रंग रेखाओं में ढली कविता

रेखा सेठी 
( सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग और  कविताओं से परिचय करा रही हैं आलोचक रेखा सेठी. )
सुकृता पॉल कुमार अंग्रेज़ी में कविता लिखने वाली वह कवियत्री हैं,  जिनकी कविता में ठेठ भारतीयता का ठाठ है| बेघरों के जीवन संघर्षों के ब्योरे, माँ बेटी के रिश्तों की प्रगाढ़ता, परिवेश और यथार्थ से ऊपर मानवीय अनुभव से जुड़े बड़े सवाल, प्रकृति के विराट में एकलय होता मानवीय अस्तित्व, स्त्री के नैसर्गिक रूप के अद्भुत बिंब, उनकी कविता का कैनवास रचते हैं |गुलज़ार साहब ने सुकृता की कविताओं का अनुवाद करते हुए उनकी कविताओं में उभरने वाले बिम्बों की भारतीयता पर बल दिया | वे जब उन कविताओं का हिन्दुस्तानी में अनुवाद करते हैं तो उसे कविताओं की घर-वापसी कहते हैं |

सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग
उन्होंने लिखा : “.......... बताइये इन नज़्मों को अंग्रेज़ी में पढ़ कर, हिन्दुस्तानी में महसूस न करूँ तो क्या करूँ!”जिस तरह उनकी कविता अनेक भाषाओं में संवाद करती है ऐसा ही एक संवाद उनकी रंग-रेखाओं का भी बनता है| सुकृता जितनी अच्छी कवयित्री हैं उतनी ही कुशल चित्रकार भी| कहना मुश्किल है कि उनके चित्र कविताओं में ढलते हैं या शब्द, चित्र बन जाते हैं| संवेदनशील रचनाकार के मन का उफान अक्सर इतना होता है कि किसी एक कला में पूरी तरह समा नहीं पाता| शब्दों और रंगों के अलग-अलग बिम्ब, उनकी रचनाधर्मिता को पूरा करते हैं|

पिछले दिनों फ्रेंच सेंटर में उनकी कला कृतियों की प्रदर्शनी हुई| इस प्रदर्शनी के अंतर्गत उनकी कविता तथा उनकी कला में उपस्थित स्त्री के विविध रूपों पर चर्चा हुई|सुकृता की रचनाएँ स्त्री को लेकर कभी उतनी मुखर नहीं रहीं लेकिन उसका मूक दर्द हर जगह प्रतिध्वनित होता है| स्त्री के प्रति उनकी दृष्टि समकालीन स्त्री-विमर्श के हल्ले में नहीं पढ़ी जा सकती| कविताओं में भले ही बहुत कुछ अनकहा रह गया हो लेकिन अपने चित्रों में सुकृता की स्त्री-दृष्टि विस्तृत एवं उदात्त है, सृष्टि में लय हो जाने वाली बूँद की तरह| उनका सबसे प्रिय बिम्ब प्रकृति और स्त्री के समंजन का है| अज्ञेय ने कहा था ‘हरी बिछली घास हो तुम’सुकृता की स्त्री एक पेड़ है हरा-घना, अपने मज़बूत तने में सबको आश्रय देता, शाखाओं-प्रशाखाओं की बाँहे फैलाये सबको अपनी आगोश में लेने का खुला आमंत्रण | लय, विलय, और विस्तार का अनूठा बिम्ब है|

सुकृता पॉल कुमार
एक और छवि जो बार-बार आकर्षित करती है वह स्त्री का प्राकृतिक-अनावृत रूप है| सुकृता अपने चित्रों में निश्चित रूप-आकार से सजी सांचे ढली अनुकृतियाँ नहीं रचतीं| वह एक खुली निर्मित है जो सांकेतिक एवं व्यंजक है| इसलिए कभी पेड़ के तने से झाँकता स्त्री का आभास मिलेगा तो कभी लहू के रंगों में बनी स्त्री की मुख-विहीन आकृति| यह खुलापन उस पूरे अहसास में भी है जो ये रचनाएँ उत्पन्न करती हैं| प्राकृतिक होना मुक्त होना है, देह के आवरण और समाज के बंधन दोनों से| तेज़ बहती हवाएँ जैसे गुरुत्वाकर्षण की सीमाओं को लाँघकर गति और वेग का प्रचंड रूप धारण करती हैं, वही स्त्री को नई उड़ान भी देती हैं|

सुकृता के यहाँ मुक्ति का अहसास केवल सांसारिक नहीं है | वह अंतर्मन की उदात्त भाव-भूमि से सृजित है--- ‘मेरा साया जब मुझसे आगे निकला/ मुझे मालूम था सूरज को पीछे/ छोड़ आई हूँ’ | कितने चित्रों में स्त्री की मुद्रा गर्भस्थ शिशु के समान है, अपनी दुनिया, अपनी पूर्णता में अपना अस्तित्व जताती| कहीं-कहीं उनकी महिलाएँ ऊपर आसमानों में कुछ ढूँढती हैं| बहुत से सवालों के जवाब बाहर नहीं होते, हमारा आसमान हमारी भीतरी दुनिया की प्रतिछवि है| सुकृता के चित्र इस भीतर-बाहर को जोड़ कर एक पराभौतिक अनुभव में बदल देते हैं| यह अनुभव सुकृता की कविताओं का भी मूल धर्म है| कवयित्री शब्द-लाघव की कमान पर कविताओं को इस कसावट से बांधे रखती है कि कहीं कुछ अतिरिक्त नहीं होता|

एक और चित्र जिसने ध्यान आकर्षित किया वह चूल्हे के सामने बैठी स्त्री का था| यह खास भारतीय पृष्ठभूमि का चित्र है जहाँ स्त्री स्वयं को अन्नपूर्णा मानती है| यह उसकी मुक्ति भी है और वेदना भी| स्त्री विमर्श की सीमित सैद्धांतिकी में पारीवारिक शोषण के अनेक बिम्ब हैं लेकिन परिवार में स्त्री की पूर्णता की छवियाँ इसके दायरे से बाहर ही रही हैं| सुकृता के चित्र में सफ़ेद लिबास में चूल्हे के सामने झुकी स्त्री माँ की याद दिलाती है| चूल्हे की आग उसके भीतर भी धधक रही है| ज़िन्दगी का बहुत-सा लेखा-जोखा उस आग में जलता है लेकिन उसमें  तपिश के साथ-साथ संबंधों की गरमाहट भी है, करुणा की आर्द्रता भी|इस चित्र को देखकर मुझे उनकी रिश्ते याद हो आई, जिसमें वे लिखती हैं ---‘धन्यवाद, अम्मा/ चाँद के लिए, धन्यवाद......सारे चाँद-तारे/ ब्रह्मांड में आलोड़ित होते हैं/ तुम्हारी प्रतीक्षा करते, अम्मा/ ताकि तुम हमको उनसे जोड़ सको/ हम जो पृथ्वी पर नींद में/ चलते हैं |’ माँ की यह छवि सुकृता की कविताओं की भी प्रिय ‘थीम’ है| उनकी कितनी ही कविताओं में माँ आती है थपकती, दुलारती और नींद में सपने बुन जाने वाली|
सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग


 इन सारी छवियों में जिस बात के प्रति रचनाकार हमेशा सचेत रहती हैं वह है ऐसे थीम के साथ जुड़ी भावुकता| सुकृता की रचनाओं में भावनाओं की सघनता तो है लेकिन विगलित भावुकता नहीं| प्रस्तुति में वे हमेशा एक तनाव या कसाव साधे रहती हैं जो उन शब्दों-रंग-रेखाओं को बहने या घुलने नहीं देता| इस तनाव को अपना-धर्म बनाना और यूँ साधना कठिन है जिसे सुकृता की रचनाएँ बखूबी निबाह ले जाती हैं|

सुकृता पॉल कुमार की कवितायें


अर्थ कुछ नहीं के बीच से ही
कुछ निकल सकता है
जैसे
सूखी ख़ाली स्लेट पर
बुलबुला फट जाने से
उभर आती है
पूरी-सी गोल आर्द्रता

ऊँचाईयाँ 

ऊँची, सातवीं मंजिल
बुद्ध की कथा कहती है

कामना और पीड़ा से परे, बहुत ऊपर

एक दिन, जन्म लिया मैंने
एक दिन, मृत्यु को वरूँगा मैं
सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

नया जीवन 

पोर्ट ब्लेयर के समुद्री किनारे पर
नौ महीने बीत जाने पर
प्रसव वेदना से मूर्च्छित वह

बीचो-बीच उठती
तीखे दर्द की लहरें
धरती दरकातीं
उल्लसित सोखती जाती मानवता

शिशु की पहली चीख़ पर
उन्होंने उसे नाम दिया
सुनामी

अकेली
क्या ऊपर नहीं उठ सकती मैं ?
ऊँचे आसमानों में ?

क्या मैं हमेशा डूबती ही रहूँगी

बिना पतवार की नाव
गहरे पानी में
खाली, रंगहीन

लहरें उमड़ती ऊपर
आस-पास नीचे-गहरे

खारी-लोनी आँखें
मुँह में समुद्री आस्वाद

इस तरह
उस तरह
सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग

पागल प्रेमी 

तुम्हें बनाती हूँ मैं
फिर-फिर बनाती हूँ
मेरा मन तम्हारी छवियों के ढेर से
पड़ा है

तुम केवल मेरी सोच का
पुलिंदा हो

मैं रंगती हूँ तुम्हें
नीला, लाल या सफ़ेद
हरा, भूरा या काला
हर ताज़े दिन के लिए एक ताज़ा रंग


यूँ गल-सड़ नहीं सकते तुम
झाड़ती रहती हूँ अपना कैनवास

मैंने तुम्हें आश्रय दिया वहाँ
अपनी-तुम्हारी परिकल्पना तक पोसा
मेरा जुनून ही बन गया मेरा धर्म
तुममें से होकर ही ध्यान लगाती हूँ मैं

उसके आगे की यात्रा में घुल गयी रेखाएँ
इष्ट और साधक के बीच 
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