मंच पर स्त्री

मोना झा

बिहार में रंगमंच का एक जाना पहचाना नाम है मोना झा का . ढाई दशक की रंगमंच की अपनी यात्रा में मोना ने जिन किरदारों को जिया है , उनमें से दो महत्वपूर्ण किरदारों की कहानी और उनको जीने के अपने अनुभव बता रही हैं वे. इस प्रस्तुति के दूसरे हिस्से में वरिष्ठ साहित्यकार हृषिकेश सुलभ मोना की अभिनय दृष्टि और अभिनय -यात्रा पर अपनी बात कह रहे हैं , मोना से एक बातचीत के आधार पर . 

एक अकेली औरत का एक दृश्य

आजादी के पहले और आजादी के बाद भी हिन्दी नाटकों में स्त्री  को केन्द्र में  रख कर बहुत कम नाटक लिखे गए हैं. फिर भी कुछ नाटक ऐसे हैं जहाँ स्त्रियाँ बहुत मजबूती से सामने आती हैं, जैसे- भारतेंन्दु का नाटक नीलदेवी, जयशंकर प्रसाद का नाटक ध्रुवस्वामिनी, स्कन्दगुप्त,धर्मवीर  भारती का नाटक आषाढ़ का एक दिन, आधे -अधूरे,  लहरों का राजहंस या भिखारी ठाकुर के नाटक। भिखारी ठाकुर के नाटकों में स्त्रियाँ केन्द्र में हैं। उन्होनें अपने सभी नाटको में स्त्रियों का दुखः, उनका शोषण उनकी लड़ाई सभी को बड़े मार्मिक ढंग से दिखाया है। चाहे वो ‘बेटी बेचवा’ हो ‘गबरघिचोर’ या कोई अन्य नाटक।

अपने 25 साल के रंगमंच की यात्रा में मैंने कई महत्वपूर्ण नाटक किए हैं, उनमें से कुछ नाटक ऐसे हैं, जिनके किरदारों को मै बार-बार करना चाहूँगी। चाहे वो शरण कुमार लिंबाले की आत्मकथा में लिंबाले की माँ की भूमिका हो, या ‘दारियो फो’ की ‘अकेली औरत’ ‘न्यायप्रिय’ की क्रांतिकारी  दमयंती या दारियो फो का नाटक ‘आरकेंजिल्स डोंट प्ले पिनबाॅल’ की सावित्री या चेखव की दुनिया की एक कहानी, जिसको हमलोगों ने ‘राजू बन गया जेन्टलमैन’ के नाम से किया था। मैंने कई निर्देशकों के साथ काम किया। सबने मुझे माँजा और अनुभव का बड़ा संसार दिया . इन किरदारों को करते हुए मुझे बहुत ही रोमांच का अनुभव हुआ .

मोना झा
 मैंने इन किरदारों की तैयारी कैसे की, इसके बारे में मैं कुछ बात-चीत करना चाहूँगी । इस लेख में मैं दो नाटकों की चर्चा करूँगी । सबसे पहले कामू का नाटक ‘न्यायप्रिय’, जिसमें मैंने दमयंती (डोरा) की भूमिका की थी। यह नाटक 1905 में हुए रूसी क्रांति की पृष्ठभूमि पर आधरित है। हमलोगों ने इस नाटक के दो अनुवाद , डा. सच्चिदानंद सिन्हा एवं प्रो. शरद चन्द्रा , पर आधरित एक तीसरा स्वतन्त्र रूप  तैयार किया। इसका काल आजादी के पहले 1930 के आस-पास का रखा गया। इस नाटक में हिंसा को लेकर एक गंभीर बहस है जो आज भी उतना ही मौजू है।

कामू का नाटक मैं पहली बार कर रही थी। पूरी टीम के लिए उनकी भाषा की बुनावट को समझना आसान नहीं था। उनकी वाक्य संरचना को लेकर अक्सर हमलोग फँसते थे और लंबी बहस किया करते थे। इस नाटक को  करने के दौरान पहली बार मुझे अहसास हुआ कि भाषा सिर्फ एक शब्द या वाक्य नहीं है बल्कि यह एक विमर्श है और इस विमर्श को समझने की जरूरत है।दमयंती का किरदार काफी जटिल और ‘अंडरटोन’ भी है। दमयंती उस क्रांतिकारी दल की एक महत्वपूर्ण पुरानी सदस्य है। अपने दल के साथियों के साथ उसका गहरा लगाव है। सभी गुुलाम भारत की आजादी के लिए प्रतिबद्ध  हैं। वे एक संवेदनशील और गरिमामय समाज बनाना चाहते हैं। लेकिन उसके लिए उन्होंने जो रास्ता अपनाया है वो हिंसा का है। हिंसा को लेकर कई प्रश्न उसके मन में उठते हैं उसका जवाब वो खोजती है अपने दल में बहस करती है।

दमयंती के किरदार के तैयारी के दौरान मुझे लगा कि ये समझना जरूरी है कि राजनैतिक हिंसा क्या है। दमयंती बतौर किरदार हिंसा को कैसे देखती है, वह क्या सोचती है। उसके भीतर और बाहर जो अन्तर्द्वन्द्व  चल रहा है, उसको मंच पर किस तरह अभिव्यक्त करना है। इस पर मैं लगातार सोच रही थी। मैने उस ‘टूल’ को खोजना शुरू किया जिसके माध्यम से वो अपनी बेचैनी और वैचारिक उथल-पुथल को अभिव्यक्त कर सके।
मैंने दमयंती के चेहरे को बहुत सपाट और निर्विकार रखा। दमयंती लगातार बम बनाती है और बम बनाना उसका रोज का काम है फिर  भी वो बम बनाते समय बहुत सतर्क रहती है क्यों कि उसके एक साथी की जान बम बनाते समय चली गई थी। उसको पता है जरा सी चूक सब कुछ ध्वस्त कर सकती है। इस पूरे सीन को जीवंत बनने में विनीत कुमार (अभिनेता)  ने मेरी बहुत मदद की, वे उन दिनों पटना आए हुए थे और हमारे पूर्वाभ्यास में  रोज बैठते थे। उन्होने बम बनाने की पूरी प्रक्रिया मुझे बतायी और मेरे ‘बाॅडीमूवमेंट’ को लेकर कई सुझाव दिये। दमयंती की चेहरे पर लगातार एक सपाटपन रहता है लेकिन भीतर ही भीतर वो बहुत ही संवेदनशील है।शेखर के साथ एक सीन में बहुत सहज तरीके से ये चीजें सामने आती हैं। मैंने इसकी तैयारी के लिए भगत सिंह के दल के बारे में गहरी जानकारी ली। उनके दल में किस तरह की बहसें हुआ करती थीं। उनके दल की तस्वीरों को हमने देखा, दुर्गा भाभी के बारे में जानकारी ली।

न्यायप्रिय की दमयन्ती की भूमिका में


अंतिम दृश्य में जहाँ शेखर को फाँसी हो जाती है। और उसके बाद दमयंती गहरे अवसाद में चली जाती है, इस दृश्य को दर्शाना बहुत कठिन था क्यों कि नाटक का अंत भी इसी दृश्य से होता है। निर्देशक ने मुझे एक सुझाव दिया कि तुम अपने जीवन के उस क्षण को याद करो जब तुम गहरे दुखः में थी। कभी-कभी गहरे अवसाद के समय ठंड की अनुभूति होती है उस अनुभूति को महसूस करो। इस दृश्य को करते समय अभ्यास के तौर पर लगातार काँपती रहती थी। धीरे -धीरे अपने-आप भावनात्मक रूप से मैं पूरे अवसाद को दमयंती के तौर पर महसूस करने लगी। इस नाटक का पूर्वाभ्यास ढाई महीने तक चला और इन ढाई महीने मैने दमयंती को बहुत गहराई से महसूस किया। एक दृश्य में जब दमयंती कहती है कि मैं बम फेंकना चाहती हूँ उस पर बलदेव दा (दलप्रमुख)  कहते हैं  कि तुम जानती हो कि हम महिलाओं को पहली कतार में नहीं रखते है। यह सुनकर दमयंती बिफर पड़ती है और गहरे दुःख के साथ कहती है ‘क्या मैं एक औरत हूँ अब भी’ मात्र इस पंक्ति से राजनैतिक स्तर पर औरतों को कैसे दोयम दर्जे मेें रखा जाता है ये पता चलता है और अभी भी ये स्थिति बहुत बदली नहीं है। इसकी लड़ाई भी दमयंती अपने दल में लड़ती है।

इसी कड़ी में मैं एक और नाटक की चर्चा करना चाहूँगी। यह नाटक है ‘अकेली औरत’।यह नाटक दारियो फो  और उनकी अभिनेत्री पत्नी प्रफैंका रैमे ने मिल कर लिखा है। इसका हिन्दी नाट्यरूपान्तरण जावेद अख्तर खाँ और सी.एल. खत्री  ने किया। ‘अकेली औरत’ अभी तक किए नाटकों में सबसे अलग है। पहली बार बिल्कुल औपचारिक तरीके से संस्था के सदस्यों और कुछ मित्रों के सामने इसका पाठ किया गया। पाठ के बाद बिल्कुल सन्नाटा सा पसर गया, कोई कुछ भी नहीं बोल रहा था, सभी साथी चुप थे। निर्देशक परवेज अख्तर ने कहा कि ये बहुत जरूरी नाटक है इसको जरूर करना चाहिए।

एक अकेली औरत


एकल अभिनय कई मायने में समूह नाटक से अलग होता है। समूह नाटक में मंच पर आपके साथ कई अभिनेता काम करते हैं । हरेक की जिम्मेदारी होती है कि नाटक अपने पूरेपन के साथ दर्शकों के सामने प्रस्तुुत हो, लेकिन एकल अभिनय में मंच पर आप बिल्कुल अकेले होते हैं, आप को ही सबकुछ करना पड़ता है। संवाद के सारे सिरों को याद रखने की और पूरे एकाग्रता और उर्जा के साथ मंच के हरेक कोने को जीवंत रखने की जिम्मेदारी भी आपकी ही होती है। पूर्वाभ्यास के दौरान मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ कि बहुत भावनात्मक सीन करते हुए मैं बहने लगती थी। मेरा मूवमेंट  गलत हो रहा है इसका ध्यान ही नहीं रहता था। एक रौ मेें बहती जाती थी। ये अभिनेता या अभिनेत्री की बहुत बड़ी कमजोरी है ये नाटक करने के दौरान मैंने जाना और मैंने इसके लिए बिल्कुल सचेत रूप से अभ्यास किया कि चाहे कितना भी भावनात्मक दृश्य हो या उत्तेजना से भरा हुआ दृश्य हो अभिनेता को दिमागी रूप से बिल्कुल सचेत और अपनी उत्तेजना और भावना पर नियंत्रण होना चाहिए। ये सब लंबे अभ्यास से ही हो पाता है।

अकेली औरत एक ऐसी औरत की दास्तान है , जो हमारे आस-पास कहीं भी मिल जाएगी, हमारे मध्यवर्गीय और संभ्रांत समाज में भी। इस नाटक में एक औरत को कमरे में बंद करके रखा जाता है। उसके बच्चे को उससे छीन लिया जाता है उसे शारीरिक यातना दी जाती है, उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाया जाता है।
मैं ऐसी ही एक औरत का किरदार कर रही थी। मैने अपने आस-पास ऐसी हिंसा को देखा है। मैने विस्तार से इस पर काम करना शुरू किया, कईं घरेलू हिंसा से पीडि़त महिलाओं के दस्तावेज को पढ़ा, उनका इंटरव्यू देखा, फिल्में  देखी। इस नाटक में गालियों का काफी प्रयोग है। गालियों को सहज तरीके से बोलना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल था इसका मैने अलग से अभ्यास किया।

एक अकेली औरत
 इस नाटक में यौन अंगों पर यौन संबंधें को लेकर कई संवाद हैं। मेरे सामने ये समस्या आयी कि इसको आंगिक भाषा में कैसे दिखाया जाए। रचना में लिखना और मंच पर अपने शरीर के माध्यम से दिखाना बहुत ही जटिल है। बहुत ही बारीक फर्क होता है श्लील और अश्लील में। मेरे मन में बार-बार शंका हो रही थी कि चीजें नकारात्मक न हो जाय, वह औरत हँसी की पात्र न बन जाय। अपनी शंका मैने निर्देशक के सामने रखी, उन्होनें कहा कि तुम इसकी चिंता छोड़ दो मैं बैठा हूँ देखने के लिए। उन्होने कहा कि मंच पर अभिनेता और अभिनेत्री गंभीर है और पूरी गंभीरता से बिना मजाक बनाए हुए दर्शकों के सामने अभिनय करते हैं तो दर्शक भी उसको उसी गहराई और संवेदनशीलता से लेता है। परवेज जी ने कहा कि यौन अंगों का  जिक्र करते समय इसे बिल्कुल स्पष्ट रूप से व्यक्त करना है। एक दृश्य में मुझे पुरुष के लिंग को दर्शाना था, मैने उसे केहुनी तक हाथ उठाकर दर्शाया था। उसी तरह एक दृश्य में  संभोग के बार में बताना था इसे मैने पैर फैलाकर दिखाया था। शुरू के पूर्वाभ्यास में इन दृश्यों को करने में मुझे काफी परेशानी हो रही थी,  क्यों कि हम अपने आप जीवन में यौन अंगों और सेक्स को बिल्कुल छिपा कर रखते हैं उस पर कोई चर्चा भी नहीं करना चाहते हैं, लेकिन मैं लंबे पूर्वाभ्यास के बाद सहज होती गई। मेरे लिए केन्द्र में सिर्फ वो अकेली औरत थी,  उसका संघर्ष उसका अकेलापन उसकी यातना और उसका विद्रोह। पूरी टीम ने बहुत मेहनत की। अंततः वह दिन आ गया.........
शो के पहले आधे  घंटे तक मैंने एक्सरसाइज किया और थक के लेट गई। चुपचाप अपने किरदार के बारे में सोचने लगी। पहली घंटी बजी और हमारे निर्देशक परवेज अख्तर ग्रीनरूम आए और मेरा हौसला बढ़ाया कहा कि पूरी उर्जा से करना, तुम ने इतनी मेहनत की है शो जरूर अच्छा होगा। टीम के सारे सदस्यों ने हौसला बढ़ाया। मेरा दिल जोर-जोर से धडक  रहा था कि अचानक म्युजिक शुरू हुआ और मेैंने अपने अंदर अकेली औरत को महसूस किया। मुझे अपने भीतर से आती उसकी आवाज सुनाई दी और मैं मंच की तरफ चली गई। इन किरदारों ने मेरे जीवन को बहुत संवेदशील बनाया। मेरे अनुभव के संसार को विस्तार मिला नया आयाम मिला, मुझे हमेशा ऐसा आभास हुआ कि मेरी आवाज उन हजारों महिलाओं की आवाज है जो आज भी संघर्ष कर रही हैं । हाशिए से आगे आने की कोशिश कर रही हैं।

( कथादेश के एक अंक में वरिष्ठ  साहित्यकार हृषिकेश सुलभ मोना झा के अभिनय और उनकी अभिनय दृष्टि पर : बातचीत आधारित )

अभिनय बाहर और अंदर दोनो स्तरों पर चलता है : 

साग मीट में


मुझे ठीक-ठीक तारीख याद नहीं, पर वह मध्य नवम्बर की हल्की ठंढ वाली  एक अनौपचारिक शाम थी. रंगकर्मी-नाटककार-अभिनेता जावेद अख्तर खां के घर बैठा था. हम दोनों काली चाय की घूंट भरते हुए पटना रंगमंच के दिनों की स्मृतियों को सहेज रहे थे. बात आगे बढती गयी. हम स्मृतियों की ढूहों को पर करते गए....और सामने थी आज के पटना की पथरीली भूमि....पटना रंगमंच ,...एक छोटे शहर के रंगमंच की समस्याएँ,....हत्या-अपराध-नृशंसता से जूझते एक साहसी शहर के रंगमंच की समस्याएँ....रंगमंच पर पड़ते दबावों के बीच विकसित होती रंगकर्म की नई सीमाएँ और नयी चुनौतियाँ....इसी बीच दृश्य में प्रवेश किया मोना झा ने. अभिनेत्री-नृत्यांगना मोना झा,...जावेद की पत्नी मोना झा. बगल के कमरे में सोई बेटी तनया को देखकर पहले आश्वस्त हुईं मोना और फिर शामिल हो गईं हमारी बातचीत में. “नृत्य का अभ्यास छूटने लगा था....रियाज़ करके आ रही हूँ....बस आज का दिन...एक सोमवार ही मिल पा रहा है....बाकी....बाकि दिन नरमेध.’’ ‘’नरमेध !” मै चौंक उठा. जावेद ने हँसते हुए कहा- “परवेज साहब की नई प्रस्तुति का नाम है यह. भीष्मजी की दो कहानियों ‘साग-मीट’ और ‘त्राश’ का मंचन वे ‘नरमेध’ शीर्षक से करने जा रहे हैं, जिसमें सिर्फ़ हम दोनों ही अभिनय कर रहे हैं. ‘साग-मीट’ में मोना और ‘त्राश’ में मै हूँ .” हमारी बातचीत रंगमंच के इस संक्रमण कल में अभिनेताओं तक पहुँची, तो मोना मुखर हुई, “...थियेटर से जुड़नेवाले नए लोग कुछ ज्यादा ही आत्मविश्वास से भरे हुए हैं. आत्मविश्वास ज़रूरी होता है, पर उसकी अधिकता सीखने में बाधा बनती है. अधिकतर नए लोग ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे उन्होंने सब कुछ पहले से ही सीख लिया हो....और आनन-फानन में सब कुछ पाना भी चाहते हैं. मैंने जब काम शुरू किया...इप्टा से जुड़ी, तो नहीं लगता था कि मैं कर पाऊँगी. मै नृत्य करती थी और अभिनय मुझे ज्यादा कठिन लगता था. पर धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा. ‘अंधायुग’ में गान्धारी की भूमिका करने के लिए जब कहा गया, मैं तो घबरा ही गई. उन दिनों मेरे लिए नृत्य ही प्रमुख था....वैसे मुझे बार यानी, हर नाटक में आरम्भ करना पड़ता है....मुझे लगता है, मैं कुछ नहीं जानती और सब कुछ जानना है. यहीं से शुरुआत होती है. नाटक के पहले पाठ से ही यह बात शुरू होती है,... और धीरे-धीरे सब कुछ आकार लेने लगता है. इसमें बड़ी भूमिका निर्देशक की होती है. मैंने ज्यादातर काम परवेज अख्तर के साथ किया है. निर्देशक से बहुत कुछ मिलता है, जिसके आधार पर अभिनेता अपने आप को विकसित कर सकता है....फिर आप दूसरों का काम देखते है,उससे भी सीखते हैं. मैंने आरंभिक दौर में पटना के तमाम रंगकर्मियों का काम देखा. आप जब दूसरों का काम देखते हैं, तो आपको अपनी ग़लती या सीमाओं का ज्ञान होता है. पहले शरीर की भाषा...बॉडी लैंग्वेज...और स्पीच में तालमेल का अभाव था, जिसे परवेज अख्तर के साथ काम करते हुए मैंने ठीक किया. दूसरों का काम देखकर भी पता चलता है कि जब आप स्वयं मंच पर होंगे और ऐसा करेंगे, तो दर्शकों की क्या प्रतिक्रिया होगी.”

नृत्य और अभिनय के अन्तर को स्पष्ट करते हुए मोना झा ने कहा, “नृत्य और अभिनय में कई मौलिक अंतर हैं. नृत्य में अभिनय शामिल है, पर वह अभिनय नहीं है. नृत्य में चरित्र ज्यादा एक्सपोज किया जाता है. अभिनय, बाहर और अंदर दोनों स्तरों पर चलता है. अभिनय में हर क्रिया के कारणों की पड़ताल आवश्यक होती है और उसका सम्प्रेषण भी आवश्यक होता है. रोना है, तो रोइए...पर क्यों? रोने का कारण संप्रेषित करना है और यह  अभिनय की अनिवार्यता है. नृत्य में यह प्रक्रिया अनिवार्य नहीं है.”

रक्तकल्याण  में  मोना जावेद अख्तर के साथ
                                                 

मधुबनी (बिहार) में सन 1970 में पैदा हुईं मोना झा ने कत्थक से अपनी यात्रा आरम्भ की और फिर पटना इप्टा से जुड़ी. लगभग डेढ़ दशाक्तक इप्टा से जुड़कर नाटक करने के क्रम में मोना झा ने एक समर्पित अभिनेत्री के रूप में अपनी पहचान कायम की. इप्टा के अलावा पटना के अन्य नाट्यदलों - प्रेरणा, प्राची और थिएटर  यूनिट के लिए भी काम किया. इन दिनों ‘नटमंडप’ के लिए कम कर रही हैं. मोना के पास ‘महाभोज’, ‘दूर देश की कथा’, ‘राशोमन’, ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’, ‘सौदागर’, ‘भारत दुर्दशा’, ‘अरण्यकथा’, ‘मंगनी बन गए करोड़पति’, नाच्यो बहुत गोपाल’, ‘सत्यहरिश्चंद्र’, ‘पोस्टर’, ‘मुक्तिपर्व’,और ‘अंधायुग’ जैसे नाटकों में अभिनय का अनुभव है. इस रंगयात्रा में वह धीरे-धीरे एक संवेदनशील और समर्थ अभिनेत्री के रूप में विकसित हुई हैं. मोना झा अभिनय की रचनात्मकता के लिए सबसे महत्वपूर्ण मानती हैं अभिनेता की दृष्टि को . मोना ने कहना शुरू किया, “चीजों को देखने के दृष्टिकोण से कई बातों में फ़र्क पड़ता है. महत्वपूर्ण होता है अभिनेता का विज़न. ...यह विज़न ही तय  करता है कि आप जिस चरित्र का मंच पर अभिनय करने जा रहे हैं, उस चरित्र का कौन-सा पक्ष आपके लिए,...और उस चरित्र के लिए भी महत्वपूर्ण है. उस चरित्र के व्यवहार का पूरा स्वरुप आपका विज़न ही तय करता है. इस विज़न के निर्माण में निर्देशक के सहयोग और संकेत या स्वयं निर्देशक के विज़न का बहुत महत्व होता है. ...अब यह वह उस अभिनेता पर निर्भर करता है कि वह निर्देशक से क्या और कितना ग्रहण करता है....उसका कैसा उपयोग करता है....एक समय आता है...यानी मंचन का समय, जब प्रस्तुति से निर्देशक अलग हो जाता है. सिर्फ अभिनय करनेवाले होते हैं और होते हैं दर्शक. यह ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है कि दर्शक से कैसा रिश्ता बनता है....निर्देशक, जो देर तक पहले साथ था...वह अब साथ नहीं है. उसकी तमाम संरचनाओं के संवाहक आप हैं....यहीं पर निर्देशक की भूमिका सीमित हो जाती है....पर इस सीमा का एक अलग स्वरुप या पक्ष है, जो बहुत रोचक है....यह पक्ष है कि जो कुछ क्षण पहले तक नियामक था,...जिसकी निर्णायक भूमिका थी,...जो नाट्यालेख चुनने,...जो पात्रों के लिए अभिनेताओं का चुनाव करने,...और वेशभूषा,...रूपसज्जा,...दृश्यबंध,...रंगसंगीत जैसे सारे तत्वों को निर्धारित करने में सबसे ताक़तवर कारक था, वह अदृश्य हो जाता है...पर क्या वह सचमुच अदृश्य हो जाता है? ...अगर हाँ, तो अब तक वह उपस्थिति ही क्यों था? रंगमंच पर उसकी अब तक की उपस्थिति की अनिवार्यता क्या है?”

 अपने प्रश्नों उत्तर स्वयं मोना झा ने दिया, “यही दूसरा पक्ष है, जिसे मै कहना चाहती हूँ कि वह अदृश्य नहीं होता. वह जाकर दर्शकों में शामिल हो जाती है. मंचन के ठीक पहले तक वह दर्शकों के प्रतिनिधि के रूप में था. जो निर्देशक जितने बड़े दर्शक समूह प्रतिनिधि होगा, उसका नाटक उतना ही सफल और जनता के लिए उपयोगी होगा. मैं मानती हूँ कि निर्देशक की भूमिका सीमित ज़रूर है, पर रंगमंच  के लिए उसकी उपस्थति एक अनिवार्यता है....निर्देशक एक अभिनेता के एक्सपोज़र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, पर यह तभी संभव है जब आप स्वयं श्रम करें और संवेदनशीलता के साथ अपने चरित्र को ग्रहण करने की क्षमता विकसित करें.”  

बचपन में बहनें
 लगभग एक माह बाद 19 दिसम्बर, 2003 की शाम पटना के कालिदास रंगालय में  मोना को मंच पर अभिनय करते हुए देखना एक सुखद अनुभव था. ‘नरमेध’ शीर्षक से परवेज़ अख्तर की इस प्रस्तुति भीष्म सहनी की कहानी ‘साग-मीट’ में एकल अभिनय करती हुई मोना झा को देखकर यह सहज अनुमान लगाया जा सकता था कि अपने रंगकर्म के प्रति वे कितना निष्ठावान हैं और उनकी रंगदृष्टि कितनी संपन्न है! ‘साग-मीट’ की नाटकीय संरचना का बहुलांश कहानी का अविभाज्य हिस्सा है. अपनी लिप्साओं के कारण निरंतर क्रूर और हिंसक होते शहरी मध्यवर्ग यह कथा मनुष्य के भीतर की नृशंसताओं को पुरे नाटकीय आवेग के साथ प्रस्तुत करती है. इस नाटकीयता का रचनात्मक उपयोग करती हुई मोना झा अभिनय के नए प्रतिमान गढ़ती हैं. प्रस्तुति के दौरान देह को बार-बार अविष्कृत करती हुई वह कई चरित्रों को रचती हैं. तनी हुई रस्सी पर चलने के लिए किसी साढ़े हुए नत को जिस सतर्कता भर कौशल की आवश्यकता होती है, वैसे ही सतर्क कौशल के बल पर वह कायान्तरण की इस प्रक्रिया से बार-बार गुज़रती हैं. संवाद-प्रेक्षण में स्वर के आरोह-अवरोह से लेकर देह की गतियों और आंगिक क्रियाओं में अनोखा तालमेल मंच पर एक ऐसे संसार की रचना करता है, दर्शक जिसका सहज ही हिस्सा बन जाते हैं.

  मध्य नवम्बर में हुई अधूरी बातचीत और ‘साग-मीट’ के प्रदर्शन के बाद मोना झा से पिछले दिनों एक मुलाक़ात होती है. कविता वाचन और कविता मंचन पर बातचीत के क्रम में मोना कहती हैं, “कविता वाचन को लेकर मेरे और ज़ावेद के बीच अक्सर बातचीत होती रही है. जावेद ने ‘राम की शक्तिपूजा’ का वाचन कई तरीके से किया है....हिन्दीभाषी क्षेत्र में मुख्य परेशानी यह रही है कि अभी तक रंगमंच स्थायी नहीं रहा है. यहाँ मेनस्ट्रीम थिएटर का अभाव रहा है. मतलब यहाँ रंगमंच में स्थिरता नहीं रही है. जैसे बंगला रंगमंच में कविता वाचन को लेकर एक लम्बा इतिहास रहा है. वहाँ शम्भू मित्र जैसे वरिष्ठ रंगकर्मी और अन्य रंगकर्मियों के रंगकर्म का हिस्सा है कविता वाचन. कविता वाचन की अपनी एक अलग शैली भी विकसित की बंगला रंगमंच ने. लेकिन हिंदी रंगमंच की मुख्य परेशानी यह रही है कि कविता वाचन को लेकर इसका अपना कोई इतिहास नही रहा है....जब हम लोगों ने ‘राम की शक्तिपूजा’ की योजना बनाई, तो कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ा. कई सवाल सामने आकर खड़े हो गए कि प्रस्तुति का तरीका क्या होगा?...हमलोगों ने तय किया कि इस कविता की ‘संगीत प्रस्तुति’ होना चाहिए. निर्देशक जावेद ने कविता  पर लगातार बातचीत की और कविता के पीछे छिपे गहन अर्थ को दर्शकों के सामने कैसे संप्रेषित किया जाए, जो कलात्मक हो—इस पर भी लम्बी बातचीत की. ‘राम की शक्तिपूजा’ में वाचन के साथ-साथ सगीत की प्रधानता थी. लेकिन हमारी कोशिश थी कि संगीत ऐसा हो जो रंगमंच को कविता से जोड़े. सिर्फ़ संगीत नहीं हो. इसमें हमें सफलता मिली; कई जगह संगीत पर और काम करने की ज़रूरत अभी भी है....कविता और नाट्य मंचन दोनों अलग-अलग प्रक्रिया है,...दोनों की अनुभूति अलग होती है. किसी अच्छी प्रस्तुति को देखने के बाद एक ख़ास तरह का रंगमंचीय अनुभव होता है,जो सिनेमा या और तरह के मनोरंजन से बिल्कुल भिन्न होता है.मुझे लगता है, कविता मंचन की सीमा है. इस तरह का काम ज़्यादा प्रयोगात्मक होता है. इसके लिए स्थायी दर्शक का निर्माण भी नहीं हो पाया है.”

 कहानी मंचन को लेकर मोना झा के पास निजी अनुभव हैं. वह अपने निर्माण की प्रक्रिया में इन अनुभवों को शामिल मानती हैं, “हमारे निर्देशक परवेज़ अख्तर कहानियों पर काम करने के लिए बहुत इच्छुक नहीं रहते हैं. उनका कहना है कि सिर्फ़ कहानी कह देना एक अच्छी रंगमंचीय प्रस्तुति नहीं हो सकती है. इसके लिए ज़रूरी है कि कहानी के माध्यम से एक ऐसी रंगमंचीय भाषा का निर्माण हो जो दर्शकों को मंच का पूरा सुख दे सके....’साग-मीट’ करने के दौरान बतौर अभिनेत्री मुझको बहुत कुछ सीखने को मिला है.चालीस मिनट तक मंच पर बिल्कुल अकेले रहना और अभिनय के द्वारा मंच हर कोने को सक्रिय बनाये रखना, एक-एक क्षण को अर्थपूर्ण बनाना-एक कठिन काम है,जो कड़ी म्हणत की माँग करता है. ‘साग-मीट’ की प्रस्तुति के दौरान मुझे अपने स्पीच और बॉडी के मूवमेंट पर काम करने का मौक़ा मिला....मुझे लगता है कि कहानी मंचन में अभी सम्भवनायें हैं, जो लगातार काम करने के बाद प्रकट होंगी.”

 सीखने की लालसा, नए प्रयोगों के प्रति उत्सुकता, अपने विज़न के प्रति जागरूकता और अपने भीतर की अभिनेत्री को लगातार खोजते रहने की आकुलता ने मोना झा को एक विशिष्ट अभिनेत्री के रूप में अविष्कृत है. पटना रंगमंच की इस विशिष्ट अभिनेत्री ने अपनी रंगनिष्ठा और समय तथा समाज के प्रति सजगता के कारण छोटे शहरों के रंगमंच पर अभिनय को नया अर्थ और गौरव दिया.    

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