हिंदी उपन्यास और थर्ड जेंडर

भावना मासीवाल
भावना मासीवाल महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय में शोध छात्रा हैं.   संपर्क :bhawnasakura@gmail.com;
हमारा पूरा समाज दो स्तम्भों पर खड़ा है पुरुष और स्त्री । आदिम सभ्यता से ही दोनों का काम आपसी सहयोग से बच्चे पैदा करना और मानवजाति को आगे बढ़ाना रहा है । लेकिन हमारे समाज में इन दो लिंगों के अलावा भी एक अन्य प्रजाति का अस्तित्व मौजूद है । ‘जो न पुरुष है न स्त्री । वह न संबंध बना सकता है और न ही गर्भ धारण कर सकता है । समाज में इन्हें हिजड़ा, खोजा, किन्नर, नपुंसक आदि कई उपनामों से संबोधित किया जाता है’। इनका असली नाम, हिजड़ा यौनिक पहचान के साथ ही समाज द्वारा मिटा दिया जाता है । इस समुदाय के रिवाजों में नाम परिवर्तन इसी यौनिक पहचान का एक हिस्सा है । संविधान में इन्हें इंटरसेक्स, ट्रांससेक्सुअल और ट्रांसजेंडर के रूप में पहचाना गया और इनकी पहचान को थर्ड जेंडर में ट्रांसजेंडर श्रेणी में रखा गया ।

थर्ड जेंडर जेंडर के भीतर एक पहचान है । यह पहचान ऐसे लोगों से जुड़ी है जो न स्त्री है और न पुरुष। यह समाज द्वारा निर्धारित जैविक सेक्स के सामाजिक सृजन को नहीं मानता है । यह सेक्स के भीतर थर्ड सेक्स को नहीं मानता है । यह उसे समाज द्वारा निर्मित मानता है । थर्ड जेंडर थर्ड सेक्स का समानार्थी नहीं है,  बल्कि इसका मानना है कि जेंडर का संदर्भ हमारे मस्तिष्क से है, यदि कोई बच्चा लड़की पैदा होती है और लड़को की तरह व्यवहार करती है तो यह उसका यौन अभिविन्यास (Sexual Orientation) कहा जाएगा । थर्ड जेंडर एक तरह से न्यूट्रल है जो अन्य जेंडर के भीतर नहीं है । इसमें सभी यौनिकताओं का समावेश संभव है । यौनिकता का आशय यहाँ यौन क्रिया और यौन संबन्धों तक सीमित नहीं है बल्कि यौनिकता से अभिप्राय प्रवृतियों और व्यवहारों से है । ‘यौनिकता हमारी भावनात्मक यानी हम कौन व क्या हैं व समाज से हमारे रिश्ते से होती है । यह न सिर्फ यौनिक पहचान से जुड़ी है बल्कि इसमें यौनिक मानदंड, व्यवहार, बर्ताव, चाहत, अनुभव, यौनिक ज्ञान और कल्पना भी शामिल होती है,  जो विषमलिंगी व समलैंगिक संबंधों के अंतर्गत गढ़ी जाती है’। यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक व्यक्ति यौनिकता को एक ही तरह से अनुभव और अभिव्यक्त करे । आमतौर पर जेंडर से यह निर्धारित होता है कि हम अपनी यौनिकता को किस तरह व्यक्त करते हैं । और थर्ड जेंडर के न्यूट्रल स्वभाव के कारण हिजड़ा समुदाय जो थर्ड सेक्स या उभयलिंगी के रूप में जाना जाता है, स्वयं को थर्ड जेंडर के भीतर ट्रांसजेंडर कहलवाना पसंद करता है ।

उपन्यास साहित्य में हिजड़ा समुदाय को केन्द्रित करते हुए चार उपन्यास यमदीप, तीसरी ताली, किन्नर कथा और गुलाम मंडी को विश्लेषण का आधार बनाया गया है । यह आधार इनकी कथावस्तु को ध्यान में रखकर बनाया गया । यह चारों उपन्यास हिजड़ा समुदाय पर केन्द्रित हैं और उनकी जैविक संरचना से लेकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक संरचना के भिन्न-भिन्न पहलुओं को सामने लाने का प्रयास करते हैं । हिजड़ा समुदाय जिसके बारे में पौराणिक आख्यानों में रामायण, महाभारत और कौटिल्य के अर्थशास्त्र, कामसूत्रम् उसके बाद मुग़ल इतिहास में बहुत सी घटनाएँ मौजूद हैं । आज जब हम इस समाज को देखते हैं तो पहला सवाल उठता है कि ये ऐसे क्यों हैं ? क्या ईश्वर ने इन्हें ऐसा बनाया है ? या यह भी हमारे समाज की ही जेंडर आधारित निर्मिति का एक रूप हैं । जिस तरह समाज में स्त्री और पुरुष दो संरचनाएं मौजूद हैं और उनके अनुरूप उनका व्यवहार, क्रियाएं और प्रतिक्रियाएं हैं । ठीक उसी तरह समाज में इनके प्रति भी पूर्व धारणाएं मौजूद हैं और यह सभी धारणाएं सृजित हैं । क्योंकि इतिहास और पौराणिक आख्यानों में कहीं भी इन्हें अनुपयोगी नहीं माना गया है, न ही पुनरउत्पादन की प्रक्रिया में इनकी निष्क्रियता को इनके मनुष्य होने पर ही चिंहित किया गया है,  जैसा कि समाज में होता है । सामाजिक धारणाओं और पौराणिक कथाओं से भिन्न साहित्य में इनकी एक अलग छवि गढ़ी गई है । इस छवि की पड़ताल अनेक संदर्भों के साथ करने की जरुरत है । साथ ही साहित्य की अंतर्दृष्टि  थर्ड जेंडर को कैसे देखती है यह समझना व देखना भी आवश्यक होगा ।

इन सभी उपन्यासों की कथावस्तु इस समुदाय के सामाजिक अस्तित्व को स्थापित करती हैं । कहीं पौराणिक आख्यानों में रामायण के अयोध्या कांड में राम द्वारा स्त्री-पुरुष दोनों को लौट जाना कहने का संदेश- जथा जोगु करि विनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा ।। नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपा निधि फेरे ।। हिजड़ों के लिए यहां कुछ नहीं कहा जाता । चौदह वर्ष बाद राम का लौटना और उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर वरदान देना ‘जब कलयुग आएगा, तब तुम लोग राज करोगे’ । रामायण जैसा प्रसिद्ध आख्यान उनके अस्तित्व की प्रमाणिकता को सुनिश्चित करता है । इसी तरह पौराणिक आख्यान महाभारत की कथा में शिखंडी और अर्जुन का बृहन्नला रूप आदर्श माना गया है । यमदीप उपन्यास में नीरजा माधव मानवी और आनंद कुमार के माध्यम से इनके इतिहास की गहराई में जाती हैं ‘अंग्रेजी में इनके लिए ‘हरमोफ्रोडाइट्स’ स्त्री-पुरुष लक्षणों वाला और ग्रीक में इन्हीं लक्षणों से युक्त हरमोफ्रोडाइट्स’ की मूर्ति को स्त्री-पुरुष प्रेम और सौंदर्य का प्रतीक बताती हैं । मिस्र, बेबीलोन और मोहनजोदड़ो की सभ्यता में इनका प्रमाण मिलता है । संस्कृत नाटकों में इनका जिक्र है कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि राजा को हिजड़ों पर हाथ नहीं उठाना चाहिए  । इसी प्रकार गुलाम मंडी में सामाजिक हैसियत के अलावा उनकी राजनैतिक भूमिका को बताया गया। ‘राजाओं के राज में हिजड़े बहादुर योद्धाओं के दल में शामिल किए जाते थे । स्त्री और पुरुष कुछ भी बन सकने की उनकी क्षमता उन्हें राजकीय जासूसों के पद भी दिलवाती थी । दरबार हो या मंदिर, वे अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन करके वाह-वाही भी लूट सकते थे । इनाम-इकराम भी कमाते थे । बादशाहों के हरम में सुरक्षाकर्मी होते थे, औरतों के साथ सेक्स न करना उनकी कमी नहीं, खूबी थी । हिजड़ों का तिरस्कार तो अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुआ’ । चारों उपन्यास की कथावस्तु हिजड़ा समुदाय के मनुष्य होने का प्रमाण प्रस्तुत करती है और समाज में उनकी निर्धारित भूमिकाओं की आलोचना करती है । जहाँ माना गया कि यह परिवार, समाज और राजनीति में उपयोगी भूमिका नहीं निभा सकता है ।

यमदीप उपन्यास की लेखिका इस समाज में इनकी उपयोगी भूमिका की तरफ ध्यान केन्द्रित करती हैं ‘जैसे मुंबई में एक कंपनी में बकाया धन की वसूली के लिए इनकी नियुक्ति हुई और परिणाम यह हुआ है कि जिस ऋण की वसूली वर्षों से नहीं हो पा रही थी, उसे चुटकी बजाकर ये लोग वसूल कर लेते हैं’ । आर्थिक स्तर पर इनके लिए रोजगार उपलब्ध कराने की बात यहाँ लेखिका करती हैं ताकि यह समाज अपनी पारम्परिक भूमिका से बाहर आ सके और स्वतंत्र रूप से जीवनयापन कर सके । इसी तरह नाजबीबी का कहना अगर सरकार हमें भी हथियार दे दे । मैं तो लडूंगी । लड़ते-लड़ते हिंदुस्तान के पीछे अपनी जान दे दूंगी’ । उपन्यास के अंत में नाजबीबी का यही संकल्प चुनाव में उनके खड़े होने की भूमिका तय करता है और वह कहती हैं , जरूरत पड़ी तो भ्रष्ट लोगों के खिलाफ हथियार भी उठाऊँगी । हर गंदगी को जड़ से साफ कर दूंगी । दुनिया में शांति रहे, और क्या चाहिए किसी को  ? नाजबीबी का यह कथन शबनम मौसी, कमला जान, आशा देवी, कमला किन्नर और रायगढ़ की मेयर मधु किन्नर  की याद दिलाता है जिसका कहना था कि वह ताली नहीं बजाना चाहती वह कुछ करना चाहती हैं । इसी तरह ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी  ट्रांसजेंडर समुदाय के रोजगार के विकल्प में महिलाओं की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी उन्हें देने और उससे संबंधित ट्रेनिंग की बात करती हैं। राजनीति यहाँ एक विकल्प के तौर पर इस समुदाय में उभर कर आती है । क्योंकि सत्ता,  सत्ता की बात को सुनती और समझती है । इसका सबसे बड़ा उदाहरण वह सभी लोग रहे जिन्होंने लंबे विरोध के बाद अपने लिए राजनीति में अलग पहचान बनाई और अपने समुदाय के लिए काम किया ।

उत्पादन और उपयोगिता की राजनीति का प्रश्न उपन्यासों का केंद्रीय प्रश्न है , जहाँ जैविक और यौनिक भिन्नता समाज में इनके अस्तित्व को अस्वीकार्य बना देती है । तीसरी ताली उपन्यास में प्रदीप सौरभ लिखते हैं घर में ऐसे बच्चे का पैदा होना उसकी पैदाइश के साथ ही उसकी उपयोगिता को खत्म कर देता है । ‘घर में बेटा जरूर हुआ था, लेकिन कुछ दिनों के अंदर ही परिवार को पता चल गया कि वह किसी काम का नहीं है । बढ़ने के साथ उसका पुरुषांग विकसित नहीं हुआ ।  उपयोगिता का यह प्रश्न सामाजिक व राजनैतिक उपयोगिता को दर्शाता है । जहाँ जैविक रूप से शरीर के किसी अंग का अविकसित होना विशेष तौर पर जननागों, उसके पूरे व्यक्तित्व को ही प्रश्न के घेरे में ला देता है । इसी कारण किन्नर कथा उपन्यास में राजशाही में पली बड़ी सोना को चंदा के रूप में इस समुदाय में पाला जाता है । क्योंकि ऐसे बच्चों को समाज व परिवार के डर से माँ-बाप छोड़ देते हैं । समाज के साथ-साथ राज्य भी इनके प्रति अपने उत्तरदायित्व को नहीं स्वीकारता । महताब गुरू कहते हैं ‘कोई कुछ नहीं करता है । समाज भी नहीं, सरकार तो अपना वोट मांगने के लिए उन्हीं के सामने चारा फैकेगी न, जो रोज मुर्गियों की तरह अंडे देकर आबादी बढ़ाएगी । हम कौन से अंडे देने वाले हैं । अल्लाह मिया ने तो हमें वह नेमत दी ही नहीं’ । हिजड़ा समुदाय का यह जैविक यथार्थ है । इसी आधार पर समाज ने मुख्य धारा से इन्हें बाहर किया । यहाँ व्यक्ति की उपयोगिता को समाज उसके एक अविकसित अंग से ही क्यों सुनिश्चित करना चाहता है विचारणीय प्रश्न  है ?

यह समाज केवल जैविक असमानता को ही नहीं झेलता है वरन सामाजिक जेंडर आधारित असमानता का भी सामना करता है । समाज में स्त्री-पुरुष निर्धारित खांचों से बाहर इनकी यौनिक पहचान और अस्तित्व बार-बार इस असमानता को झेलने के लिए मजबूर होती है । यमदीप उपन्यास की नंदरानी अपने स्कूली शिक्षा के दौरान आए शारीरिक बदलाव को महसूस करने लगी थी । ‘क्या नंदरानी, तुम कैसे चलती हो ? हम लोगों की तरह चलो ।.. कहीं हिजड़े देख लेंगे तो तुम्हें भी वही समझ बैठेगे’। यहाँ समझ का मसला सामाजिक संरचना में इनकी स्थिति से है जिसे समाज द्वारा अपमान जनक बनाया गया है ।हमारे समाज में जेंडर की सामाजीकरण की प्रक्रिया के तहत स्त्री और पुरुष व्यवहार व स्वभाव को ही समाज में स्वीकृति दी जाती है । ऐसे में इस समुदाय का व्यवहार समाज में स्वतः ही अव्यवाहारिक माना लिया जाता है । क्योंकि जेंडर निर्मिति में हमें इनके यौन व्यवहार की शिक्षा दी ही नहीं जाती बल्कि इनके यौन व्यवहार को क़ानूनी अपराध माना जाता है । ऐसे में इस प्रकार के बच्चों का प्राकृतिक यौन व्यवहार उन्हें स्वयं से नफरत और आत्महत्या को मजबूर करता है । तीसरी ताली उपन्यास की निकिता की माँ सामाजिक मजबूरी के कारण अपनी बेटी को हिजड़ा समुदाय को सौप देती है और निकिता परिवार से दूर अपनी इस नई परिस्थिति को समझने और खुद की पहचान व भविष्य के प्रति आशंकित महसूस करती है । ‘अपने को किसी से कम न समझने वाली निकिता के अंदर अपने आधे-अधूरे होने का हीन भाव घर करने लगा । उसके दिमाग की खिड़की अभी इतनी बड़ी नहीं थी कि वह ऐसे लोगों से प्रेरित हो पाती जो उसकी तरह ही थे ..उसे यह बात सबसे ज्यादा डराती कि थोड़े दिनों के बाद नीलम उसे चुनरी पहनाकर मुकम्मल हिजड़ा बना देगी’ । वह इस समाज में खुद के अस्तित्व का आंकलन नहीं कर पाती है और आत्महत्या कर लेती है । दूसरी ओर नंदरानी बार-बार महसूस करती है ‘कि उसके शरीर का विज्ञान ही नंदिनी दीदी के विवाह में बाधक बनता है। कभी-कभी अपने ही हाव-भाव या चाल पर कुढ़ कर रह जाती’। समाज कभी इनकी जैविक भिन्नता को तो कभी यौनिक भिन्नता को मुख्य धारा से अलग होने का कारण मानता है । सवाल उठता है कि आखिर मनुष्यता का तकाजा क्या इनके अस्तित्व और पहचान के लिए काफी नहीं है ?

परिवार के जो सदस्य इन्हें अपने पास रखना भी चाहते है । समाज उन्हें मजबूर कर देता है कि वह उस बच्चे को उसी समाज को सौप दे । तीसरी ताली उपन्यास में आनंदी आंटी की बेटी निकिता एक ऐसा ही उदाहरण है । उपन्यास की पात्र आनंदी आंटी बिना समाज की परवाह किये  अपनी बेटी को पढ़ाना चाहती है,  वह उसके लिए प्रयास करती है । मगर हर जगह निराशा हाथ लगती है,  फिर चाहे लडकियों का स्कूल हो या लड़कों का । दोनों जगह से एक ही जवाब मिला कि जेंडर स्पष्ट न होने के कारण हम दाखिला नहीं दे सकते हैं.. । यह स्कूल सामान्य बच्चों के लिए है, बीच वाले बच्चों को दाखिला देने से स्कूल का माहौल खराब हो जाता है’ । ऐसे में सवाल उठता है यदि परिवार बच्चे को पालना चाहता है तो क्यों समाज और राज्य उसमें रूकावट उत्पन्न करते हैं? यही सवाल यमदीप उपन्यास में नीरजा माधव नंदरानी अर्थात नाजबीबी के माध्यम से सामने लाती हैं । नंदरानी के माता-पिता भी नंदरानी को अपने पास रखना चाहते हैं । नंदरानी की मम्मी का कहना था कि वह उसे पढ़ा-लिखाकर अपने पैर पर खड़ा कराएगी । किसी के भरोसे नहीं रहना पड़ेगा उसे । मगर फिर एक सवाल महताब गुरू उठाते हैं कि ‘माता जी किसी स्कूल में आज तक किसी हिजड़ा को पढ़ते-लिखते देखा है ? किसी कुर्सी पर हिजड़ा बैठा है ? पुलिस में मास्टरी में, कलेक्टरी में ...किसी में भी ?...अरे इसकी दुनिया यही है, माताजी ...कोई आगे नहीं आएगा कि हिजड़ों को पढाओ, लिखाओ नौकरी दो..जैसे कुछ जातियों के लिए सरकार कर रही है.. ’। महताब गुरु के माध्यम से लेखिका ने समाज में इनके प्रति अपनाएं गए सत्ता के सामाजिक चरित्र को उघारा है । बच्चे में जहाँ शारीरिक अक्षमता तो समाज स्वीकार कर लेता है जैसा महताब गुरु कहते हैं कि- लूली-लगड़ी होती यह, कानी-कोतर होती, तो भी आप इसे अपने साथ रख सकते थे । यही बात गुलाम मंडी उपन्यास में लेखिका अंगूरी के माध्यम से कहती हैं–लगड़े-लूले को तो कोई नहीं दुतकारता, अन्धे काने से तो कोई नफरत नहीं करता वैसे ही हमको खुदा ने बनाया,.... । महताब गुरू और अंगूरी दोनों ही समाज में हिजड़ों के प्रति उपेक्षा के भाव के कारणों को सामने लाते हैं । जहाँ शारीरिक विकलांगता से अधिक पुनरूत्पादन की राजनीति कारगर है । भले ही समाज में ऐसे बच्चों को शारीरिक व मासिक रूप से विकलांग व बीमार के रूप में संबोधित किया जाता हो ।

यह समुदाय केवल मुख्यधारा से बाहर ही नहीं किया गया बल्कि समाज में इनके प्रति डर और अफवाहों को भी लोगों में भरा गया । ताकि लोग इनके प्रति नकारात्मक रवैया अपनाए और यह समाज मुख्यधारा में आने का प्रयास न कर सके । साथ ही अलगाव की जिंदगी जीने को मजबूर बना रहे । इस बात का जिक्र यमदीप उपन्यास की पत्रकार मानवी करती है ‘ऐसा सुना जाता है कि आप लोग युवकों को बहला-फुसलाकर जबरन उनका ऑपरेशन करके हिजड़ा बना देते हैं’। महताब गुरु इन अफवाहों को नकारते हैं और कहते हैं ‘हमारी बस्ती में जल्दी कोई इंसान का पूत घुसता है ..कि किसी के आते ही हम उसे तुरंत आपरेशन कर देंगे पकड़कर ? डाक्टरी खोले बैठे हैं इसी कोठरिया में क्या ? यह देखो हमारा अंग, कोई काटा है कि अल्ला-रसूले वैसे भेजा है ? ’ मानवी का यह प्रश्न मुख्य धारा के समाज का प्रश्न था । यही कारण है कि समाज ने इन्हें इंसान की जगह शैतान समझा और उसी के अनुरूप निजी और सार्वजनिक जगहों में व्यवहार किया गया । सार्वजनिक जगहों पर लोग इनसे बात करना इनके साथ खड़े होने तक में अपमान महसूस करते हैं । समाज की मानवता इनकी यौनिक पहचान के सामने आते ही खत्म हो जाती है । जब वह जान जाते है कि वह व्यक्ति एक हिजड़ा है ।
यह समुदाय अस्पष्ट जेंडर और यौनिक पहचान के कारण अपने नागरिक अधिकारों से वंचित रहने को भी मजबूर किया जाता रहा है क्योंकि राज्य की सत्ता दो जेंडर भूमिकाओं पर कार्यरत है । तीसरे की भूमिका को वह स्वीकारता ही नहीं है । इसी कारण शिक्षा के क्षेत्र में ऐसे बच्चों को एक ओर सामाजिक कारणों से अपमानित किया जाता है तो दूसरी ओर राज्य की कोई स्पष्ट नीति नहीं होने के कारण, परिवार द्वारा मजबूर होकर ट्रांसजेंडर समुदाय में शामिल कर दिया जाता है । यहाँ रोजगार की विकल्पहीनता इन्हें परंपरागत पेशा नाच-गाना, बधाई, नेक के लिए मजबूर करती है । इस समुदाय के अधिकांश लोगों के समक्ष जब भी यह समस्या आई उन्होंने यही पेशा अपनाया । क्योंकि समाज में उनके लिए यही पूर्व निर्धारित है और जब भी परम्परागत छवि से बाहर जाकर शिक्षा पाकर कुछ करना चाहा तो अपमानित होना पड़ा । गुलाम मंडी उपन्यास में अंगूरी कहती है ‘कोई भरती करता क्या पाठशाला में, पहले पूछते मेल कि फिमेल । अपनी वो शर्मिला है न, छोरा बन के भरती हुए थी, तो बहनजी ने एक दिन चड्डी उतरवा ली थी उसकी और जूते मारकर के स्कूल से निकालवा दिया था उसको । उमराव गुरु के कुनबे ने शरण दी उसको वरना भूखी मर जाती तो वो भी.. ’। आर्थिक स्थितियां यहाँ अधिक घातक है ।

हिजड़ा समाज में कुछ लोग ही जैविक रूप से इस समाज के हिस्सा होते है, अधिकांश अपनी यौनिक पहचान की अस्पष्टता के कारण इस समाज में शामिल हो जाते हैं । यौनिकता की अस्पष्टता से तात्पर्य स्त्री और पुरुष समाजीकृत संरचना में जेंडर आधारित व्यवहार को नहीं अपनाने से है । एक पुरुष का स्त्रियों की भांति नृत्य और संगीत में रूचि उसके व्यवहार को स्त्रैण बनाता है और समाज में वह बच्चा एक अलग श्रेणी में देखा जाने लगता है । गुलाम मंडी उपन्यास का राजा जो शारीरिक रूप से पूरी तरह पुरुष है मगर अपने स्वभाव में स्त्रियोचित गुणों से परिपूर्ण है । वह ऑपरेशन के जरिए अपना लिंग परिवर्तित करवाना चाहता है । समाज में उसकी यौनिकता को उसी रूप में नहीं स्वीकारा गया बल्कि उसके साथ मुख्यधारा द्वारा ही शोषण के उपरांत उसके लिंग को काट दिया जाता है और बाद में इस समुदाय में बेच दिया जाता है । रानी तो अपने स्त्रियोचित गुणों के कारण इस समाज में लाई गई मगर तीसरी ताली उपन्यास की रानी और ज्योति दोनों ही पूर्ण पुरुष थे । वह समाज की कुत्सित प्रथाओं, रिवाजों और आर्थिक कारणों से इस स्थिति में पहुँचते हैं ।

तीसरी ताली उपन्यास में ज्योति का प्रकरण पूर्वी उत्तरप्रदेश, बिहार के एबीसीडी यानी आरा, छपरा के सफ़ेदपोशों के घृणित और कुत्सित शौकों से परिचित कराता है । लौंडों के रूप में जिसमें खुबसूरत किशोरों को पहले तो शौकिया तौर पर पनाह दी जाती है और बाद में निकाल बाहर कर दिया जाता है । ऐसे में यह किशोर आर्थिक बदहाली यौन शोषण और समाज द्वारा अपमान से बचने के लिए हिजड़ा समूह में प्रवेश करते हैं । हिजड़ा समुदाय का यह उसूल है कि वह किसी भी पूर्ण स्त्री और पुरुष को अपने समूह में शामिल नहीं कर सकते हैं । सोनम ज्योति को समझाते हुए कहती है ‘मैं तुम्हें हिजड़ा नहीं बना सकती । भगवान ने तुम्हें पूरा आदमी बनाया है । वैसे भी हम भगवान से डरते हैं । किसी सही आदमी को हिजड़ा बनाना हमारे समाज में कुफ्र है’ ।  ऐसे में ज्योति का आगे बढ़कर कर स्वयं को हिजड़ा बनाने का प्रस्ताव -“माना मैं मर्द हूँ, लेकिन ये समाज मुझसे मर्द का काम लेने के लिये राजी नहीं है । मुझे इस समाज ने मादा की तरह भोग की चीज में तब्दील कर दिया है । मैं मर्द रहूँ, औरत रहूँ या फ़िर हिजड़ा बन जाऊँ, इससे किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा । पेट की आग तो बड़ों-बड़ों को न जाने क्या से क्या बना देती है’. ...बिना हिजड़े के भी तो हिजड़ा बना हुआ हूँ। जो अपने को मर्द कहते हैं, वे कौन से हिजड़ों से कम हैं ! गरीब का बेटा हूँ तो पूरे गाँव की भौजाई बन गया हूँ’ । ज्योति की सामाजिक और आर्थिक स्थिति समाज के तथाकथित वर्ग बाबू श्यामसुन्दर सिंह जैसों की उपभोगी प्रवृति और शौकिया रिवाजों पर घृणा करने को मजबूर कर देती है । ज्योति का दिल्ली आकर नीलम के डेरे में हिजड़ा बनना इन्हीं परिस्थितियों और शौकिया रिवाजों का परिणाम था । एक मुकम्मल पुरुष ज्योति के हिजड़ा बनने की रस्म और प्रक्रिया हमारे अन्दर एक ओर वितृष्णा भरती है तो दूसरी ओर एक प्रश्न भी हमारे आत्ममंथन के लिए छोड़ देती है कि आखिर इस समुदाय का अस्तित्व हमारे समाज में क्या है ? इसी प्रकरण में गाँवों में स्वांग मंडली में नाच गा कर कमाने वाले लोगों की स्थिति ज्योति के समान ही देखी जाती है । काम हो जाने के बाद जिन्हें समाज द्वारा स्वांग वाला, खसुआ, जनखा, हिजड़ा कहकर टरका दिया जाता है। उनके काम को उनकी जेंडर पहचान से जोड़ कर उन्हें ताने मारे जाते हैं । उन्हें समाज में उपेक्षित बना दिया जाता है । इसी कारण ज्योति, रहमान जैसे गरीब परिवार के पुरुष जो समाज द्वारा रोजगार के नाम पर उपेक्षा का शिकार होते हैं । वह सभी दो वक्त की रोटी के लिए नकली हिजड़ों के रूप में यौन कर्म को अपनाते हैं और परिवार का भरण पोषण करते है । क्योंकि उनका मानना है इस लाइन में अच्छी कमाई होती है । पेट की यही आग तो हिजड़ों को नाचने गाने के साथ समाज की उपेक्षा और उपहास के दंश से बचने के लिये, वैश्यावृति में घुसने और रईसजादों के लौण्डेबाजी के शौक को पूरा करने के लिये मजबूर करती है ।

हिजड़ा समाज के अपने कुछ नियम-कायदे होते हैं । अक्सर जिन्हें हम नजरअंदाज कर देते हैं और उन पर आरोप लगाते हैं । पहला इस समाज में पूर्ण स्त्री और पुरुष के साथ संबंध रखना व उन्हें अपने समाज में शामिल करना। दूसरा समलैंगिक संबंधों को विषमलिंगी विवाह की मान्यताओं से बाहर स्थापित करना । तीसरा इस समुदाय के लोगों का सिग्नल, रेलवे स्टेशन अन्य सार्वजनिक स्थानों पर भीख मांगना और चौथा वैश्यावृति में सक्रिय होना । पांचवा हिंसा और चोरी करना । यह सभी इस समाज में अपराध माना गया है । इस समुदाय के भीख मांगने और वैश्यावृति को पेशे के रूप में अपनाने वाले लोगों को दंड दिया जाता है,‘क्योंकि उनके समुदाय में भीख मांगना चोरी-हिंसा करना भयंकर पाप माना जाता है’ । यह समाज अपनी इस योनि में पैदाइश से डरता है । इसी कारण वह किसी का भी दिल दुखाने व जीव हत्या को पाप मानता है । यमदीप उपन्यास में महताब गुरु कहते हैं ‘ अरे, हम तो खुद ही डरते हैं कि कहीं हमसे किसी का दिल न दुःख जाए । एक चींटी भी पैर के नीचे पड़ जाती तो सोचते हैं कि इसके अंडे होंगे... ’ यह समाज धर्म से गहराई से जुड़ा है इसी कारण किसी तरह की हिंसा को यह अपराध मानता है । यहाँ धर्म का आश्य मुख्य धारा के धार्मिक संदर्भों से नहीं है यहाँ धर्म इनका अपना समुदाय है । इस समाज में सभी लोग बुचरा देवी को मानते हैं और मृत्यु होने पर मार-मार कर दफनाए जाते हैं । ताकि दुबारा इस योनि में जन्म लेकर वापस न आ सके । ‘सुना है, रात में कब्र में गाड़ देते हैं, वह भी अपनी ही बस्ती में । और उस पर ..जूते-चप्पल से पीटते हैं, थूकते हैं और इस योनि में दोबारा जन्म न लेने की बात करते हैं’ । सभी उपन्यासों के कथानकों में इनका संदर्भ मौजूद है ।

आर्थिक असमर्थता बेरोजगारी, शिक्षा का अभाव, तकनीकी अकुशलता और सबसे बड़ी समस्या परंपरागत पेशे का अज्ञान इन्हें वैश्यावृति को पेशा बनाने पर मजबूर करता है । लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी अपने साक्षात्कार में इस समुदाय की आर्थिक सामाजिक स्थिति के संदर्भ में कहती हैं कि ‘हिजड़ों के पास बुद्धि नहीं होती ? उनके पास प्रतिभा नहीं होती ? बल नहीं होता ? वह राजनीति में नहीं जा सकते? फौज में नहीं जा सकते ? इन बातों को किन तर्कों के आधार पर तय किया ? आप ने कलाकारों, प्रतिभावानों को मजबूर कर दिया पचास-पचास रुपए में देह बेचने को, ताली बजाने को’ । इस समुदाय की कमला देवी जो पेशे से यौन कर्मी हिजड़ा हैं कहती हैं ‘यहाँ जो नए लोग आते हैं वह दो तरह की कमाने की प्रक्रिया से होकर गुजरते हैं पहला परम्परागत नेक, बधाई, ताली और नाच-गाने से है और जिनके पास यह गुण नहीं होता वह मजबूर होते हैं वैश्यावृति की ओर’ । यमदीप उपन्यास में महताब गुरु के माध्यम से लेखिका इस समाज की आर्थिक स्थितियों पर लिखती हैं ‘पेट पालने की इसी विवशता में कितने तो छिपे-मुद्दे तौर पर इसे वैश्यावृति की तरह अपना चुके थे । क्योंकि एक तो गिरिया कम लोग बनते थे और दूसरे केवल गिरिया द्वारा दी गई सीमित धनराशि में इनका खर्च चलना मुश्किल हो जाता था’ । बावजूद इसके आर्थिक मजबूरियों के साथ-साथ समाज का अमानवीय व्यवहार भी इन्हें यौनकर्म की ओर धकेलता है । रेखा चितकबरी जैसे इस समाज के लोग वैश्यावृति को आसानी से पैसा कमाने का जरिया बना लेते हैं और किशोरवय हिजड़ों को बाज़ार के अनुरूप तैयार करते हैं क्योंकि बाजार में ग्राहक लड़कियों की जगह लौंडे मांग रहे थे । लौंडे लड़कियों की तुलना में सस्ते में भी उपलब्ध थे । विदेशी ग्राहक तो कमसिन लौंडों की मुँहमाँगी कीमत दे रहे थे’ । यह प्रक्रिया एक तरह से मानवतस्करी है । आज इसका वैश्विक बाज़ार बढ़ा है और इसका सबसे बड़ा कारण आर्थिक बेरोजगारी है । तीसरी ताली और गुलाम मंडी उपन्यासों में इनका संदर्भ दिया गया है ।

आर्थिक स्थितियां मनुष्य को जितना मजबूर बनाती हैं उससे कई अधिक प्रशासनिक गतिविधियाँ । प्रशासन भी अपने चरित्र में पितृसत्तात्मक होता है । लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी कहती हैं घायल हिजड़ो, बीमार हिजड़ों के साथ हॉस्पिटल में भेदभाव किया जाता है । पुलिस चौकी में उनके साथ हुई दुर्घटना को दर्ज नहीं किया जाता । स्वयं उनके साथ दो बार बलात्कार करने की कोशिश की गई  । प्रशासन भी मौका पड़ने पर मदद की अपेक्षा शोषण की प्रवृति को अपनाता है । गुलाम मंडी उपन्यास की पात्र रानी जिसका जन्म तो पुरुष शरीर में हुआ था मगर उसकी यौनिकता स्त्री स्वभाव की थी । इसी कारण उसे परिवार में पिता के हाथों मार तक खानी पड़ी और समाज में भी अपमानित होना पड़ा । उसके अपमान का एक कारण उसकी यौनिकता थी तो दूसरी गरीबी । वह कहती है ‘मुझ एक को छोड़ सब पूरे थे । मेरी दाढ़ी-मूंछ नहीं निकले । आवाज छोरियों जैसी रह गई तो सब मेरे को मारते-चिढाते-खिजाते थे । बाप भी जब देखो, तब हाथ छोड़ देता था । लोगों के घर बर्तन मांजने गई तो बोले, हिजड़े से बर्तन मंजवाएंगे क्या ? मैंने कह दिया, ‘....से बर्तन थोड़ी मांजते हैं, मांजते तो हाथ से ही हैं न । तो घराती ने थाने में रिपोर्ट कर दी कि हिजड़ाघर औरतों को छेड़ रहा है । अश्लील बाते कर रहा है । पुलिस मुझे पकड़कर ले गई । मारा भी और रेप भी किया । अब पूछो कानून के रखवालों से, भला हिजड़ों को पुरुष थाने में क्यों भेजते हैं। नहीं तो बनाए तीसरा थाना’ । शारीरिक शोषण केवल महिलाओं के साथ ही नहीं होता बल्कि यह समाज भी इससे प्रताड़ित है । अंतर केवल इतना है कि महिलाओं के साथ हुए शोषण को संविधान में बलात्कार के अंतर्गत परिभाषित कर दिया गया है । मगर इस समुदाय के साथ किया गया यौन शोषण संविधान की किसी भी परिभाषा में दर्ज नहीं हो सका है ।

समाज ने इंसानियत के जिस तकाजे पर इस समुदाय को मनुष्यता के सामाजिक पैमाने से बाहर किया । वही मनुष्यता मुख्य धारा से अधिक इनमें दिखती है । वह चाहे सड़क पर पड़ी गर्भवती पगली के जन्मजात शिशु को उसी समाज द्वारा उपेक्षित किए जाने पर यमदीप उपन्यास की पात्र नाजबीबी द्वारा पालना हो या उसी समाज के लोगों द्वारा महिला से बलात्कार के प्रयास को असफल कर उसकी रक्षा करना हो, किन्नर कथा की पात्र ‘मातिन’ इसी का एक उदाहरण है । ‘मातिन हिजड़ा नहीं है, वह संपूर्ण स्त्री, किंतु विधवा है’ । उसका अपना जेठ उसके पति की मृत्यु के तुरंत बाद जमीन के लालच में उसका बलात्कार और बाद में मारने का प्रयास करता है । सत्ता शोषण का कोई भी  रास्ता अपनाने से कभी पीछे नहीं हटती है । यमदीप उपन्यास में मानवी द्वारा नारी सुधार गृह के सफेदपोश चेहरे को बेनकाब करने के प्रयास में उसमें शामिल नेताओं का चरित्र भी सामने आने लगता है और यही जनता के रक्षक अपनी भक्षक भूमिका में आकर मानवी पर हमला करते हैं । नाजबीबी उस समय मानवी की रक्षा करती है । प्रश्न उठता है जिस मनुष्यता व मानवता की बात मुख्यधारा का समाज करता है क्या वह यही मानवता है कि अपने से कमजोर का शोषण व बलात्कार करे ? नाजबीबी कहती हैं ‘सोच रही हूँ, मेम साहब, कि भगवान ने मुझे हिजड़ा बनाकर ठीक ही किया । अगर यह न बनाता तो जरूर मुझे औरत बनाता और तब ये सारे अत्याचार मुझे भी झेलने पड़ते’ । मुख्यधारा के लोगों को भी सोचने को मजबूर कर देता कि उनकी मानवता कितनी कमजोर और स्वार्थी है उनसे अच्छे तो यही लोग हैं । जो वक्त पड़ने पर मनुष्यता और उसके मूल्यों  की रक्षा करते हैं ।
( यह आलेख भावना मासीवाल के शोध आलेख का हिस्सा है , पूरा शोध लेख स्त्रीकाल के प्रिंट एडिशन में  शीघ्र प्रकाश्य ) 
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