आलोचना के समानान्तर

सुनीता गुप्ता 

सृजन के समानांतर आलोचना का संसार विकसित होता है। हाल के वर्षों में अस्मिता विमर्शों ने आलोचना के ठीक बगल में उपस्थित होकर अपनी धमाकेदार पहल से सबका ध्यान आकृष्ट किया हैै। विमर्श अंग्रेजी के डिस्कोर्स शब्द का अनुवाद होते हुए भी अपने वर्तमान स्वरूप में उससे बिल्कुल अलग है। डिस्कोर्स का एक अर्थ एकतरफा संवाद भी होता है। पर भाषा विज्ञान गवाह है कि कई बार शब्द अपने मूल उद्गम से इतनी दूर चले जाते हैं कि उनका अर्थ ही बिल्कुल उल्टा हो जाता है। विमर्शों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। आलोचना का स्वर निर्णयात्मक होता है। पर आलोचना के निर्णयात्मक तेवर के विपरीत विमर्श में संवाद की स्थिति होती है। यह संवादधर्मिता स्त्री भाषा की भी मुख्य पहचान है। स्पष्ट है कि आलोचना में उस पुरूष दृष्टि की प्रधानता है , जो दूसरों की नहीं सुनना चाहता।

जहां तक स्त्री और आलोचना का सवाल है, तो दोनों का संबंध छत्तीस के आंकड़े के समान है। लम्बे समय तक स्त्री ने आलोचना में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करायी। आलोचना ने भी स्त्री को कम नजरअंदाज नहीं किया। सवाल यह है कि यदि आलोचना से स्त्री छूटी रही और स्त्री से आलोचना तो इसकी वजह क्या है? साहित्य में स्त्री की उपस्थिति को पुरुष रचनाकारों द्वारा नकारा जाता रहा। यह सब अनायास नहीं हुआ। एक छद्म आम सहमति के तहत स्त्री की उपेक्षा की जाती रही। स्त्री के लिखे हुए को इस योग्य समझा ही नहीं गया  कि उसपर  विचार किया जा सके। परिणाम यह हुआ कि स्त्री रचनाकारों का लिखा बहुत सा बहुमूल्य रचनाएं उपेक्षित होती चली गयीं। यह इतिहास में स्त्री की उपेक्षा का परिणाम था। डाॅ. सुमन राजे अपने ‘हिन्दी साहित्य का आधा इतिहास’ में इसी ओर इंगित करती हुई लिखती हैं - ‘‘ज्यों ज्यों आधे इतिहास का लेखन गति पकड़ता गया, यह धारणा पुख्ता होती चली गयी कि पुरुष इतिहासकारों ने महिला रचनाकारों के साथ बहुत अन्याय किया है। यह अन्याय उदासीनता के चलते हुआ हो, ऐसी बात नहीं, यह अन्याय विमुख रहकर किया गया है।’’ स्त्री को बाहरी जगत से बेदखल करने में पुरुष समर्थ हुआ,  जिसका नतीजा यह हुआ कि इतिहास के अक्षर भी उसी के हिस्से पड़े। इतिहास में स्त्री की दस्तक उपेक्षित होती चली गयी। दिनकर ने बड़े गर्व से ‘उर्वशी’ में लिखा - ‘‘इसीलिए, इतिहास पहुंचता जभी निकट नारी के/ हो रहता वह अचल या कि फिर कविता बन जाता है।’’ बिना यह सोचे कि इतिहास की इस उपेक्षा का कितना बड़ा दंश स्त्री को भुगतना पड़ा। इतिहास के साथ साथ वह जीवन से भी उपेक्षित होती चली गयी। उसकी इस उपेक्षा के पीछे कहीं तो इतिहास के निर्माण में स्वयं उसकी अल्पसंख्यक उपस्थिति रही किंतु जहां वह उपस्थित थी भी, वहां उसकी इस उपस्थिति केा दर्ज ही नहीं किया गया। रोहिणी अग्रवाल जब लिखती हैं -‘‘अपने समय और साहित्य में मौजूद रहने पर भी उपस्थिति का साक्ष्य इतिहास में दर्ज होकर ही मिलता है, और सच यह भी है कि सबसे अधिक छल स्त्रियों के साथ इतिहास में  ही किया गया है। ... हम अपने अनुभव से जानते हैं कि उपेक्षा से मारक कोई अस्त्र नहीं होता।’’ - तो इसके पीछे यही दंश का भाव है।

यह तो पूर्व आधुनिक काल व स्वतंत्रता के पूर्व की स्थिति हुई। स्त्री के विरुद्ध जारी यह षड्यंत्र आज भी किसी न किसी रूप में जारी है। आज भी यह परम्परा विद्वानों द्वारा पोषित होती चली आ रही है कभी स्त्री विमर्श को पश्चिम से आयातित मानकर - मानो हिन्दी साहित्य या भारतीय समाज में सबकुछ यहीं का रहा हो- और कभी ब्रा ब्रनिंग जैसी छिटपुट घटनाओं को ही स्त्रीवाद का पर्याय मानकर। ब्रा बर्निंग की घटना आज बहुत पीछे छूट चुकी है। इसके मूल मकसद को समझे बिना, इसीको स्त्रीवाद का पर्याय मानना अधूरी समझ व अधूरे अध्ययन का द्योतक ही माना जा सकता है और कोई भी विद्वान कितना ही बड़ा क्यों न हो, क्या सिर्फ इसी आधार पर कि वह पुरुष है, अधूरी समझ के आधार पर फतवा जारी करने का अधिकार उसे दिया जा सकता है? स्त्री साहित्य की उपेक्षा के कुछ ताजे उदाहरण प्रस्तुत किये जा सकते हैं। हिन्दी के चर्चित आलोचक डा0 परमानंद श्रीवास्तव के संपादन में ‘समकालीन हिन्दी कविता’ का प्रकाशन सन् 1990 में हुआ। यह वह समय है जब स्त्री रचनाकार कविता जगत में बड़ी सशक्तता तथा आत्मविश्वास के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही थीं। किंतु संग्रह में केवल एक  स्त्री रचनाकार को शामिल किया गया है। हाल के वर्षों में डा0 नंदकिशोर नवल के संपादन में प्रकाशित काव्य संकलन ‘संधि युग’ में विगत सदी के अंत व नयी सदी के प्रारंभ में अपनी पहचान बना रहे कवियों को शामिल किया गया है। यहां भी केवल एक स्त्री रचनाकार को लिया गया है वह भी इस स्वीकृति के साथ कि इसमें स्त्री का स्वर स्त्री की तरह नहीं है। तो क्या यह मान लिया जाय कि समकालीन काव्य परिदृश्य पर स्त्री स्वर की कोई स्पष्ट दस्तक नहीं है?  इतनी बड़ी संख्या में कविता में स्त्री की उपस्थिति को निश्चय ही दरकिनार नहीं किया जा सकता। तो क्या इन आलोचकों की दृष्टि में स्त्री लेखन एक प्रलाप भर है?
अस्मिता विमर्श को साहित्य से पृथक मानकर खारिज किये जाने का प्रयास पुराना है। साहित्यकारों का एक वर्ग  है, जिसका मानना है कि अस्मिता विमर्श साहित्य के विषय नहीं है , ये समाज शास्त्र की परिधि में आते हैं । सवाल यहां यह है कि साहित्य का भी कोई नियत विषय है क्या? क्या साहित्य को समाज से अलगाया जा सकता है? जो समाज का है, क्या वह सब साहित्य का नहीं है? साहित्य का समाज से सीधा सम्बंध है तो समाज का कोई भी विषय साहित्य के लिए अस्पृश्य कैसे हो सकता है? और मानव जीवन की परिधि में आनेवाला कोई भी विषय चाहे वह मानविकी हो या विज्ञान, तकनीक, धर्म, अर्थ, राजनीति - साहित्य  के लिए त्याज्य कैसे हो सकता है क्या? यदि अस्तित्तववाद जैसा दर्शन का विषय साहित्य में प्रवेश पा सकता है, फ्रायड का मनोविश्लेषणवाद साहित्य द्वारा अपनाया जा सकता है, मार्क्सवाद  की राजनीतिक विचारधारा साहित्य की विषय वस्तु बन सकती है तो फिर स्त्री विमर्श से ही साहित्य को परहेज क्यों? नवजागरण का एजेंडा भी सामाजिक राजनीतिक एजेंडा था, पर साहित्य पर पड़ने वाले इसके प्रभावों को क्या आज नकारा जा सकता है? बल्कि सच तो यह है कि नवजागरण की शुरुआत ही स्त्री विमर्श जैसे विषयों के साथ हुई थी। तो फिर कहीं यह  स्त्री लेखन को बहिष्कृत करने का उपक्रम तो नहीं? या फिर स्त्री की मुक्ति उन्हें भयभीत कर रही है, ठीक वैसे ही जैसे मजदूरों की मुक्ति से पूंजीपति वर्ग भयभीत होता रहा है या दलितों की मुक्ति से उंची जाातियां। व्यवस्था विरोध का जो स्वर माक्र्सवाद का मुख्य स्वर है, वही स्त्रीवादी विमर्श की भी प्रमुख पहचान है जिसकी सबसे बड़ी चोट विवाह व्यवस्था, परंपरा व धर्म है।  दरअसल पुरुष समुदाय घबड़ाया हुआ है, अपने पांवों के नीचे की धसकती जमीन से। स्त्री को घर से बांधकर, परिवार की संरचना को और उसके सारे दायित्व स्त्री पर डालकर वह स्वयं स्वछंद हो गया। अब जब परिवार की पक्षपातपूर्ण संरचना पर चोट पर रही है तो वह बौखलाया हुआ है। परिवार समाज की एक ऐसी अनिवार्यता है जिसके लिए पुरुष को स्त्री पर निर्भर रहना पड़ता है। इसलिए स्त्री मुक्ति का कोई भी कदम उसे सशंकित कर जाता है। परिवार महत्वपूर्ण है स्त्री के लिए भी , बल्कि पुरुष से कहीं अधिक वह इसके लिए मरती खपती है - पर वह कभी परिवार को लेकर सशंकित नहीं होती क्योंकि वह परिवार की संरचना का सार संभाल करती है। वह परिवार कि लिए ही जीती और मरती है उसके इसी जीने और मरने के कारण पुरुष निश्ंिचंत रहता है। स्त्री के पारिवारिक दायित्वों को उसके बंधन के तौर पर व्याख्यायित किया जाता है किंतु उनके विकल्प की बात नहीं होती। स्त्री उन दायित्वों तले अपना वजूद मिटाने को विवश है क्योंकि कोई और उसे उठाने को प्रस्तुत नहीं है। बच्चों का अभिभावकत्व तो पिता को दिया गया जबकि दायित्व स्त्री के हिस्से आया - कोख में निर्माण की प्रक्रिया से लेकर मनुष्य बनाने की प्रक्रिया तक । पुरुष के हिस्से के दायित्वों को वहन करते हुए स्त्री घुटटकर रह गयी। परिवार का वजूद स्त्री के कारण है और इसीलिए आज जब स्त्री इसपर सवाल उठाने लगी है तो वह घबड़ाया हुआ है कि कहीं परिवार का मूलभूत ढांचा ही छिन्न- भिन्न न हो जाय। स्त्री मुक्ति में उसे अपने पांवों की बेड़ी का स्वर सुनायी पड़ने लगता है।

वर्गभेद के आधार पर साहित्य की दृष्टि निर्मित करने वाले विचारक जब समाजशास्त्र का विषय मानकर अस्मिता विमर्श को खारिज करते हैं तो पूछने की इच्छा होती है कि उनका समतामूलक समाज का नारा छद्म है या फिर अस्मिता विमर्श का नकार? अस्मिता विमर्श मानव मानव के बीच किये जा रहे भेदभाव के विरुद्ध प्रतिकार का स्वर है। कला जीवन के लिए मानने वाले लोगों के लिए साहित्य जीवन निरपेक्ष कैसे हो सकता है?
अस्मिता विमर्शों की यात्रा बहुत लम्बी तो नहीं है, पर इसने अपनी सशक्त पहचान अवश्य दर्ज करायी है। खड़ीबोली हिन्दी को लड़खड़ाकर चलने से लेकर छायावादी सूक्ष्म अभिव्यक्ति हासिल करने में लगभग पचास वर्षों तक का समय लगा था। उससे बहुत कम समय में ही अस्मिता विमर्श, खासकर स्त्री विमर्श के साहित्य ने बड़ी तेजी से अपनी सशक्त पहचान दर्ज कर ली है जो संवेदना से लेकर अभिव्यंजना तक किसी भी स्तर पर कमतर नहीें आंकी जा सकती। चर्चित कवयित्री अनामिका लिखती हैं - ‘‘ ... यह आधारभूत तथ्य है कि अस्मिता लिंग -अस्मिता हो, जातीय, राष्ट्रीय या क्षेत्रीय अस्मिता या फिर वर्ग-वर्ण-नस्लगत, शोषण के सतत घूर्णण से स्फुलिंग की तरह उपजी राजनीतिकि अस्मिता - उसे अकेली, अलबेली, कटी-फटी इयत्ता समझने की भूल कभी नहीं करनी चाहिए।’’ वे स्त्री और दलित आंदोलनों से पहले उपनिवेश के खिलाफ चले स्वाधीनता, रंगभेद तथा अश्वेत आंदोलनों को भी अस्मिता आंदोलनों में परिगणित करती हुई घोषित करती हैं कि ‘‘ये सब अस्मिता आंदोलन इस बात का प्रमाण हैं कि जो जहां उपेक्षित और प्रताडि़त है, आज उसमें पचखियां फूट पड़े हैं। चट्टान की छाती दरक गई है और संचित आवेग वहां से झरने की तरह फूट पड़े हैं।’’ आगे वे लिखती हैं - ‘‘जो जहां भी उत्पीडि़त और साधन-विपन्न हैं, उन्हीं के कंधे है दुनिया बदलने की जिम्मेदारी। ... स्त्रियों से ज्यादा अच्छी तरह भला कौन समझता है कि अलग अलग कमरे साफ करना घर की सफाई का  ही दूसरा नाम है। रंग-रोगन और घर की आधारभूत टूट-फूट सुधरने का, समूची रिमाॅडेलिंग साधने का वक्त भी आएगा, फिलहाल अपने कमरों के जाने तो झाड़ें। अस्मिता-आंदोलन यही कर रहे हैं।’’

यह ठीक है कि रचना और आलोचना दोनों की रचना प्रक्रिया अलग होती है। रचना जीवन से सीधे साक्षात्कार है,  जबकि आलोचना रचना के माध्यम से जीवन से साक्षात्कार। इन अर्थों मेें आलोचना को समाज की समीक्षा कहा जा सकता है क्योंकि साहित्य यदि जीवन की समीक्षा है तो आलोचना साहित्य की। विमर्श साहित्यालोचन की एक नयी शब्दावली है जिसका संबंध  साहित्यिक की उस धारा से है जो खंडित अस्मिता के पक्ष में उठ खड़ी हुई है। आलोचना से यह इन अर्थों में भिन्न है कि इसमें आलोचना की स्थापना के विपरीत संवाद की स्थिति होती है। इसका सीधा संबंध मुक्ति की चेतना और संघर्ष के साथ जोड़ा जा सकता है। इन अर्थोें में यह सीधे जीवन से जुड़ता है। जहां तक स्त्री विमर्श का सवाल है, तो इसका संबंध स्त्री मुक्ति की चेतना से है। स्त्री मुक्ति संघर्ष के कई रूप हैं - एक का संबंध आंदोेलनों से है, दूसरे का लेखन से। निश्चय ही दोनों को एक दूसरे से अलग नहीं किया जा सकता - दोनों की पारस्परिकता निर्विवाद है। स्त्री लेखन में भी एक विचारात्मक लेखन है जिसे काफी हद तक समाजशास्त्रीय कहा जा सकता है पर इसके महत्व को इसलिए नजरअंदाज नहीें किया जा सकता क्योंकि यह साहित्यिक आलोचना के लिए औजार उपलब्ध कराता है और सृजनात्मक लेखन के लिए सामग्री।  डाॅ0 सुमन राजे लिखती हैं - ‘‘  स्त्री के मुक्ति संघर्ष का एक समृद्ध शास्त्र विकसित हुआ है, जिसे समग्र रूप से स्त्री विमर्श कह दिया जाता है।’’

एक समय था जब आलोचना - काव्य शास्त्र - की जीवन से निरपेक्ष अपनी स्वायत्त सत्ता हुआ करती थी। काव्य शास्त्र के विभिन्न सम्प्रदाय में कविता की जो समीक्षा मिलती है, वहां कविता का विश्लेषण विशुद्ध कला के रूप में हुआ है। आलोचना के क्रमिक विकास पर दृष्टि डालें तो स्पष्ट होता है कि आलोचना की यात्रा क्रमशः समाजोन्मुख होने की है। छंद, अलंकार, गुण, रस आदि की सारहीन विवेचना के लिए आज आलोचना में कोई जगह नहीं बची हैे। इसकी जगह आज समाज सापेक्षता ने ले ली है। ऐसे में छंद, अलंकार  वगैरह अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। क्या आश्चर्य कि भविष्य में आलोचना का स्थान विमर्श न ले ले। आलोचना का स्वरूप गतिशील रहा है। जो आलोचना परम्परागत मानदंडों पर टिकी होती है, वहां जीवन की उपेक्षा होती है। जीवन में आ रहे बदलाव के साथ तालमेल बैठाना आलोचना के लिए अनिवार्य है, अन्यथा वह पिछड़ जाती है। यही कारण है कि आलोचना का स्वरूप बदलता रहा है और सर्वमान्य आलोचना जैसे किसी मानक की बात करना जड़ता ही कही जा सकती है।  डाॅ0 शंभुनाथ लिखते हैं -‘‘आज की आलोचना सबसे पहले एक संवाद है। उसका महत्व इससे नहीं है कि वह क्या सैद्धांतिक दावे करती है, बल्कि इससे है कि उसके सिद्धांत का व्यवहार रूप क्या है। ’’

आलोचना का इतिहास काव्य शास्त्र या सैद्धांतिकी से निरंतर मुक्ति का रहा है। आलोचना का वर्तमान स्वरूप उसके सैद्धांतिकता से प्र्रस्थान की ओर उन्मुख है। वस्तु पक्ष आलोचना के लिए सदैव महत्वपूर्ण रहा है चाहे वह महावीर प्रसाद द्विवेदी का उपयोगितावाद हो या शुक्लजी का लोकमंगल या हजारी प्रसाद द्विवेदी का मानववाद, रामविलास शर्मा की समाज सापेक्षता, नामवरजी की मूल्यपरकता, शंभुनाथजी का संस्कृति निर्माण के खतरों का संधान - समय साक्षी है  कि आलोचना के सामने एक बेहतर समाज के निर्माण की चुनौती हमेशा रही है। रचना का शिल्प वहां वस्तु के अनिवार्य घटक के तौर पर ही है। विमर्श के वर्तमान अर्थ में देखा जाय तो माक्र्सवाद का स्वर भी एक तरह से विमर्श का ही स्वर है। डाॅ0 शंभुनाथ लिखते हैं -‘‘मेरी नजर में विशुद्ध साहित्यिक आलोचना जैसी कोई चीज न पहले कभी थी और न आज हो सकती है। मेरे जैसे लोगों के सामने साहित्यिक विमर्श के लिए सदा से सांस्कृतिक निर्माणों की एक विस्तृत दुनिया रही है, सभ्यता का विकास रहा है।’’ हिन्दी की आलोचना की वर्तमान अवस्था पर उनकी यह टिप्पणी गौर करने योग्य है - ‘‘हिंदी की विडंबना यही है कि अधिक बहस मुख्य मुददों पर न होकर एसे ही फतवों पर होती है। जाहिर है, ऐसी आलोचना में वस्तुपरकता की कमी समाज  में मानवीय तत्वों की कमी का ही नतीजा है। ऐसी आलोचना की खुद अपनी दृष्टि ही एक सीमा के बाद अंधता का काम करने लगती है।’’

आलोचना के क्षेत्र में आ रहे इस बदलाव के प्रति समकालीन पीढी सजग हो रही है। यह पीढ़ी इन बदलावों के प्रति न केवल संवेदनशील है, बल्कि आलोचना के क्षेत्र में आयी जड़ता को तोड़कर उसे विकासोन्मुखी बनाने के लिए प्रयत्नशील है। बदलते समय के साथ जीवन और उसके साथ साहित्य में आ रही नवीन दृष्टियों को यह उपेक्षा से नहीं देखती। यही कारण है कि वह साहित्य के नये सौन्दर्य शास्त्र की मांग कर रही है और नये साहित्यिक विमर्शों को आदर से स्थान दे रही है। युवा आलोचक देवेन्द्र चैबे अपनी चर्चित पुस्तक ‘आलोचना का जनतंत्र’ में इसी ओर इंगित करते हुए लिखते हैं - ‘‘साहित्य के अनुभव क्षेत्र का दायरा विस्तृत हुआ। परिणामस्वरूप उसकी व्याख्या और विश्लेषण की नयी आलोचनात्मक और वैचारिक पद्धतियां आईं। इस दौरान महत्वपूर्ण बात यह हुई कि साहित्य और समाज विज्ञान के क्षेत्र में कार्य कर रहे आलोचकों ने इस नए साहित्य के मूल्यांकन के लिए नई नई विचार पद्धतियों को आजमाया एवं नए आंदोलनों से निर्मित साहित्य की रचनात्मक धारणाओं को पहचाना, उसकी व्याख्या की तथा उसके आलोचनात्मक विश्लेषण और मूल्यांकन करते हुए इस नए साहित्य को स्थापित करने का प्रयास किया।’’ आगे वे लिखते हैं - ‘‘इसलिए साहित्य और समाज विज्ञान का नया सौंदर्यशास्त्र संघर्षरत समाज के उन मुददों और संदर्भों को केंद्र में  ला रहा है जिसे अब तक हाशिये पर रखा गया था; अगर बहस की भी गई तो उसी पारंपरिक सौंदर्यशास्त्र के ढ़ांचे में जिसे धर्म या कानून मान्यता देता है।’’

यह सच है कि हिंदी के स्त्री विमर्श का प्रारंभिक स्वर समाज की आलोचना का स्वर है। इस स्वर की साहित्यिकता पर तो सवाल उठाया जा सकता है पर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इसने साहित्य को वे औजार उपलब्ध कराये जो आगे चलकर स्त्री विमर्श के साहित्य व आलोचना का आधार बनीं। कोई भी विचार जब साहित्य में आता है तो उसकी सैद्धांतिकी निर्मित होने में समय लगता है। पाश्चात्य स्त्री विमर्श में स्त्रीवादी आलोचना के माानदंडों का स्वरूप स्पष्ट हो चला है। सुखद स्थिति यह है कि हिंदी में भी स्त्री विमर्श की सैद्धांतिकी आकार ग्रहण करने लगी है और इस दिशा में गंभीर काम हो रहे हैं। सुमन राजे का ‘हिंदी साहित्य का आधा इतिहास’ तथा ‘इतिहास में स्त्री’, अनामिका का ‘स्त्रीत्व का मानचित्र’, प्रभा खेतान का ‘स्त्रीः बाजार के बीच बाजार के खिलाफ’ और ‘उपनिवेश में स्त्री’, जगदीश्वर चतुर्वेदी का ‘साहित्य का इतिहास दर्शन’, रोहिणी अग्रवाल का ‘स्त्री लेखन: स्वप्न और संकल्प’,, रेखा कास्तवार का ‘स्त्री चिंतन की चुनौतियां’ आदि इसी दिशा में किये गये प्रयास हैं। अर्चना वर्मा, अनामिका, रोहिणी अग्रवाल, शालिनी माथुर, रेखा कस्तवार, सविता सिंह आदि इस क्षेत्र में कुछ ऐसे नाम हैं जो किसी पहचान के मुहताज नहीं। एक ऐसे समय में जब आलोचना किसी प्रबल स्वर और मानदंड से शून्य है, यह स्त्री दृष्टि ही है जो आलोचना के नये मानदंड के साथ उपस्थित हो रही है। स्त्री विमर्श का यह स्वर अपने वैविध्य में ध्यान आकृष्ट कर रहा है।
पुरुष की एकरस गंभीर भाषा के विपरीत स्त्री विमर्श की भाषा नये रचनात्मक तेवर के साथ उपंिस्थत हो रही है। इस भाषा में कभी आलोचना को कविता के साथ गलबांहियां डाले देखा जा सकता है तो कभी संवाद करते और कभी विधाओं की सीमा को तोड़ते। रोहिणी अग्रवाल ने पात्रों के साथ संवाद के माध्यम से स्त्री विमर्श की जो आलोचकीय पद्धति विकसित है, वह तो अपनी प्रभान्विति में अदभुत है। कहना उचित होगा कि स्त्री विमर्श सर्जनात्मकता आलोचना को एक नयी भूमि प्रदान कर रही है। निरंतर जड़ व शून्य हो रही आलोचना के बीच यह स्त्री आलोचना ही है जो नये सर्जनात्मक तेवर व शिल्प के नये प्रयोग कर रही है और विधाओं की सीमा रेखा का उल्लंघन करती हुई आलोचना के नये स्वरूप गढ़ रही है। स्त्री विमर्श भाषा के साथ एक नया ट्रीटमेंट कर रही है जो अनुभवों की गझिन परतों को खोलने में समर्थ हो रही है। रचनाओं का पुनर्पाठ जीवन और जगत को समझने की एक नयी समझ दे रहा है जिसके आलोक में मानवीयता पर पड़ी खरोंचों का स्वरूप स्पष्ट हो रहा है।

इस आवाज को नकारना इतिहास के साथ छल है। स्त्री की भाषा का सर्जनात्मक तेवर, पारम्परिेक गांठों को खोलती उसकी सजग स्त्री दृष्टि, विधाओं की सीमाओं को तोड़ती उसकी धमाकेदार पहल - ये सब और कुछ नहीं, आलोचना के क्षेत्र में पैदा होते एक नये प्रतिमान की आहट है,  जिसकी उपेक्षा इसबार संभव नहीं है , क्योंकि अब वह सन्नद्ध है कि उसकी आवाज इतिहास द्वारा नकारी न जा सके।

युवा आलोचक सुनीता गुप्ता बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर के एक कॉलेज में हिन्दी पढाती हैं. संपर्क : 
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