उम्मीदों के उन्मुक्ताकाश की क्वीन

नीलिमा चौहान
पेशे से प्राध्यापक नीलिमा 'आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक 'बेदाद ए इश्क' प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com. 
एंड दे लिव्ड हैप्पिली एवर आफ्टर ' की तर्ज पर  दाम्पत्य के सुखांत से रसानुभूति पैदा करने वाली  रोमांटिक फिल्मों का दौर अब फीका पड़ता नज़र आ रहा है और उसके स्थान पर विवाह की पपम्परागत संस्था को नकारकर उन्मुक्ताकाश में अपने स्व को तलाशती नायिकाओं वाली फिल्मों ने दर्शकों की कलात्मक रुचि का परिष्कार करना आरंभ कर दिया है । क्वीन , डॉली की डोली , पीकू और अब तनु वेड्स मनु रिटर्न्स : स्त्री विमर्श वाली समझदार फिल्मों की पूरी फेहरिस्त बनती जा रही है ।  यह स्त्री विमर्श अपनी सामग्री ही नहीं पेशकश में भी जीनियस किस्म का है । पत्नी , मां , बहन , बेटी , बहू नहीं , स्त्री  की पहचान है उसकी आजाद शख्सियत ;  जिसे जीता , लुभाया , भरमाया , बहलाया नहीं जा सकता । इन सबमें स्त्री पुरुष की सत्ता से आज़ाद होती  स्त्री अपनी दुनिया की क्वीन है । क्वीन जिसके अपने सपने हैं , अपना हौसला है , रास्ते बनाने की तड़प है । जहां नायिका  एक कोई अच्छे से नायक के प्रेम में पडकर , एक अच्छे घराने की वधू बनकर सुखी वैवाहिक जीवन की अपेक्षित नियति का शिकार होकर जीना स्वीकार नहीं करती ।

तनु वेड्स मनु रिटर्न्स को  बेहद कलात्मक और मनोरंजक पैकेज के बावजूद  स्त्री विमर्श की  एक बेहतरीन फिल्म माना जा सकता है । तनु सामंती व्यवस्था के भीतर अपनी मनमाफिक और आजादी के लिए प्रपंच करने वाली स्त्री समाज की प्रतिनिधि है । तनु जितनी आधुनिक दिखती है,  उससे कहीं अधिक वह पुरातन सोच की है .वह पत्नी नहीं जोंक है,  जिसको एक बार पत्नी की पोस्ट हासिल हो जाए तो वह जीवन भर निठल्ले रहकर पति का सामाजिक - मानसिक शोषण करती रह सकती है । उसके दुख उसके अभाव सब उसके खालीपन की उपज हैं । रस उसके जीवन में इसलिए नहीं क्योंकि वह एक कर्महीन प्राणी है |. जिन पत्नी अधिकारों की बात वह करती है वह सब हास्यास्पद हैं क्योंकि उसको खुद किसी कर्तव्य का अहसास तक नहीं है |. उसके आंसू दर्द नहीं जगाते क्योंकि उनका कारण धोर स्वार्थी नजरिया है | दुनिया में अनगिनत पत्नियां हैं वह भी एक है जिसके जीवन की कोई सामाजिक उपादेयता नहीं | कुल मिलाकर यह कि तनु और उस जैसी अन्यों में ऐसा क्या है कि उन्हें ज़रा देर भी चाहा जा सके | ये पत्नी बनने के लिए पैदा हुई और पत्नी के गुमनाम ओहदे पर पैरासाइट की तरह जीते रहने को खुदा की नेयमत मानने वाली फूहड़ प्रजाति है |



इसके ठीक विपरीत दत्तो जैसी आधुनिक , संधर्षशील , आत्मनिर्भर ,सुलझी हुई , स्पष्टवादी और स्वाभिमानी लड़की के चरित्र में बहुत सी संभावनाओं की मजबूत झलक दिखाई गई है । दत्तो की बेहद पारंपरिक पृष्ठभूमि के कॉंनट्रास्ट में उसका  समूचा चरित्र बहुत यथार्थवादी तरीके से पेश किया गया है . उसे अपने खिलाड़ी होने , अपने बल पर अपना जीवन जीने की जिद पर आत्माभिमान है । दत्तो के इस दिपदिपाते चरित्र के आगे  'अपने अंडरवियर तक के लिए'  परनिर्भर रहने वाली तनु जैसी औरतों के  बेमानी हकों की हाय हाय हास्यास्पद लगने लगती है  । दत्तो  एक अत्यंत बंद समाज से आने वाली  कम आयु की हौसलों और उम्मीदों से सपनों से भरी लड़की है । एक आम भारतीय लड़की जिसके सपनों की दहलीज पर जो भी पहला समर्पित नायक द्वार खट्खटाता है ,वह उसे ही दिल दे बैठती है । पर वह प्रेम और समझौते में फर्क समझती है । चूंकि वह खैरात नहीं लेती स्वाभिमानी है , खिलाड़ी है , तो गिरकर उठना भी जानती है और हार को जज़्बे के साथ वैसे ही स्वीकार  करना जानती है जैसे जीत को । उसके लिए तनु की तरह ग़मों को पालने की सहूलियत है न ही समय और न ही आवश्यकता । इसलिए वह ' ऎसे शिव से गिरिजा विवाह करने की मुझको नहीं चाह ' जैसे औदात्यपूर्ण फैसले से न केवल खुद को हमेशा के लिए आजाद कर लेती है वरन तनु और मनु जैसे विवाहित जोड़ों को उनकी
परम्परागत दाम्पत्य की स्वाभाविक नितयि को भोगने के लिए सहज स्पेस  दे देती है । एक आम लड़की की सी भावनात्मक कमजोरी से तुरंत निकलकर समारोह में शराब पीकर शोर मचाने वाले को अपना करारा कराटॆ चाप देते दिखाकर और तनु और मनु को टाई से उपजे इमोश्नल मैलोड्रामात्मक प्रेम विवाद में पड़ता दिखाकर  निर्देशक ने फिल्म के अपने पात्रों से पूरा पूरा न्याय किया है । अवस्थी जी को जूस पिलाने वाले अंतिम दृश्य में प्रेम की अनंत संभावनाओं वाले आकाश में उड़ने और एक्स्प्लोर करने वाली संघर्षशील लड़की के रूप में कुसुम का चरित्र और भी अधिक प्रामाणिक लगने लगता है । यदि निर्देशक ने इस संबंध के बनने और टूटने को दत्तो के लिए एक सबक की तरह दिखाया होता और दर्शक को आगे के जीवन के लिए मात्र शुष्क लक्ष्यों के लिए कटिबद्ध दत्तो दिखाई होती तो यह स्वतंत्र स्त्री का एकांगी प्रस्तुतिकरण कहलाता । भावात्मक , आर्थिक , सामाजिक वैचारिक  स्वतंत्रता से लबरेज दत्तो का चरित्र दर्शक के परंपरागत माइंडसेट् से दखलंदाज़ी कर उसे दत्तो से साधारणीकृत होने पर विवश कर देता है । लगता है कि तनु जीत गई पर साफ महसूस किया जा सकता है तनु हार गई । उसे मिला लिजलिजे दाम्पत्य प्रेम से लूटे गए आजीवन अधिकारों के आराम से भरी एक बंद दुनिया । जहां रहेगा आधारहीन उद्देश्यहीन और  वास्तविक उल्लास से हीन जीवन । जबकि दत्तो ने अपने लिए अनंत आकाश की संभावनाओं भरी जिंदगी को वापिस जीत लिया ।

पूरी फिल्म में मनु के प्रति दयनीय पात्र के प्रति सहानुभूति पैदा होती है । जिम्मेदार , कमाऊ , सिंसियर हस्बेंड बनकर अपने सामाजिक पारिवारिक दायित्व को ही दाम्पत्य प्रेम का नाम दे देना उसकी नियति है । वह इसी प्रेम को  तलाशता फिरने वाला पति नामक जीव है और पहले असफल वैवाहिक जीवन के दुखांत के तुरंत बाद एक नये प्रेम संबंध  के भ्रम में पड़कर फिर से " एक अच्छा हस्बेंड बनकर दिखाउंगा " की अंतहीन अपेक्षाओं के रास्ते पर  होम होने चल देता है । फिल्मकार यदि मनु शर्मा के इस नये संबंध का आधार तनु और दत्तो की रूपसाम्यता न दिखाता तो हस्बेंड प्रजाति की इस नियति के दंश को नहीं उभार पाता । एक तरह के संबंध की दुखांत स्थिति के बावजूद चालीस की उम्र में मनु शर्मा उसी पुराने संबंध को नई पत्नी में तलाशने की अपरिपक्वता दिखाता है । फिल्म के दूसरे पुरुष पात्रों को भी ' कंधे ' की तरह इस्तेमाल होने के लिए उत्कट  दिखाकर  फिल्मकार ने परंम्परागत स्त्री पुरुष संबंध को बेहतरीन तरीके से संतुलित  किया है ।
 इस पूरी फिल्म की कलात्मक प्रस्तुति में स्त्री विमर्श एक अंडरकरंट  के तौर पर लगातार मौजूद रहा है । फिल्म की कलात्मक प्रस्तुति में हर तरह के दर्शक के आअनंद के लिए स्कोप दिखाई देता है । शुद्ध मनोरंजनात्मक नजरिये से देखने वाले दर्शक का दिल  भी अनजाने में  दत्तो ही जीत ले जाती है और यही इस फिल्म की सारी ताकत है  ।    दर्शकों की कलात्मक अभिरुचि का संस्कार करने वाली इस तरह के विमर्शों वाली फिल्मों का स्वागत किया जाना चाहिए ।
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