स्त्रीवादी क़ानूनविद ( वकील साहब ) का ट्रायल

स्त्रीवादी क़ानूनविद  और आलोचक अरविंद  जैन से मनीषा कुमारी की बातचीत 

स्त्रीवादी कानून सिद्धांत ( Feminist Jurispudence ) पर हिन्दी में काम का ख्याल कैसे आया . आपके सामने ऐसे किसी काम के उदाहरण थे क्या ? 

मैंने थोड़ी-बहुत हिंदी स्कूल में ही पढ़ी थी. स्कूल-कॉलेज के दिनों (1966-1977) में छात्र आन्दोलन से लेकर आपातकाल तक की तमाम बहसों में शामिल रहा हूँ. बाद में वाणिज्य और कानून का विद्यार्थी रहा, सो हिंदी में लिखना कठिन काम था. शुरुआती दौर से लेख, अंग्रेजी में ही लिखता रहा हूँ. 1978-79 में मेरा एक लेख ‘मेनस्ट्रीम’ में छपा था “डोनेशन टू पार्टी इन पॉवर” और कुछ लेख ‘फाइनेंसियल एक्सप्रेस’ और अन्य पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं. कुछ एक के अनुवाद हिंदी और अन्य भाषाओँ में भी.




1980-81 के आसपास मैंने हिंदी में भी लिखना शुरू किया. इसलिए कि आम पाठक कानूनी पेचिद्गिओं को अपनी भाषा में जान-समझ सके. कानून-संविधान और अदालती फैसलों की ‘जलेबीनुमा’ भाषा-परिभाषा पढ़ते-समझते हुए, यह अहसास निरंतर गहरा होता चला गया कि ‘कोख से लेकर कब्र’ तक सारे कानून मूलतः “स्त्री विरोधी” हैं.....“दलित विरोधी” हैं. महादेवी, सावित्री बाई फुले, रमाबाई पंडिता, रुकमाबाई, रेगिना गुहा और अन्य महिलाओं की संघर्ष गाथाएं पढ़ते हुए धारणाएँ और ठोस हुई. उन दिन आई फ़िल्मों  ‘अंकुर’, ‘निशांत’, ‘मंथन’ और ‘भूमिका’ की नायिकाओं ने भी इस दिशा में सोचने-समझने में महत्वपूर्ण दिशा संकेत दिए.

घर-परिवार-समाज में भी स्त्री और विशेष कर दलित स्त्री या बच्चों के प्रति हिंसा, यौन हिंसा, घरेलु हिंसा, हत्या, दहेज़ हत्या, दमन, उत्पीड़न, शोषण, अत्याचार और बर्बरता भी लगातार बढती ही जा रही थी. ‘मथुरा’ बलात्कार मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने तो भीतर तक झुलस दिया था. रही सही कसर “सुधा गोयल दहेज़ हत्या काण्ड” से लेकर “रूपकंवर सती काण्ड” तक में अदालती फैसलों ने पूरी कर दी. पुलिस, समाज, संसद, न्यायपालिका और मीडिया की भूमिका अपने नग्नतम और हत्यारे अर्थों में आमने-सामने थी. परिणाम स्वरुप मेरी चिंता या चिंतन, दलित और स्त्री केन्द्रित होती चली गई.

अरविंद जैन 
'औरत होने की सजा' आपका प्रतिनिधि काम  साबित हुआ और आप टाइप्ड हो जाने की हद तक इस काम से जाने जाते हैं.
समय-समय पर महिलायों और बच्चों सम्बन्धी कानूनों पर लेख लिखता रहा, जो देश के प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए....होते रहे. हाँ! अपने जीवन की तरह ही, इन लेखों को लिखने की भी कोई विशेष ‘योजना’ नहीं थी. आधार सामग्री के रूप में कोई किताब उपलभ्द्ध थी ही नहीं. ईमानदारी से कहूँ तो हिंसा-यौन हिंसा के खिलाफ आये, गुस्से और घृणा का परिणाम हैं ये लेख. संक्षेप में अन्याय, शोषण और दमन के सामने, हैरान-परेशान और असहाय दिल-दिमाग-कलम का कोई ‘संकल्प’ रहा होगा. अब कभी ये लेख पढता हूँ, तो खुद ही विश्वास नहीं होता कि मैंने ही लिखा था.....पता नहीं कब, किसने और क्यों लिख दिया!
अगर कथाकार मित्र अरुण प्रकाश, लेख कांट-छांट कर पांडुलिपि ना बनाते, तो शायद “औरत होने की सजा” (1994) कभी छपती ही नहीं. हाँ! छपने के बाद जब मैंने पुस्तक देखी, तो सचमुच बहुत दिनों तक गहरे अवसाद (खुद से नाराज़ और शर्मिंदा) में रहा कि यह क्या “बकवास-आधा-अधूरा” सा काम छपवा दिया. शायद इस अवसाद से निकलने के चक्कर में ही, “औरत, अस्तित्व और अस्मिता” के लेख लिखे गए होंगे. (हालांकि छपते ही बहुत समीक्षाएं प्रकाशित हुई और हिंदी में एक घटना की तरह लिया गया. बाद में अनेक संस्करण आये और पंजाबी में अनुवाद भी हुई. ‘उत्तराधिकार या पुत्त्राधिकार’ दिल्ली विश्वविद्यालय के बी.ए. कोर्स में पढाया जाता है और ‘यौन हिंसा और न्याय की भाषा’ कई विश्वविद्यालयों के एम.ए. के छात्रों के लिए संस्तुत हुआ.

दोस्तों, वकीलों और न्यायधीशों की क्या प्रतिक्रिया रही?
यह सब लिखने की वजह से अधिकाँश सम्बन्धियों, दोस्तों, वकीलों और न्यायधीशों की ‘आँख में किरकरी’ या असहमति के विद्रोही स्वर सा ही रडकता रहा हूँ. ‘शीतयुद्ध’ सी उपेक्षा और तिरस्कार ने आहत बहुत किया, मगर शुक्र है कि कभी दिशाभ्रमित नहीं कर पाए. धीरे-धीरे सबसे दूर और इस विचार से मुठभेड़ करते-करते, अकेला रहने की आदत सी हो गई. मुख्यधारा के विरुद्ध जाने पर स्त्री को ही नहीं, पुरुषों को भी एकांत या अज्ञातवास झेलना पड़ता है. कुछ ही मित्र ऐसे हैं, जो ‘वाद’-विवाद-संवाद के माध्यम से मुझे हमेशा, इस दिशा में सोचने-समझने-लिखने की हिम्मत देते रहे. अपने और बकीलसा’ब के बीच, ‘मुक्केबाजी’ (लहूलुहान होने की हद तक) अभी भी होती ही रहती है.

आपकी किताब लिखने के समय से अब तक क्या न्यायपालिका की भाषा और मानसिकता बदली है ? ऐसा मैं  इसलिए पूछ रहा हूं कि लोकतंत्र के लगातार मजबूत होने से फर्क पडा हो शायद ?
साफ़ बात तो यह है कि ज्यादातर न्यायमूर्ति या न्यायधीश, हिंदी की किताबें पढ़ते ही नहीं. जो पढ़ते भी हैं, उनकी अपनी सोच-समझ की सीमायें हैं. भाषा थोड़ी जरूर बदली है, पर भाव अभी भी परम्परा के इर्द-गिर्द वहीं-कहीं घूम-घुमा रहा है. इस शिक्षित-शहरी और साधन संपन्न ‘वर्ग विशेष’ की मानसिक बनावट-बुनावट में, बदलाव आने-होने में अभी और समय लगेगा. कहना कठिन है, कितना समय और लग सकता है. इस ‘वर्ग विशेष’ में ‘स्त्री’ और ‘दलित’ के प्रवेश पर ही इतने प्रतिबंध हैं, कि बराबरी का रिश्ता-सम्बन्ध या संवाद संभव नहीं. भीतर कितनी ‘दमघोटू घुटन’ और ‘वर्ग घृणा’ है, वही जानते-महसूसते हैं- जो भीतर तक पहुंचे हैं. अनुमान लगाया जा सकता है कि स्थितियों-परिस्थितियों ने किस कद्र, आत्मा तक पर खामोशी के ताले जड़ रखे हैं.

 न्यायापालिका अपने समय में तय कानूनों से चलती है , उससे किसी ऐक्टिविजम से तो दूर ही रहना पडेगा न , मेरा कहने का आशय है कि यदि संसद किसी सुधार के लिए तैयार नहीं है और न्यायपालिका की चेतना संसद की गति से अधिक आधुनिक होती जाती है , किसी उत्पीडित अस्मिता के प्रति टकराव ही तो बढेगा ? 
मेरा स्पष्ट तौर पर मानना है कि मौजूदा समाज व्यवस्था में किसी भी “सुधार” का सपना या कल्पना, मौजूदा ढाँचे (पितृसत्तात्मक, सामन्ती और पूंजीवादी) में ही ‘फेर-बदल’ तक सीमित हो सकती है. कोई आमूल-चूल परिवर्तन तो होने से रहा. हाँ! कभी-कभार, उदारवादी-सुधारवादी मेक-अप (‘कॉस्मेटिक सर्जरी’/‘विंडो ड्रेसिंग’) होता रहता है. ‘न्यायिक सक्रियता’ के दौर में ‘सफाई अभियान’ के अंतर्गत, विवादस्पद विषयों पर ‘राष्ट्रीय बहस’ की ‘नाटक-नौटंकी’ करवाना भी विवशता है. वर्ग-हितों की रक्षा-सुरक्षा करते हुए, दोनों ही अपनी-अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ खूब अच्छी तरह जानते-पहचानते हैं.

‘न्यायपालिका की चेतना संसद की गति से अधिक आधुनिक’ हो भी जाये तो क्या? किसी भी ‘तनाव-दबाव’ में, संसद को विवश तो नहीं ही किया जा सकता. आखिर, ‘सत्ता’ का स्थाई निवास तो संसद ही है और निसंदेह ‘अंतिम शब्द’ की घोषणा भी वहीँ से होगी. न्यायपालिका सुनाती रहे ‘आदेश-उपदेश’, संसद रातों-रात ‘अध्यादेश’ जारी कर सकती है.  ‘उत्पीडित अस्मिता के प्रति’ अभी तक, ना कभी कोई टकराव हुआ है और ना निकट भविष्य में होने की कोई ‘सम्भावना’ नज़र आ रही है.

मनीषा कुमारी 
'औरत होने की सजा' आपका प्रतिनिधि काम  साबित हुआ और आप टाइप्ड हो जाने की हद तक इस काम से जाने जाने लगे, जबकि उससे कम मह्त्वपूर्ण आपके द्वारा हिन्दी साहित्य की गई समाज शास्त्रीय आलोचना नहीं थी, “औरत: अस्तित्व और अस्मिता” भी हिन्दी मे पह्ले  मुक्कमल स्त्रीवादी आलोचनाओं मे से एक है, लेकिन आपका यह काम उतना ख्यात नहीं हो सका. क्या हिन्दी आलोचना इसके लिए तैयार नही थी , आपको बाहरी मानती रही  या उसके तय मापदंड से आप बाहर थे ? 
शायद मैं ‘पुरुष’ होने के कारण भी ‘बाहरी व्यक्ति’ था और किसी विश्वविद्यालय का ‘प्रोफेसर’ ना होने कि वजह से भी. आलोचना का क्षेत्र, मेरे लिए पूर्ण रूप से ‘वर्जित क्षेत्र’ था. यह काम करते समय या कभी बाद में, मेरी मंशा ‘आलोचना क्षेत्र’ में, किसी भी तरह प्रवेश पाने या ख्याति जुटाने की थी ही नहीं. मुझे एक पाठक की हैसियत से पढने-समझने या टिप्पणी करने के अधिकार से तो वंचित नहीं ही किया सकता. सो मैंने, उतना ही किया.
निश्चित रूप से कुछ सिद्ध-प्रसिद्ध-वृद्ध संपादकों, बौद्धिकों, धनाड्य लेखिकाओं और स्थापित मठाधीशों ने, इसे अपनी ‘घोर अवमानना’ माना-समझा. मगर मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूँ कि मेरी जिज्ञाषा, सिर्फ और सिर्फ महिला-पुरुष रचनाकारों कि कलम के माध्यम से, साहित्य में स्त्री और दलित या वंचित समाज को देखना-समझना भर था.

पढ़ा-सुना था कि ‘साहित्य समाज का दर्पण’ होता है. बिना पढ़े कैसे पता लगता कि साहित्य के दर्पण में, समाज की सदियों पुरानी तस्वीरें- ‘उलटी-कुलटी’ क्यों दिखती हैं......दिख रही हैं. तरह तरह के मोतियाबिंदों से पीड़ित बौद्धिकों को, दलित/स्त्री की पीड़ा ‘प्रामाणिक’ और विचारणीय क्यों नहीं लग रही. ‘बचपन से बलात्कार’ की चीखों की बजाय, सम्भोग के कामोतेज़क ‘बेडरूम सीन’ ही क्यों दिखाई दे रहे हैं. बेशक, निरंतर बदलते समय और समाज में, अगर दशकों पूर्व ‘तय मापदंड’ नहीं बदलते, तो इतिहास के कूड़ेदान में फैंक दिए जाते हैं.

आपके द्वारा की गई आलोचनायें , एक समय  में रची गई  साहित्यिक कृतियों का तत्कालीन समय के सापेक्ष मूल्यांकन करती हैं , ऐसा करते हुए कई बार आप प्रेस्कृटिव हो जाते हैं. यद्यपि महिला रचनाकारों की कृतियों का स्त्रीवाद के पैमाने पर की गई वे बेहतरीन आलोचनायें हैं. 
क्षमा करें, मैं इस बारे में कोई टिप्पणी नहीं करूंगा.

आप तो अपनी आलोचना में रचनाकारों को बाजब्ता कानून का ज्ञान देने लगते हैं , तो क्या लेखक को कानून की किताबें पढकर लिखना होगा ? हालांकि जिन सवालों को ये रचनाकार अपने लिए विषय बना रही थीं , महिला आन्दोलन उन्हीं सवालों के साथ स्थापित कानून से टकरा रहा था , यानी इन रचनाकारों को तो कानून का ज्ञान होना ही चाहिए था. क्या यह समाज से रचनाकारों के कटे होने का परिणाम है ? 
“रचनाकारों को बाजब्ता कानून का ज्ञान” नहीं, बल्कि पाठकों को सामान्य कानून की जानकारी देने का ‘दुस्साहस’ अवश्य किया. कानून की जानकारी के बिना, कानूनी समस्याओं पर लिखना क्या जरूरी है? आपके सवाल में ही, जवाब मौजूद है....खैर, अखबारी कतरनों के आधार पर, अपने सजे-धजे ‘ड्राइंग रूम’ में बैठ कर किसी अर्थपूर्ण ‘रचना’ को जन्म नहीं दिया जा सकता. समाज से संवाद, लगाव और गहरे सरोकारों के बिना, साहित्य की ‘बंजर जमीन’ पर गुलाब की खेती नामुमकिन है. प्रायोजित लोकार्पणों, समीक्षाओं और सिफारिशों के आधार पर, सरकारी या गैर-सरकारी पुरुस्कार, सम्मान, अवार्ड तो बटोरे जा सकते हैं, लेकिन सच मानिए ऐसी किताबें का ‘प्रथम संस्करण’ भी प्रकाशक के गोदाम में पड़ा-पड़ा सड़ जाता है. इन तमाम स्त्री रचनाकारों ने अपने समय और समाज की स्त्री की व्यथा-कथा को, सार्थक अभिव्यक्ति देने का जोखिम उठाया गया है. शेष-अशेष तो भविष्य का पाठक तय करेगा, आलोचक नहीं. आलोचना को हमेशा  ससम्मान असहमति ही माना-समझा जाना चाहिए, बशर्ते कि वो ‘व्यक्तिगत पूर्वाग्रह-दुराग्रह’ से ना लिखे गए हों.  

आपको नहीं लगता कि ये जिस समय की रचनायें हैं, उसके परिवेश के अंतरद्व्न्द्व इनमें व्यक्त होते हैं , क्योंकि ये लेखिकायें खुद अपने पुराने परिवेश से जुडकर बदली स्त्री की कथा कह रही थीं ? 
ऐसा ना होता तो मैं इन पर अपना समय, श्रम और पूँजी क्यों लगाता. सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिवेश के अन्तर्द्वन्द और विसंगतियों के बिना, किसी भी समाज या  समय की स्त्री को रेखांकित करना संभव नहीं.
मैंने ‘बेघर’ पर उपन्यास छपने के २५ साल बाद लिखा था और ममता कालिया जी से कभी नहीं मिला था. बाद में यह लेख ममता जी ने ‘बेघर’ की ‘भूमिका’ के तौर पर इस्तेमाल किया. मेरे लिए यह, दुनिया का सबसे बड़ा ‘सम्मान’ है. परन्तु वस्तुस्थिति यह है कि अधिकांश लेखकों को, आलोचना के नाम पर सिर्फ तारीफ़ चाहिए...तारीफ़. बहुत से ‘महान’ तो अब, मुझसे इतने नाराज़ हैं कि क्या कहूँ!

यह पुरानी पीढ़ी का ही अमूल्य योगदान है, कि पिछले कुछ सालों में साहित्य में भारतीय स्त्री/दलित की स्थिति, छवि, अवधारणा, स्वप्न, आकांक्षाएं, विचार और अभिव्यक्ति के तेवर, काफी हद तक सकारात्मक रूप में बदले हैं....बदल रहे हैं....बदलेंगे.
मेरा मानना है कि किसी भी पसंदीदा रचना के लेखक से, कभी नहीं मिलना चाहिए और रचना का मूल्यांकन, रचनाकार के नैतिक-अनैतिक जीवन से प्रभावित नहीं होना चाहिए.

 कुछ व्यक्तिगत सवाल , जिसके मायने सामाजिक हैं, आपने ‘हंस’ क्यों छोडा ? आप क्या हिन्दी पट्टी में स्त्री और दलित के प्रति सम्वेदनशीता पैदा करने में ‘हंस’ की भूमिका नहीं देखते हैं. 
इस ‘व्यक्तिगत सवाल’ का जवाब मैं जरूर देता, अगर यादव जी हमारे बीच होते. फिर भी इतना ही कह सकता हूँ कि ‘हंस’ छोड़ने का कारण ‘व्यक्तिगत’ नहीं, बल्कि स्त्री-विमर्श को देह-विमर्श की ओर धकेलने पर गंभीर सैधान्तिक मतभेद ही थे.

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि शुरुआती दौर में ‘हंस’ ने, ‘स्त्री’ और ‘दलित’ विषय पर बेहद उल्लेखनीय बहस को उद्वेलित किया. लेकिन बाद में (विशेषकर ‘हासिल’ काण्ड और ‘होना-सोना एक खूबसूरत दुश्मन के साथ’ प्रकरण) पूर्ण रूप से ‘दिशाभ्रमित’ भी किया.
अफ़सोस कि एक अच्छा-ख़ासा ‘आन्दोलन’ जिसमें समाज की वैचारिक दिशा-दशा’ बदलने की ‘संभावनाएं’ थी, कुछ विचारहीन अति-उत्साही, मदहोश महत्वाकांक्षी और ‘लम्पट क्रन्तिकारी’ स्त्रियों-पुरुषों के व्यक्तिगत स्वार्थों की वजह से, बेहद अराजक और यौन-हिंसक भीड़ में बदल गया.
असहाय ‘नायक’ समय रहते समुचित ‘निर्णय’ नहीं ले पाने के कारण, अपराधबोध और कुंठाओं के अंतहीन अँधेरे में विलीन हो गया. उसी दौरान मैंने ‘सावधान- आगे खतरा है’ भांपते हुए लिखा था “डार्क रूम में बंद आदमी की निगाह में औरत” (‘उदभावना’, जनवरी,2005).
शायद ‘यहाँ तक’ पहुँचने के बाद ‘राजन’ ने, किसी की भी बात सुनना बंद कर दिया था.

  क्या लिख रहे हैं आज कल, या आपने अपना सर्वोत्त्म दे दिया है ?
 अभी उल्लेखनीय कुछ नहीं....मगर ‘अनलिखे’ को लिखने की, चिंतन-प्रक्रिया में अवश्य हूँ.   मेरे लिए लिखना, रोज़ किसी समुद्र किनारे रेत का नया घरोंदा बनाने जैसा है. ‘निर्णायक फैसले’ की आशा और उम्मीद में, बकीलसा’ब रोज़ एक बरसों पुराने मुकदमें में, सुबह से शाम तक अंत-हीन बहस करते रहते हैं. असलियत तो यह है कि मेरे पास देने के लिए, कुछ भी (सर्वोत्तम, विशेष या असाधारण) था ही नहीं. अपने समय और समाज में, असहमति या विरोध का ‘एक स्वर’ या ‘प्रयास’ कह सकते हैं. अक्सर कहता हूँ ‘जो लिखा व्यर्थ था, जो नहीं लिखा अनर्थ है’. फिर भी, ‘भविष्य की स्त्री’ से संवाद जारी है.....रहेगा.


अब तक जिए जीवन के बारे में कैसा लगता है?
स्कूल-कॉलेज के दिनों में भाषण या वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में बोलने की तैयारी के लिए, रात को मैं अक्सर घर के पास बने सुनसान स्टेडियम में चला जाता था. स्टेडियम में चारों तरफ घुप्प अँधेरा और सन्नाटा होता था. स्टेडियम में बनी स्टेज पर खड़ा हो कर, बोलने का अभ्यास करता था. एक-दो-तीन बार....कभी-कभी दस बार.
लगता है कि मैं आज भी उसी स्टेडियम की स्टेज पर खड़ा होकर, बोलने की कोशिश कर रहा हूँ.....रोज़ कर रहा हूँ. अदालत में हूँ या किसी स्कूल-कॉलेज-विश्वविद्यालय के हॉल में......हाँ! इतना अंतर जरूर आया है कि ‘घुप्प अँधेरे’ की जगह, आँखे चुन्धयाति रौशनी है और ‘सन्नाटे’ की जगह ‘बेहद शोर’. स्टेडियम तब एकदम सुनसान होता था, अब दर्शकों-श्रोताओं-प्रति-द्वंदियों और ‘न्यायमूर्तियों’ से भरा है. तब बोल-बाल कर चुपचाप घर लौट आता था, अब बोलना बंद करता हूँ तो हाल, कभी तालियों की गड़गड़ाहट से गूंजने लगता है और कभी पीठ पर घातक तीरों की बौछार होने लगती है. बिना किसी किन्तु....परन्तु.....लेकिन....गिले-शिकवे या शिकायत के.......मैं अभी भी उसी सुनसान स्टेडियम के घुप्प अँधेरे और सन्नाटे में, बोलने-जीने की जिद्दो-ज़हद कर रहा हूँ. मैं अपनी कडूआहट के लिए ‘क्षमाप्रार्थी’ हूँ, मगर भावी नस्लों के लिए बेहद खुशहाल और इंसाफ़-पसंद घर-परिवार-समाज-देश और दुनिया की मंगल कामना करता हूँ.

सर्वोच्च न्यायालय का कहना है कि महिलाएं दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ कर रही हैं. आप क्या सोचते हैं.शायद आपका संकेत 2 जुलाई, 2014 को सर्वोच्च न्यायालय (न्यायमूर्ति चंद्रमौली कुमार प्रसाद और पिनाकी चन्द्र घोष की खंड पीठ) द्वारा अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य  ( क्लिक करे) के मामले में सुनाये फैसले की तरफ है. मीडिया इसे “दहेज कानून का ‘दुरुपयोग’ रोकने के लिए महत्वपूर्ण व्यवस्था” मानता है. मेरा मानना है कि दहेज उत्पीड़न विरोधी कानून की मूल विडंबना है कि यह स्त्रियों को सुरक्षा कम देता है, आतंकित और भयभीत ज्यादा करता है. आज तक .सका लाभ, वास्तविक पीड़िताओं को कम ही मिल पाया है ईमानदारी से कहूँ तो साफ़ तौर पर कारण यह है कि कानून की भाषा में दहेज़ माँगना, लेना या देना किसी भी तरह ‘अपराध’ नहीं है, दहेज़ हत्या ‘दुर्लभतम में दुर्लभ’ मामला नहीं, दहेज़ उत्पीड़न ‘मृत्यु से ठीक पहले’ होना सिद्ध करो और अब दहेज़ अपराधियों की गिरफ्तारी पर भी रोक या अंकुश. नैशनल क्राइम रेकॉर्ड ब्यूरो 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में हर घंटे एक महिला दहेज हत्या का शिकार हो रही है लेकिन दहेज प्रताड़ना के अधिकाँश मामले तो दर्ज ही नहीं होते. कानूनी जाल-जंजाल या समाज में बदनामी के भय से, उत्पीड़ित महिलाएं सामने नहीं आतीं और घुट-घुटकर जीती-मरती रहती हैं. इस सब के बावजूद देश की सब से बड़ी अदालत का कहना है कि महिलाएं कानून का ‘नाजायज इस्तेमाल’ ढाल की बजाय, हथियार के तरह कर रही हैं. सच यह है कि इस देश में बहुत से कानून हैं, मगर महिलाओं के लिए कोई कानून नहीं है और जो हैं वो अंततः स्त्री विरोधी हैं.

दहेज अपराधों में सजा की दर बेहद कम है. क्या कारण हो सकता है?हम क्यों और कैसे भूल जाते हैं कि दहेज अपराध में सजा की दर इसलिए भी बेहद कम है कि अपराध घर की चारदीवारी के भीतर होते हैं, जिनके पर्याप्त सबूत नहीं होते या हो नहीं सकते. कौन देगा ‘बहू’ के पक्ष में गवाही? ऊपर से कानून में इतने गहरे गढ्ढे हैं, कानून के रखवाले भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं, साधन-संपन वर्ग में दहेज के चलन का पहले से अधिक बढ़ा है. कानून ऊपरी तौर पर बेहद ‘प्रगतिशील’ दिखते हैं, पर दरअसल बेजान और ‘नख-दन्त विहीन’ हैं. इस संदर्भ में मैंने विस्तार से एक लेख स्त्री-काल के लिए लिखा था-“न्यायपालिका में दहेज़ का नासूर”

क्या आप मह्सूस करते हैं कि बलात्कार के लिए, भारतीय समाज की संस्कृति ही तर्क और संरक्षण मुहैय्या कराती है?यह जान कर आश्चर्यजनक लगेगा आपको कि २०१४ के मौजूदा कानून के अनुसार भी विवाह के लिए लड़की की उम्र 18 साल होनी चाहिए मगर 18 से कम होने पर भी विवाह "गैरकानूनी" नहीं माना-समझा जाता और भारतीय दण्ड संहिता की धारा 375 के अनुसार ‘सहमती की उम्र’ 18 साल है पर इसी कानून के अपवाद अनुसार "15 वर्ष से अधिक उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध, किसी भी स्थिति में बलात्कार नहीं है"। क्यों?
आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि 1860 में सहमती की उम्र सिर्फ 10 साल थी जो 1891 में 12 साल, 1925 में 14 साल और 1949 में 16 साल की गई थी। 1949 के बाद इस पर, कभी कोई विचार ही नहीं किया गया। अध्यादेश (3.2.2013) और बाद में नए अधिनियम (२०१३) में इसे 16 से बढ़ा कर 18 किया गया।
वर्तमान कानून के अनुसार विवाह का लिए लड़के की उम्र २१ साल और लड़की की उम्र १८ साल होनी चाहिए पर यदि कोई १८ साल से कम उम्र का लड़का,१८ साल से कम उम्र कि लड़की से विवाह करे, तो ना कोई कानूनी जुर्म है और ना कोई सजा. १८ साल से कम उम्र की लड़की से विवाह दंडनीय अपराध है और सहमती की उम्र भी १८ साल है, मगर १५ साल से बड़ी उम्र की अपनी पत्नी से जबरदस्ती यौन सम्बन्ध ‘बलात्कार’ नहीं.

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (संयुक्त राष्ट्र) की एक रिपोर्ट के अनुसार "दुनिया की ९८ प्रतिशत पूँजी पर पुरुषों का कब्जा है. पुरुषों के बराबर आर्थिक और राजनीतिक सत्ता पाने में औरतों को अभी हज़ार वर्ष और लगेंगे." पितृसत्तात्मक समाजों के अब तक यह पूँजी पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों को पुत्राधिकार में मिलती रही है, आगे भी मिलती रहेगी. आश्चर्यजनक है कि श्रम के अतिरिक्त मूल्य को ही पूँजी माना जाता है, मगर श्रम की परिभाषा मे घरेलू श्रम या कृषि श्रम शामिल नहीं किया जाता. परिणामस्वरूप आधी दुनिया के श्रम का अतिरिक्त मूल्य यानी पूँजी को बिना हिसाब-किताब के ही परिवार का मुखिया या पुरुष हड़प कर जाते हैं.
सारी दुनिया की धरती और (स्त्री) देह यानी उत्पादन और उत्पत्ति के सभी साधनों पर पुरुषों का     ’सर्वाधिकार सुरक्षि” है. उत्पादन के साधनों पर कब्जे के लिये उत्तराधिकार कानून और उत्पत्ति यानी स्त्री देह पर स्वामित्व के लिये विवाह संस्था की स्थापना (षड्‌यन्त्र) बहुत सोच-समझकर की गयी है.

दरअसल भारतीय विधि-व्यवस्था में भी उत्तराधिकार के लिए वैध संतान और वैध संतान के लिए वैध विवाह होना अनिवार्य है. न्याय की नज़र में, वैध संतान सिर्फ पुरुष की और ‘अवैध’ स्त्री की होती है. वैध संतान का ‘प्राकृतिक संरक्षक’ पुरुष (पिता) और ‘अवैध’ की संरक्षक स्त्री (माँ) होती है। विवाह संस्था की स्थापना से बाहर पैदा हुए बच्चे ‘नाजायज’, ‘अवैध’, ‘हरामी’ और ‘बास्टर्ड’ कहे-माने जाते हैं. इसलिए पिता की संपत्ति के कानूनी वारिस नहीं हो सकते. हाँ, माँ की सम्पत्ति (अगर हो तो) में बराबर के हकदार होंगे. ‘वैध-अवैध’ बच्चों के बीच यही कानूनी भेदभाव (सुरक्षा कवच) ही तो है, जो विश्व-भर में ‘विवाह संस्था’ को, अभी तक बनाए-बचाए हुए है.

वैध संतान की सुनिश्चितता के लिए यौन-शुचिता, पवित्रता, सतीत्व, नैतिकता, मर्यादा और इसके लिए स्त्री देह पर ‘पूर्ण स्वामित्व’ तथा नियंत्रण बनाए रखना पुरुष का ‘परम धर्म’ घोषित किया गया है. मतलब जो वैध और कानूनी है, वो पुरुष का और जो अवैध है या गैरकानूनी है, वो स्त्री का. जी हाँ! फिलहाल यही और ऐसा ही है हमारा कानून। ईमानदारी से बोलूँ तो मर्दों के लिए घर आशियाना और औरतों के लिए जेलखाना है.

आपने तो न्यायालयों की भाषा पर भी काम किया है, क्या न्यायलयों की मर्द्वादी भाषा इसी संस्कृति से पोषित नहीं है?
उत्तराधिकार कानूनों के माध्यम से पूँजी और पूँजी के आधार पर राजसत्ता, संसद, समाज, सम्पत्ति, शिक्षा और क़ानून-व्यवस्था- सब पर मर्दों का कब्जा है. नियम, कायदे-क़ानून, परम्परा, नैतिकता-आदर्श और न्याय सिद्धांत- सब पुरुषों ने ही बनाए हैं और वे ही उन्हें समय-समय पर परिभाषित और परिवर्तित करते रहते हैं. हमेशा अपने वर्ग-हितों की रक्षा करते हुए. ‘भ्रूण हत्या’ से लेकर ‘सती’ बनाए जाने तक, प्रायः सभी क़ानून, महिला कल्याण के नाम पर सिर्फ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेकअप’ ही दिखाई देता है. मौजूदा विधान-संविधान-क़ानून महिलाओं को कानूनी सुरक्षा कम देते हैं, आतंकित, भयभीत और पीड़ित अधिक करते हैं. निःसंदेह औरत को उत्पीडित करने की सामाजिक-धार्मिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रक्रिया में पूँजीवादी समाज क़ानून को हथियार की तरह इस्तेमाल करता रहा है. इसलिए ‘लॉ’ का असली अर्थ ही है-‘लॉ अगेंस्ट वूमैन’. समता की परिभाषा (बकौल सुप्रीम कोर्ट) है- सामान लोगों में समानता.
नारी सम्बन्धी अधिकांश फैसलों के लिए आधारभूमि तो धर्मशास्त्र ही हैं जो मर्दों के लिए ‘अफीम’ मगर औरतों के लिए ज़हर से भी अधिक खतरनाक सिद्ध हुए हैं. तमाम न्यायाशास्त्रों के सिद्धांत पुरुष हितों को ही ध्यान में रखकर गढ़े-गढ़ाए गए हैं. मथुरा से लेकर भंवरी बाई और सुधा गोयल से लेकर रूप कंवर सती कांड तक की न्याय- यात्रा में हजारों-हजार ऐसे मुकदमे, आंकड़े, तर्क-कुतर्क, जाल-जंजाल और सुलगते सवाल समाज के सामने आज भी मुंह बाए खड़े हैं। अन्याय, शोषण और हिंसा की शिकार स्त्रियों के लिए घर-परिवार की दहलीज से अदालत के दरवाजे के बीच बहुत लम्बी-चौड़ी गहरी खाई है, जिसे पार कर पाना बेहद दुसाध्य काम है। न्यायलयों की मर्द्वादी भाषा इसी महान सभ्यता और संस्कृति की दें है.

कानून की भाषा ही नहीं, परिभाषा भी घोर ‘मर्दवादी’ और पुरुष हितों को पोषित करने वाली लगती है. “औरत होने की सजा” के “यौन हिंसा और न्याय की भाषा” नामक लेख में, मैंने इस पर विस्तार से चर्चा की है. कानूनी भाषा ही नहीं, व्यवहार में भी पुरुष वर्चस्व साफ़ झलकता है. पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायधीशों पर यौन शोषण के आरोप, वरिष्ठ अधिवक्ताओं पर यौन शोषण-उत्पीड़न के आरोप और आए दिन महिला अधिवक्ताओं के साथ होने वाले यौन शोषण-अत्याचार के दुखद हाद्सो के बावजूद, समाज-मीडिया-न्यायपालिका की रहस्यमयी ख़ामोशी का मतलब क्या है? क्या यह सब होने-देखने के लिए ही औरतें अभिशप्त हैं? आखिर कब तक? दूर-दूर तक विरोध-प्रतिरोध  या प्रतिशोध की चिंगारी तक दिखाई नहीं दे रही. संभावनाओं का गर्भ में ही, गला घोंटा जा रहा है.  अक्सर महसूस होता है कि औरतों को अपनी आत्मरक्षा के लिए, कानूनी अधिकारों का इस्तेमाल हथियारों की तरह और हथियारों का इस्तेमाल कानूनी अधिकारों की तरह करना होगा.

बलात्कार के खिलाफ मानस बनाने के लिए जहां समाज, न्यायालय और संस्कृति के प्लेटफार्म पर काम करने की जरूरत है, वहीं क्या आप यह देखते हैं कि परिवार न सिर्फ इसके लिए अपने 'पवित्र डोमेन' में तर्क बनाता है, बल्कि बलात्कारियों को सांस्कृतिक संरक्षण भी देता है? विवाह के भीतर बलात्कार के लिए क्या यही संस्कृति और परिवार का 'पवित्र डोमेन' जिम्मेवार नहीं है?
इन दोनों सवालों के जवाब में सच कहूँ तो भारतीय समाज दोहरी चरित्र(हीन) नैतिकता में जीने वाला समाज है. भारत में वैवाहिक पार्टनर के बीच यौन संबंध ही ‘नैतिक’ है, बाकी सब ‘अनैतिक’. हालांकि कानून का ‘नैतिकता’ या ‘अनैतिकता’ से कोई लेना-देना नहीं है. विवाह-पूर्व वयस्क स्त्री-पुरुष द्वारा सहमति से यौन संबंध (या परस्पर सहवास) ‘अनैतिक’ माने-समझे जाते हैं मगर कोई कानूनन अपराध नहीं.
बाल विवाह की ‘सामजिक कुप्रथा’ अभी भी जिन्दा है. समाज ही नहीं, बाकायदा कानून-विधि-विधान में फल-फूल रही है. भारतीय कानून-विधान-संविधान पत्नी से ‘बलात्कार का कानूनी लाइसेंस या अधिकार’ और समाज ‘बलात्कार की संस्कृति’ को बढ़ावा देता है. स्त्री देह शोषण के लिए विवाह और वेश्यावृति की जड़ें तो भारतीय समाज की महान सभ्यता और संस्कृति का स्वर्णिम अध्याय कहा जाता है. विवाह संस्था में स्त्री, पति की निजी संपत्ति है और वेश्यावृति के प्राचीनतम धंधे में स्त्री. सार्वजनिक संपत्ति. देवदासी से लेकर आधुनिकतम ‘एस्कॉर्ट्स’ तक, मर्दों का ‘आनंद बाज़ार’ ही नहीं ‘व्यवसाय भी है.  हालांकि वेश्या या ‘काल-गर्ल’ से यौन सम्बन्ध बनाना, भले ही ‘अनैतिक’ बताया जाता है मगर पुरुष ग्राहक पर कोई अपराध नहीं. पकड़ी गई तो वेश्या को ही जेल जाना होगा.
ऐसे आधे-अधूरे और गड्ढे भरे कानूनों से ना तो 'बाल विवाह', 'बाल तस्करी', 'बाल वेश्यव्रती' को रोका जा सकता है और ना ही स्त्री विरोधी हिंसा-यौन हिंसा को. वैधानिक प्रावधानों में अंतर्विरोधी और विसंगतिपूर्ण 'सुधारवादी मेकअप' से, स्त्री के विरुद्ध हिंसा-यौन हिंसा, कम होने की बजाये बढ़ी है, बढती रही है और बढती रहेगी।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में अतिथि के द्वारा पत्नी की कामना करने पर उसे अतिथि को पेश करना स्वर्ग के लिए जरूरी बताया गया, क्या ऐसे तर्क मानस का निर्माण नहीं करते हैं, विवाह के भीतर बलात्कार के लिए.
प्राचीन भारत से लेकर अब तक, पति के लिए पत्नी उसकी अपनी ‘निजी संपत्ति’ है, जिसे वह अपने हितों को पूरा करने के लिए ‘उपयोग-दुरूपयोग’ की इज़ाज़त दे सकता है. वैवाहिक जीवन में बलात्कार की छूट के कारण भारतीय शादीशुदा महिलाओं की स्थिति ‘सेक्सवर्कर’ और घरेलू दासियों से भी बदतर है। ‘सेक्स वर्कर’ को ना कहने का अधिकार तो है , शादीशुदामहिला को वो भी नहीं है।अपने लाभ या राज्य-विस्तार के लिए, साधन-संपन्न अतिथि को पत्नी पेश करने से लेकर अपनी बेटियों के डोले तक भेजे जाते रहे हैं. काशीनाथ विश्वनाथ राजवाड़े ने “भारत में विवाह संस्था का इतिहास” में प्रामाणिक दस्तावेज सहित विस्तार से विवेचना की है. स्त्री देह को पाने-हथियाने और बलात्कार करने के, सैंकड़ों उदाहरण हिन्दू धर्मशास्त्रों और मिथकों में मौजूद हैं. जब घर में स्त्री देह का जबरन भोग-उपभोग, हिंसा-यौन हिंसा या उत्पीड़न मान्य है, तो घर से बाहर भी अधिकार मानने- समझने की ‘मानसिकता’ भी स्वाभाविक रूप से बनेगी ही. क्या कागजी विकल्प, मौलिक अधिकारों की बराबरी कर सकते हैं ? परंपरा , संस्कृति , संस्कार , रीति - रिवाजों और रूढि़वादियों व धर्मशास्त्रियों द्वारा बनाए गए नियमों के आधार पर वैवाहिक बलात्कार को जायज नहीं ठहराया जा सकता। कोई भी ‘असली धर्म’ इसका समर्थन नहीं करता परन्तु धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने सब ‘धर्मभ्रष्ट’ किया हुआ है.

‘व्यभिचार’ का कानून भी तो विबाह के भीतर पति की इच्छा से दूसरे पुरुष के साथ यौन संबंध का तर्क देता है, यानी एक हद तक बलात्कार के लिए स्पेस बनाता है?
व्यभिचार’ (धारा-497 आई.पी.सी.) सम्बन्धी कानून के अनुसार पुरुष (भले ही विवाहित हो) किसी भी अविवाहित, विधवा या तलाकशुदा स्त्री (स्त्रियों) के साथ सहमती से यौन रिश्ते (आप कहते रहें ‘अनैतिक’) बना सकता है। दूसरे पुरुष की पत्नी के साथ यौन संबंध ‘व्यभिचार’ है (अगर उसके पति की सहमति या मिलीभगत नहीं है) लेकिन यदि पति (मालिक) भी सहमत हो तो, यह कोई अपराध नहीं। यानि आपस में पति-पत्नियाँ बदलना विधान-सम्मत है. ‘व्यभिचार’ एक मायने में स्वेच्छा से ‘सहमती’ नहीं, मानसिक अनुकूलन के बाद ‘बलात्कार’ ही है. समलैंगिक संबंधों को भी अपराध-मुक्त करने के लिए, सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद तक बहस जारी है. कभी भी ‘अध्यादेश’ जारी हो सकता है. कानूनी जाल-जंजाल में, ऐसे और भी बहुत से प्रावधान हैं मगर उन पर फिर कभी.....

भारत में विवाह के भीतर बलात्कार के खिलाफ कनून बनने के मार्ग में क्या -क्या बाधायें हैं.सामजिक-आर्थिक-राजनीतिक सत्ता पर, पुरुषों का कब्जा है. संसद में मर्दों का बहुमत है, सो ऐसा कोई कानून नहीं बनायेंगे, जो पित्रसत्ता की जड़ों में मट्ठा डालने का काम करे. ‘महिला आरक्षण विधेयक’- अभी नहीं, कभी नहीं. सारे कानून मर्दों के हितों और वर्चस्व को बनाये-बचाये रखने वाले ही बने-बनाये गए हैं. हालांकि उपरी तौर पर ढिंढोरा यह पीटा जाता है कि ‘स्त्री सशक्तिकरण’ के लिए, संसद ने ना जाने कौन-कौन से विधेयक पारित किये है. वास्तविकता यह है कि दांपत्य में यौन संबंधों के बारे में सदियों पुरानी सामंती सोच और सीलन भरे संस्कारों में, कोई बदलाव नहीं हो पा रहा। मालूम नहीं इस सवाल पर सबने, क्यों 'मौनव्रत' धारण कर लिया है।
देश में अपराधियों का राजनीतिकरण और राजनीति का अपराधीकरण इतना बढ़ गया है कि
वर्तमान दहशतज़दा माहौल में यौन हिंसा की शिकार औरत की चीख, आखिर कौन और कब सुनेगा ? मेरे विचार से स्त्री के दमन, उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ़ कानून बनने-बनाने में सबसे बड़ी बाधा है- राजनीति और सत्ता में ‘मर्दवादी’ नेताओं की षड्यंत्रपूर्ण चुप्पी और अपने अधिकारों के प्रति स्त्री आन्दोलन के दिशाहीन भटकाव.

दुख तो यह भी है कि महिला प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति, मुख्यमंत्री, गवर्नर, सुप्रीम और हाईकोर्ट की न्यायमूर्तियां और अन्य सांसद, मंत्री, अफसर वगैरह के होने के बावजूद, आम औरतों के हालात बद से बदतर होते गये हैं। कुर्सी मिलते ही औरत, औरत नहीं रहती, सत्ता के इशारे पर नाचने वाली ‘गुड़िया’ बन जाती है, गुड़िया।

अफसोस कि तमाम प्रतिभाशाली और क्रांतिकारी बेटे-बेटियां, जो सचमुच स्वाधीनता संघर्ष के दौरान बुने सपनों को साकार कर सकते थे या जिनमें देश की नियति बदलने की सारी संभावनाएं मौजूद थीं, सत्ता संस्थानों ने खरीद लिए, राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय आवारा पूंजी की गुलामी करने लगे या पेशेवर दलाल हो गये। कुछ ने सपनों के स्वर्ग अमेरिका, फ्रांस, इंग्लैंड या कहीं और जाकर ‘आत्महत्या’ कर ली। जिनके बस का दलाल होना नहीं था, वो ‘फर्जी मुठभेड़’ में मारे गये या फिर अराजक जीवन की दारु पीते-पीते एक दिन, खून की उल्टियां करते बरामद हुए। ऐसी विश्वासघाती और आत्मघाती होनहार पीढ़ियों को या राष्ट्र कर्णधारों को क्या कहे?

जाति और धर्म संस्थानों को स्त्री के प्रति यौन हिंसा के बडे  उत्प्रेरक के तौर पर माना जाता है, इन्हें कानूनों से किस हद तक ठीक किया जा सकता है ? 
 धार्मिक पाखंड, कर्मकांड, अन्धविश्वास और तर्कहीन आस्थाओं के शिकार, मर्द और स्त्रियाँ दोनों ही हैं. धर्म मर्दों के लिए अनाथालय सिद्ध हुआ है, मगर स्त्रियों के लिए ‘वेश्यालय’. स्त्रियों की शस्त्रों से अधिक हत्या तो, धार्मिक शास्त्रों ने की है.
     
मर्दों की आँखों में फिट जाती और धर्म  के 'टेलीलेंस' का फोकस, हर स्त्री देह पर एक जैसा ही होता है। स्त्री को देखते ही 'टेलीलेंस' की लार टपकने लगती है और दिमाग में हिंसक घोड़े हिनहिनाने लगते हैं। स्त्री फ़िल्मी हिरोइन (सीता, पार्वती, द्रोपदी, तुलसी, आनंदी या किसी भी भूमिका में हो) हो या टेनिस-हाकी-क्रिकेट खिलाड़ी, राजनेता हो या समाजसेविका, पुलिस अफसर-डॉक्टर- वकील- इंजिनियर हो या एयर होस्टेस- नर्स-स्टेनो, अध्यापक हो या छात्रा, शिक्षित हो या अनपढ़, अमीर हो या गरीब, सवर्ण हो या दलित, शहरी हो या ग्रामीण, हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई हो या नास्तिक। गंगा-यमुना में नहा रही हो या पांच सितारा स्विमिंग पूल में, सड़क किनारे या गांव के तालाब पर- कैमरा क्लिक,क्लिक करने लगता है। मीलों की दूरी से फिल्म शूट होने लगती है और स्त्री को पता तक नहीं चलता कि कब सीडी या एम् एम् एस, पितृसत्ता के 'आनंद बाज़ार' में छप गया।
दरअसल पुरुषों को घर में घूंघट या बुर्केवाली औरत (सती-सावित्री) चाहिए और अपने धंधा चलाने या ब्रांड बेचने के लिए बिकनीवाली। सो स्त्रियों को सहमती के लिए लाखों डॉलर, पाउंड, दीनार या सोने का लालच (विश्व सुन्दरी के ईनाम और प्रतिष्ठा) और जो सहमत नहीं उनके साथ जबरदस्ती यानी हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न, शोषण के तमाम हथकंडे।

स्वयं सहमत हुई या की गई (नायिकाओं) स्त्रियों का तर्क होता है कि "हम देह नहीं सिर्फ देह की (कामुक-उतेजक) छवि बेच रही हैं, जो सचमुच देह बेचने या गुजारे के लिए विवाह बंधन में बंधने से कहीं ज्यादा फायदेमंद और सम्मानजनक है। देखो हत्या, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, यौन-हिंसा, दमन, उत्पीड़न और शोषण की शिकार ब्याही-अनब्याही आम स्त्रियाँ घुटघुट कर दम तोड़ रही हैं या सालों से इन्साफ के मंदिरों के चक्कर काटती घूम रही हैं।“ आपके ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों में भी लिखा है 'सलज्जा गणिका नष्टा, निर्लज्श्च कुलांगना'। समझ नहीं आ रहा कि  (अ)न्यायशास्त्रों में घुस कर बैठे, आदिकालीन धर्मशास्त्रों की भरीआखिर हम कब तक ढोते रहेंग -भरकम गठ े?

 दिक्कत यही है कि अधिकांश कानूनों की बहुमंजिला ईमारत, ऐसे ही धर्म ग्रंथों-शास्त्रों, परम्पराओं और रीति-रिवाजों के नीवं पर बनी-बनाई गई है. शिक्षा-दीक्षा के कारण स्त्रियाँ बदली हैं, बदल रही हैं मगर भारतीय पुरुष अपनी मानसिक बनावट-बुनावट बदलाने को तैयार नहीं है. उसके लिए यह सत्ता से भी अधिक, लिंग वर्चस्व की लड़ाई है. समानता के संघर्ष में स्त्रियों का दबाव-तनाव बढ़ता है तो कुछ उदारवादी-सुधारवादी ‘मेक-अप’ या ‘कॉस्मेटिक सर्जरी’ की तरह नए विधि-विधान बना दिए जाते हैं और कुछ और सुधारों के सपने दिखा दिए जाते हैं.

आपका जन्म कब और कहाँ हुआ? परिवार के बारे में भी कुछ बताएं?
मुझे तो यही बताया गया है कि मेरा जन्म 7 दिसम्बर, 1953 को अविभक्त पंजाब के जिला हिसार के पास उकलाना मंडी में हुआ था. जन्म के समय या काफी बाद तक परिवार, एक ‘संयुक्त परिवार’ ही था. व्यापारिक घराना जो अभी भी पड़-दादा के नाम से जाना जाता है. संयुक्त परिवार का रुई-लकड़ी-तेल का कारखाना था, मंडी में नीचे कमीशन-एजेंट की तीन दुकानें थी और ऊपर रिहायस. पास के गाँव सिंयाना में पुरानी हवेली और खेत भी थे. कहते हैं 1929 में लाहौर में साइमन कमीशन के विरोध जुलूस में दादा जी (अपने वकील) लाला लाजपत राय के साथ थे और पुलिस की लाठियों की मार के कारण उनका एक हाथ काटना पड़ा था. शायद यही वजह थी कि वो ‘होली-दिवाली’ ही नहाते थे. मंडी में सब उन्हें भी ‘टुंडा लाट’ बोलते थे. उन्हें ‘सांग’ देखने, रागनियाँ सुनने का शौक था और खुद बहुत अच्छे किस्सा-गो थे. बचपन में हमने उनकी जुबानी ‘जानी चोर’, नरसिंह का भात’ और अन्य किस्से सुने हैं. व्यापार के सिलसिले में वो देशभर में घूमे रहते थे. सूरज छिपने के बाद कुछ नहीं खाते थे.

मेरे पिता अध्यापक थे. मंडी में सब उन्हें अभी तक ‘मास्टर जी’ कहते थे. दो चाचा और दो बुआ थी. होश संभाला तो दोनों बुआओं की शादी (व्यापारिक घरानों में) हो चुकी थी.

आपके पिता अध्यापक थे. कहाँ-क्या पढाते थे?
पिता जी शुरू में उकलाना मंडी के ‘जैन हाई स्कूल’ और ‘जनता हाई स्कूल’ में ही अध्यापन करते रहे. मुझे याद है 1963-1964 में उन्हें हांसी के सरकारी स्कूल में नौकरी मिल गई थी मगर चुनाव लड़ने के चक्कर में उन्होंने, कुछ ही समय बाद इस्तीफ़ा दे दिया था. चुनाव हारने के बाद उन्होंने थोड़े समय ‘अरविन्द हाई स्कूल’ चलाया, परन्तु 1966 में दादी जी की बीमारी के कारण वापिस उकलाना चले गए. उकलाना से वो अग्रवाल हाई स्कूल, बल्लभगढ़ चले गए और फिर (1967) जैन हाई स्कूल, रोहतक में पढाने लगे. 1970 में उन्होंने राजनीति शास्त्र में भी एम.ए. किया और 1970-1994 तक वो वैश्य कॉलेज में राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक रहे. रिटायर होने के बाद वो फिर से उकलाना जा बसे और लम्बी बीमारी के बाद अगस्त 2006 में उनका देहांत हो गया.

आपके पिता ‘मास्टर जी’ या राजनीति शास्त्र के प्राध्यापक थे. उनका आप पर क्या-कितना प्रभाव पड़ा?इसका जवाब देने से पहले यह बताना जरूरी है कि व्यापारिक घराने के ‘संयुक्त परिवार’ में वो अकेले ‘शिक्षित’ व्यक्ति थे, जिनकी व्यापार की बजाय राजनीति, समाज और साहित्य में गहरी रूचि थी. बहुत अच्छे वक्ता और लेखक थे. देखने में पंडित नेहरु की कार्बन-कॉपी- खद्दर का चूड़ीदार पायजामा-कुरता और अचकन. पूर्णरूप से शाकाहारी, चाय कभी नहीं पीते थे और चमड़े की कोई वस्तु, इस्तेमाल नहीं करते थे. दहेज़ लेने-देने के सख्त विरोधी. दहेज़ लेने-देने  वालों की शादी में नहीं जाते थे. उनके यहाँ से आई मिठाई आदि भी नहीं खाते थे. इसे वो बच्चों की ‘खरीद-फ़रोख्त’ मानते थे. पैसे के लिए उन्होंने कभी किसी को, ट्यूशन नहीं पढाया. कुल मिला कर एक आदर्शवादी, समाज सुधारक, प्रजातान्त्रिक और ईमानदार व्यक्ति और व्यक्तित्व.

निश्चित रूप से उनका प्रभाव, मुझ पर पढ़ना ही था. मैंने शुरुआती दौर में पढना-लिखना-बोलना, उन्ही से सीखा. ना जाने क्यों, मुझे लगता है कि वो मेरे पिता नहीं, ‘मास्टर जी’ थे और उम्र-भर ‘मास्टर जी’ ही बने भी रहे. किसी लावारिस-अनाथ बच्चे सा मैं, उन्हें कहीं मिल गया हूँगा और वो मुझे अपने ‘गुरुकुल’ में ले आये होंगे. अन्य बच्चों की तरह, मुझे भी पढाया-सिखाया और शिक्षित-दीक्षित होने के बाद, ‘गुरुकुल’ से विदा कर दिया. अन्य बच्चे ‘गुरु-भाई’ या ‘गुरु-बहन’ बन गए. मैं अक्सर सोचता और महसूस करता हूँ कि उनके और मेरे बीच, बाप-बेटे का नहीं, बल्कि ‘गुरु-शिष्य’ का अमर रिश्ता है. मेरे पास तो ‘गुरु-दक्षिणा’ में देने के लिए, कभी कुछ था ही नहीं....सो चिर-ऋणी हूँ....रहूँगा.

क्या ‘माँ’ के बारे में कुछ नहीं बताएंगे ? 
बताता हूँ....उनके बारे में भी बताता हूँ. मेरा ननिहाल भी उकलाना मंडी में ही था. उनके पिता यानि मेरे नाना जी की मृत्यु, कम उम्र में ही हो गई थी. विधवा नानी जी और उनकी तीन बेटियों के पास, उनके एक भाई (राम भगत) ने रहना शुरू कर दिया था जो  आजीवन अविवाहित ही रहे.  माँ का छोटी उम्र में ही विवाह हो गया, सो शिक्षा अधूरी रह गई. भारतीय स्त्रियों की तरह ही उनका जीवन भी, एक कुशल गृहणी सा ही रहा मगर वो एक बेहद साहसी और विवेकशील महिला हैं.    

कानून पढने और वकील बनने का सपना कब देखा?
उस समय पिता जी को शायद 700-800 रूपये महीना वेतन मिलता था. माँ-बाप के अलावा हम तीन भाई और दो बहिनें थी. (एक बहन ‘अपराजिता’ कि 1979 में ‘ब्लड कैंसर’ से मौत हो गई थी.) पिता जी को लगता था कि इतनी तन्खाह में, मुझे दिल्ली से पढ़ना संभव नहीं होगा. इसलिए पिता चाहते थे ‘अर्थ-शास्त्र’ में एम.ए. करके, वहीँ-कहीं लेक्चरर लग जाऊं, पर मुझे ‘संविधान’ पढने की धुन सवार थी, सो कानून पढने राजधानी आ गया. दिन में नौकरी और शाम को कानून की पढाई ने, पिता जी की आर्थिक विवशता हल कर दी थी.  
6. ‘संविधान’ पढने की धुन सवार होने की कोई खास वजह?

कोई ठोस वजह तो समझ नहीं आ रही. ‘महाभियोग’ में वारेन हसिंग्स पर चले मुकदमें के दौरान, एडमंड बर्क के भाषणों और जे. एस. मिल की पुस्तक ‘लिबर्टी’ ने वकालत का रास्ता दिखाया-सुझाया था. उन्ही दिनों वीरेंद्र सिंधु की किताब “भगत सिंह और मृतुन्जय पुरखे” पढ़ते हुए, बड़ी सिद्दत से महसूस हुआ था कि ‘क्रांतिकारी पैरवी’ के लिए, समर्पित और सरोकारी वकील होना अपरिहार्य है. संभव है कहीं बहुत भीतर तक यही अहसास हो रहा था, कि मुझे पढने-लिखने-सोचने और बोलने के अलावा कुछ नहीं आता.

न्यायव्यवस्था में लूट की सम्पूर्ण संरचना और सुनियोजित षड्यंत्र को, सूक्ष्मता से जानने-पहचानने और रेखांकित करने के प्रयास में ही मैं समझ पाया कि इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं और काफी दूर-दूर तक फैली है. न्याय मंदिरों के प्रांगण में भी ‘भ्रष्टाचार के विषवृक्ष’, निरंतर फल-फूल रहे हैं.

मासिक पत्रिका जनपथ  से साभार 
    
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