"मय्यादास की माड़ी" के स्त्री पात्र

हेमलता महिश्वर
हेमलता महिश्वर जामिया मीलिया इस्लामिया में हिन्दी की प्रोफ़ेसर हैं. ' नील नीले रंग के'  कविता संग्रह एवं आलोचना पुस्तक ' स्त्री लेखन और समय के सरोकार'  संपर्क : hemlatamahishwar@gmail.com
 
भीष्म साहनी - यह नाम ही अपने आप में बड़प्पन का द्योतक है। जब भी कभी कोई बड़प्पन का बोध कराए तो निश्चित तौर पर उसने ऐसे कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण कार्य तो किए ही होंगे। भीष्म साहनी ने जिस भी काम में हाथ डाला है, वह महत्वपूर्ण हो उठा है। फिर वे 'तमस' जैसी रचना के जनक भी है जो उनकी पहचान है।  साहित्यिक कर्म करते हुए उन्होंने अपनी भावी पीढ़ी के समक्ष जिन मूल्यों को प्रस्तुत किया है, उनका वज़न भला कम किया जा सकता है?  कहानियों की रचना हो या उपन्यास की या फिर नाटक की- कोई भी किसी से कमतर नहीं है। 'झरोखे','कड़ियाँ', 'तमस', 'बसंती', 'मय्यादास की माड़ी','कुंतो', 'नीलू नीलिमा नीलोफर' उपन्यास हैं। 'हानूश', 'कबिरा खड़ा बाज़ार में', 'माधवी', 'मुआवज़े', 'रंग दे बसंती चोला' और 'आलमगीर' नाटक हैं। उनकी कहानियॉं चाहे वह वांगचू हो या चीफ़ की दावत, जिस संश्लिष्ट संवेदनशीलता को जन्म देती है, वह मानस परिवर्तन के लिए बाध्य कर ही देती है। इनके अलावा उन्होंने फ़िल्मों में भी काम किया है। फ़िल्मों वाला हिस्सा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि नाटक और फिल्म में काम करना एक अतिरिक्त साहस का काम है। आज भी नाटक में काम करने की चाहत रखनेवालों को सहजता से परिवार और समाज में स्वीकृति नहीं मिल पाती है। इनमें काम करने वाला कुछ अधिक आधुनिक है, चाहे वह ना भी हो तो भी ऐसा माना जाता है। पर भीष्म साहनी के साथ ऐसा नहीं था। वे प्रगतिशील विचारधारा के पोषक तो थे ही, साथ ही उनके भाई बलराज साहनी स्वयं एक मँजे हुए स्थापित कलाकार थे। भीष्म साहनी की तमस में निभाई गई भूमिका क्या भला विस्मृत की जा सकती है? 'मोहन जोशी हाज़िर हो' के केन्द्रिय पात्र के अतिरिक्त एक इतालवी फिल्म 'द लाफिंग बुद्धा' में भी उन्होंने प्रभावी कार्य किया है।

इस लेख में मैंने 'मय्यादास की माड़ी' नामक उपन्यास को लिया है। राज्य का समापन और ब्रितानी शासन के आरंभिक काल में बुनी गई कथा का केन्द्रीय पात्र है धनपतराय। इस उपन्यास में चित्रित काल इस पर भी अपने चिंतन के लिए जो विषय लिया है वह है - ' 'मय्यादास की माड़ी' के स्त्री पात्र'। 'मय्यादास की माड़ी' के स्त्री पात्र - इस विषय का चुनाव हो सकता है बहुत अजीब लगे पर भीष्म साहनी पर लिखने के लिए मैंने उनके स्त्री पात्रों को ही केन्द्र में रखना उचित समझा। फिर स्त्री प्रधान रचना को न लेते हुए यह उपन्यास 'मय्यादास की माड़ी' क्यों?- यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल बनता है। यह उपन्यास इसलिए क्योंकि यह उनकी प्रौढ़तम रचना है। आरंभिक रचनाकर्म में विकास प्राप्त करने की गुंजाइश होती है पर लगभग परवर्ती काल में ऐसा माना जा सकता है कि जीवन दर्शन का विकास हो चुका होगा। किसी भी रचनाकार के जीवन दर्शन की समग्रता से परिचय उसके प्रौढ़ काल की रचनाओं से प्राप्त होने की संभावना होती है। फिर भीष्म साहनी एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी रहे हैं। वे कोई सामान्य से रचनाकार नहीं थे। यूँ तो हमारे सारे कर्म ही सामाजिक सरोकार सम्पन्न होते हैं। किसी भी रचना में चाहे जिस विधा की हो, उसमें सामाजिकता का अभाव नहीं हो सकता।आशय यह है कि कला का कोई भी माध्यम हमारी सामाजिकता का परिचायक होता है फिर लेखक तो अपनी रचना के माध्यम से सीधे संवाद करता है। लेखक को इस बात की धूल मिल सकती है कि वह अपने लेखन कार्य संपादन के बाद उस पर कोई बात। न करे। पर भीष्म साहनी तो न केवल एक सामान्य लेखक अपितु प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष भी रहे हैं। मतलब पूरी लेखक बिरादरी को दिशा निर्देश भी देते रहे हैं। इसका मतलब सीधा सा यह है कि करणीय अकरणीय के द्वंद्व से भी वे ज़बर्दस्त तरीके से ज़ूझते रहे होंगे और फिर सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट नीति प्रकट करना नि:संदेह बहुत बड़ी चुनौती होती है, जिसे वे सदा साधते रहे होंगे। इसलिए भी उनकी प्रौढ़तम रचना के स्त्री पात्र मेरे लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। सवाल यह भी बनता है कि 'मय्यादास की माड़ी' कोई नायिका प्रधान उपन्यास तो है नहीं, फिर नायिका प्रधान रचना क्यों नहीं ली गई? तो इसके जवाब मे मैं यह कहना चाहती हूँ कि नायिका प्रधान रचनाओं की निर्मिति के समय हम एक विशेष मानसिक बुनावट के साथ रचनाकर्म में लिप्त होते हैं। पर आप एक स्वाभाविक मनोदशा का आकलन करना चाहते हों तो विशिष्ट से परे होना अनिवार्य होगा।

 'मय्यादास की माड़ी' में बहुत कम स्त्री पात्र हैं और सिवाय 'रुकमिणी' के अतिरिक्त किसी भी पात्र का विस्तार आद्यंत नहीं है। यदि उपन्यास में उपस्थित होने के क्रम से देखा जाए तो पहली पात्र वीरॉंवाली जो हरनारायण की बेटी है और रूक्मिणी की मॉं है। वीरॉंवाली एक विधवा है जो अपने पिता के साथ रहती है। पिता हरनारायण जीवन के कर्म क्षेत्र से अलग एक हारा हुआ व्यक्ति है। एक उदार और दयालु पात्र है यह जिससे धनपतराय मुंशी की तरह का काम लेना चाहता है। पर हरनारायण की दयालुता मज़दूरों से ठीक से काम नहीं ले पाती जिस कारण धनपतराय उसे नौकरी से हटा देता है पर फिर भी उसका ख़्याल रखता है। हरनारायण में प्रतिरोध का साहस नहीं है इसलिए संतोष का एक अचल पहाड़ अपने भीतर जमाए बैठे है। संतोष वह भी असहज संतोष अकर्मण्यता का परिचायक होता है। । वीरॉंवाली अपनी बारह तेरह वर्ष की लड़की के साथ अपने पिता के संतोष को न डिगाते हुए बस दिन काट रही है। रुक्मो दूबली पतली सी बारह-तेरह साल की लड़की है। गाँव के ही पंडित को देखकर छिप जाती है-
"अंदर बैठी रुक्मो की मॉं बोली,"शरमाती नही, तुमसे अभी भी डरती है।"
वीरॉंवाली ने फिर हँसकर कहा, "याद नहीं, जब छोटी-सी थी तो तुम्हारे आने पर खाट के नीचे छिप जाती थी। तुम्हें 'बाबा' समझती थी, जो उसे अपने झोले में डाल ले जाएगा।"
और कथा ऐसे चलती है कि सच में ही यह पंडित उसे माड़ी तक ले जाने का कारण बनता है। धनपतराय के तीन बेटे हैं - बड़ा 'कल्ला' जो मिर्गी का रोगी है, शरीर से कमज़ोर है, लार बहाता रहता है, मचक मचककर चलता है, बुद्धि का सामान्य विकास नहीं हो पाया है, दूसरा लड़का है - मंझला जो सामान्य लड़का है, महत्वाकांक्षी है, पैतृक संपत्ति को हथियाने की मंशा रखता है। और तीसरा लड़का हुकूमतराय विदेश से शिक्षा प्राप्त कर लौटता है और अंग्रेज़ सरकार का क़ायल है।

मंसाराम की पत्नी का नाम है ईशरादेई और इनकी दो बेटियाँ हैं। बड़ी बेटी पुष्पा का लगन धनपतराय के मँझले के साथ तय होता है। शादी के बाद घटनाक्रम ऐसे मोड़ लेता है कि धनपतराय बड़ी चालाकी से अपने बीमार बेटे के साथ अपनी दूसरी बेटी का विवाह कर देने के लिए मंसाराम को बाध्य कर देता है। तुरंत ही अपनी दूसरी बेटी की विवाह की तैयारी में ईशरादेई लग जाती है और दुल्हन को लेकर बाहर आते हुए गश खाकर गिर जाती है। इधर मुहूर्त के निकल जाने के डर से पंडित आनन फ़ानन में सामने खड़ी लड़कियों में से एक का हाथ पकड़कर विवाह करवा देता है। तब जाकर पता लगता है कि यह रूक्मणी है। जिस लड़की के पास खाने का भी ठीक ठिकाना नही था, वह माड़ी की बहु बन जाती है।

सहज सुलभ खेल खेलना, पूरे घर की गंभीरता को खिलखिलाहट में बदल देने का काम था रूक्मों का पर पंडित के एक ही कार्य ने उसकी निर्दोष खिलखिलाहट को जैसे निगल लिया था। पंडित के इस कार्य के लिए वीरॉंवाली पंडित को खूब खरी खोटी सुनाती है। वहीं उपन्यासकार इस बात का भी भरपूर अवसर देता है कि ईशरादेई को खूब व्यावहारिक बुद्धि से सम्पन्न दिखा सके। एक पागल के साथ अपनी बेटी को भला कौन ब्याहना चाहेगा। बड़ी बेटी पुष्पा के विवाह की सफलता के लिए जब वह अपनी छोटी बेटी के विवाह को एक समझौते के तौर पर स्वीकार कर लेती है तो भला उसकी भौतिक दुनिया की समझ कितनी प्रखर रही होगी! वह बारम्बार आग्रह करती है कि बारात वालों से कुछ भी न कहा जाए, ग़म खाकर चुप रह लिया जाए। पर उसकी इस नसीहत का कोई नतीजा नहीं निकला। पितृसत्ता की ठेठ प्रतिनिधि है ईशरादेई। और बहुत कुशल भी। वह स्त्री के दर्द को महसूस करती है और अपनी छोटी बेटी को एक पागल से ब्याह देने से बचाने के लिए वह पछाड़ खाकर गिरती है और उसकी बेटी को बेमेल विवाह से बचा ले जाती है। इतना ही नहीं, जहॉं वह अपनी बेटी के दर्द को महसूस करती है पर वहीं सामाजिक लोकाचार के अनुसार अपनी ब्याहता बेटी को घर चलाने और पति पर क़ब्ज़ा ज़माने के तरह तरह के हथकंडों को अपनाने की सीख भी देती है। सत्ता पर क़ब्ज़ा ज़माने के लिए घर के पुरूष सदस्यों का पूरा ख़्याल रखने की सीख देती है और घर की चाबी अपने हाथ में लेने को कहती है।
धनपतराय के दोनों समधी दो विपरीत माली हालत के हैं। मंसाराम और ईशरादेई सम्पन्न हैं तो हरनारायण और वीरॉंवाली विपन्न। ईशरादेई विपन्न रूक्मों को अपनी बेटी की जेठानी के तौर पर स्वीकार नहीं कर पाती। पर फिर भी यह तो हो चुका है।

बड़ी बूढ़ी औरतों की मुखरता का शायद ही कोई जवाब होता है। ऐसा ही एक चरित्र भागशुद्धि का निर्मित किया गया है। वह बड़ी खड़ी भाषा में बात करती है। जब स्थितियॉं 'नंगा नहाए क्या और निचोड़े क्या' में परिवर्तित हो जाती हैं या ' चाह मिटी चिंता घटी, मनुवा बेपरवाह, जिनको कछु न चाहिए वे शाहन के साह' तक यात्रा कर ली जाती है तो सच बोलने का दुस्साहस पैदा हो जाता है और जिस आनंदलोक की सृष्टि करता है वही कबीर का ' रस गगन धरा में अजस्र बहने' लगता है। यह संवाद देखिए- भागसुद्धी - बडी देर से बारात ले जा रहे हो, कुंदनलाल! बेटीवालों का पानी उतारने जा रहे हो, क्या?"
" पानी उतारनेवाली बात ही हुई ना, कुंदनलाल! चालीस बाराती लाने को कहा था, और यहाँ पूरा लश्कर उठा लाए हो। यह पानी उतारना नहीं तो क्या हुआ! बेटियाँ सबकी साँझी होती हैं।"
पर यहाँ विवेच्य चरित्र है रूक्मो यानी रुक्मणी।

रूक्मो जब तक माता के घर में थी तब तक एक मस्तमौला थी। खेलना, कोठरी में छिपकर मॉं को तंग करना, पुष्पा की शादी में दुल्हे से नेंग के लिए दुल्हन की बहन और अन्य लड़कियों के साथ मचलना, सुर में सुर मिला कर मॉंग करना, डोली के वापस आने की खबर सबसे पहले देना- ये सारे काम बाल सुलभ तरीके से कर रही थी। चूँकि ईशरादेई चक्कर खाकर गिर जाती है और मुहूर्त निकला जा रहा था तो पंडित ने आव देखा न ताव, इससे पूछा न उससे, और सीधे सामने खड़ी लड़की का हाथ पकड़कर खींचा और विवाह वेदी पर उसे बैठा दिया। अचानक ही हँसती खेलती लड़की गंभीर स्त्री का बाना ग्रहण कर लेती है। यहाँ से उसके जीवन की संघर्ष यात्रा का आरंभ होता है। मँझला और उसके दोस्त उसे तंग करते हैं, भद्दे इशारे करते हैं, उसके दरवाज़े पर पत्थर फेंकते हैं, गाने गाते हैं और एक वक्त ऐसा भी आता है कि ये सारे धनपतराय का लिहाज भी करना बंद कर देते हैं।

रूक्मो का पति कल्ला शारीरिक रूप से अक्षम होने के बावजूद अपनी पत्नी की स्थिति को समझता है और उसे सुरक्षा देना चाहता है। गाँव में एक आर्य समाजों का आगमन होता है और वह लड़कियों के लिए स्कूल खोलना चाहता है। तमाम विरोध के बावजूद स्कूल खुलता है और रूक्मो वहाँ पढ़ने जाती है। माड़ी की बहु का बाहर निकलना आम हिंदू परिवारों की तरह अच्छा नहीं माना जाता तो रूक्मो का निकलना सहज कैसे होता भला? मँझला खूब गाली गलौज करता है, लाठी भांजता है पर पिता धनपतराय उसका साथ न देकर बहु का साथ देते हैं। नवजागरण का प्रभाव इस घटना पर उपन्यासकार दिखाने में यहाँ सफल रहा है। लड़कियों का पढ़ना उस दौर में नई बात थी और रूक्मो लड़की ही नहीं बहु भी थी। बहु को पढ़ने की अनुमति देना बहुत क्रांतिकारी कदम था। कल्ला भी अपनी घुँघरू लगी लाठी के साथ उसके साथ- साथ रहता। रूक्मो विपन्न परिवार से सम्पन्न परिवार में आती है। उसकी छोटी सी कोठरी के सामने माड़ी खुद एक गाँव की तरह है। वह अपनी मॉं को बताती है कि हर काम के लिए नौकर हैं और मॉं इस भौतिक सुख को देख आश्वस्त होती है। धनपतराय के मन में रूक्मो के लिए अलग जगह है। वह उसका सम्मान इसलिए करता है कि उसके अपंग बेटे का वह पूरा पूरा ध्यान रखती है। पारंपरिक हिंदू स्त्री की तरह पति चाहे जैसा हो वह स्वीकार्य भाव से जीवन को संचालित करती है। वह दयालु है, सहनशील है, घरेलू कार्यों में दक्ष है, उस पर जो आवाज़ें कसी जाती हैं, उन्हें अनसुना करने की क्षमता है, क्रोध नहीं आता, मितभाषी है, धन संपत्ति का मोह नही है, माड़ी छोड़कर स्कूल के पास पति के साथ रहने लगती है। एक आदर्श स्त्री के जितने गुण हो सकते हैं, वे सारे रूक्मों में आरोपित किए गए हैं। वह अपने बीमार पति का इलाज भी करवाती है। वह न सिर्फ पढ़ती है अपितु बाद में गाँव की और लड़कियों को पढ़ाती भी है।

मुझे इस चरित्र में अब तक कुछ भी अटपटा नहीं लगा था। भीष्म साहनी ने एक बहुत सच्ची सी तस्वीर हमारे सामने रखी थी। धनपतराय द्वारा बहुत आधुनिक कदम उठाया गया है। रूक्मो भी बहुत सावधानी के साथ अपनी संवेदनशीलता का परिचय देती है। ऐसे में सावित्री बाई फुले की याद हो आना सहज स्वाभाविक है। सावित्री बाई फुले के समझदार पति ज्योतिबा फुले न केवल अपनी पत्नी को पढ़ाते है अपितु उन्हें अध्यापिका के तौर पर नियुक्त भी करते हैं जो देश की पहली औपचारिक अध्यापिका होती हैं। यह सन अट्ठारह सौ अड़तालीस की बात है। दोनों का समाज ने ही नहीं, उनके अपने परिवार ने भी विरोध किया था। इनके सामाजिक सरोकारों से प्रभावित होकर अंग्रेज़ सरकार ने इनका सार्वजनिक अभिनंदन भी किया था। क्या भीष्म साहनी के समक्ष फुले दंपत्ति नहीं थे? क्या उनके समक्ष सिर्फ ब्रह्म समाज, आर्य समाज और प्रार्थना समाज ही थे? क्या सत्य शोधक समाज को वे नहीं जानते थे? और यदि नहीं जानते थे, तो क्या कारण रहे होंगे? और यदि जानते थे तो उनके पास एक क्रांतिकारी चरित्र था जिसके माध्यम से वे समाज को नई दिशा दे सकते थे।

रूक्मो का अंत इस चरित्र की कमज़ोरी है। कथानक पर विचार करते हुए किसी भी घटना का परवर्ती प्रभाव अवश्य दिखाया जाता है। आर्यसमाजी शिक्षक तो एक निश्चित उद्देश्य के साथ गाँव में पढ़ाने आता है और तमाम विरोध के बावजूद सफल होता है। पर ऐसा कोई उद्देश्य रूक्मो के पास नहीं दिखाई देता। फिर उसका पति बीमारी से ठीक होता है तो रूक्मो तीर्थ यात्रा में फैंटेसी में घिरकर मृत्यु को प्राप्त होती है। बहुत ही भ्रम पैदा करती है यह स्थिति। क्या कहना चाहता है, उपन्यासकार? क्या स्त्री के पढ़ने - लिखने का, इतने त्याग, सहनशीलता का यही परिणाम होना है? मुझे डॉ अम्बेडकर याद आ रहे हैं जिन्होंने शिक्षा को शेरनी का दूध कहा था और कहा था कि जो इसे पियेगा वह दहाड़ेगा ही। पर भीष्म साहनी की रूक्मो शिक्षा प्राप्त करने के बाद भी आर्यसमाजी अंत को प्राप्त होती है जो मेरे जैसे पाठक को गहन अवसाद से भर देती है।
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