मै ही हूँ मैला आंचल में डाक्टर ममता: लतिका

 किसी इंसान , महान व्यक्तित्व , सार्वजनिक जीवन की शख्सियत -लेखक , कलाकार को जानने -समझने का उसके हमसफ़र का उसके प्रति के नजरिये से बेहतर जरिया और क्या हो सकता है. हम सब के प्रिय लेखक फणीश्वर नाथ रेणु की प्रेयसी / पत्नी लतिका जी से स्वतंत्र पत्रकार , शोधार्थी व ' फणीश्वरनाथ रेणु डाॅट काॅम'  के माॅडरेटर अनन्त ने उनके निधन (जनवरी 2011) के पहले आत्मीय बातचीत की थी. कई बैठकों में ( पटना से रेणु  के गाँव औराही हिंगना तक ) की गई बातचीत का एक अंश स्त्रीकाल के पाठकों के लिए . पूरी बातचीत हम प्रिंट एडिशन में प्रकाशित करेंगे. आइये थोड़ा रेणु को थोड़ा लतिका जी को जानें इस बातचीत से.

लतिका 
साक्षात्कारकर्ता का नोट 

8-9 साल पुरानी घटना है। फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन व उनके  साहित्य को समझने का फैसला किया।  
रेणु से जुड़े व उन्हें  समझने वालों के  साक्षात्कार की योजना बनाई. सबसे पहले लतिका जी से बात करने का फैसला किया. मैं एक दिन लतिका जी के घर  जा ही धमका। दरवाजा खटखटाया: 
अंदर से आवाज आई , "कौन ?"
मैने परिचय भी नहीं दिया था कि पुनः आवाज आई ‘‘ मेरे पास कुछ नहीं है क्या लेने आये हो ? जो था सब तुम लोगो को दे दिया।"
मैने पुनः दरवाजा खटखटाया,  फिर वे चिल्लाकर बोलीं:- "भागो , भागता है कि नहीं ," इसके साथ पदचाप सुनाई दी। मैं डरा सहमा वहां से भागा। घुमावदार सीढियों से भागते हए नीचे उतरा। मैं तुरंत अरूण भैया ( रेणु जी के दामाद )  के आवास की ओर कूच किया। पसीना से तर-बतर स्थिति में पहूॅंचा। नवनीता भाभी (रेणु जी की बेटी) और अरूण  भैया कमरे में बैठे थे। पूरा वाकया  एक ही साॅस में सुनाने लगा। दोनो मंद-मंद मुस्कुराने लगे। पूरी घटना सुनने के बाद हॅसने लगे। 
मैने कहा , ' अगर हीरामन की तरह भोला-भाला मासूम होता,  तो लतिका जी से नहीं मिलने का कसम ही खा लेता। " भाभी बोली आपको कसम खाने की जरूरत नहीं है। मैं आपको मिलवा दूॅंगीं।  हम दुबारा उनके घर गये. 
 भाभी ने लतिका जी से कहा कि ‘‘आप इन्हें एक बार डांटकर भगा दी थीं। ’’ लतिका जी बोली:- ‘‘ मुझे याद नहीं मैने इसे डांटा है।’’ लतिका जी आगे बोलीं:- ‘‘ अरे मै बोलती कुछ हूॅ , छपता कुछ है। बाद में पता चलने पर गुस्सा आता है।"  मेरी ओर मुखातिब होकर बोलीं, ' तुम सही-सही लिखना। जब भी मिलने आना,  धीरे से दरवाजा खटखटाना। वहां से चलते वक्त जैसे ही प्रणाम किया झट से सर पर हाथ रख दिया। मुझे रेणु की कालजयी रचना मैला आंचल की डाक्टर ममता के  ममत्व व प्यार अहसास हुआ था।
लतिका जी से मुलाकात वर्ष 2006 में हुई थी। इसके बाद जब भी वक्त मिलता लतिकाजी के पास पहुंच  जाता। लतिकाजी जब औराही हिंगना चली गई। मैं औराही हिंगना पंद्रह दिनों तक रहा। इस दरमियान भी लतिका जी से बाते हुई। बातचीत का सिलसिला टुकड़े-टुकड़े में चार वर्षो तक चलता रहा है : 


आप रेणुजी से सबसे पहले कब और कैसे मिलीं ? पहली मुलकात में रेणु कैसे लगे ?
1944-45 में शायद पहली बार मिली थी। मैं राउंड पर थी, अचानक मेरी नजर भागलपुर जेल से आये पुलिसकर्मियों पर पड़ी। मैं पूछ बैठी कि आपके साहब लोग तो चले गए ना। पुलिसकर्मियों ने बेड की ओर इशारा किया। मैं बेड के करीब गई तो देखी कि एक मरीज बेसुध पड़ा है। हाथों में बेडि़यां है। मैं नजदीक पहुँची  तो वह मुझे सूनी नजरों से देखने लगा। मैंने  कुछ पूछना चाहा , तो उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैं उस वक्त कुछ समझ नहीं पाई। आज मैं महसूस करती हूॅ कि उस मरीज की नजरों में  जीने की चाह थी।

रेणु की दूसरी पत्नी पद्मा के साथ लतिका 
कभी यह जानने का प्रयास किया था कि रेणुजी ने पहली मुलाकात में नजरें क्यों फेर ली  थी  ?
 (याद करने की कोशिश करते हुए )  एक बार पूछी थी।  क्रांतिकारी थे, क्रांति की बात सोच रहे थे। अंग्रेज कब भागेगें ? उनके साथियों  के स्वास्थ्य  को लेकर चिंतित रहते थे, जो कि अस्पताल से स्वस्थ होकर लौट गये थे.  उनकी एक ही इच्छा थी कि जल्द से जल्द स्वस्थ हों । जेल से छूटे और भारत मां की सेवा करें। अक्सर ऐसे ही सवालों सें घिरे रहते थे। मै हाल-चाल पूछने गई थी। जीवन जीने की आशा जगी थी उनके दिल में। आंखों पर जब अचानक रौशनी पड़ती  है तो पलकें बंद हो ही जाती है। शायद ऐसा ही महसूस किया था।

रेणुजी को देखकर आप कभी अचंभित भी हुई थीं ?
अचंभित तो पहली मुलकात में हुई थी। मै मन ही मन सोंचती थी कि दुबला पतला बीमार आदमी क्रांतिकारी भी हो सकता है ? अरे भाई शरीर में ताकत रहेगी,  तभी कोई संघर्ष कर सकता है। उनसे जब जुड़ी तब जानने का मौका मिला। स्वभाव से क्रांतिकारी थे। आजादी के बाद भी नेपाली क्रांति- समाजवादी आन्दोलन से जुड़े रहे।

 रेणुजी की कौन-कौन सी आदतें आपको आज भी याद आती है ?
 (गंभीर मुद्रा में) बच्चे की तरह जिद्द करने की आदत। उनकी बाल सुलभ चपलता, स्वादिष्ट भोजन की फरमाइश। जीवन जीने का सलीका, उनके दरवाजा खटखटाने का अंदाज। ऐसी कई छोटी बातें, पहले बहुत याद आती थी। अब भी याद आती है। जब तक जीवित हूॅ, उनकी यादें  याद आती रहेंगी।

आज जब उनकी याद सताती है तो क्या करती हैं ?
 पहले बहुत परेशान रहती थी। उनकी तस्वीरे किताबों को देखकर खुद ढाढ़स बंधाती थी। मन नहीं लगता था तो राम कृष्ण मिशन आश्रम चली जाती थी। अपने काम में ध्यान लगाती थी। अब तो शरीर में ताकत भी नहीं कि कहीं जा सकूॅ। घर में रहती हूॅ। अकेले जीने की आदत सी पड़ गई है। मेरी भतीजी काॅरवा  पास में रहती है। उसके यहां भी चली जाती हूॅ। जरूरत पड़ने नीता को बुलावा भेज देती हूॅ। अब  इश्वर से प्रार्थना करती हूॅ कि जल्दी जीवन से मुक्ति मिले। बहुत जीवन जी लिया। अब जीने का मन नहीं करता।

फणीश्वरनाथ रेणु
आप शारीरिक रूप से कमजोर होती जा रही हैं। घर में नौकरानी क्यों नहीं रख लेती हैं ? वह  आपकी देखभाल किया करेगी।
 क्या करूंगी  नौकरानी रखकर ? उसका खर्च कहां से आयेगा ? अब कमाती भी नही हूॅ। आया को पैसा कहां से दूॅगी ? आजकल की आया घर का काम ठीक से नहीं करती है। रसोई घर को गंदा ही छोड़ देती है, घर में झाडू भी ठीक से नहीं लगाती। सिर्फ पैसा ऐंठती है। अपना काम खुद करना चाहिए , दूसरे के भरोसे जीने से जिंदगी बोझ बन जाती है।

आप पटना,  हजारीबाग से पटना कैसे आईं ?मैं नर्सिग ट्रेनिंग करने के लिये पटना आई थी। पीएमसीएच में ही प्रशिक्षण लिया और यहीं नौकरी भी मिल गई। फिर रेणुजी से शादी हो गई। वही कोई 1938-40 के वर्ष में पटना आई थी।

आप नर्स क्यों और कैसे बनीं ?
जीवन को सेवा के प्रति समर्पित  करने का फैसला लिया था। इस वजह से नर्सिग सेवा में आई। युद्ध में जख्मी सैनिकों और देश के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों की सेवा करना बड़ा पुण्य का काम था। आजादी की लड़ाई में सब लोग अपने-अपने तरीके से सहयोग कर रहे थे। मै मरीजों को सेवा के जरिये देश की सेवा करने का फैसला किया था। जब तक नौकरी में रही ठीक वैसे ही मरीजों की सेवा करती रही। नर्सिग की पढ़ाई के दरम्यान ' ' फलोरेंस नाईटेंगल' के जीवन से परिचित हुई। उनकी सेवा भावना ने भी मुझे काफी प्रभावित किया। फलोरेंस  का नाम सुने हो। अरे ! वही वो महिला जो सबसे पहले घायल सैनिकों की सेवा किया करती थी। उसी के बाद नर्सिग ट्रेनिंग की शुरूआत हुई। उस जमाने में मरीजों की सेवा अपने परिवार की तरह किया जाता था। मरीज और परिवार में कोई अंतर नहीं माना जाता था। मरीज को सिर्फ दवा खिला देने से डयूटी पूरी नहीं हो जाती थी। मरीजों का बिस्तर तैयार करना, वक्त पर भोजन देना सहित कई अन्य कार्य भी ख्याल रखना पड़ता था। मरीजों के लिए ऐसा माहौल बनाकर रखना पड़ता था कि उसे घर की चिंता न सतायें। जरूरत पड़ने परदुआ भी करनी पड़ती थी। बहुत जिम्मेवारी का काम है नर्स का।

रेणुजी के लिए भी दुआएं की होंगी ? (रेणु  का नाम सुनते ही उनके चेहरे पर मायूसी छा गई)  अरे वो तो बिमरिया आदमी थे। उन्हें एक साथ कई बी मारियां थी:- टीबी , अल्सर , सहित कई रोग के रोगी थे। ऐसा रोगी मैंने कभी नहीं देखा । एक बीमारी ठीक होती नहीं थी कि दूसरी  उपट जाती थी। रात-रात भर खून की उल्टियां करते थे। दर्द से बहुत कराहते थे।  पीड़ा सहन करना मुश्किल हो जाता था। उतना कष्ट भोगते किसी को नहीं देखी । न जाने कितनी रातें उनके सिराहने बैठकर बिताई ? हालत में सुधार नहीं दिखती,  तब मैं दुआएं करती थी। दुआओं का असर भी देखी हूॅ। लेकिन मैं यह नहीं कहती कि वोे मेरी दुआओं के भरोसे ही जिन्दा थे। मैं तो सिर्फ उनकी सेवा करती रही। मेरे जीवन का उद्देश्य भी यही था।

 आप सुभाष चन्द्र बोस को सुनीं  , गांधी  से मिलीं  , राजेन्द्र प्रसाद से मिलीं । इन सब में आपके प्रिय कौन हैं ?
 अरे ! ये सभी महान पुरूष हैं। सबों का विचार बहुत अच्छा है। मैं इनलोगों में अच्छे-बुरे काभेद कभी नहीं करती।  सभी लोग मेरे प्रिय हैं। गांधी जी और राजेन्द्र बाबु से जब मिली थी तब बहुत कम उम्र की थी। इन दोनों को सिर्फ देखी ही थी। उनकी बातों को सुनी थी या नहीं यह भी याद भी नहीं। सुभाष दा को जब पहली बार सुनी थी तो उस वक्त कितनी बड़ी थी ? ये अप्पु (रेणुजी का दूसरा बेटा) की बेटी मोना है,  उसके उम्र की रही होगी। मैं  17-18 वर्ष की थी। बोस दा से बाद में भी मिली भी थी। इसलिए बोस दा को ज्यादा जान पाई।

तीसरी कसम का एक दृश्य 
 बोस दा से कब और कैसे मिली थी ?
 मैं यहीं पटना में रहकर पढ़ाई कर रही थी। हजारीबाग से चिट्टी आई। चिट्टी से ही जानकारी
मिली सुभाषचन्द्र बोस रामगढ़ में सम्मेलन की तैयारी में जुटें है। मेरे परिवार के लोग भी सम्मेलन की तैयारी में जुटे थे। मै भी हजारीबाग पहुंच गई। मैंने  अपनी बहन के साथ लड़कियों का जत्था बनया । हजारीबाग में घर-घर जाकर महिलाओं  से सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए अनुरोध किया। बहुत सारी महिलाएं इस अभियान से जुड़ी। फिर सम्मेलन में महिलाओं को साथ लेकर हजारीबाग से रामगढ़ गई। माया भी इस सम्मेलन में खूब  काम की थी। इसी बीच बोस दा के करीब जाने का मौका मिला।

 हजारीबाग में जब घर-घर जाकर बेटियों, बहुओं एवं महिलाओं को आजादी के आन्दोलन से जोड़ने का प्रयास कर रही थी। तब समाज में विरोध का भी सामना करना पड़ा होगा।
- हजारीबाग में बंगालियों की काफी संख्या थी। सम्मेलन की तैयारी में बंगाली लोग बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रहे थे। हमलोगों का काम था महिलाओं को हिम्मत दिलाना। उन्हें समझाना कि सम्मेलन का महत्व क्या है ? आजादी कितनी जरूरी है ? घर के पुरूषों का भी सहयोग मिलता था। शुरूआती दौर में ही थोड़ी परेशानी उठानी पड़ी थी। बाद में तो बंगाली समुदाय के अलावा  अन्य समुदाय की महिलाओं को इस आन्दोलन से जोड़ना आसान हो गया था।

आपको याद है कि आपके आवास पर रेणु जी से मिलने कौन -कौन आते थे ?
 बी0पी0 कोईराला आये थे। ये नेपाल के प्रधानमंत्री भी बने थे। शैलेन्द्र भी आये है,  इस घर में। शैलेन्द्र जी  तो साथ में तीसरी कसम देखने का वादा किए, लेकिन ऐसे फंसे कि पटना पुनः नहीं आ सके। नवेन्दु घोष का भी आना हुआ था। अज्ञेय जी आते थे, नागार्जुन जी भी। दिनकर जी तो अक्सर आते थे लेकिन वह ज्यादातर नीचे से ही आवाज लगाते थे। वे पड़ोस में ही रहते थे। भोला चटर्जी, मनमथनाथ गुप्त, रघुवीर सहाय, सहित कई लोग आये हैं। वो जब तक जीवित रहे लोगों का आना जाना लगा ही रहा। वैसे उनसे मिलने वाले ज्यादातर लोग काफी हाउस मे ही मिला करते थे। रामवचन राय , जुगनू  शारदेय तो इनके साया बने चलते थे। भूपेन्द्र अबोध , डाक्टर सियाराम तिवारी , जितेन्द्र सिंह , आलोक धन्वा , सत्यनारायण जी। साहित्यकार , पत्रकार , गायक , वादक रंगकर्मी-- किस्म-किस्म के लोग आते रहते थे। मैं तो खातीरदारी में ही परेशान रहती थी।

इसका मतलब है कि रेणु जी में बहुत आकर्षण था?
 अरे गप्पी आदमी थे। गप्प लड़ाने में माहिर थे। गप्प करते-करते उन्हें वक्त का भी पता नहीं चलता था। किस्सा सुनाते थे लोग सुनते थे। कई बार तो लोग भ्रम में पड़ जाते थे। झूठ और मनगढंत बातों को भी ऐसे सुनाते थे कि सच और झूठ में फैसला करना मुश्किल हो जाता था। जो एक बार बातें कर लेता था दूसरी मिलने का वादा कर ही यहां से जाता था। मैला आंचल से प्रसिद्धि मिली हुई  थी। 'मारे गए गुलफाम'  कहानी पर 'तीसरी कसम' पर फिल्म का निर्माण हो चुका था। एक आकर्षण तो था ही लोगों के बीच। घर से लेकर काफी हाउस तक लोगों से मिलते रहते थे।

अब कौन-कौन लोग आते हैं।
 उनके जाते ही यहां सब कुछ सुना हो गया। उनका ऐसा मायाजाल था कि लोग लोग खींचे चले आते थे। मै तो यहां सिर्फ तमाशबीन थी। उनके जाने के कुछ महीने बाद तक लोग आते-जाते रहते थे। तरह-तरह के किस्से सुनाते थे। मैं सुनती थी। कई वर्षो तक सिर्फ मैं सुनती रही। किस्से कहानियों को सुनकर परेशान भी हो जाती थी। अब तो लगता है कि कुछ लोग वेवजह की भी बाते करते थे। सच यह है कि अब कुशल छेम पूछने बहुत कम ही लोग आते है।

 रामबचन राय और जुगनू  शारदेय तो रेणु के हनुमान कहे जाते थे। रेणु जी के इन दोनो हनुमान का आपके प्रति बात-व्यवहार कैसा है ?
 रामबचन जी कभी-कभी आते रहते हैं। राजनीति में जाने के बाद भी एक दो बार मिलने आये हैं। सीधे सरल आदमी है। लेकिन इनका भी आना न के बराबर ही होता है। अपने काम में व्यस्त रहते होगें। जुगनू  का तो नाम भी मत लो। वह भारी बदमाश आदमी है। विश्वासी तो कभी नहीं रहा।

लतिका 
पदमा जी से कैसे रिश्ते रहे ? फिर कोई विवाद आप दोनों के बीच में ? 
जब पहली बार गयी थी। उस वक्त थोड़ा बहुत विवाद हुआ था। जब कोई  आदमी दो शादी करता है तो उसकी पत्नियों के बीच विवाद होता ही है। कोई भी स्त्री पति के प्यार का बटवारा नहीं करना चाहती है। (पदमा जी की ओर इशारा करते हुए) हमारे और इनके बीच कुछ ऐसा ही हुआ था। मैं वहां कुछ दिन रही भी थी। फिर मैं पटना चली आई। मै यहां पटना में रहने लगी। यह (पदमाजी) गांव (औराही-हिंगना) में रहती थी। फिर कभी कोई विवाद नहीं हुआ।

 रेणु  को गुस्सा कब आता था ? 
गांव में कम ही रहते थे। जब वे घर पर रहते तो बच्चे भी उनकी नजरों के सामने बदमाशी नहीं करते थे । वेणु होश संभालते ही बाहर का काम करने लगा था। यहां अधिकांशतः रात को ही ' पंचलाईट '  जलाकर उस वक्त लिखना शुरू करते थे । जब गांव के लोग सो जाते थे। निःशब्द  रात में ही ज्यादातर लिखने का काम करते थे। जब वह लिखते रहते तो टोक-टाक की बात तो दूर उनके पास कोई जाता भी नहीं था। एक घटना याद आ रही है। गर्मी का दिन था। घर के पिछवाड़े में बैठकर कुछ लिखने में मगन थे। शायद 'तीसरी कसम'  कहानी लिख रहे थे। इसी बीच मैं खाना लेकर दबे पांव पहुंची । लगभग आधे घंटे से भी अधिक वक्त तक मैं खड़ी। लेकिन मै कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाई। यह सब घटना उनकी छोटी बहन महथी देख रही थीं। वही बोली भइया भाभी खाना लेके खाड़ छिये। उनकी नजर मेरे उपर पड़ी तो बोले कि बोले के चाही न। हित-कुटुम्ब सगा-संबंधी के आदर सत्कार कोई कमी होती तो थोड़ा गुस्सा होते थे। वैसे मैं  कोई  मौका ही नहीं देती थी गुस्सा होने का।

सुना है कि रेणु  रिवालवर भी रखते थे ? एक रचनाकार को रिवालर रखने की क्या जरूरत पड़ गई।
 ठीक सुना है तुमने रिवालवर रखा करते थे। मेड इंन इंगलैड का था। उस रिवालवर का नाम बबली था। कलकता में अक्षय कुमार लाहा की दुकान से 12000 रु0 में मै ही खरीदकर लाई थी। उनको जान पर खतरा महसूस हुआ था , जमीन -जाल वाले आदमी थे। इसको लेकर झगड़ा फसाद हुआ होगा। हमले की आशंका होगी। जान पर खतरे की बात उन्होंने दिनकर जी को बतायी  थी। उस वक्त प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री थे। दिनकर जी ने शास्त्री जी को यह बात बताई। शास्त्री जी ने  इसकी जांच करवाई। , इसके बाद लाइसेंस निर्गत हुआ था।

रिवाॅलवर की खरीददारी में सारा पैसा रेणु जी ने लगाया था या आपने भी मदद की थी? 
उनको अच्छे किस्म की रिवाॅलवर चाहिए थी। उनके पास मात्र 2800  रूपये थे। 6000 रु0 मैंने निकाला। अपने साथ में नौमी (कुत्ता) को साथ लेकर पहले हजारीबाग गई। अपने बड़े भाई हथियार के शौकीन आदमी थे। हथियार के संबंध में अच्छी जानकारी रखते थे। उनके सलाह पर कलकता गई रिवाॅलवर की खरीदारी कर पटना लौट आई।

 सुना है कि हीरामन नाम का आदमी आपके घर में काम करता था। उसी के  बात व्यवहार हाव भाव  वेश-भूषा  को केन्द्रित कर तीसरी कसम कहानी लिखी  थी उन्होंने । 
तीसरी कसम का हिरामन मेरे घर में काम करने वाला हिरामन से प्रेरित अवश्य है। लेकिन शत-प्रतिशत वही हीरामन नही है। मेरे  घर के हिरामन से तीसरी कसम के हिरामन की सादगी, मासूमियत और वेश-भूषा को लिया गया है। शेष पूर्णिया के इलाके के किसी गाड़ीबान के चरित्र को मिलाकर तीसरी कसम का हिरामन जीवंत होता है। हिरामन मेरे घर का सबसे विश्वासी आदमी था। वह तीसरी कसम के हिरामन की तरह ही कपड़ा पहनता था। सहज दिल का इंसान था। रेणुजी हजारीबाग गये हुये थे। हीरामन घर में काम कर रहा था। रेणु जी उससे काफी देर तक बाते करते रहे। उसके भोलेपन से प्रभावित होकर तीसरी कसम लिखते वक्त पात्र के रूप में उसका चित्रण किया था। हीरामन मुझे पीसी ही कहता था। मै उसकी मासूमियत और भोलेपन की कायल थी। उसकी इच्छा थी पटना आकर गंगा स्नान की .
-क्या यह सच है कि आप ही मैला आंचल की डाक्टर ममता हैं ?
  ( मुस्कुराते हुए ) हाॅ ! मै ही हूॅ मैला आंचल में डाक्टर ममता। डाक्टर ममता के रूप में मेरी ही छवि को उकेरा है उन्होने।
 आप यहां (औराही हिंगना) में भी मरीजों की सेवा करती थीं ? 
  (दरवाजे की ओर इशारा करते हुए)  यह तो बहुत परानी बात हो गई। जब मै यहां रहा करती थी । कुछ दवाईयां रखती थी , किसी को कुछ होता तो दौरा-दौरा चला आता था। इस इलाके में दूर-दूर तक कोई अस्पताल नहीं था। यहां जो सबसे नजदीक अस्पताल है, वह फारबिसगंज में था। फारबिसगंज यहां से 20-25 किलोमीटर दूर है। मै डाक्टर तो थी नहीं , नर्सिग सेवा के दरमियान जो ज्ञान हासिल किया था। सीमित सुविधाओं में मरीजों की सेवा करती थी। यहां तो छोटी-छोटी बीमारियों से लोग इलाज के आभाव में मर जाते थे।

आखिर रेणु में क्या खास बात थी कि आप उनसे शादी करने के लिये राजी हो गयीं ?
 देखने में वे साधारण लगे थे, लेकिन अस्पताल में असाधारण काम करने के बाद ही रोगी बनकर पहुंचे  थे। उनके अंदर मेरे प्रति विश्वास और आशा  थी। उनके जीने की चाह को भी मैं देखी थी। उनकी चाह को मैने पूरा किया। बााद के दिनों में उन्होने क्या किया और उनके अंदर क्या खास बात थी , यह बताने की जरूरत नहीं है।

 क्या आपको कभी ऐसा लगा कि रेणु के साथ  शादी करके बहुत बड़ी गलती की है ? 
 शादी का फैसला मेरा था। मुझे अपने फैसले पर कभी अफसोस नहीं हुआ। वैसे भी सेवाभाव के साथ जीवन यापन करने का फैसला काफी पहले ले चुकी थी।  

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