वारेन हेस्टिंग्स का साँँड: उत्तर औपनिवेशिक समय का ऐतिहासिक पाठ

रेखा सेठी
रेखा सेठी हिंदी विभाग, इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली वि वि, में एसोसिएट प्रोफेसर हैं. 
‘‘दौ सौ साल के बाद जब अंग्रेज़ मालामाल होकर वापस अपने वतन इंग्लैण्ड लौटेंगे तब भी इंडिया में उनके जैसे ही नेटिवों का राज होगा।... उनके कपड़े, विचार, स्वप्न और आकांक्षाएँ अंग्रेज़ होेंगी।’’ 

यह पंक्तियाँँ उदय प्रकाश की कहानी ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँँड’ से हैं। उत्तर औपनिवेशिक मानसिकता से पूर्ण समय और समाज आलोचनात्मक विमर्श उदयप्रकाश की कहानियों का प्राण है। अपनी अलग-अलग कहानियों में उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से भारत के औपनिवेशिक इतिहास और भूमंडलीकरण से पैदा होती नव साम्राज्यवादी हकीकत के अमानवीय पहलुओं पर तीखा प्रहार किया है। ‘वारेन हेंस्टिंग्स का साँँड’,‘पाॅलगोमरा का स्कूटर’ जैसी कहानियाँँ तो सीधे  इन मुद्दों को उठाती हैं। ‘पीली छतरी वाली लड़की’,‘मोहनदास’ ‘मैंगोसिल’,‘दिल्ली की दीवार’ सभी कहानियों में उत्तर औपनिवेशिक इतिहास, बाज़ारवाद, मानवीय अस्तित्व का संकट और नैतिक दिवालिएपन के अनेक संदर्भ मौजूद हैं। अपनी लगभग हर कहानी में लेखक सत्ताकामी, ताकतवर वर्गो के वर्चस्व से दबी-कुचली असंख्य मानवीय जातियों के संघर्ष की अमिट दास्तान सुनाता है। अस्तित्व के संकट और मनुष्य की जुझारु जीजिविषा के द्वन्द्व से उपजता लेखक का दृष्टिबोध मानवीयता के पक्ष की पुकार है। अपनी कहानियों के इस कथ्य को संपे्रषित करने के लिए उदय अपने लेखन में एक लीला रचते हैं जहाँ  इतिहास अतीत से निकलकर सतत निवर्तमान बन जाता है। इस दृष्टि से ‘वारेन हेस्टिंग्स का साँँड’ एक विलक्षण कहानी है।

1997 में जब यह कहानी अपने सबसे पहले रूप में इंडिया टुडे के साहित्य वार्षिकी विशेषांक में छपी थी तो साहित्य की दुनिया में हड़कंप मच गया। समय और स्पेस की सीमाओं का अतिक्रमण कर इसमें अतीत, वर्तमान और भविष्य का जैसा ग्राफ बन रहा था,  उससे उसकी तरह-तरह की व्याख्याएँ और कठोर आलोचनाएँ हुई। किसी ने इसका संबंध हिन्दू पुनर्जागरण से जोड़ा तो किसी ने उसे औसत रचना कहकर खारिज कर दिया लेकिन आज लगभग पंद्रह साल बीत जाने पर भी यह कहानी उत्तर औपनिवेशिक समय और समाज का ऐतिहासिक पुनर्पाठ प्रस्तुत करती है। वर्तमान सामाजिक ढाँचे की चरमराहट ढाई सौ साल पुराने इतिहास की अनुगूँज  बनकर उभरती है। 1757 में पलासी युद्ध  के उपरांत लाॅर्ड क्लाइव की टिप्पणी-

 ‘‘मै सिर्फ यह कहूंगा  कि अराजकता का ऐसा दृश्य, ऐसा भ्रम, ऐसी घूसखोरी और बेईमानी, ऐसा भ्रष्टाचार और ऐसी लूट-खसोट जैसी हमारे राज में आज दिखाई दे रही है, वैसी किसी और देश में न कभी सुनी गई, न कभी देखी गई। अचानक धनाढ्यों  बेइंतहा दौलतपरस्ती ने विलासिता और भोग के भीषण रूप को चारों तरपफ पैदा कर दिया है। इस बुराई से हर डिपार्टमेंट का हर सदस्य प्रभावित है। हर छोटा मुलाजिम ज्यादा से ज्यादा ध्न हड़पकर बड़े मुलाजिम या अधिकारी  के बराबर हो जाना चाहता है। क्योंकि वह यह जानता है कि सम्पत्ति और ताकत ही उसे बड़ा बना रही है। .... कोई ताज्जुब नहीं  कि दौलत की इस हवस को पूरा करनेवाले साधन  इन लोगों के वे ‘अधिकार ’ हैं, जो इन्हें उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से प्रशासन चलाने के लिए दिए गए हैं। विडंबना है कि ये ‘साधन ’ सिर्फ रिश्वतखोरी जैसे भ्रष्ट आचरण के लिए ही नहीं, लूट-खसोट और ठगी -जालसाजी के लिए भी इस्तेमाल हो रहे हैं। इसकी मिसालें उपर के पदों पर बैठे लोगों ने कायम की हैं, तो भला नीचे के लोग उसका अनुसरण करने में नाकामयाब क्यों रहें?

यह रोग सर्वव्यापी है। यह नागरिक प्रशासन, पुलिस और फौज ही नहीं लेखकों, कलमनवीसों और व्यापारियों तक को अपनी चपेट में ले चुका है।’’यदि इन पंक्तियों का संदर्भ अदृश्य कर दिया जाए तो यह विवरण स्वातंत्रयोत्तर भारतीय समाज का आईना बना जाता है। लेखक ने टिप्पणी की है-‘और यही है वह बिंदु जहाँ ढाई सौ साल पहले की कहानी आज की कहानी बनती है।’ अर्थात् कहानी का उद्देश्य अतीत का उत्खनन न होकर वर्तमान की पहचान है। लेखक अपने समय की उत्तर औपनिवेशिक सच्चइयों को उपनिवेशवाद के इतिहास से गुज़रकर परखना चाहता है। अतीत और वर्तमान एक दूसरे का संदर्भ बनकर नए दृष्टिबोध् को जन्म देते है। इस आलेख का उद्देश्य कहानी के इस ढाँचे को स्पष्ट करना है जहाँ उदय प्रकाश यथार्थ की अनेक सतहों पर एक साथ तथ्य और कथा का संश्लेषण कर महाख्यानात्मक रचना करते हैं। यद्यपि कहानी के आरंभ में ही लेखक ने स्पष्ट कर दिया है कि ‘इस कहानी में इतिहास उतना ही है जितना दाल में नमक होता है।’ फिर भी यह देखना रोचक होगा कि उस नमक-यात्रा  इतिहास को लेखक ने कहानी में कैसे पिरोया है।

वारेन हेस्टिंग्स  और उपनिवेशवाद का उदय 

इतिहास के पन्नों में वारेन हेस्टिंग्स उस व्यक्ति की तरह दर्ज है,  जो हिंदुस्तान का पहला गवर्नर जनरल बना। लार्ड क्लाइव के बाद उसने ही ईस्ट इंडिया कम्पनी की बागडोर संभाली। उसकी प्रशासनिक नीतियों के इतने व्यापक प्रभाव पड़े कि आने वाले दौ-सौ वर्षों के लिए भारत अंग्रेज़ों का उपनिवेश बन गया। इस कहानी में वारेन हेस्टिंग्स को मुख्य पात्र बनाकर औपनिवेशिक प्रक्रिया को साकार किया गया है। वह मात्र व्यक्ति नहीं सत्ता का प्रतिनिधि है । वह हिंदुस्तान और यहाँँ की संस्कृति से अभिभूत भी है और आतंकित भी। जैसे एंलिस इन वंडरलैंड’ में सबकुछ एक अजूबा है उसी तरह वारेन हेस्टिंग्स के लिए हिंदुस्तान रहस्य-रोमांच भरी दुनिया है। उसके लिए कुम्हारिन, मालिन, नटनी जैसे औरतें आश्चर्यजनक ढंग से रहस्यपूर्ण हैं, जिन्हें देखकर उसके मन में दो ख्याल लगभग एक साथ ही जन्म लेते हैं-‘‘ओह जीसस, व्हेयर द हेल आय एम।’’ और दूसरा -‘‘मुकाबला कठिन है। हमें इनको ही गुलाम बनाना है।’’

कहानी में यह सारा चित्रण हमें उपनिवेशवाद की प्रक्रिया को गहरी अंतदृष्टि से परखने का मौका देता है। वारेन हेस्टिंग्स अपने आस-पास की हर चीज़ को विदेशी निगाह से देखने की कोशिश कर रहा है। यहाँँ के हवा-पानी, मिट्टी या लोगों से उसका कोई संबंध नहीं । उसके मन में अनजाने परिवेश का भय तो है ही, साथ ही यह उद्देश्य भी साफ है कि उसे इन्हीं लोगों को गुलाम बनाना है। मुगल-शासकों की तरह इस मिट्टी में एक रंग होकर धुल  जाना उसका लक्ष्य नहीं है लेकिन पिफर भी कुछ ऐसा अवश्य है जो उसे सम्मोहित करता है।
महीन कल्पना से रचे गए कहानी के ताने-बाने में वारेन, भारत की वाचिक परंपराओं से पूर्णतः सम्मोहित दिखाई पड़ता है। जयदेव, राध-कृष्ण से जुड़ी दंतकथाएँ, संगीत, कलाएँ, मिथ और स्मृतियाँँ सब उसे अभिभूत किए दे रहे हैं। वह यहाँ की वासंती हवा के खुमार को अनुभव करता है। बुन्तू , अब्दुल कादिर और चोखी उसके मीत हैं लेखक ने चोखी के रूप में वारेन की नेटिव प्रेयसी की कल्पना सी है जिसके साथ वह कृष्ण बनकर रास रचाता है। इस प्रेम-कथा में वह उन्माद और मुक्ति की जिस पींग पर सवार हिंदुस्तान को एक अलग रूप में पहचान रहा था लेकिन उसका असली एजेंडा उसकी आँखों से ओझल नहीं होता। वह शेक्सपियर की माप़र्फत याद करता है ‘‘इफ यू हैव टु डिफीट देम, यू हैव टु किल देयर मेमोरीज़। यू हैव टु डिस्ट्राॅय देयर पास्ट। यू हैव टु शूट देयर स्टोरीज़।’’

 आश्चर्य, सम्मोहन और औपनिवेशिक एजेंडा - इस कहानी में वारेन हेस्टिंग्स का व्यक्तित्व  इन सभी विन्दुओं का समाहार है। एडवर्ड सईद ने उत्तर औपनिवेशिक अध्ययन दृष्टि जो नई दिशा दी, उसकी छाया कहानी में अनेक स्थलों पर प्रतिघ्वनित होती है। वारेन जिस नज़र से हिन्दुस्तान को देख रहा है। उसमें पाश्चात्य पूर्वाग्रह स्पष्ट लक्षित हैं। उस रोमानी धुंधलके  में यथार्थ स्थितियाँँ गायब कर दी गई हैं,  जिससे औपनिवेशिक एजेंडे को सही ठहराया जा सके। अंग्रेज़ों का सम्मोहन उपनिवेशवादी प्रक्रियाओं का उदय है। वारेन हेस्टिंग्ज़ ने भारतीय भाषाएँ सीखीं, गीता का अनुवाद कराया और भारत का पहला नक्शा बनाया। यह सब धीरे -धीरे  उपनिवेशवादी जड़ो को पुख़्ता करने की साजि़श भर था। वारेन हेस्टिंग्स ने भारतीय ग्रंथों के अनुवादों से भारतीय मानसिकता की सब जानकारियाँ अंग्रेज़ो को सुलभ कराई। देश का नक्शा बनाकर औपनिवेशिक व्यवस्था का विस्तार किया, स्थाई भूमि बंदोबदस्त और राजस्व के नए नियम लागू किए। उनके माघ्यम से आने वाले लगभग दौ-सौ सालों के लिए अंग्रेज़ी शासन की ऐसी सुदृढ़ नींव रखी जिसमें शोषण और बर्बरता का इतिहास बार-बार दोहराया जाता रहा।

संस्कृतियों की टकराहट

इस कहानी का एक अन्य आयाम दंतकथाओं, मिथकों, विश्वासों पर टिकी भारतीय संस्कृति को रेनेसां और एज आॅपफ रीज़न से उदित पाश्चात्य संस्कृति के बरक्स रखकर देखने और आँकने का भी है। एक ओर भारतीय संस्कृति का एक रूप है, जहाँ एक-एक आकृति की भी अनेक जीवित कथाएँ हैं। जिस समय वारेन हेस्टिंग्स हिंदुस्तान के इस अलिखित इतिहास पर विस्मित हो रहा था उस समय इंग्लैंड में ‘एज आॅफ रीज़न’ का उदय हो चुका था -‘वहाँ तो महान रोम और इटली के प्रभाव और प्रेरणा से रेनेसां आ चुका था। चाउसर (सास्यूर) , दांते, शेक्सपीयर, होमर की वाणी वहाँ गूँज रही थी। इसका न्यूटन, गैलीलियो से लेकर अरस्तू, प्लेटो ही नहीं प्रफांसिस बेकन, वोल्तेयर, दिदेरो और मैकियावेली के विचारों से ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में नई उथल-पुथल मची हुई थी।’ इस एज आॅफ रीज़न में करुणाशून्य औद्योगिक समाज की स्थापना हुई जिसने पूँजी, माल और मुनाफे के लिए धरती और समुद्र में अधिकार  की लड़ाइयों को जन्म दिया। पश्चिम में विचार की इस रोशनी ने पूर्व के तथाकथित अविकसित समाजों में दमन और शोषण के स्याह-अँधेरे  अघ्यायों की रचना की। भारत पर शासन करने के लिए जिन लोगों को इंग्लैंड से नियुक्त कर यहाँ भेजा गया वे वहाँ के सामाजिक जीवन के लिए सिरदर्द थे। वारेन हेस्टिंग्स स्वयं सोचता है- ‘वे बर्बर, मूर्ख, असभ्य और बेहद लालची थे। दौलत कमाने की उनकी भूख, संपत्ति जमा रकने की उनकी हवस कल्पनातीत थी। वे इस देश को लूटने आए थे।’ इन संस्कृतियों की टकराहट के बीच लेखक यह स्थापित करने की कोशिश करता है कि किंवदंतियों के प्रमाण ढूँढने वाली संस्कृति में मनुष्य और प्रकृति की साझेदारी थी। मानवीय प्रेम और करुणा के स्रोत सूखे नहीं थे जबकि तर्क और विचार आश्रित पश्चिमी समाज आधुनिकता  की दुहाई देता हुआ व्यक्ति केन्द्रित हो रहा था। वह नृशंस और स्वार्थी था और इसी प्रक्रिया में उपनिवेशवाद का उत्स छिपा था।

अंग्रेज़ों के साथ-साथ कुछ स्वार्थ-प्रेरित हिंदुस्तानी भी थे ,जिन्होंने इस शोषण-चक्र को पूरा किया। हिंदुस्तान में सत्ताखोरों-व्यापारियों का ऐसा तबका भी था जो अंग्रेज़ों के खैरख्वाह बने हुए थे। वे उनमें अपना भविष्य देख रहे थे। अंग्रेज़ों को खुश करने, उनका विश्वास हासिल करने को वे कुछ भी कर सकते थे। य हाँ तक कि व्यापारिक ठेके हासिल करने के लिए वे अपने परिवार की स्त्रियों को पेश करने से न चूकते। वे हिंदुसतान की लूट में अंग्रेज़ों के भागीदार थे। लेखक ने संकेत किया है कि ये लोग अधिकतर  उच्च जाति के हिंदू थे, जो अपने रहन-सहन, खान-पान, पहनावे और भाषा, सभी में अंग्रेज़ होने की कोशिश कर रहे थे। अंग्रेज़ों के लौट जाने के बाद भारत में इन जैसे नेटिवों का शासन इन्हीं सत्ताकामी, चापलूसों का शासन है। इनके स्वप्न और आकांक्षाएं अंग्रेज़ हैं।

कहानी के सबसे विवादास्पद सांस्कृतिक प्रतीक हैं - ‘गाय और साँँड’ जिनके कारण इस कहानी का संबंध हिंदु पुनरुत्थान  से जोड़ा गया। वारेन हेस्टिंग्स ने इंग्लैंड में अपने मित्र मिस्टर इमहाॅफ को एक पत्र लिखकरं बताया कि यूरोप में जिन गाय-बैलों को ‘कैटल’ कहा जाता है, यहाँँ उनकी पूजा होती है। उनके नाम होते हैं और वे जानवर नहीं गूँँगे मुनष्य हैं। इंग्लैंड जैसे औद्योगिक समाज के लिए जो मात्र पशु थे, भारतीय समाज में वे परिवार के जीवन का आधर थे। एक ओर, औद्योगीकरण पश्चिम के मानवीय समाज को अमानवीय बना रहा था और दूसरी ओर ये गाय-बैल थे जो गैर-मानवीय होते हुए भी मानवीय करुणा से संपन्न थे। वारेन हेस्टिंग्स हिन्दुस्तान में रहते हुए उनकी सहानुभूति और क्षमता को पहचान रहा था। कहानी के अनुसार जब उस पर महाभियोग लगाकर उसे वापस इंग्लैंड भेज दिया गया तो वह अपने साथ पाँँच ब्राह्मणी गाय और एक साँँड ले गया। कहानी का अंतिम हिस्सा इन्हीं गायों के एक-एक कर मर जाने या मार दिए जाने की कथा है। साँँड उन गायों की मौत का साक्षी है। वह मौन रहकर भी अंग्रेज़ी षड्यंत्र को पहचान रहा था। इसलिए जब महाभियोग के मुकदमे में हेस्टिंग्स को भारत की एक तिहाई आबादी के मौत के उत्तररदायित्व से मुक्त कर दिया जाता है तब वह उन्मत्त साँड हेस्टिंग्स के विरुद्ध  खड़ा होता है। वह साँँड भारतीय आक्रोश और विद्रोह का प्रतीक बन अंग्रेजी साम्राज्यवाद की प्रतीक   बग्घी पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त कर देता है। लेखक उस साँँड के इस जुनूनी आवेश और साम्राज्यवादी प्रतीकों के ध्वंस की अनेक व्याख्याएँ करते हुए एक बूढ़े लामा से कहलवाता है कि वह साँँड अभी मरा नहीं है। साम्राज्यवादी ताकतों के विरुद्ध  मानवीय करुणा का विद्रोह कभी खत्म नहीं होता।

कहानी के रुपक और बहुस्तरीय यथार्थ की परतें 

इस कहानी पर बातचीत तब तक अधूरी  रहेगी जब तक कहानी के विभिन्न रुपकों को डिकोड न किया जाए। अपनी अन्य कहानियों की तरह यहाँँ भी उदय प्रकाश यथार्थ के अनेक वृत्त एक साथ समेटने की कोशिश कर रहे हैं। कहानी का गठन वर्णनात्मक और किस्सागोई के अद्भुत तनाव से निर्मित है। कथाकार कुशल किस्सागो की तरह अतीत का वह पृष्ठ खेलता है जो वर्तमान यथार्थ की परतें उधेड़ने का उत्प्रेरक बनता है और फिर  उसे छोटे-छोटे असंख्य ब्यौरों से भर देता है जिसमें अनेक रुपक अपनी अर्थ छवियों की अगिनत संभावनाओं के साथ बिखरे पड़े हैं। लेखक ने स्वयं लिखा -‘असल में जब इतिहास में स्वप्न, यथार्थ में कल्पना, तथ्य में फैंटेसी और अतीत में भविष्य को मिलाया जाता है, जो आख्यान में लीला शुरु होती है और एक ऐसी माया का जन्म होता हैै जिसका साक्षात्कार सत्य की खोज की ओर की एक यात्रा है।’



कहानी का विन्यास आख्यानपरक है। इतिहास, कल्पना, यथार्थ मिथक सब उसके हिससे हैं। एक थ्री-डी अनुभव की तरह पाठक स्वयं को उसके बीच महसूस करता है। इतिहास के पृष्ठों में अंकित गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स की छवि यहाँँ अनेक रुपांतरणों से गुज़रती है। लेखक ने विक्टोरिया मेमोरियल में रखे एक चित्र का विवरण दिया है,  जिसमें वारेन उसकी पत्नी और एक नेटिव लड़की दिखाई पड़ती है। उदय कहानी में इस चित्रा का प्रतीकात्मक प्रयोग करते हैं। वारेन की पत्नी परंपरावादी विक्टोरियन समाज का प्रतिनिध्त्वि करती है। इसीलिए कहानी में वह बार-बार पति को समझाती है- ‘कि तुम जिस जाति और जिस देश के हो, वह एक विजेता देश है।’ नेटिव लड़की की संकल्पना चोखी के रूप में की गई है जो एक तरफ तो भारत की गुलाम जनता की प्रतीक है दूसरी ओर वह वारेन की लीला का अंग है। वारेन हेस्टिंग्स इन दोनों ध्रुवों  के बीच स्वयं को उलझा हुआ पाता है कभी ऐसा लगता है कि वह भारतीय संस्कृति से अभिभूत है तो कभी उसके भीतर का औपनिवेशिक गवर्नर जाग जाता है। कहानी के अनेक पाठ बनते हैं जो उपनिवेशवाद की अन्तक्रिया को समझने में मदद करते हैं। अपने एक इंटरव्यू में उदय प्रकाश ने यह स्वीकार किया है - ‘‘वारेन हेंस्टिंग्स 1772 में गवर्नर बना था और जो रिकार्डेड हिस्ट्री में है, वह बिल्कुल वैसा नहीं है,  क्योंकि वारेन कभी पागल नहीं हुआ, वह कभी गाय के पीछे नहीं भागा, कभी उसने कृष्ण का रूप धरकर  बाँँसुरी नहीं बजाई, कभी चरवाहा नहीं बन, कभी वह वृंदावन नहीं गया।... तो वह सबकुछ कल्पना और स्वप्न था।... एक मिथ क्रिएट किया कोलोनियलाइज़ेशन का, जिससे हमारे देश के उपनिवेशीकरण की जो अंतक्रिया  है, उसको हम समझ सकें... उसको थोड़ा जान सकें। इसमें युक्ति कहां से आई...? अब हर लेखक के समाने वह गुत्थी होती है, जिसको वह अपनी तरह से सुलझाता है।’’

उदय प्रकाश उपनिवेशवाद की गुत्थी को सुलझाने के लिए कथा में कई प्रकार के खेल रचते हैं। औपनिवेशिकता जितना बड़ा सच है उससे मुक्ति की आकांक्षा भी उतना ही बड़ा सच है। प्लासी की लड़ाई में नवाब सिराजुद्दौला की हार मीर जाफर और राय दुर्लभ जैसे लोगों की गद्दारी के कारण हुई लेकिन लेखक ने उसी समय में एक जांबाज़ वफादार सिपहसालार की कल्पना की है और चोखी को उसकी बेटी बताया गया है। चोखी वारेन के रंग के रंगी जाकर भी उसके औपनिवेशिक इरादों को पहली चुनौती देती है। ऐसी ही एक और प्रतीकात्मकता इंपीरियल बग्घी  उड़ा देने वाले साँँड़ और 1857 की क्रांति के बीच दिखाई गई है। 1795 में जिस दिन वारेन हेस्टिंग्स को महाभियोग के मुकद्दमे से बरी किया गया उसी दिन उस साँँड ने उन्मत्त  होकर वारेन हेस्टिंग्स और शाही बग्घी  को हवा में उछाल दिया। उस उन्मत्त  साँँड़ पर आर्मी ने हमला कर उसे गोली मार दी। बाद में, उसी साँँड की चर्बी का प्रयोग उस कारतूस में हुआ जिससे मंगल पांडे ने अंग्रेज़ एडजुटेंट को गोली मारी। वह स्वतंत्रता की क्रांति का सूत्रापात था जिसके तार वारेन हेस्टिंग्स को चुनौती देने वाले साँँड से जुड़े थे। विद्रोह की यह संकल्पनात्मक चेतना अविरत है। वही इतिहास, वर्तमान और भविष्य को इस बिंदु  पर केन्द्रित करती है।

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कहानी में इस निरंतरता को सिद्ध करने के लिए उदयप्रकाश देश काल के विविध मुखी  वृत्त रचते हैं। कहानी का केन्द्रीय पात्रा वारेन हेस्टिंग्स होने के कारण कहानी का अपना विशिष्ट कालखंड है। उसका परिवेश एवं स्थितियँँा ऐतिहासिक तथ्यों और अकड़ों से परिभाषित होती हैं। उस समय की शासन प्रणालियों, अंग्रेज़ नियुक्तियों अमीर हिंदुस्तानियों के व्यवहार आदि के जो वितरण दिए गए हैं वे उस समय के सरकारी रिकाॅर्ड से पुष्ट किए जा सकते हैं। भारतीय इतिहास की स्मृतियाँँ और परंपराएँ स्वयं में देश-काल के छोटे-बड़े वृत्त बनाती हैं। इन सबके साथ कहानी का उद्देश्य उसे उस ध्रातल तक ले जाता है जहाँँ उत्तर-औपनिवेशिक समय और समाज की आलोचनात्मक पहचान उभरने लगती है।

 उदय प्रकाश की कहानी तकनीक की एक खास अदा है कि कहानी में जब भी चरमोत्कर्ष के ऐसे तनाव शिखर रचे जाते हैं वहाँँ वे लेखकीय हस्तक्षेप से उसे तोड़कर पुनः अपने समय-समाज की ओर लौटा लाते हैं। यहाँँ भी लेखक यह बताना नहीं भूलता कि यह वह समय था जब फ्रांसीसी  कंपनी और इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच यूरोप, अमेरिका और एशिया के समुद्रों, बाज़ारो और प्राकृतिक संसाधनों को हथियाने के लिए लड़ाई चल रही थी और ढाई सौ साल पहले भी फ्रांस  की सार्वजनिक कंपनी इंग्लैंड की प्राइवेट कंपनी से हार रही थी। उत्तर औपनिवेशिक दौर में भी दौलत की हवस से प्रेरित प्राइवेट कंपनियाँँ हर सार्वजानिक ढाँँचे को घ्वस्त कर स्थितियों को अपने पक्ष में मोड़ने में कामयाब रही हैं। तमाम घोटाले और सेंसेक्स का संवेदी सूचकांक इन प्राइवेट कंपनियों की इशारे पर ही करवट लेता है।



उत्तर औपनिवेशिक मानसिकता के स्रोत औपनिवेशिक इतिहास के अन्य संदर्भो में भी तलाशे जा सकते हैं जिन्हें यह कहानी संभव बनाती है। ऐसा ही एक प्रश्न भाषा का  है जो केवल भाषा तक सीमित न होकर सामाजिक न्याय का प्रश्न बन जाता है। कहानी में चित्रित सत्ताकामी चापलूसों का शासन आज़ाद हिंदुस्तान आज भी ढ़ो रहा है। यह उन जैसे नेटिवों का राज है जिनके स्वप्न और आकांक्षाएँ ही अंग्रेज़ नहीं उनकी भाषा भी अंग्रेज़ी है। आज़ादी के बाद अंग्रेज़ी जानने वाले ही सत्ता और समाज पर कब्ज़ा करके बैठ गए। आज तो स्थिति और भी गंभीर हो गई है, जहाँ निचले-से निचले तबके का आदमी यह मानने लगा है कि अंग्रेज़ी ही ज्ञान की कुंजी  और सपफलता की सीढ़ी है। एक भाषा का वर्चस्व हमसे हमारी कथाएँ और विश्वास छीनकर हमें निपट यथार्थवादी बना रहा है। यह दिमागी सरहदों की गुलामी है। औपनिवेशिक इतिहास की निरंतरता !

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