हिन्दी साहित्य में महिलाओं को अब तक समानता नहीं मिली है : उषा किरण खान

( हाल  के दिनों  में  कथाकार  उषा  किरण  खान  को  'पद्मश्री '  से  नवाजा  गया . युवा  पत्रकार  इति शरण  ने  उनसे  स्त्रीकाल  के लिए  बातचीत  की  .  स्त्रीविमर्श , स्त्री -लेखन , भाषा , स्वानुभूति -सहानुभूति  बहस , महिलाओं  को  रॉयलिटी, पटना  में कथा - सम्मलेन -विवाद  तथा  अपने लेखन  पर  उषा  किरण  खान  ने   बेबाक  बातचीत  की . ) 
उषा किरण खान 


हिन्दी साहित्य में स्त्री विमर्श का एक लंबा इतिहास रहा है। साहित्य के विभिन्न चरणों के साथ स्त्री विमर्श के स्वरूपों में भी परिवर्तन आता रहा। महिलाओं की लेखनी में अपनी पहचान बनाने के बाद स्त्री विमर्श का एक सशक्त रूप सामने आया। पद्म श्री उषा किरण खान इस परिवर्तन को एक लंबा संघर्ष मानती है। उनका मानना हैं कि उन संघर्षों के बाद आज युवा स्त्रियां बेबाकी से अपनी बातें लिख पा रही हैं । 
                                                                                                                                                (इति शरण) 
 स्त्री -लेखन को आप किस रूप में देखती हैं ?
लेखनी के क्षेत्र में महिलाओें ने हमेशा अपनी भूमिका निभाई है। मगर आज कहानी और उपन्यास के साथ-साथ महिलाएं वैचारिक लेखनी भी कर रही हैं। वह साहस के साथ अपनी जीवनी लिख रही है। इसके लिए उन्हेें कई आलोचनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है, मगर वे उन आलोचनाओं से पीछे नहीं हट रही।
स्त्रियों का यह सफर इतना आसान नहीं था। इसके लिए हमने एक लम्बा रास्ता तय किया हैं। महादेवी वर्मा, आशापूर्णा देवी, सुभद्रा कुमारी चैहान, यह सभी घरेलू महिलाएं थी। अपनी लेखनी के लिए उन्होनें बहुत संघर्ष किया है। आज स्त्रियों की अभिव्यक्ति का कारण शिक्षा का प्रचार-प्रसार और अपने अधिकारों के प्रति उनकी चेतना ही है।

इति शरण 
क्या आप खुद को स्त्रीवादी लेखिका कहलवाना पसंद करेगी ?
हां, मैं खुद को स्त्रीपक्षी मानती हूं, हाँ  मैैं स्त्रीवादी हूं। मगर ऐसा नहीं कि बिना सोचे समझे किसी मुद्दों पर स्त्रियों की पक्षधर हो जाऊंगी। समाज अगर किसी स्त्री को गलत कह रहा है तो यह जानने की कोशिश करूंगी कि वह गलत है या सही। उसका सीधे समर्थन या विरोध नहीं करूंगी। मान लिजीए किसी स्त्री के ऊपर खून का आरोप लगता है तो मैं जानने की कोशिश करूंगी कि उसने खून किया क्यों ? उसके तह तक जाऊंगी। क्योंकि स्त्रियां प्रायः भावुक होती है। वे एक मां होती हैं। वे आसानी से खूून नहीं कर सकती।

महादेवी वर्मा का मानना था कि एक स्त्री अपने जीवन का जितना सजीव चित्रण कर सकती है, एक पुरुष स्त्री जीवन का वैसा चित्रण नहीं कर सकता। स्त्री का अपना खुद का अनुभव होता है। आपको क्या लगता हैं किसी वर्ग विशेष पर बात करने के लिए उस वर्ग का होना जरुरी हैं ? 
हां, यह बात बिलकुल सही है कि एक स्त्री अपने आपको पुरूषों की तुलना में ज्यादा बेहतर तरीके से अभिव्यक्त कर सकती है। इन दिनों मुझे एक बात समझ आई है, “मैनें आज तक दलितों के बारे में जो कुछ भी लिखा है, मुझे लगता है एक दलित उन चीजों को मुझसे बेहतर लिख सकता है।“ दूसरी बात जो मेरी समझ में आई वह यह कि अभी स्त्रियां अपनी आत्मकथाओं  में जो बाते लिख रही है वैसी बातें प्रेमचंद्र, शरतचंद्र जैसे पुरूष लेखक नहीं लिख पाए। इस तरह मुझे लगता है कि स्त्री मुद्दों पर महिलाएं ज्यादा अच्छा लिख सकती हैं। लेकिन मैं पुरूषों को खारिज भी नहीं करती।

 अंग्रेजी साहित्य में भी 19 के दशक तक महिला लेखिकाओं को कुछ खास तवज्जों नहीं मिली, लेकिन धीरे-धीरे वहां स्थिति में सुधार आया और महिला लेखिकाओं के लेखन को भी पुरुष लेखकों के बराबर का महत्त्व मिलना शुरू हुआ । आपको क्या लगता हैं हिंदी साहित्य में महिलाओं को अब तक समानता मिल पाई हैं ?
हिन्दी साहित्य में महिलाओं को अब तक समानता नहीं मिली है। आज भी उनपर आरोप लगाया जाता है कि उनकी रचना मौलिक नहीं होती। महुआ मांझी पर भी कुछ ऐसा ही आरोप लगाया गया। जबकि यह सामान्य सी बात है कि 500 पन्नों का उपन्यास कोई दूसरे के लिए क्यों लिखेगा। दरअसल, यह सारी बातें महिलाओं को कमतर दिखाने के लिए कही जाती है।

उषा किरण खान और बाबा नागार्जुन 

 फिल्मों की भी अगर बात करें तो वहां भी पुरुष अभिनेताओं की तुलना में स्त्री अभिनेत्रियों को कम पैसे मिलते हैं । अभी करीना, कंगना, दीपिका, प्रियंका जैसी कुछ अभिनेत्रियों ने इस मुद्दे को उठाया भी था। साहित्य हो या फिल्म जगत स्त्रियों के साथ होने वाले इस दोयम दर्जे में सुधार कैसे लाया जा सकता है ?
मैं फिल्मों के बारे में तो ज्यादा कुछ नहीं बोल सकती क्योंकि उस क्षेत्र का मुझे उतना ज्ञान नहीं है। मगर साहित्य की एक बिलकुल सामान्य बात मैं आपको बताती हूं। किसी किताब की राॅयेलटी का जो दस्तख़त करवाया जाता है, उसका फाॅर्म स्त्री और पुरूष दोनों के लिए समान होता है। लेकिन जब बात पैसों की आती हैं तो स्त्रियां वहां पुरूषों से पीछे रह जाती हैं। स्त्रियां पैसों के लिए दवाब नहीं डाल पाती। उनके अंदर एक संकोच भी होता है। मगर पुरूष आसानी से दवाब बना लेते हैं। अगर महिलाएं संकोच से बाहर निकलकर दवाब बनाने की कोशिश भी करती हैं तो उनका यह कहकर मज़ाक उड़ाया जाता है कि देखो कैसी औरत है, पैसों की चर्चा कर रही है। इन स्थितियों से बाहर निकलने के लिए स्त्रियों को संगठित होने की जरूरत हैं।

एक स्त्री लेखिका होने के क्रम में आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा ?
वैसे तो मुझे बहुत ज्यादा परेशानी नहीं हुई। एक पढ़े-लिखे परिवार में आपको ज्यादा परेशानियों  का सामना नहीं करना पड़ता है। हां, ज्वाइंट फैमिली होने के कारण खुद ही परिवार में थोड़ी उलझी रही। बच्चे बड़े हो रहे थे उनकी देखभाल पढ़ाई-लिखाई और फिर आर्थिक उन्नयन के लिए नौकरी करना, बस इन्हीं चीजों में थोड़ी उलझ गई थी। लेखनी कोई परफाॅमेंस तो है नहीं कि उसके लिए आपको कही बाहर जाना होता है। घर बैठे लिखा जा सकता है। इसलिए ज्यादा कोई बाधा नहीं आती है। शायद मैं ड्रामा की बात करती तो कुछ सीमाओं का सामना करना पड़ सकता था। जीवन भर बिहार में रहने से जरूर कुछ बाधाएं आई। एक तो मैं स्त्री, ऊपर से बिहारी। हालांकि बिहार के लोगों के बिना कोई किताब छपती भी नहीं हैं। मगर हमारे क्षेत्र के लोगों को अभी भी कमतर आंका जाता है। एक और बाधा यह रही कि मैं अपनी रचनाओं का बहुत प्रचार नहीं करती। इसलिए इनकी समीक्षाएं भी बहुत नहीं आती। मगर आज भी कई युवा लेखक मुझसे कहते हैं कि मैने आपकी रचनाओं को पढ़ा हैं। मेरे लिए बस उतना ही काफी हैं। पाठकों तक मेरी रचना पहुंच रही है, मेरे लिए यही खुशी की बात हैं। इसलिए मैं इन बाधाओं को बाधा मानती भी नहीं हूं।

स्त्रीकाल के गया सेमिनार में बोलती हुई उषा किरण खान 

आपकी रचनाओं में ज्यादातर चरित्र और परिवेश आपके ग्रामीण क्षेत्र के ही होते हैं, आपने अपने लेखन के क्रम में अपने गांव में महिलाओं की स्थिति में कितना बदलाव देखा हैं ?
जब मैनें लिखना शुरू किया था तो वे सचमुच भोल-भाले ग्रामीण थे। फिर पंचायती व्यवस्था शुरू हुई, उसके बाद पंचायतों में महिलाओं को पहले 30 प्रतिशत और फिर 50 प्रतिशत आरक्षण मिला। जिन स्त्रियों को मोहरा बनाकर पेश किया जाता था अब वही स्त्रियां खुलकर सामने आने लगी। मगर आज भी वहां जातिगत भेदभाव की स्थिति बनी हुई हैं। दलितों और पिछड़े वर्गों के आपसी वर्गीकरण से ही अब तक लोग प्रभावित है। इससे सबसे ज्यादा महिलाएं ही प्रभावित होती है।

 वर्तमान साहित्य में स्त्री विमर्श को किस रूप में देखती हैं ? क्या पहले की तुलना में अब स्त्री विमर्श पर ज्यादा खुल कर बात हो रही है ?
पहले स्त्री मुद्दों पर इतनी खुलकर बाते नहीं होती थी जितनी आज हो रही है। पहले कही ना कही महिलाओं को हाशिये पर रखा जाता था। मगर आज इसपर बड़े स्तर पर बाते हो रही। रवीन्द्रनाथ ने स्त्रियों की भूमिका को घर से बाहर लाने की कोशिश की। उनका एक उपन्यास है “गोरा“। जिसमें स्त्री पात्र का पति ही उसे बाहर जाने और अपनी पहचान बनानी की स्वतंत्रता देता है, लेकिन बाद में उसके पति को ही उससे काॅम्पलेक्शन होने लगता है। यहां रविन्द्रनाथ उस महिला पात्र का पक्ष लेते हुए दिखते हैै। वही उनके दूसरे उपन्यास “घर-बाहर“ में भी उन्होनें महिला पात्र का ही पक्ष लिया, जिसमें स्त्री अपने पति के दोस्त के विचारों से प्रभावित हो जाती है और कई बार अपने पति को भी उसकी बातों के आगे चुप करा देती है। इस तरह कई कथाकारों ने धीरे-धीरे अपने लेखन में महिला पात्र को घर की चार दिवारी से बाहर निकाला। उसके बाद मनु भंडारी, कृष्णा सोबती जैसी  लेखिकाओं ने बेबाकी से स्त्री मुद्दों पर लिखना शुरू किया।

अभी एक फिल्म आई “पीकू“ जिसमें महिला की एक सशक्त छवि को दिखाया गया । इस फिल्म पर खूब चर्चाए हुई । लेकिन जब इन्हीं मुद्दों पर साहित्य में बातें होती है तब इतने बड़े स्तर पर चर्चा नहीं होती। इसका क्या कारण हैं ?
साहित्य हमेशा से अल्पसंख्यक विषय रहा है। इसे बहुत ज्यादा कोई नहीं पढ़ता । इसलिए हमें इसकी क्वान्टिटी पर ना जाकर क्वालिटी पर जाना चाहिए।

 आप अपनी मैथिली की रचनाओं को ज्यादा करीबी मानती हैं या हिंदी रचनाओं को ?
हिन्दी मेरी स्वाभाविक भाषा है और मैथिली मातृभाषा है। मेरी शिक्षा दीक्षा हिन्दी में हुई इसलिए उसमें खुद को ज्यादा सहज महसूस करती हूं। दूसरी बात मैं अपनी रचनाओं के जरीए अपने क्षेत्र की कोशी की सच्चाई दुनिया के सामने लाना चाहती थी। इस विषय पर अभी तक लिखा नहीं गया था। फणीनश्वर नाथ रेणु जी ने कोशी का जो वर्णन किया वो ग्लैैमराइज था। उनके क्षेत्र में स्थिति हमारे जैसी विषम नहीं थी। हमारे यहां आज भी हमें बैलगाड़ी और नाव से घर जाना पड़ता है। इन सभी सच्चाईयों से लोगों को वाकि़फ कराने के लिए मैंने  हिन्दी भाषा का चुनाव किया। मैथिली की रचना की कुछ सीमाएं होती है । उसकी पहुँच  एक सीमित क्षेत्र तक ही रह जाती है।

जैसा कि आपने कहा “क्षेत्रीय भाषा की रचनाओं के पाठक सीमित होते हैं।“ इसकी सीमाओं का कारण किसे मानती हैं ?
हमारी मैथली भाषा बहुत विकसित  है। इसके बावजूद इस भाषा के साहित्य के प्रकाशन के लिए कोई प्रकाशक नहीं मिलते हैं। ऐसी ही स्थिति भोजपुरी की भी है। अगर आप इन भाषाओं में कुछ लिख रहे हैं तो आपको अपनी किताब खुद ही प्रकाशित करनी पड़ती है। उसके बाद वितरण की समस्या। किताब प्रकाशित होने के बाद भी उसका वितरण नहीं हो पाता। दरभंगा तक में एक भी मैथिली भाषा के साहित्य की दुकान नहीं है। इन सभी परिस्थितयों में एक स्त्री के लिए क्षेत्रीय भाषाओं में लिखना और भी मुश्किल हो जाता है।मुझे भी शौक था कि मैं भी प्रतिमा राय बन जाऊं। जैसे वह उड़ीया में लिखती हैं मैं भी सिर्फ मैथिली में ही लिखूं । मगर उड़िया या बांग्ला भाषा के साहित्य को जितनी तवज्जों मिलती है, हमारी भाषाओं की रचनाओं को नहीं मिल पाती है। उन भाषाओं की किताबों के अनुवाद भी तुरंत हो जाते हैं मगर हमारे यहां प्रकाशक तक नहीं मिलते। मेरे दिल के करीब मैथिली है। लेकिन उसकी सीमाओं के कारण मुझे हिन्दी में लिखना पड़ता है।
युवाओं को हिंदी या क्षेत्रीय भाषा की रचनाओं से जोड़ने की जिम्मेदारी किसकी होनी चाहिए ?
यह एक संकट का विषय है। मैं अपने ही घर में अपने नाती पोतो को बोलती हूं “अगर तुम लोग मैथिली में नहीं बोलोगे तो मेरे मैथिली में लिखाने का क्या मतलब।'' आज की पीढ़ी का क्षेत्रीय भाषा से संबंध बिलकुल टूटता जा रहा है। इसके लिए जरूरी है कि मैिथली, भोजपुरी जैसी क्षेत्रीय अकादमी सामने आए। क्षेत्रीय भाषाओं का सम्मेलन होना चाहिए। अगर हम प्रयास करे तो युवा इससे जुड़ सकते हैं। इस साल मैथिली लिटरेचर फेस्टिवल की ही बात की जाए तो वहां बड़ी संख्या में युवाओं ने भागीदारी निभाई थी।हमें अपनी मातृभाषा से हमेशा जुड़ कर रहना चाहिए। मैं युवाओं को हमेशा यही कहूंगी “आप आकाश में जरूर जाइए, मगर जड़ मत छोडि़ए. ''

अभी कुछ किताबों के रिलीज़ से पहले उनके प्रोमो तैयार किये जा रहे हैं। लेखनी में इस तरह की मार्केटिंग से स्त्री लेखिकाओं को कितना खतरा हो सकता हैं ?
अगर ऐसा हो रहा है तो इसके लिए आज की स्त्रियों को तैयार होना चाहिए। हमारे समय की स्त्रियां तो यह सब जानती भी नहीं। मुझे भी इसकी जानकारी नहीं है। लेकिन अब स्त्रियों को प्रतियोगिता में भी आगे आना चाहिए। आज की युवा स्त्रियां आगे आ भी रही है।

.आपने अभी पटना में कथा -पाठ  का एक भव्य आयोजन करवाया था। जो काफी सराहनीय था। मगर उसको लेकर कुछ अलोचनाएं भी हुई थी कि आपने उसमें सिर्फ अपने करीबी लोगों को ही बुलाया था। इस मुद्दे पर आपका क्या कहना है ?
वहां एक नाटक के मंचन के लिए मैनें अपनी बेटी कणु प्रिया को बुलाया था। वह एक रंगकर्मी है। मैनें उसे एक अभिनेत्री के रूप में  बुलाया था। वह भी लोगों ने डिमांड पर। मेरी एक प्रसिद्व रचना है “दूबधान“। मेरी बेटी उसका बहुत अच्छा मंचन करती है। अभी तक इत्तेफाक से पटना में उसने इसका एक भी मंचन नहीं किया था। कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि आप इस समारोह में कणु प्रिया को “दूबधान“ के मंचन के लिए क्यों नहीं बुला रही है। लोगों की डिमांड पर मैनें उसे नाटक के मंचन के लिए बुलाया था। उस कार्यक्रम में कणु प्रिया ने “दूबधान“ और विभा रानी ने विख्यात कथाकार संजीव जी के नाटक नवरंगी नटनी की प्रस्तुति दी थी।मेरी एक बेटी दिल्ली में दूरदर्शन की प्रभारी है। वह भी वहां आई थी उस कार्यक्रम को कवर करने के लिए। अब अगर मेरी बेटियां इस काबिल हैं तो वे आई। मुझे फर्क नहीं पड़ता कि कोई क्या कह रहा है। जिन लोगों का आरोप हैं कि मैनें कुछ खास लोगों को ही बुलाया था तो उन्हें समझना चाहिए कि वहां सारे लोग मेरे अपने नहीं थे। जहां तक बात रही सीमित लोगों को आमंत्रित करने की तो वह एक सरकारी कार्यक्रम था। सरकार की तरफ से सिर्फ 27 लोगों की ही संख्या निर्धारित की गई थी। जिसमें 20 लेखक और 7 समीक्षक थे। हमलोग 27 से 28 नहीं कर सकते थे। हांलाकि मैं चाह रही थी लोगों को 25 हजार की जगह 15-15 हजार ही देकर लोगों की संख्या बढ़ा दी जाए। मगर इसे माना नहीं गया। वैसे मुझे लगता है, अगर इस बात को मान भी लिया जाता और लोगों की संख्या बढ़ाकर 30 भी कर दी जाती तब भी  31वां इंसान नाराज ही रहता। आपको बता दूं कि कुछ लोगों ने इस बात की भी हवा फैलाई कि नाटक के मंचन के लिए मेरी बेटी को एक लाख रूपये दिए गए है। अब इसपर मैं क्या बोलूंगी।

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