्टिंग नेचर पाती हूं, शायद इसी कारण क्योंकि वह ग्यारह वर्ष का बालक मां से महरूम, पिता भाई बहनों से दूर जीवन भर प्यार और सुरक्षा की तलाश में रहा....अपने सहयोग और साहचर्य से यह सामंजस्य बिठाने में मैं कहां तक सफल रही यह उदय प्रकाश पर छोड़ती हूं...परिवार में बेटी न होने का अहसास उदय प्रकाश जी को खलता रहा...पर पोती के आ जाने पर वे बेहद खुश हुए....और परिवार भरा पूरा हुआ....

उदय प्रकाश जी से मैं केवल यही पूछना चाहती हूं कि उनकी कहानियों का फलक इतना बड़ा है...विविध रंग रूप के चरित्र पात्र हैं...सभी तरह के सम्बन्धों के शेडस हैं...मां-पिता, भाई-बहन, मित्र-यार परिजन...सबकुछ देखने को मिलते हैं....पर इन कहानियों में पत्नी पर आधारित न विषय बनाकर, न चरित्र के रूप में कोई कहानी देखने को क्यों नहीं मिलती?  भविष्य में उम्मीद करती हूं उदय प्रकाश जी की कलम से और बहुत सी मानवीय संवेदना की गहराईयों को छूती हुई कहानियां निकलेंगी....जिनमें उनकी सहचर्या, सहधर्मिनी पत्नी भी मौजूद होगी. 
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