हिन्दी पाठ्यपुस्तकों में स्त्री छवि

कमलानंद झा
कमलानंद झा केन्द्रीय विश्वविद्यालय बिहार में हिन्दी अध्ययन के विभागाध्यक्ष हैं. इन्होने पाठ्यक्रमों की सामाजिकी पर शोध किया है : मोबाइल : 08521912909
( कमलानंद झा इस आलेख में एन सी आर टी की पुस्तकों के हवाले से यह पड़ताल कर रहे हैं कि किस प्रकार हमारे बच्चों को बचपन से ही पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लिए अनुकूलित किया जाता है .) 
अन्य अनुशासनों में शोध और अनुसंधान की स्थिति और गति क्या है, मैं नहीं जानता। किन्तु हिंदी में शोध की गुणवत्ता से हम सभी परिचित हैं। समकालीन दौर में जो विमर्श चर्चा के केन्द्र में  है उनमें स्त्री और दलित विमर्श सर्वाधिक महत्वूपर्ण है। हम सभी लोग इस बात को लेकर खूब दुखी  हो ले सकते हैं कि आखिर आज के इस अति वैज्ञानिक युग में भी स्त्रियों के प्रति हमारी धारणा घोर पारंपरिक और प्रतिक्रियावादी क्यों है? और दुख से उबरने के लिए हम इन विषयों को केंद्र में रखकर गुरू गंभीर शोध करते और करवाते हैं। मोटी-मोटी पुस्तकें लिखते हैं। पत्रिकाओं के विशेषांक निकालते हैं, सेमिनार गोष्ठियाँ करते हैं और न जाने क्या-क्या करते हैं? लेकिन हम इस विषय पर अपेक्षाकृत बहुत कम सोच पाते हैं कि जिस उम्र में बच्चों और किशोर-किशोरियों में  विचार की निर्मिति होती है, उस समय में हम उदासीन रह जाते हैं। वही वह उम्र होती है जब सभी तरह के पारंपरिक सोच उनमें पुख्ता रूप धारण कर लेती है। तात्पर्य यह कि स्कूली पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तकों और बाल साहित्य के प्रति हमारी घोर उपेक्षा और उदासीनता पितृसत्ता पैरोकारों  को खुला चारागाह मुहैय्या करा देता है। जब वे अपनी फसल लहलहा लेते हैं तो हमें सिर धुनने और पछताने के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगता।

हम सभी जानते है कि विद्यालयी पाठ्यपुस्तकों में एनसीईआरटी सर्वाधिक गुणवत्तात्मक पुस्तकें प्रकाशित करती रही हैं। देश के सर्वाधिक विद्यार्थी इसे पढ़ते-गुनते है। अधिकांश निजी प्रकाशक इन्हीं पाठ्यपुस्तकों को अपना आदर्श मानकर पुस्तकें प्रकाशित करते है। लेकिन आप चकित और दुखी एक साथ होंगे जब बिगत दस-बीस वर्षों से प्रकाशित होने वाली पाठ्यपुस्तकों से गुजरेंगे। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के अंतर्गत जो पाठ्यपुस्तकें प्रकाशित हुई है उन्हें अगर हम थोड़ी देर के लिए छोड़ दें तो घोर निराशा होगी। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकें अगर सतीप्रथा का घोर महिमामंडन करे तो चिंतित होना स्वाभाविक है। सातवीं कक्षा के बच्चों को कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर सतीप्रथा को एक आदर्श प्रथा के रूप में  स्वीकार करने की वकालत करते है। ‘लाल अंगारों की मुस्कान’ नामक पाठ में रणथंभौर के राणा हमीर के जब सभी सैनिक खिलजी से युद्ध में मारे जाते हैं, तो लेखक महोदय बच्चों को बताते हैं कि ‘‘स्त्रियों ने फैसला किया कि हम किले के द्वार खुलने से पहले जौहर करेंगी। अब वे निश्चिंत थे। जैसे उन्हें जो करना था, वह कर चुके थे। रात को वे सब सो रहे थे सुबह जल्दी उठने के लिए और सुबह उनको जल्दी उठना था हमेशा को सोने के लिए। ऐसी जीवंत नींद रात के सितारों ने फिर नहीं देखी। यह वे आपस में अब भी कहा करते है।’’1

स्त्रियों द्वारा अपने आपको सती कर लेना-ऐतिहासिक सत्य हो सकता है लेकिन लेखक ने जिस उत्साह से इस दृश्य का वर्णन किया है वह सिर्फ ऐतिहासिक तथ्य भर नहीं है। लेखक के ही शब्दों में ‘‘पौ फटी तो सब जागे और पुरूषों ने नित्य कर्म से निवृत्त हो सबसे पहले एक चिता सजाई। स्त्रियों ने पूजन किया, कीर्तन किया अपने पतियों से मिल। पतियों ने उन्हेें प्यार से थपथपाया। उन्होंने उनके पैर छुए। आज वे अपने सर्वश्रेष्ठ श्रृंगार में  थी, जैसे जीवन की सर्वाेत्तम यात्रा पर उन्हें जाना था और यों वे दर्पदीप्त गति से चिता की ओर चली, जैसे स्वयंवर के बाद दुल्हनें अपने रथ की ओर बढ़ रही हों।2 जिस तरह से लेखक ने उपमादि अलंकारो के माध्यम से इस दृश्य का जीवंत वर्णन किया है, उनके निहितार्थ को आसानी से समझा जा सकता है। आगे की पंक्तियों में तो लखक ने इस राक्षसी प्रथा पर अपनी स्वीकृति की मुहर लगाकर एनसीईआरटी की नीतियों की धज्जियाँ उड़ा दी, ‘‘क्या आत्मा की अमरता का ऐसा विशाल और मृत्यु का इतना मनोरम विवरण इतिहास के किसी और पृष्ठ में  भी इतने प्रदीप्त रूप में  लिखा गया है?’’3 यह पाठ्यपुस्तक 1987 का संस्करण है। घोर आश्चर्य का विषय है कि एक दशक बाद सन् 1997 में सरस भारती, भाग-2 के नाम से प्रकाशित पुस्तक में  भी इस पाठ को हटाया नहीं गया। बल्कि इसके विपरीत शातिर चतुराई यह की गई कि ‘लाल अंगारों की मुस्कान’ जो प्रतीकात्मक अर्थ भी ध्वनित करता था बदलकर ‘शरणागत की रक्षा’ सदृश मानवतावादी नामकरण कर दिया गया और कुछ ‘मनोरम वर्णन’ को संपादित कर दिया गया।

ध्यान देने की बात यह है कि इन पाठ्यपुस्तकों के प्रकाशन से बहुत पहले यानि सन् 1975 में ही एनसीईआरटी की राष्ट्रीय परिसंवाद आधारित पुस्तक ‘स्टेटस आॅफ वीमेन’ में  बहुत सिद्दत से महसूस किया गया था कि ‘‘समाज में  औरतों के संबंध में दुष्प्रचारित मिथकों, प्रतीकों, लोकोक्तियों और कहावतों का समूल बहिष्कार किया जाना चाहिए।’’4 किन्तु कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर सरीखे विद्वानों के लिए इन पुस्तकों का कोई मूल्य-महत्त्व नहीं। सौतेली माँ का मिथ स्त्री उपेक्षा, चरित्र-हनन और स्त्री शोषण का सबसे कारगर हथियार है। कदाचित आज तक ऐसा कोई सर्वे या अनुसंधान नहीं हुआ है जो सौतेली माँ को खलनायिका प्रमाणित करे। किन्तु शायद ही हिन्दी की कोई पाठ्यपुस्तक होगी जिसमें सौतेली माँ के बहाने स्त्री को जलील न किया जाता हो। मैंने अपने शोध के दरम्यान सिर्फ 25 सौतेली माताओं से मिला तो उसका नतीजा आश्चर्यजनक था। सौतेली मां की हृदय विदारक पीड़ा यह थी कि उनके लिए ‘दूध-माछ’ दोनों हानिकारक था। उन्होंने कहा कि यदि मैं अपेन सौतेले बेटे को कुछ नहीं कहती हूँ और अगर वह शरारत करता है तो लोग कहते हैं कि सौतेली माँ है न? हमारे पड़ोस की महिला अपनी संतान को खूब मारती-पिटती है किन्तु उसे कोई कुछ नहीं कहता।

एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक भी इस मिथ का शिकार रही है। हिन्दी के परमादरणीय विद्वान आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का एक निबंध नौवी कक्षा की पाठ्यपुस्तक पराग भाग-एक में संकालित है। 1989 में प्रकाशित ‘आत्मनिर्भरता’ नामक पाठ का आरंभ ही इन पंक्तियों से होता है, ‘‘नम्रता ही स्वतंत्रता की धात्री व माता है। लोग भ्रमवश अहंकार वृत्ति को उसकी माता समझ बैठते हैं, पर वह उनकी सौतेली माता है जो उनका सत्यानाश करती है।’’5 आचार्य शुल्क ने सौतेली माता को बच्चों का सत्यानाश करने वाली माना हैं। गनीमत है कि आगे उन्होंने इस सूत्र वाक्य को विस्तार नहीं दिया है। अभ्यास प्रश्न बनाने वालों को मानो इन दो पंक्तियों में ज्ञान की कुंजी मिल गई। सिर्फ इन दो पंक्तियों के आधार पर दो-दो सवाल पुस्तक में पूछे गए है: सवान नं.-1 ‘‘अहंकार वृत्ति सौतेली माता कैसे है?’’6 पाठ्यपुस्तक मंे इस प्रश्न के उत्तर का संकेत कहीं नहीं है। दावे के साथ कहा जा सकता है कि इस प्रश्न का उत्तर प्रश्न बनाने वाला भी नहीं कर सकता है?

सवाल नं.-2 ‘‘सौतेली माता अपने सौतेले पुत्रों को कैसे हानि पहुँचाती है?’’7 सवाल में इस उत्तर का स्पेस ही नहीं छोड़ा गया कि बच्चे यह लिखें कि कई सौतेली माताएँ ऐसी भी होती हैं जो कभी भी अपनी संतान को हानि पहुँचाती है। अभ्यास में पूछे गए प्रश्न के आधार पर ऐसे बच्चों की दुर्दशा की कल्पना की जा सकती है जिनकी सौतेली माँ बहुत अच्छी होंगी। ऐसे पाठों की संख्या भी कम नहीं है जो स्त्रियों को पति को परमेश्वर मानने की सीख देता है। यह मात्र संयोग नहीं है कि प्रो. कृष्ण कुमार को एक बच्ची का काँपी में लिखे प्रश्नोत्तर आज भी याद है जिसमें लिखा हुआ था - ‘‘सावित्री को आदर्श स्त्री क्यों कहा जाता है?’’8 उत्तर में  बच्ची ने लिखा था - ‘‘क्योंकि वह पतिव्रता नारी थी।’’9 उस बच्ची के लिए एक स्त्री का आदर्श सिर्फ और सिर्फ पतिव्रता होना है।

पाठ्यपुस्तकों में स्त्रियों और दलितों की अनुपस्थिति और हशिये पर उनकी दयनीय उपस्थिति का गहरा राजनीतिक सरोकार है। पुरुष वर्चस्व और सवर्ण वर्चस्व का सत्ता के साथ साँठ-गाँठ सर्वविदित तथ्य है। सीधे-सीधे राजनीति पर निम्न जातियों और दलितों का उभार तो वोट का समीकरण है। इस तरह की मानसिकता वाले रचनाकारों का सीधा प्रयास यह होता है कि भारत की संस्कृति को एक तथाकथित पुरुष-सवर्ण हिंदू संस्कृति के रूप में तब्दील कर दिया जाय। इसके लिए पाठ्यपुस्तक में हर प्रकार के गैर ब्राह्मणवादी और स्त्रियों के योगदान को झुठलाने की कोशिश की जाती है।

इसका पक्का प्रमाण पाठ्यपुस्तकों में विन्यस्त जीवन-चरित परक पाठ है। राम, कृष्ण, आदि खास तरह के मिथकीय चरित्रों से पाठ्यपुस्तक भरी होती है। उसमें गैर हिंदू, गैर-सवर्ण और गैर स्त्री चरित्र हाशिये पर भी शायद ही दिखें। जबकि दलितों और स्त्रियों मंे चरित नायकों की कमी नहीं है। देश के विभिन्न अंचलों में प्रचालित लोक गाथाओं के लगभग सभी चरित्र दलित वर्ग से आते है। जैसे सलहेस, दुलरादयाल, दीनाभ्रदी, सती मंजरी आदि। लेकिन ये पाठ्यपुस्तक में  नहीं आ सकते। देश की अधिकांश जनता जिन लोक गाथाओं और लोक संस्कृतियों में जीती है, उन्हें पाठ्यपुस्तकों में  फटकने न देना एक खास तरह की राष्ट्रीयता की अवरधारणा को सर्वानुमति प्रदान कराने का चालाक तरीका है। शिक्षाविद कृष्ण कुमार ने इसका तीखा विरोध करते हुए लिखा है, ‘‘अपनी सांस्कृतिक विरासत के सांचे में  डालने, अपने अतीत के गौरव में जीने और उसे जिलाने तथा अपने मिथकीय आख्यानों पर राष्ट्रीयता का मुलम्मा चढ़ाने की चेष्टाएँ एक भाग्यवादी मानसिकता से ही उत्पन्न होती है। राम, कृष्ण दुष्यंत कितने ही महान क्यों न रहे हों अंततः वे उस व्यवस्था के अंग के जिसमें राजा के जीवन, जन्म, विवाह और मरण उनक अतिविशिष्ट सामाजिक स्थिति के परिचायक होते थे।10
ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि एनसीईआरटी के इन पाठ्यपुस्तकों में स्त्रियों की ऐसी ही घिसी-पिटी स्टीरियो  टाइप छवि से हमारा साक्षात्कार होता है बल्कि कई स्थानों पर स्त्रियों की छवि काफी प्रभावशाली भी दिखती है। किंतु कठिनाई यह है कि इन पाठ्यपुस्तकों में  दलितों और स्त्रियों के व्यक्तित्व विश्लेषण में  वैचारिक सुसम्बद्धता और परिपक्वता की घोर कमी है। सुखद तथ्य यह है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 के अन्तर्गत प्रकाशित होने वाली पाठ्यपुस्तकों में इन कमियों को बहुत हद तक दूर करने की सफल चेष्टा की गई है। इन पाठ्यपुस्तकों में  सर्वाधिक ध्यान देने वाली बात यह है कि पाठों के चयन में रचनाकार की ‘महानता’ को शर्त नहीं माना गया है। पाठों के चयन में शुचिता से अधिक संवेदना की सच्चाई और गहराई पर ध्यान दिया गया है। पाठ्यक्रम में  दो टूक कहा गया है कि ‘‘स्त्रियों की आवाज को अपनी दमक ऐश्वर्य एवं विविधता के साथ हमारी पाठ्यपुस्तकों तथा शिक्षण पद्धतियों में महत्वपूर्ण स्थान देने की आवश्यकता है।12 यही कारण है की जहाँ
 सातवीं की पुरानी पाठ्यपुस्तक औरतों के सती होने से उल्लसित थी वहीं नयी पाठ्यपुस्तक क्षितिज की चपला देवी 1857 के महासंग्राम में अंग्रेजों के खिलाफ जंग छेड़ देती है और अंग्रेज उसे जला डालते हैं। वह पति की मृत्युपरांत यौन शुचिता हेतु यहाँ जौहर नहीं करती बल्कि देश की आजादी हेतु मरना स्वीकार करती है। यह फर्क है दोनों पाठ्यपुस्तकों में। एक पाठ्यपुस्तक में वह अबला है, निरीह है तो दूसरी में वह अंग्रेजों से लड़ने के लिए कमर कसती है।

ग्यारहवीं की नयी आधार पाठ्यपुस्तक आरोह तथा अंतरा पुरानी पाठ्यपुस्तकों को  धता बताते हुए उभरते हुए किशोर-किशारियों को दलित और स्त्री विमर्श से साक्षात्कार कराती है। जड़ परंपरा और खास तरह की शुद्धतावादी-पवित्रतावादी अवधारणा के बरक्स सिक्के के दूसरे पहलू से कदाचित पहली बार विद्यार्थियों को रू-ब-रू कराने की कोशिश् की गई है। ऐसे दलित  और स्त्री विमर्श के पाठों को पढ़ाने में सर्वाधिक कठिनाई शिक्षकों को होगी। इन पाठों को पढ़ाते हुए शिक्षकों को सर्वप्रथम अपने-आप से जूझना होगा। आज तक वे जिस सांचे में सोच-विचार रहे थे, थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ वही पढ़ा भी रहे थे। उन्हें पहली बार इन पंक्तियों को पढ़ाना पड़ेगा कि, ‘‘सच का सवेरा होते ही वेद डूब गए, विद्या शूद्रों के घर चली गई। भू देव ब्राह्मण शरमा गए।’’13 जिस वेद का यशोगान करते-करते उनकी जिह्वा थकती नहीं थी उन्हें ज्योतिबा फुले  के बारे में पढ़ाना पड़ेगा और जब उन्हें  ज्योतिबा फुले  सरीखे अद्भुत व्यक्ति की जीवनी पढ़ानी पड़ेगी तो उन्हें यह भी पढ़ाना पड़ेगा कि कैसे समाज सुधारकों की सूची से तथाकथित सम्भ्रान्त उच्च वर्ण के समीक्षकों/विद्वानों ने महात्मा फूले का नाम गायब कर दिया। पाठ्यपुस्तक के अनुसार, ‘‘यह ब्राह्ममणी मानसिकता की असिलयत का पर्दाफाश करता है। (अंतरा भाग-1) इस पाठ में ज्योतिबा फुले  के शब्दों में ‘‘यदि आधुनिक शिक्षा का लाभ सिर्फ उच्च वर्ण को मिलता है तो उसमें शूद्रों का क्या स्थान रहेगा? गरीबों से कर जमा करना और उसे उच्च वर्णाें के बच्चों की शिक्षा पर खर्च करना किसे चाहिए ऐसी शिक्षा?14

पहले की पाठ्यपुस्तकों में भी प्रेमचंद की कहानिायाँ संकलित होती रही है किन्तु कबीर और प्रेमचंद की रचना संकलन में संपादक अतिरिक्त सावधानी बरते रहे हैं। पंच परमेश्वर, ईदगाह तथा दो बैलों की कथा ही बच्चों को पढ़ने लायक समझा जाता रहा। ‘आरोह’ में प्रेमचंद की कहानी ‘दूध का दाम’ जाति प्रथा की अमानवीयता को
 तार-तार करती निकलती है। अंतरा भाग-एक में सुप्रसिद्ध हिन्दी दलित कथाकार ओमप्रकाश बाल्मीकि की कहानी ‘खानाबदोश’ मजदूर वर्ग के शोषण, यातना और जाति विभेद की समस्या का समाजशास्त्रीय विश्लेषण करती है। दलित साहित्य के नाम से ही बिदकने वाले हिन्दी के अति शुचितावादी साहित्यकारों और शिक्षकों को ऐसी कहानियों को पढ़ाने में काफी परेशानी होगी। अपने को वर्गच्युत किए वगैर इन रचनाओं को पढ़ा पाना संभव नहीं है। अंतरा में ही श्रीकांत वर्मा की कविता ‘हस्तक्षेप’ केवल राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था में हस्तक्षेप करती कविता नहीं है बल्कि हिन्दी पाठ्यपुस्तक में हस्तक्षेप करती कविता है। वास्तव में प्रो. कृष्ण कुमार के निर्देशन मंे यह ऐसा हस्तक्षेप है जो बकोल श्रीकांत वर्मा ‘एक बार शुरू होने पर कहीं नहीं रूकता हस्तक्षेप’। और इसी हस्तक्षेप की अगली कड़ी है धूमिल की कविता ‘मोचीराम’ जिसकी नजर में
न कोई छोटा है, न कोई बड़ा
मेरे लिए, हर आदमी एक जोडी जूता है
जो मेरे सामने मरम्मत के लिए खड़ा है।15



इस दृष्टि से रहा-सहा कसर पांडेय वेचन शर्मा उग्र की आत्मकथा ‘अपनी खबर’ पूरा कर देती है। इस आत्मकथा के मार्फत ब्राह्मणवाद की सारी कुलीनता श्रेष्ठता पछाड़ खाकर गिर पड़ती है। यही वजह है कि इन पाठों के विरोध में कुछ खास तरह के लोगों ने जोरदार विरोध किया। इस विरोध के कारण एनसीईआरटी को तत्काल कुछ पाठों को संकलन से हटाना पड़ा।सारे विरोध के बावजूद इन पाठ्यपुस्तकों में  दलित और स्त्री उपस्थिति उम्मीद जगाती है। हम सभी जानते है कि अगर दुनिया सुंदर है, सुविधापूर्ण है तो उसमें दलितों का सर्वाधिक योगदान है। लेकिन पूर्व के पाठ्यपुस्तकों में उनके इस महत्वूपर्ण योगदान को रेखांकित नहीं  किया गया था। आठवीं की नयी पाठ्यपुस्तक वसंत-भाग-तीन में सुभाष गताडे का एक पाठ है-‘पहाड़ से ऊँचा आदमी’। गया जिले के गेलौर गाँव में 1934 ई. में एक ऐसे सख्श का जन्म हुआ, जिसके कारनामे चकित ही नहीं दंग भी करते है। घोर दलित दशरथ मांझी ने 360 फीट लंबा और 30 फीट चैड़ा पहाड़ काट कर रास्ता बनाने का ऐतिहासिक काम किया। गेलौर गाँव से अस्पताल 80 किलोमीर दूर था। दशरथ मांझी ने बुलंद हौसले के बदौलत 30 वर्षाें में उस रास्ते को घटाकर महज 13 किलोमीटर मंे तब्दील कर दिया। दूरी की वजह से देर से अस्पताल पहुंचने के कारण दशरथ मांझी की पत्नी उस पहाड़ी रास्ते मंे दम तोड़ दी थी। उसी दिन उसने तय किया कि अब कोई दूरी की वजह से नहीं मरेगा ‘नया दौर’ फिल्म मंे साहिर लुधियानवी के गीत -
फौलादी है सीने अपने फौलादी हैं बाहें
हम चाहें तो चट्टानों में पैदा कर दें राहें।
को दशरथ माँझी ने सच साबित कर दिया। कदाचित इसीलिए पाठ्यपुस्तक में इस फिल्मी गीत को भी संकलित किय गया है। आज जब हम लड़कियों को साइकिल चलाते देखते हैं तो वह सामान्य-सी बात लगती है, किन्तु लड़कियों में आत्मविश्वास और साहस का संचार करने में  साइकलिंग की भूमिका अत्यंत महत्वूपर्ण है। इसी पाठ्यपुसतक में ‘जहाँ पहिया है’ नाम से एक ऐसा पाठ संकलित है जो तमिलनाडु के पडुकोट्टई गाँव में  साइकिल के माध्यम से हुए सामाजिक आंदोलन की रोचक और रोमांचक घटना को रेखांकित करता है। बारहवीं की पाठ्यपुस्तक वितान भाग-2 में ऐन फ्रैंक के डायरी अंश ‘द डायरी आॅफ ए गर्ल’ तथा इसी कक्षा की पूरक पाठ्यपुस्तक वितान, भाग-एक में बेबी हालदार का ‘आलो आंधारि’ (अंधेरे का उजाला) का अंश स्त्री विमर्श पर छात्र-छात्राओं को नयी रौशनी प्रदान करेगी। कक्षा नौ की पाठ्यपुस्तक में सर्वप्रथम एवरेस्ट पर चढ़ने वाली महिला बचेंद्रीपाल पर आधारित पाठ लड़कियों में यह विश्वास दिलाने में सफल होगा कि दुनिया का कोई भी काम स्त्रियों के लिए असंभव नहीं है। ज्योतिबा फूले सन् 1840 के आस-पास इस बात को समझ रहे थे कि स्त्री पराधीनता के बीज तत्व विवाह और वैवाहिक मंत्रों में निहित हैं। इसलिए उन्होंने विवाह के नये मंत्र बनाने शुरू किए। ज्योतिबा फूले की जीवनी पर आधारित पाठ में उनके द्वारा निर्मित कुछ मंत्रों का उल्लेख किया गया है। उसमें एक मंत्र  इस प्रकार है, ‘‘स्वतंत्रता का अनुभव हम स्त्रियों में है ही नहीं। इस बात की आज हम शपथ लें कि स्त्री को उसका अधिकार देंगे और उसे अपनी स्वतंत्रता   का अनुभव करने देंगे।’’



ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या-2005 के अंतर्गत प्रकाशित सभी पाठ्यपुस्तकें बिल्कुल ठीक और चुस्त-दुरूस्त है, उसमें भी अपेक्षित सुधार की आवश्यकता है। बच्चों की पाठ्य सामग्री अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। हम सबों को इन सामग्रियों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। अगर हमें बच्चों का बचपना, बचाकर रखना है, उन्हें स्वस्थ लोकतांत्रिक नागरिक बनाना है तो इसके लिए हम सबों को सामूहिक प्रयास करना होगा।’’ ‘अरोह’ पाठ्यपुस्तक में संकलित निर्मला पुतुल के शब्दों में -
इस अविश्वास भरे दौर में
थोड़ा - सा विश्वास
थोड़ी सी उम्मीद
थोड़े से सपने
आओ मिलकर बचाएँ
कि इस दौर में भी बचाने को
बहुत कुछ बचा है,
अब भी हमारे पास।17


संदर्भ स्रोत:
1. किशोर भारती, भाग-2, एनसीईआरटी 1987, पृ. 120
2. उपर्युक्त, पृ. 120.
3. उपर्युक्त,
4. इमेज आॅफ वूमेन एंड कैरिकुलम इन मदर टंग-एनसीईआरटी 1991, पृ. 17.
5. पराग भाग-एक, एनसीईआरटी 1989, पृ. 17.
6. उपर्युक्त.
7. उपर्युक्त.
8. राज, समजा और शिक्षा कृष्ण, कुमार, राजकमल प्रकाशन, 1999, पृ. 91-92.
9. उपर्युक्त
10. परिप्रेक्ष्य, नीपा, वर्ष-1, अंक-1, पृ. 21.
11. भाषाओं को पढ़ाने के लिए पाठ्यक्रम, मई 2005, हिन्दी, एनसीईआरटी पृ.8
12. अंतरा, भाग-एक, एनसीईआरटी, 2006, पृ. 56
13. उपर्युक्त, पृ. 57.
14. उपर्युक्त, पृ. 173.
15. उपयुक्त, पृ. 58.
16. आरोह, एनसीईआरटी, 2006 पृ. 181.
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