‘अर्थ स्वातंत्र्य ’ स्त्री मुक्ति की पूर्व शर्त

सुनीता
आम्बेडकर विश्वविद्यालय,दिल्ली के हिन्दी विभाग में शोधरत , संपर्क : sunitas988 gmail.com
भारतीय संस्कृति स्त्री  विरोधी  है और यहाँ स्त्री  की छवि परम्परागत मलबे से ही बनी है। इसके भौतिक कारण भी देखे जा सकते है। जैसे ‘ज्ञान’ और ‘संपत्ति’ इन दोनो से ही भारतीय पितृसत्ता के मनीषियों ने स्त्री  को वंचित रखा। वो तो यहाँ तक चले गए कि संपत्ति को संपत्ति की क्या जरूरत, अर्थात स्त्री  तो स्वयं किसी की संपत्ति है। पहले पिता की, फिर  पति की और अंत में बेटों की। रही ‘ज्ञान’ की बात, अगर ज्ञान नही होगा तो कोई बहस या तर्क नही करेगी। वर्जीनिया वुल्फ बताती है कि स्त्रियों को पुस्तकालय में  प्रवेश की अनुमति नहीं  थी। पर स्त्री  मुक्ति का आह्वान करते हुए लेखिका लिखती है कि ‘‘आप चाहें तो अपने पुस्तकालयों में भले ही ताला लगा दीजिए, लेकिन मेरी दिमागी आजादी को रोकने वाला कोई दरवाजा, कोई ताला कोई नट-बोल्ट नही बना।’’1

महादेवी वर्मा किसी भी समाज के विकास का मापदंड उस समाज में स्त्री  की स्थिति और हैसियत को मानती है। ‘‘नितांत बर्बर समाज में स्त्री  पर पुरुष वैसा ही अधिकार रखता है, जैसे वह अपनी अन्य स्थावर संपत्ति पर रखने को स्वतंत्र है। उसके विपरीत पूर्ण विकसित समाज में स्त्री -पुरुष की सहयोगिनी तथा समाज का आवश्यक अंग मानी जाकर माता तथा पत्नी के महिमामय आसन पर आसीन रहती हैै।’’2  महादेवी आर्थिक प्रश्न पर समूचे ऐतिहासिक विकास क्रम को कटघरे में खड़ा करती है। पुत्र पिता की समस्त सम्पत्ति का आधिकारी  होता था, परन्तु कन्या को विवाह के अवसर पर प्राप्त होने वाले यौतुक के अतिरिक्त और कुछ देने की आवश्यकता ही नही समझी गई। ‘‘स्त्री  को इस प्रकार पिता की संपत्ति से वंचित करने में क्या उद्देश्य रहा, यह कहना कठिन है। यह भी संभव है कि स्त्री  के निकट वैवाहिक जीवन को अनिवार्य रखने के लिए ऐसी व्यवस्था की गयी हो।’’3 भारतीय पुरुष ने स्त्री  को या तो सुख के साधन  के रूप में पाया या भार रूप में फलतः वह उसे सहयोगी का आदर न दे सका।

मनुस्मृति के अनुसार पैतृक जायदाद का माता-पिता की मृत्यु के बाद सभी पुत्रो में समान रूप से बँटवारा किया जाना चाहिए किन्तु ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी  था। स्त्रियाँ इस पैतृक संसाधन  में हिस्सेदारी की मांग नही कर सकती थीं । किंतु विवाह के समय मिले उपहांरो पर स्त्रियों का स्वामित्व माना जाता था और इसे स्त्री धन  की संज्ञा दी जाती थी। स्त्री  और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भिन्नता संसाधनॉन  पर उनके नियंत्रण की भिन्नता की वजह से अधिक  प्रखर हुई। मनुस्मृति में पुरुष के धन  अर्जन के सात तरीके बताए गए हैं - खोज , विरासत, खरीद, विजित करके, निवेश, कार्य द्वारा तथा भेंट। वही स्त्रियों के लिए प्रियजनों (परिवार ) द्वारा दिए गए उपहार मात्र। मैत्रोयी पुष्पा इसे उपहार नहीं बल्कि ‘रिश्वत’ के रूप में देखती हैं जिसके बदले स्त्री  से यह अपेक्षा की जाती है कि वह संपत्ति में अपने अधिकार  की मांग न करे।


एंगेल्स ने ‘स्त्री  की अधीनस्थ  स्थिति को ताम्र ओर लोह-औजारो के विनियोजन से उपजी माना।’ युग्म-विवाह और समूह -विवाह जैसी व्यवस्थाओं  में सगे पिता का निश्चयपूर्वक पता लगाना असम्भव होने के कारण मात्र सगी माँ को मान्यता प्राप्त थी। जिसके कारण घर के भीतर नारी की प्रधानता  होती थी। इसी को इतिहासकारो ने आदिकालीन मातृसत्ता से जोड़ा हैं। लेकिन जब इन व्यवस्थाओ ने विकास किया, ‘कृषि युग’ और ‘ताम्र युग’ संदर्भ में आए तो बाहरी क्षेत्र ने घरेलू क्षेत्र पर अपना वर्चस्व प्राप्त कर लिया। जो पहले से ही पुरुष के अधिकार  क्षेत्र में था। संपत्ति के निर्माण ने संपत्ति के वैध् वारिस की अवधरणा को जन्म दिया जिसके चलते स्त्री  भी पुरुष की अधीनस्थता  में आ गयी। इस तरह ‘एकल विवाह’ व्यवस्था के साथ पितृसत्ता अस्तित्व में आयी।

महादेवी भारतीय पत्नीत्व को एक विडम्बना ही मानती है। समाज स्त्रिायों के विवाह की चिंता इसलिए नही करता कि देश या जाति में सुयोग्य माताओ और पत्नियों का अभाव हो जायेगा, वरन, इसलिए कि उनकी अजीविका का हम कोई और सुलभ साध्न नही सोच पाते। किसी स्त्री  के विध्वा होते ही प्रश्न उठता है कि उसका भरण-पोषण और उसकी रक्षा कौन करेगा? महादेवी इस तथ्य पर भी प्रकाश डालती है कि क्यों हमारे समाज ने सदियो से स्त्रियों की आर्थिक परतंत्रता को जारी रखा है। समाज की यह धरणा रही है कि स्वावंलम्बन के साधनों से युक्त स्त्री  गृहिणी के कर्तव्य  को हेय समझेगी, अतः गृह में अराजकता उत्पन्न हो जाएगी। जो कि पूर्णतः भ्रान्तिमूलक  है। महादेवी लिखती हैं  कि ‘‘हमारे यहाँ आज भी श्रमजीवियों की स्त्रियाँ तथा किसानों  की सहधर्मिणियाँ घर संभालती और जीविका के उपार्जन में पुरुष की सहायता भी करती है। इस चिंता से कहीं पुरुष के अधिकार  के बाहर न चली जावे, उन्हें पुरुष मनोरंजनी विद्या के अतिरिक्त और कुछ न सिखाना उनके लिए भी घातक है और समाज के लिए भी, क्योंकि वे सच्ची सामाजिक प्राणी और नागरिक कभी बन ही नही पाती।’’4

समय के बदलते परिदृश्य और बढ़ते आर्थिक दबाबो के कारण धन  कमाने के लिए बाहर निकलती स्त्री  आज परिवार की बेज्जती का नही बल्कि इज्जत और जरूरत का सबव बन गयी है। परतु स्त्री  से जुड़े सामंती मूल्य आज भी सांस ले रहे है। स्त्री  पर बैठाए गए तमाम पहरों   ने स्त्री  संघर्ष के तनाव को और अधिक  बढ़ाया है। ‘वर्ग-संघर्ष’ और ‘यौन-संघर्ष’ के बीच कौन-से एकसमान सूत्र है? यह शोध् का विषय रहा है। इस पूंजीवादी व्यवस्था में क्या स्त्री  भी एक वर्ग ही है? ऐसे में नारीवादियों की ‘सिस्टर हुड’ वाली विचारधरा कहाँ तक साबित होती है? यह सभी अपने आप में बड़े सवाल है जो नारी-विमर्श ने उठाए है।

मार्क्सवादी स्त्री  को यह आशवासान दिलाते हैं  कि जब सर्वहारा वर्ग की जीत हो जाएगी और साम्यवादी शासन प्रणाली लागू होगी तो स्त्रियाँ स्वयं मुक्त हो जायेंगी । इसलिए स्त्री , अपनी मुक्ति की स्वतंत्र लड़ाई को महत्व देने के स्थान पर वर्ग-संघर्ष में अपना सहयोग दे। जबकि महादेवी स्त्री -मुक्ति के लिए किसी आदर्शवादी व्यवस्था का इंतजार नही करना चाहती,  उल्टा उनका दृढ़ विश्वास है कि जिस समाज में स्त्री  अपनी पूर्णता में मुक्त होगी वही सभ्य और आदर्श समाज होगा। मार्क्सवादी , स्त्री  तथा पुरुष में  भेद-भाव का बड़ा करण उनके बीच श्रम-विभाजन को मानते है। तथा नारी को सार्वजानिक उद्यम में ले आने को उसकी मुक्ति के रूप में देखते है। परंतु ध्यान देने योग्य है कि सामजवादी व्यवस्था में स्त्रियों  को आर्थिक आजादी मिलने पर भी क्या यौनिक स्वतंत्रता मिल पायी? नही। महादेवी स्त्री  की आर्थिक पराधीनता  का कारण स्त्री  की एक ‘स्त्री ’ के रूप में पहचान न होने के बदले पुत्री , पत्नी, माता के रूप में उसकी छवि बनाना भी मानती है। वह लिखती है कि ‘‘भारतीय स्त्री  के संबंध् में पुरुष का ‘भर्ता’ नाम जितना सार्थक है उतना सम्भवतः और कोई नाम नही। स्त्री  पुत्री , पत्नी, माता आदि सभी रूपों में आर्थिक दृष्टि से कितनी परमुखापेक्षी रहती है, यह कौन नही जानता।’’5 मार्क्सवादियों  द्वारा एक दलील यह भी दी जाती है कि क्रांति तात्कालिक रूप में भौतिक स्तर को परिवर्तित करती है जबकि मानसिक परिवर्तन में समय लगता है जो सांस्कृतिक पुननिर्मिति पर निर्भर करता है। यह निर्विवाद सत्य है कि स्त्री  की अध्ीनस्थता का घनिष्ठ सम्बन्ध् संस्कृति से है। सीमोन लिखती ही है ‘‘स्त्री  पैदा नही होती गढ़ी जाती है।’’6

महादेवी ने मजदूर व निम्न वर्गीय स्त्रियों के मर्म को भी बड़ी बेबाकी से छुआ है। वह लिखती है कि ‘‘उत्तराधिकार  मिल जाने पर भी हमारी मजदूर स्त्रियाँ निर्धन पिता व दरिद्र पति से दरिद्रता के अतिरिक्त और क्या पा सकेंगी।’’7 यहाँ समाजवादी नारीवाद की वह सीमा पुष्ट हो रही है,  जिसमें पिता, पति, पुत्र द्वारा स्त्रियों को घरेलू कार्य के लिए वेतन देने की मांग की जाती है। क्योंकि महिलाआं के घरेलू कामकाज का वेतन की शक्ल में कोई आकलन नही किया जाता। केवल पारिवारिक बदलावो से स्त्री  की स्थिति में विशेष परिवर्तन नही आएगा बल्कि राज्य को संसाधनों  का सही वितरण स्त्री  के हक में करना होगा। महिला का घरेलू श्रम जिसे उत्पादक या अनुत्पादक श्रम कहा गया। वह महज शोषण नही स्त्री  की अधीनस्थता  है। प्रगातिशील महिला संगठन ( पी .ओ.डब्लू) के अनुसार स्त्रियों के शोषण के दो बुनियादी ढाँचे थे-लैंगिक आधार पर श्रम का विभाजन तथा संस्कृति जिसने इसे प्रतिपादित किया। श्रम विभाजन में भेदभाव के पीछे मंशा यह थी कि स्त्रियों को आर्थिक रूप से पुरुषों पर आश्रित रखा जाए। स्वदेशी आंदोलन की तर्ज पर स्त्रियों के लिए रोजगार सृजन के जो प्रयास किए गए वे पुरुषों की आमदनी में  महिलाओ की ओर से कुछ पूरक सहायता के मद्देनजर किए गए न कि जीवन यापन के लिए धन  कमाने के उद्देश्य से। ‘‘यह कार्य प्रशिक्षित स्त्रियों द्वारा अर्थोपार्जन के बजाय समाजसेविका के रूप में किया गया। ऐसा प्रतीत होता है कि स्त्रियों की दक्षता को मात्र सेविका, सफाई, भोजन बनाने या पढ़ाने जैसे ‘पोषक’ कार्यो तक या उन्हें गृहस्थी के परम्परागत कार्यो जैसे खाद्य प्रसंस्करण तथा हस्तशिल्प तक सीमित कर दिया गया।’’8

घरेलू श्रम के लिए वेतन की जो माँग उठायी गयी, सिमोन दी बोउआ ने उसका विरोध किया। उनका मानना है कि ‘‘एक छोटी अवधि में  बहुत संभव है कि घरेलू पत्नियाँ, जिनके पास दूसरा विकल्प नही है, वेतन पाकर खुश होगी। इसमें कोई शक नही। लेकिन एक लम्बे दौर में घरेलू कामों के लिए वेतन औरतों  को यह मानने के लिए प्रेरित करेगा कि घरेलू पत्नी होना भी एक तरह का काम है। इस तरह स्त्री  फिर  घरेलू परिसीमाओ के भीतर निर्वासित-सी जिंदगी जीने के लिए मजबूर रहेगी।’’9 असल चीज़ है घरेलू श्रम की परिस्थितियों में बदलाव वरना घरेलू कामों का महत्व तो बढ़ जाएगा, लेकिन उससे जुड़ी औरत के अलगाव और एकाकीपन की परिस्थितियाँ वैसी ही बनी रहेगी। वह जीवन और ज्ञान के तमाम स्रोतों  से कटकर घरेलू श्रम की चार दीवारी में ही कैद हो जाएगी।

भारतीय स्त्री  शोषण की चैतरफा मार झेलती है। उसके प्रति न तो शास्त्रो ने रहम दिखाया न ही राज्य ने अपनी कोई जिम्मेदारी निभाई और तो और वह परिवार तथा पति, जिसकी सेवा में उसने अपना संपूर्ण जीवन और स्वत्त्व होम कर दिया। वहाँ भी वह उपेक्षित ही रही। महादेवी के इन शब्दो में स्पष्ट नजर आता है कि भारतीय स्त्री  का जीवन क्या है ‘‘श्रमजीवी श्रेणी की स्त्री  को गृह का कार्य और संतान का पालन करके भी बाहर के कामों में पति का हाथ बटाना पड़ता है। सबेरे  6 बजे, गोद में छोटे बालक को तथा भोजन के लिए एक मोटी काली रोटी लेकर मजदूरी के लिए निकली हुई स्त्री  जब 7 बजे संध्या समय घर लौटती है तो संसार भर का आहत मातृत्व मानो उसके शुष्क ओठो में कराह उठता है। उसे श्रान्त शिथिल शरीर से पिफर घर का आवश्यक कार्य करते और उस पर कभी-कभी मद्यप पति को निष्ठुर प्रहारों को सहते देखकर करूणा को भी करूणा आये बिना नही रहती।10

 हमारे देश में कृषक तथा अन्य श्रमजीवी स्त्रियों की इतनी अध्कि संख्या है कि उनकी मुक्ति के बिना भारत में स्त्री -विमर्श अर्थहीन ही रहेगा। एक स्त्री  अगर शैक्षिक और व्यवसायिक स्तर पर  पुरुष की बराबरी करती भी है तो भी समाज उसके साथ लिंगभेद करता है। जर्मेन ग्रीयर लिखती है कि ‘‘चिकित्साशास्त्र का अध्ययन करने वाली लड़की अगर खासी मेहनत करेगी तो डाॅक्टरी की परीक्षा पास कर लेगी। लेकिन यह सच है कि स्त्री  रोगी पुरुष डाॅक्टरो को प्राथमिकता देती है और पुरुष रोगी भी। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग और रेडियो संचालन सीखने वाली लड़कियों के रोजगार न पा सकने के अनेको प्रमाण मौजूद है।’’11

वही महादेवी का स्त्री -विर्मश इतना अधिक  निराशावादी नहीं है। शंभू गुप्त का मानना है कि ‘महादेवी की नारी दृष्टि, यथार्थ के सकारात्मक और सम्भावनात्मक पहलुओं पर सबसे पहले और सबसे ज्यादा ध्यान केंद्रित करती है। लेखिका केवल स्त्री दृष्टिकोण से ही नही, बल्कि समाज के सामूहिक विकास के लिए भी यह आवश्यक मानती है कि स्त्री  घर की सीमा के बाहर भी अपना विशेष  कार्यक्षेत्र चुनने को स्वतंत्र हो। अपने ‘घर और बाहर’ लेख में महादेवी ने स्त्री  के लिए विभिन्न व्यवासिक विकल्पों की बात की है। जिसके माध्यम से स्त्रियाँ भारतीय संस्कृति और समाज को उन्नत और गतिशील बनाने के साथ-साथ स्वयं भी आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और सुदृढ़ होगी।

चिकित्सा के समान कानून का क्षेत्र भी स्त्रियों के लिए उपेक्षणीय नही कहा जा सकता। साहित्य यदि स्त्री  के सहयोग से शून्य हो तो उसे आधी  मानव-जाति के प्रतिनिधित्व  से शून्य समझना चाहिए। महादेवी लिखती है कि ‘‘पुरुष के द्वारा नारी का चरित्र अधिक  आदर्श बन सकता है, परन्तु अध्कि सत्य नही, विकृति के अधिक निकट  पहुँच सकता है, परन्तु यथार्थ के अध्कि समीप नही। पुरुष के लिए नारीत्व अनुवाद है, परन्तु नारी के लिए अनुभव। अतः अपने जीवन का जैसा सजीव चित्र वह हमें दे सकेगी वैसा पुरुष बहुत साधना  के उपरांत भी शायद ही दे सके।’’12 यहाँ महादेवी का अभिप्राय यह नही है कि स्त्री  के विषय में चिंतन या शोध् पर केवल स्त्री  का ही अधिकार हो, पुरुष का नही। परंतु लेखिका यह दावा जरूर करती है कि विस्तृत क्षेत्र में स्त्री  की सक्रियता के बिना उसकी पराधीनता  की बेड़िया टूटना असंभव है।

वर्जीनिया वुल्फ वैचारिक और आर्थिक स्वंतत्रता को स्त्री  के लिए बहुत ही जरूरी मानती है। वह लिखती है कि ‘‘अगर स्त्री  आर्थिक रूप से सबल और समर्थ हो जाती है,  तो उसे किसी मर्द से नफरत करने की जरूरत नहीऋ वह उसे चोट नही पहुँचा सकता। और उसे किसी मर्द की चापलूसी भी करने की जरूरत नहीं,  क्योंकि वह उसे कुछ नही दे सकता।’’13 स्त्री  को चाहिए चीजों पर अपने आप में विचार करने की आजादी उदाहरण के लिए उस इमारत को मैं पंसद करती हूँ अथवा नही? वह तस्वीर सुंदर  है या नही? वह किताब मेरी राय में अच्छी है या बुरी? चेखव अपनी कहानी ‘डार्लिग’ में नायिका की पुरुषों पर निर्भरता और परमुखापेक्षिता दिखाते हुए नारी मात्र से यह अपेक्षा करते है कि वह तटस्थ दृष्टि और स्वंतत्र विचार रखे।

महादेवी स्त्री  को सबल और सक्षम बनाने का हल इसमें खोजती है कि माता-पिता को बाध्य होना चाहिए कि वे अपनी कन्याओ को उनकी रूचि तथा शक्ति के अनुसार कला, व्यवसाय आदि की ऐसी शिक्षा पाने दे,  जिसमें वे आर्थिक रूप में आत्मनिर्भर हो सके। ‘‘राष्ट्र की सुयोग्य संतान की माता बनना उनका कर्तव्य हो सकता है, परन्तु केवल उसी पर उनके नागरिकता के सारे अधिकारों का निर्भर रहना अन्याय ही कहा जायेगा।’’14 यहाँ महादेवी मातृत्व की अनिवार्यता पर प्रश्न उठाती है। भारत में अधिकाँश  स्त्रियाँ (चाहे वे अकेली हो, तलाक शुदा, भागी हुई या विधवा  हो ) जब पुरुष सुरक्षा से वंचित हो जाती है,  तो उनके उत्पीड़न की संभावना और अधिक  बढ़ जाती है। जिसका सबसे बड़ा कारण है,  उनका आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर न होना। आश्चर्यजनक रूप से ऐसी स्त्रियाँ  समाज के बजाय, अपने परिजनो के हाथों  उत्पीड़ित होना ज्यादा पंसद करती है।

सन् 2013 में संसद में तलाक संबंधी  कानून में बदलाव के लिए यह प्रस्ताव पेश किया गया कि स्त्रियों को तलाक के बाद अपने पति की उस संपत्ति में भी हिस्सा दिया जाए जिसे ‘मिल्कियत’ कहा जाता है। इससे पहले उसे पति द्वारा खर्चा भत्ता दिये जाने का प्रावधान  था। परंतु इस विधेयक  पर जेंडर बायसिस होने के आरोप लग रहे है। केवल स्त्री  को ही पति की संपत्ति में अधिकार क्यों हो, पति के लिए पत्नी की संपत्ति में ऐसे किसी अअधिकार  प्रावधन क्यों नही है। उन्हें संदेह है कि स्त्रियाँ इस कानून का दुरूपयोग  कर सकती है,  परंतु लोग इस जेंडर विभेद की जड़ में जाकर नही देखना चाहते कि क्यों आज स्त्री को ऐसे कानूनी अधिकार  मुहैया कराने की आवश्यकता पड़ती है।

भारतीय स्त्री  की गुलामी की परम्परा इसका सबसे बड़ा कारण है। भारतीय स्त्रियों का प्रतिनिधित्व  कौन करता है? वे घरेलू श्रमिक और ग्रामीण महिलाएँ जिनके पास आज भी अपनी कोई संपत्ति या अधिकार  नही है। और वह अपनी संपूर्ण ऊर्जा और कुशलता को ताउम्र पति और उसके परिवार की सेवा में झोक देती है। उनके अस्तित्व की कोई पहचान नही है,  जिसका सबसे बड़ा कारण है महिलाओ की आर्थिक परतंत्रता। विरासत से ही उन्हे ऐसे अधिकारों  से वंचित रखा गया। तब आज अचानक बराबरी की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। यह ठीक वैसा ही है जैसे आरक्षण लागू करने  के कारणो और आवश्यकताओं को न समझते हुए कई लोग उसका विरोध करते है। वे स्त्री  और दलित शोषण के इतिहास को भुला देना चाहते है। ‘सीमांतनी उपदेश’ में लेखिका ने औरतों की तत्कालीन आर्थिक स्थिति के बारे में  लिखा है कि ‘‘बाप के माल में से लड़कियों को कौड़ी भी नही मिलती। खाविंद की दौलत में कुछ अखत्यार नही। बेटे पर दावा चल ही नही सकता। और जो कोई दोलतमंद विधवा  होती है, बिरादरी के सब मिल के भाई या देवर का या फिर किसी और रिश्तेदार का लड़का गोद में बिठा देते है। उसके सब माल असबाव का मालिक बना देते है।’’15

भारतीय स्त्री  की आर्थिक स्वतंत्रता को लेकर सबसे विवादित मुद्दा रहा है ‘हिन्दू कोड बिल’। विवाह संस्था की दमनकारी संरचना स्त्री  को आर्थिक सुरक्षा देने से इन्कार करती है,  क्योंकि यही आर्थिक अधीनता  स्त्री  की पितृसत्ता पर निर्भरता सुनिश्चित करती है। विवाह संस्था के दमनकारी क्रूर पंजों से स्त्री  को आजादी दिलाने के उद्देश्य से डाॅ. अम्बेड़कर ‘हिन्दू कोड बिल’ लाए थे। डा. अम्बेडकर ने अपनी उच्च शिक्षा लंदन स्कूल आॅफ इक्नाॅमिक्स’ से ली थी। वहाँ जाकर उन्होंने आर्थिक पहलुओं पर रिसर्च की और अपने अनुभव से यह पाया कि पश्चिमी अर्थव्यवस्था के इतना मजबूत और समाज के विकसित होने का प्रमुख कारण है वहाँ की आधी  आबादी, यानि स्त्रियों का इसमें बराबर सक्रिय होना। भारतीय स्त्रियों की अधीनस्थता  को बाबा साहेब ने भारत के विकास में बहुत बड़ी बाध माना और उसका विरोध् भी किया।

डाॅ. अम्बेडकर ने महिलाओ को समान कार्य के लिए समान वेतन, मातृत्व लाभ, प्रसूति अधिकार अधिनियम ,विवाह-विच्छेद, अतंरजातीय विवाह, शिक्षा, संपत्ति में अधिकार  जैसे कई अधिकार  दिए जाने की बात रखी। परंतु रूढ़िवादी नेताओ के विरोध के  कारण यह बिल पास नही हो सका। उन्होंने इसे हिन्दू कानून की वैदिक, एवं शास्त्रीय जड़ों पर प्रहार करने वाला बिल बताया। बाबा साहेब ने स्त्री  के संपत्ति संबंधी  अधिकार  की मांग 1950 में की थी। पर उसके 55 वर्षो बाद सन् 2005 में  उत्तराधिकार संबंधी  विधेयक पास   हुआ, जिसमें संयुक्त हिन्दू परिवार में पुत्री  को भी पुत्र के समान संपत्ति का अधिकारी  माना गया। हालाकि व्यवहारिक तौर पर उसकी सामाजिक स्वीकृति आज भी बाकी है।

महादेवी हिन्दू कानून की, स्त्री  को संपत्ति के अध्किार से वंचित रखने की मंशा को इस रूप में रेखांकित करती है ‘‘संभव है स्त्री  के निकट वैवाहिक जीवन को अनिवार्य रखने के लिए ऐसी व्यवस्था की गई हो। दूसरा कभी युवतियाँ स्वयंवरा होती थी और कभी विवाह के लिए बलात छीनी भी जा सकती थी। ऐसी दशा में पैतृक संपत्ति में उनके उत्तराधिकारी  होने पर अन्य परिवारो के व्यक्तियों का प्रवेश भी वंश-परम्परा को अव्यवस्थित कर सकता था। चाहे जिस कारण से भी हो परंतुु इस विधान  ने पिता के गृह में कन्या की स्थिति को बहुत गिरा दिया।’’16 ऐसा नहीं  है कि स्त्री  के नाम पर सम्पत्तियाँ नही है या वे खरीदी व बेची नहीं जाती। परंतु ऐसा तभी किया जाता है जब पति या पिता को किसी तरह की बेईमानी या कर की चोरी करनी होती है।

मजदूर आदिवासी एवं दलित स्त्रियाँ,  एक ऐसा तबका है, जो स्त्रियों में  भी सबसे ज्यादा विषम परिस्थितियों और शोषण का शिकार होता  है। क्या यह वास्तविकता नही है कि अधिकाँश  मजदूर महिलाये आदिवासी और दलित होती हैं ? ।समाज का अधिकाँश  श्रम ये महिलाये ही करती है और बदले में सबसे कम पाती है। चाहे वह संपत्ति हो, आय हो, स्वास्थ्य, भोजन या फिर  सम्मान। कई स्थानो पर विशेषकर निर्माण कार्य में काम पूरे परिवार के आधर पर मिलता है। वहाँ मजदूरी परिवार के मुखिया (पुरुष) को ही दी जाती है और श्रम करने के बावजूद परिवार की महिलाओ के हाथ में कोई आय नही आ पाती। खेतो में कार्य करने वाली स्त्रियाँ पति के रोजगार में सहायक मानी जाती है,  श्रमिक नही। हमारे पास ‘फैकट्री  एक्ट 1948’ है, कि महिलाओं और पुरुषों को समान कार्य के लिए लिए समान वेतन दिया जाए पंरतु व्यवहार में इसका पालन नही किया जाता।

स्त्रियों की मुक्ति स्वयं स्त्रियों  पर निर्भर करती है। उन्हें सबसे पहले इस दमनकारी व्यवस्था के विभिन्न घटको का असहयोग करना चाहिए। जर्मेन ग्रीयर का मानना है कि ‘‘स्त्रियों को पूंजीवादी राज्य में प्रमुख उपभोक्त की अपनी भूमिका को भी ठुकरा देना चाहिए।’’17 बजारवाद स्त्रियों को घरो से बाहर तो ले आया। परंतु पुरुष के वर्चस्व और स्त्री  की अधीनस्थता की  स्थिति में सेंध्नही लगा पाया। और फिर उसकी ऐसी कोई कोशिश थी भी नही। बाजारवाद तो एक मुनाफा खोर संस्कृति है। पूंजीववाद ने भी स्त्री  का शोषण ही किया, फिर चाहे उसके उपभोक्तावादी रूप को पल्लवित करना हो या सस्ते श्रम के रूप में उसकी उपलब्धि !
प्रोद्यौगिकी और विकास के क्षेत्र में स्त्री  मुक्त हो रही है या फिर सकी गुलामी की जड़े और पुख्ता हो रही है? यह एक बड़ा सवाल है। जर्मेन ग्रीयर का मानना है कि मशीनीकरण के आगमन से स्त्रियों को घरेलू कार्यो से कुछ निजात तो मिली है ताकि वे अपने बारे में सोचने और संघर्ष करने का कुछ समय पा सके। वही दूसरी तरफ यह उपभोक्तावादी संस्कृति स्त्री  की परम्परागत इमेज को ही मजबूत और स्थापित करती है। जैसे डिटर्जेंट हो वा कपडे़ धेने की मशीन और बच्चो के डाॅयपर अक्सर औरते ही ऐसे विज्ञापन करती दिखेगी। अर्थात् यह उन्ही के कार्यक्षेत्र  का दायरा हो।

फैक्ट्ररियों और फर्म यानि उत्पादन के क्षेत्र में प्रोद्योगिकी आते ही स्त्री  श्रमिकों की छटनी शुरू हो जाती है। प्रोद्यौगिकी से जुडे़ शिक्षा व व्यवसाय के क्षेत्र में भी स्त्रियों का अनुपात पुरुषों की तुलना में ना मात्र ही होता है जैसे आई.टी. इंजीनियर, टैक्नोक्रेट आदि। मार्क्स इसका एक दूसरा ही पहलू सामने रखते है कि मशीनीकरण के बाद स्त्रियों और बच्चों की सस्ते मजदूर के रूप में पूंजीपतियों को सबसे पहले तलाश होती है। बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का मानना है कि स्त्री  श्रम का उपयोग आर्थिक दृष्टि से बड़ा लाभकारी है, स्त्रियाँ शिकायते नही करती, टेªड यूनियन नही बनाती, पुरुष की तुलना में कम पगार लेती है। साथ ही कभी भी निकाली जा सकती है। इसी के चलते पिछले दो दशको में श्रमशक्ति का स्त्री करण तेजी से हुआ है। विडम्बना यह है कि पूर्णरूप में भारतीय स्त्री  आज भी अपने आर्थिक अधिकारों  से वंचित ही है।

कोलनताई की राय थी कि स्त्रियों की कुछ खास समस्याएँ समाजवाद में ही हल हो सकती है। मसलन बच्चो की देखभाल, मातृत्व, घरेलू काम-काज आदि। समाजवाद ने बड़े ही कौशल से इस अंतर्विरोध् को हल किया। सामूहिक  रसोईघरो, मातृत्व के कारण विशेष छुट्यिाँ एवं पूरी  पगार, बच्चो की देखभाल के सरकारी प्रबंध् किए गए। समाजवादी सोवियत संघ में स्त्रियाँ कानूनी तौर पर स्वतंत्र थीं , पुरुषों के समान थीं । सामाजिक जीवन में उत्पीड़ित-दमित नही थीं । इसके बावजूद स्त्री -पुरुष के बीच मौजूद अंतर्विरोध् एवं पुरुष का वर्चस्व बना रहा। इससे स्त्री  के प्रति बुनियादी रवैये एवं मूल्य संरचना में मूलगामी बदलाव नही आया।

पुरुष वर्चस्व को खत्म करने के लिए ही महादेवी, स्त्रियों को स्वयं भी कुशल और सक्रिय होने की सलाह देती है। ताकि स्त्रियाँ पुरुषों के अनुपात में ही भौतिक उत्पादन के साथ-साथ बौद्धिक  उत्पादन पर भी अपना नियंत्रण स्थापित कर सकें। क्योकि केवल राज्य की सेवा या सुविधओ पर निर्भर होकर स्त्री , पुरुष के वर्चस्व को कभी खत्म नही कर पाएगी।

संदर्भ
1.  वुल्फ, वर्जीनिया, अपना कमरा ;अनु. गोपाल प्रधनद्ध, पृ. 34
2.  वर्मा महादेवी,  शृंखला की कड़िया, पृ. 23
3.  वही, पृ. 87
4.  वही, पृ. 73
5.  वही, पृ. 87
6.    बोआ, सीमोन दी, स्त्री -उपेक्षिता (अनु. प्रभा खेतान), पृ. 26
7.    वर्मा, महादेवी,  शंृखला की कड़ियाँ, पृ. 25
8.   कुमार, राध, स्त्री  संघर्ष का इतिहास 1800-1900, पृ. 139
9.    बोउआ, सीमोन दी, स्त्री  के पास खोने के लिए कुछ नही है ;अनु. मनीषा पांडेयद्ध, पृ. 52
10.  वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 24
11.  ग्रीयर, जर्मेन, बढ़िया  स्त्री  (अनु. मधू बी. जोशी), पृ. 123
12. वर्मा, महादेवी,  शंृखला की कड़ियाँ, पृ. 63
13.  वुल्फ, वर्जीनिया, अपना कमरा (अनु. गोपाल प्रधान ) , पृ. 77
14.  वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 69
15.  महिला, अज्ञात हिंदू, सीमांतनी उपदेश, पृ. 96
16. वर्मा, महादेवी,  शृंखला की कड़ियाँ, पृ. 88
17.  ग्रीयर, जर्मेन, बध्यिा स्त्री  (अनु. मधु  बी. जोशी), पृ. 294
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