जेंडर और जाति के कुंडलों को तोडता लेखन और सत्ता की कुर्सी


( पिछले दिनों हिन्दी अकादमी,  दिल्ली की अध्यक्ष के रूप में मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति के सन्दर्भ से पुष्पा के लेखन की राजनीति और राजनीति तथा सत्ता में स्त्री की पहचान की कोशिश कर रही हैं प्रो परिमळा अंबेकर.स्त्रीकाल की ओर से भी मैत्रेयी को बहुत -बहुत बधाई !  )



 पुरुषवादी मानसिकता  ने स्त्री को राजनीति के क्षेत्र में अमूमन सरपंच के रूप में स्वीकार करने की आम रवैय्या  तो बना  लिया है,  लेकिन सामाजिक या अकादमिक स्थानों या संस्थानों में स्त्री के प्रशासन की छडी के तले काम करने की स्वीकृति मर्दवादी  भारतीय संवेदना को अब भी अखरती जरूर है । इसीलिए सरकारी या गैर सरकारी संघ संस्थानों के अध्यक्षता या उपाध्यक्षता के पद, योग्यता और कर्मठता के बावजूद भी स्त्रियों को प्रदान करने की कोई  प्रामाणिक प्रयत्न होता हुआ हम कम ही देखते हैं । लेकिन हाल में हिन्दी अकादमी दिल्ली के उपाध्यक्ष पदपर मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति , इन मानित या सहज स्वीकृत मर्दवादी मानसिकता को तोडती हुई  ऐसी प्रक्रिया है , जिससे  विश्वास  पाकर स्त्रीवर्ग की प्रामाणिक निष्ठा,  मानवीय सरोकारों की कुप्पी और भी प्रतबद्धता से जलेगी निस्संदेह ।

 मैत्रेयी की रचनाएॅं स्त्रीमुक्ति के सवालों का, देह या सेक्स के धरातलपर उसकी जैविक सहज आवश्यकताओं की भूमिका में हर संभव उत्तर देने का सृजनात्मक प्रयत्न हैं। मर्दवादी  समाज में स्त्री की अपनी जगह  पाने की लडाई , मैत्रेयी के अनुसार स्त्रीयत्व के नकार की या देह से मुक्त होकर, मुक्त तन-मन की आध्यात्मिक अयथार्थ की लडायी नहीं है । अपितु, देह की जैविक स्त्री एवं पुरूष सहज इच्छाओं को साथ लिये लिये, मानवीय संबंधों के सुंदर रूपों को उकेरने का कमिटमेंट है । यह लेखन कमिटमेंट, मैत्रेयी के पात्रों में है, जिससे कहीं भी, मानवीय व्यवस्था की आंतरिक और बाहरी कुलाबें टूटती नहीं हैं, बिखरती नहीं है,  वरन उनकी अस्मिता में एक अजीब रंग और राग की निखार तारी होते जाती है... !

‘अल्मा कूबतरी‘, ‘इदन्न्मम‘, ‘झूलानट‘, ‘बेतवा बहती रही‘, ‘कहे ईसुरीफाग‘, ‘कस्तूरी कुडल बसै‘, ‘ललमनिया‘ॅं, ‘गोमा हॅंसती ह‘ै, ‘खुली खिडकियाॅं‘, ‘सुनो मालिक सुनो‘ आदि उपन्यास कहानी आत्मचरित और विमर्श ग्रंथों के साथ मैत्रेयी ने अपने लेखन की जो चटायी सजायी है ,  वह  मैत्रेयी को  अपनी स्त्री लेखक बिरादरी से बहुत अलग करती है ,  उसकी लेखन की सजी चटायी अपने विरासत में प्राप्त ग्रामांचलीय मिट्टी की गंध से सरोबार है । प्रेमचंद, फणीश्वरनाथ रेणू, नागार्जुन की सजी सजायी कथासेट को मैत्रेयी स्त्रीगत कलात्मक सोच और स्त्रीसुलभ महीन कशीदेकारी से ऐसे सजा रही है , जो ग्रामीण जीवन के छंद को प्रासबद्ध करके, फाग ईसुरी भैरव आदि रागों में ढाल रही है । प्रेमचंद, नागार्जुन, रेणु आदि की दालानी बैठक में अपना अदीन हस्तक्षेप कर रही है,  ताकि इन मर्दानी बैठकों में स्त्रियों को भी जगह मिले... उसकी भी आवाज सुनायी पडे ..!


‘‘ लडकी यादव की होती, जाटों की होती तो भी कोई बात थी । ब्राह्मण परिवार के उपाध्याय गोत्र की सनाढ्य लडकी, वह भी खिली-सिकुर्रा जैसे पिछले क्षेत्र में पली बढी, वह ऐसी हिम्मत करेगी सोचा भी नहीं जा सकता ‘‘ । ‘कस्तुरी कुडल बसै‘ आत्मचरित्र से मैत्रेयी ने सदियों के जाति और जेंडरगत कंुडलों को उखाडकर, परंपरागत स्थिर , भद्र मार्यादित बंदरों में बंधे पानी में कंकड फेंककर उसे जब हिला दिया था तब समीक्षक ‘कांतीकुमार जैन‘ द्वारा उठा यह उद्गार और श्लाघन वास्तविक है । पिता की मौत के बाद , अपनी सुरक्षा के किले में बांधेरखकर,  बेटी के भविष्य के लिये चिंतित विधवा माॅं , जिस पुरूष समाज को दूर रखकर विरोध करते हुए,  एक प्रकार की जैविक वितृष्णा को ओढकर सुरक्षित जीवन जीने के लिए  मैत्रेयी को विवश करती है वही बेटी उसी आग की ओर अपना देह बढाते जाती है, जो आग उसे बचपन से रौंदते आया है ! कामना और इच्छाओं को अपने तहत जीने की, सेक्स और संभोग को वस्तुगत नहीं अपितु शुद्ध व्यक्तिगत धरातल पर  भोगने की इच्छा जाहिर करती है । अपने देहगत और मन सुलभ इच्छाओं की तृप्ति के लिये र्निद्वंद्व उठखडी होती है । जीवन के इन संघर्षों को, इच्छा काम और नीति नियमों के मर्यादाओं के बंधनों को,  मैत्रेयी एक ही मूल से तोडते जाती है । और तो और, अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाकर, अपने मन को , मन की बातों को उलीचते जाती है... ! ' प्यार करोगी  और छिपाओगी भी ?'  शरारत  भरी आँखों वाले लड़के यह  तुमने मुझ किशोरी से कहा था !!
मैंने उस प्यार को किताबों से लेकर मीडिया तक में उलीच दिया !! देखो तुम्हारे एक वाक्य ने कितनी- कितनी प्रेमिकाओं को मेरी ज़मीन पर उतार दिया !! ( लेखिका के फेसबुक टाइम लाइन पर )

बलात्कार और संभोग की देह परिभाषा को नये सिरे से गढनेवाली मैत्रेयी, देहसंबंधों के मूल मेें गुंथी हुई  नीति मार्यादा और परंपरा को नयी व्याख्या भी देती है । यह व्याख्या व्यक्ति की  देह और अस्मिता की आवाज को सुनती भी है और सुनाती भी है । एक विस्फोट की तरह! वह विस्फोट जो चादर के सात परतों के तले फूटता हो !! परंपरा की मार्यादाओं को मैत्रेयी, पीढी दर पीढी के अतृप्त अनजिये मानसिकता की वितृष्णा के रूप में देखकर, संबंधों की स्वछंदता और खुली व्यवस्था का वकालत करती है, सृजनात्मक निर्णय देती है -जिन निर्णयों के मूल में मनुष्य की आत्मा की पुकार घुली हुई  है, मानवीयता की मर्यादा के बंधन बंधे हुये हैं । मैत्रेयी के अनुसार ‘संभवतया, सामाजिक व्यवस्था का हर हिस्सा, हर रिवाज, हर आदर्श हर संबंधों के आचरण की अनिवार्यता और आग्रह के पीछे शायद पीढी दर पीढी चली आ रही अनिवार्यता की कुंठा होगी फ्रस्टरेशन होगा जो हर नये पीढी के पैरों में बेडी बनकर खनखनाती है । ‘  जिन्हे तोडकर भागने की चेतना अपनी उदात्ता और मार्मिकता के बावजूद भी एक अजीब प्रकार के दंश का, पापबोध का अनुभव करती है । लेकिन इस दंशबोध के बावजूद भी , अपराधबोध के टीस के होनेपर भी, हर नये कदम की अनिवार्यता और मानवीयता को पहचानकर, विकास और मूल्यान्वेषण के यज्ञ को सामाजिकता का जामा पहनाना आधुनिकीकरण का मानवीय पक्ष है । मैंत्रेयी का रचनालोक इसी मानवीय पक्ष का जीवंत दस्तावेज है ।



मैत्रेयी की लेखनी समाज की उस गुप्त और गुमनाम लडाई  को चेहरा और आवाज प्रदान करती है, जिसके दंश को नाूसर की तरह श्रेणीकृत व्यव्स्था में कंडीशनड भारतीय समाज झेलते आ रहा है और झेलने के लिए विवश भी है । मुख्यधारा के  समाज की अपनी अभिजातीय मर्यादाएॅं, आर्थिक स्वायत्तताएॅं, हाशियाकृत समाज की तमाम अव्यवस्थाओं के लिए कारण बनकर असामाजिकता के न्याय निर्णयों में बंधने के लिए विवश कर देती है । पुष्पा का कथा संसार, इस असामाजिक परंपरागत मर्यादाओं को अपनी ही चेतनादृष्टि  से परिभाषित करता है ।

इंटर काॅलेज मोठ से सन् 1960 में इंटर पास करके बुंदेलखंड  काॅलेज झांसी से 1962 में बी.ए की डिग्री पाती है मैत्रेयी, जो उत्तर प्रदेश के अलीगढ जिले के सिर्कुरा गाॅव में सन् 1944 में जन्मी थी । उसी काॅलेज से एम.ए पास करके दिल्ली आकर जामिया मिलिया के स्टेट रिसोर्स सेंटर में कुछ महीने रहती हैं । यूॅं तो लिखने का सुरूर काॅलेज के दिनों से ही था मैत्रेयी में , लेकिन साप्ताहिक हिन्दुस्तान  में सन् 1990 में छपी कहानी ‘आक्षेप‘, के बतौर पुष्पाजी, वैवाहिक और सामाजिक आक्षेपों के सारे रोडों को उखाड फेंकती है ,और सृजनात्मक कथावितान का ताना बाना बुनती है ।  उन्हें लेखन के लिए  हिन्दी अकादमी का साहित्यिक कृति सम्मान, उत्तरप्रदेश का साहित्य सम्मान, साहित्य परिषद का वीरसिंहदेव पुरस्कार, सार्क साहित्य पुरस्कार ,आगरा विश्वविद्यालय का गौरव श्री पुरस्कार और नंजनगूडू तिरूमलांबा पुरस्कार आदि  भी मिला । कन्नड की प्रथम महिला कथाकार के रूप में स्थापित अपने समय की दबंग लेखिका तिरूमलांबा के नाम का पुरस्कार पाना, मैत्रेयी पुष्पा के लिये विशेष भी है ।

बंुदेलखंड की भाषा की रसवत्तता को बोलचाल के लय की ठसक को और शैली एवं संवादों की प्रांतीय थापों को कथा कथन का माध्यम बनाकर, एक ऐसे वस्तु परिवेश को रचती हैं  मैत्रेयी, जिसके सिलन की बुनावट की कलात्मकता और महीनता ही उसे समाकालीन सारे रचनाकारों से अलग पहचान दिलाती है । कथा में ग्रामांचलीयबोध की जीवंतता, भाषाप्रयोग की सहजता एवं आत्मीयता समाजजीवन की गतिविधियों को आइना  पकडवाती है.  कन्नड में लगभग ऐसी ही कथात्मक संवेदना और अभिव्यक्तिगत कलात्मकता को लेकर हाजिर होती है उत्तर कर्नाटक प्रदेश की  अंचलीयताबेाध से सरोबोर, सजग सचेत और अत्यंत आत्मीयभावबोध से सरोकृत लेखिका गीता नागभूषण ।



मैत्रेयी के रचनासंसार के पात्र कुसुमा भाभी, डबलबब्बा, अल्मा, मंदाकिनी, मैत्रेयी, कस्तूरी, उर्वशी इत्यादि जीवन के खमीर की उस खटायी को लेकर रचे बसे हंै । अस्तु...... हिन्दी अकादमी दिल्ली के उपाध्यक्ष पदपर मैत्रेयी पुष्पा की नियुक्ति, सचमुच, श्लाधनीय है । उनकी यह नियुक्ति निस्संदेह , समीचीन व्यवहार और निर्णय लेकर आयेगा !! आशा है , उनके कार्यकाल में, आकादमी का कार्यक्षेत्र का विस्तार, हिन्दीतर दक्षिण प्रदेशों में भी विशेषतया बनी रहे । उनके प्रति विशेष अभिवादन के साथ।

प्रो परिमळा अंबेकर, अध्यक्ष,हिन्दी विभाग ,गुलबर्गा विश्वविद्यालय, कलबुर्गि -06 कर्नाटक.
सं/ 09480226677. parimalaambekar@gug.ac.in

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