इतिहास के आईने में महिला आंदोलन

निवेदिता
मूलतः पत्रकार निवेदिता सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे' प्रकाशित . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com 
 नारीवादी सिथिंया एनलो ने भूमंडलीकरण के समर्थकों से पूछा था कि तुम्हारी व्यवस्था में ‘औरतें कहां हैं’? इस छोटे से सवाल का उस समय लंबा जबाब दिया गया था कि औरतें कहां नहीं हैं, किस मोर्चे पर  नहीं है? पर सच तो यह है कि भूमंडलीकरण के इस दौर में औरतें जितनी सबल दिखतीं हैं उतनी ही वह हारी हुई दिखती है। बाजार के जाल में फंसी हुई । आजादी की कीमत चुकाती हुई। हाफतीं हुई ,लडती -भिड़ती हुई। सामाजिक स्थितियां राजनीतिक घटनाक्रमों की रफ्तार से नहीं बदलती। वर्गो और विभिन्न सामाजिक श्रेणियों में बंटे समाज में स्त्री की हालत इसलिए भी बुरी है कि वह इन विभेदों के साथ़-साथ पितृसत्तात्मक समाज को भी झेल रही है।

आजादी के बाद  देश में जो समाजिक, आर्थिक व राजनीतिक बदलाव हुए उस बदलाव में स्त्रियों की साझेदारी रही है। साझेदारी से ज्यादा उसने घर और बाहर के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई लड़ी। पर ये लड़ाईयां इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हुई। जो कुछ नाम दर्ज हैं वे इसलिए कि इन नामों के बिना इतिहास लिखा नहीं जा सकता था वर्जीनिया वुत्फ ने एक जगह लिखा है ‘इतिहास में जो कुछ अनाम है वह औरतों के नाम है’। इतिहास में औरतों की भूमिका हमेशा  से अदृश्य रही है। उसकी एक वजह है कि हम इतिहास चेतन नहीं रहे। इतिहासकारों ने प्रतीकों, लोक गाथाओं, गीतों व अन्य स्त्रोतों को कभी समेटने की कोशिश नहीं की। हम जानते हैं कि व्यवस्थित रुप से इतिहास रचने की मंजिल पर पहुंचने से पहले ऐसे सभी समुदाय पहले चरण में आत्मगत ब्योरों का इस्तेमाल करते हैं ताकि उनकी बुनियाद पर इतिहास लिखने की इमारत खड़ी की जा सके। आशा रानी वोरा  ने जब महिलाएं और स्वराज किताब लिखना शुरु किया तो उन्हें तथ्य जुटाने में 12 वर्ष लगे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि आजादी आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर लिखने के लिए जब सामग्री जुटाने लगी तो गहरी निराशा हुई।

माना जाता है कि उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में अनेक महिला आंदोलन हुए। पर उन आंदोलनों का कोई इतिहास नहीं मिलता। यही वह क्षण है , जब स्त्री आंदोलन व देश  में हुए आंदोलन का पुर्नमूल्याकंन जरुरी है ताकि मुक्ति की सामाजिक परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ा जा सके। जब देश  में आजादी के आंदोलन की लहर थी तो बिहार भी उस आग में लहक रहा था। औपनिवेशिक काल में बिहार में बंगालियों,कायस्थों और मुसलमानों का अभिजात तबका काबिज था,जमींदारी मुख्यतः भूमिहारों,राजपूतों,बा्रह्मणों,मुसलमसनों और कायस्थों के हाथ में थी। 1920 के असहयोग आंदोलन 1932 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में राजपूत और भूमिहार जाति ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। और यह समुदाय राजनीति में अपना प्रभाव बनाने लगा। उसी दौर में महिलाएं वोट देने के अधिकार को लेकर आंदोलन कर रही थीं। यह त्रासदी है कि जिस आंदोलन की शुरुआत महिलाओं ने बींसवीं सदी के आरंभ में की थी, आज उसी तरह का आंदोलन राजनीति में 33 प्रतिशत हिस्सेदारी को लेकर है। आजाद मुल्क में भी महिलाओं को उसके हिस्से का हक लेने के लिए लड़ना पड़ रहा है।

राजनीतिक रुप से बिहार हमेशा  से चेतनशील रहा है। 1917 में महात्मा गांधी के आगमन के बाद पर्दा प्रथा,बाल विवाह, सती प्रथा, शिक्षा जैसे सवालों के साथ-साथ असहयोग, स्वदेशी  खिलाफत और खादी के आंदोलन में महिलाओं ने जमकर हिस्सा लिया। 1912 में पटना में राममोहन राय सेमिनरी में महिला सम्मेलन का आयोजन किया गया। श्रीमती मधोलकर ने इसकी अध्यक्षता की। और बाल-विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। 1928 में महिलाओं ने साइमन कमिशन का जबरदस्त विरोध किया। बिहार में लेजिस्लेटिव कौंसिल में महिलाओं को वोट देने के अधिकार व लेंगिक भेदभाव को लेकर नवम्बर,1921 को एक प्रस्ताव पेश किया गया। 1919 के एक्ट के अनुसार वे वोट नहीं दे सकती थीं। कौंसिल में इस मसले पर जमकर बहस हुई। और यह प्रस्ताव 10 वोटों से गिर गया। और कोलकाता में पेश महिलाओं के मताधिकार देने संबंधित प्रस्ताव भी भारी मतों से पराजित हो गया। पर महिलाएं हिम्मत नहीं हारीं। उनके संघर्ष जारी रहे। लंबी लड़ाई के बाद बिहार और उड़़ीसा में 1929 में यह अधिकार महिलाओं को मिला।

अतीत में हुए संघर्ष को देखते हुए हम ये कह सकते हैं स्त्री के भीतर आजादी की आग है। और उसकी पहली लड़ाई है वर्चस्व विहीन समाज की स्थापना। यही वजह है कि आज स्त्रियाँ  परिवार में श्रम के विभाजन,पारवरिक संबंधों में उसकी उपस्थिति और सत्ता में उसकी जगह को लेकर आंदोलित हैं । महत्वपूर्ण बात यह है कि स्त्रियों का आंदोलन एकालाप में नहीं चलता।  समाजिक, राजनीतिक और आर्थिक आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका का भले ही आंकलन नहीं हुआ हो सच तो यह है कि सभी आंदोलनों में उसकी भागीदारी रही है। देश में 70 के दशक में जयप्रकाश  नारायण के नेतृत्व में बड़ा आंदोलन हुआ। जिस आंदोलन ने सत्ता  की नींव हिला दी। उसमें बड़ी संख्या में स्त्रियों ने हिस्सा लिया। काॅलेज स्कूलों से निकल कर निरंकुश सत्ता के खिलाफ वे सड़कों पर थीं। स्त्री जब भी किसी आंदोलन का हिस्सा होती हैं,  तो वह एक साथ कई वर्जनाओं को तोड़ती है।
स्त्री आंदोलन को महत्वपूर्ण आयाम देने वाली सिमोन द बोवुआर कहतीं हैं ' मात्र वर्ग संघर्ष के द्वारा ही स्त्री-मुक्ति के महान लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सकता है....चाहे साम्यवादी हों,माओवादी हों,या ट्रस्टवादी औरत हर जगह हर खेमें में अधीनस्थ की स्थिति में है,सबसे निचले पायदान पर खड़ी है।'  जब देश  में 74 का आंदोलन हो रहा था उसी दौर में देश  के कई हिस्सों में स्त्री हिंसा के वीभत्स मामले सामने आ रहे थे। यह वहीं दौर था जब रुप कंवर को सती के नाम पर जबरन जला दिया गया। इस अमानवीय घटना के विरुद्ध  महिलाओं ने जबरदस्त आंदोलन किए। 92 आते -आते देश को हिला देने वाली घटना हुई- भवंरी बाई के ऊपर बलात्कार की घटना ।

आजादी के बाद 80 का दशक भारत में स्त्री आंदोलन का दशक माना जाता है। महिलाएं एक तरफ स्त्री के मसले पर लड़ रही थीं दूसरी तरफ देष में चले सभी प्रमुख आंदोलन में उसकी हिस्सेदारी रही। राजनीति में अपनी हिस्सेदारी से लेकर वह जल,जंगलऔर जमीन की लड़ाई में लगी रही। बिहार में जमीन की लड़ाई में मूल रुप से वामपंथी पार्टियों का असर रहा है। 80 के दशक में नक्सल आंदोलन का विस्तार हुआ। राजनीतिक शक्तियों के रुप में खुद को स्थापित करते के लिए उन्होंने संसदीय राजनीति का रास्ता चुना।1985 में उनका मुख्य हिस्सा चुनावी संघर्षो में शामिल हो गया। 74 के जनआंदोलन से वे अलग.-थलग ही रहे।  जन आंदोलन और चुनावों में भागाीदारी के जरिए दलित और अति पिछड़ी जातियों के गरीब तबको के बीच खासकर मध्य बिहार में भाकपा माले का व्यापक विस्तार हुआ। इस तबके के बीच जनता दल आदि पार्टियों का भी गहरा असर था। दलित और पिछड़ों के सामाजिक व राजनीतिक विस्तार को देखते बड़े भूस्वामियों और उच्य वर्ग के किसान जातीय राजनीति के नाम पर गोलबंद होना शुरु हुए। बिहार में कई जातीय नरसंहार हुए। जिसमें सबसे ज्यादा दलित और पिछड़ी जाति की महिलाओं व बच्चे निशाना बने। दरअसल 72से 85 के बीच तानाशाही बनाम लोकशाही, केन्द्र में जनता प्रयोग की विफलता और विपक्षी शक्तियों का बिखराव और 80 में इंदिरा गांधी की हत्या और राष्ट्रीय एकता जैसे सवाल ने दलितों व पिछड़ों के मुद्दे  को पीछे ढकेल दिया।

 90 के दशक आते आते यह एक बड़ा मुद्दा  बना। फिर आया मंडल का दौर।  पिछड़ों व दलितों की भागीदारी जैसे सवाल अब राजनीतिक सवाल था, जिससे कोई पार्टी बच नहीं सकती थी। पिछले 22-25 सालों में निश्चय ही सामाजिक परिवर्तन के लिहाज से यादगार काल है, जिसने परंपरागत राजनैतिक ढांचे को ध्वस्त कर दिया। वंचित समुदायों में नई राजनीतिक चेतना आई। राजनीतिक परिवर्तन के काल में इसे चिन्हित किया गया। इसी काल में लोगों को आवाज मिली और इसी दौर में अति पिछड़ों को पंचायतों में आरक्षण मिला। महिलाओं को आरक्षण मिला।

पर बात यहीं खत्म नहीं होती। जैसे-जैसे स्त्री अपने अधिकार के प्रति सजग हुई उसपर हमले तेज हुए। इस सदी मेें भी निर्भया बलात्कार जैसे जधन्य मामले सामने आए। जिसने देश को आंदोलित किया। उसी आंदोलन का नतीजा है कि बलात्कार के विरुद्ध कड़े कानून बने। स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गो एवं वर्णो तथा जातियों के बीच नए-नए समीकरणों से चाहे कुछ भी नहीं मिला हो पर वह लड़ रही है। अपनी क्षमता और कौशल को और अधिक तराश  रही है। वह इस अमानवीय परंपरा के विरुद्ध खड़ी है। पूंजीवादी पितृसत्ता उपर से चाहे जिनती उदार और सरल लगे भीतर से बड़ी जटिल है। प्रभा खेतान कहती हैं कि ' दोष इसकी संरचना में ही है।'   हमें इस संरचना से ही अलग होना होगा। इसके लिए स्त्री समूह की जरुरत है। उसे हर मोर्चे पर लड़ना होगा। दुनिया की आधी आबादी स्त्रियों की है, दुनिया में दो तिहाई काम औरतें करतीं हैं लेकिन दुनिया की सबसे गरीब कौम औरत ही है।

ये औरत कौन है,  जो लड़ रही है,  जो जीने का हक मांग रही है,  जो जानती है अपमान सहती हुई शोषणग्रस्त आधी आबादी जब विद्रोह करेगी तो उसमें सच्ची आग और तड़प होगी। वह फूटती-लरजती जहां-जहां बहेगी वही से इतिहास का नया अध्याय लिखा जायेगा। जो नारा कार्ल मार्क्स  ने दुनिया के मजदूरों के लिए दिया था वह नारा उसके लिए है। वह कह रही है दुनिया कि स्त्रियां एक हो तुम्हारे  पास खोने के लिए कुछ नहीं है।

सन्दर्भ स्रोत :
महिला और राजनीति -लेखक -श्रीकांत
प्रभा खेतान का आलेख-‘हंस’ की नारीवादी उड़ान
बिहार में सामाजिक परिवर्तन के कुछ आयाम-श्रीकांत/प्रसन्न चैधरी

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